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भारत के लिए कैसे बड़ी मुसीबत बन सकता है ईरान पर हमला!

भारत भले ही तेल के लिए ईरान पर निर्भर नहीं है, लेकिन जानकारों का कहना है कि दुनियाभर में तेल की कीमतों में होने वाली किसी भी बढ़ोतरी का असर देश के कई बड़े उद्योगों पर पड़ेगा

More Carriers, Wider Theatre: US Buildup Around Iran Dwarfs Venezuela Episode
अमेरिका जंगी जहाजों की तैनाती से ईरान पर लगातार दबाव बढ़ा रहा है (सांकेतिक फोटो)
अपडेटेड 25 फ़रवरी , 2026

पश्चिमी एशिया में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं. जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें होंगी. तेल महंगा होने का सीधा और बुरा असर उन सभी सेक्टरों पर पड़ेगा जो तेल से जुड़े हैं, जैसे कि स्पेशलिटी केमिकल्स, पेंट्स, पेट्रोकेमिकल्स और सिंथेटिक कपड़े.

विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर अमेरिका ने तेहरान पर हमला किया, तो कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं. वैश्विक बाजारों में ब्रेंट क्रूड के दाम पहले ही चढ़ रहे हैं और 20 फरवरी को यह 70 डॉलर का आंकड़ा पार कर गया था. 23 फरवरी को यह 72 डॉलर के करीब ट्रेड कर रहा था.

सावधानी के तौर पर, तेहरान में भारतीय दूतावास ने वहां रह रहे भारतीयों को जल्द से जल्द देश छोड़ने की सलाह दी है. 23 फरवरी को जारी यह एडवायजरी ईरान के कुछ हिस्सों में हो रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच आई है.

'ब्लूमबर्ग' के एक अनुमान के मुताबिक, अगर फरवरी से ईरान का तेल बाजार से पूरी तरह बाहर हो जाता, तो 2026 की दूसरी तिमाही तक तेल की कीमतें औसतन 71 डॉलर रह सकती थीं. लेकिन अगर यह संकट पूरे साल बना रहा, तो 2026 की आखिरी तिमाही तक कीमतें औसतन 91 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं.

भारत के लिए यह गणित काफी महंगा है. कच्चे तेल की कीमत में सिर्फ 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का सालाना इम्पोर्ट बिल करीब 1 अरब डॉलर बढ़ जाता है. भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 85 फीसद तेल विदेशों से मंगवाता है. वित्त वर्ष 2025 में भारत ने अलग-अलग देशों से 161 अरब डॉलर का तेल इम्पोर्ट किया था.

भारत ने काफी पहले ही ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था, जब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अपने पहले कार्यकाल में उस पर पाबंदी लगाई थी. इसलिए, ईरान से जुड़े सैन्य तनाव का भारत पर कोई सीधा असर नहीं होगा. लेकिन, अगर भारत को ऊंचे दामों पर तेल खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा, तो इससे सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा और राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ जाएगा.

भारत के लिए एक और मुश्किल यह है कि अमेरिका के दबाव में उसे रूस से मिलने वाले सस्ते तेल का फायदा भी कम होता जा रहा है. वित्त वर्ष 2025 में करीब 56.9 अरब डॉलर के तेल के साथ रूस भारत को तेल देने वाला सबसे बड़ा देश था. लेकिन अब वहां से इम्पोर्ट घट रहा है. वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर 2025) में रूस से तेल का इम्पोर्ट साल-दर-साल 14 फीसद गिरकर 23.1 अरब डॉलर रह गया है.

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तेल की बढ़ती कीमतों से रिफाइनिंग और एविएशन के साथ-साथ केमिकल, पेंट और सिंथेटिक टेक्सटाइल जैसे सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं. इसके अलावा, बासमती चावल, फल और सूखे मेवों के व्यापार पर भी असर पड़ सकता है.

ईरान के साथ भारत का सीधा व्यापार बहुत कम है. पिछले साल के कुल एक्सपोर्ट्स में ईरान की हिस्सेदारी मात्र 0.3 फीसद और इम्पोर्ट्स में 0.1 फीसद से भी कम थी. हम मुख्य रूप से वहां बासमती चावल भेजते हैं और वहां से फल व मेवे मंगवाते हैं.

क्रिसिल की रिपोर्ट कहती है कि चूंकि दुनिया के कुल कच्चे तेल की सप्लाई में ईरान का हिस्सा 4-5 फीसद है, इसलिए वहां उत्पादन रुकने से कीमतें आसमान छू सकती हैं. भारत की तेल पर भारी निर्भरता को देखते हुए यह चिंताजनक है. असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ये कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल पाती हैं या नहीं.

भारतीय बासमती चावल के लिए ईरान तीसरा सबसे बड़ा बाजार है, जहां हमारे कुल एक्सपोर्ट का करीब 13 फीसद हिस्सा जाता है. हालांकि, चूंकि वहां चावल मुख्य भोजन है, इसलिए मांग में बहुत ज्यादा कमी आने की आशंका कम है.

लेकिन लंबे समय तक अशांति रहने से सप्लाई चेन बाधित हो सकती है और ईरान की कंपनियों से पेमेंट मिलने में देरी हो सकती है, जिससे भारतीय निर्यातकों के पास नकदी की कमी हो सकती है. जहां तक ईरान से आने वाले फल और मेवों की बात है, तो ये कोई एसेंशियल गुड्स नहीं हैं, इसलिए सप्लाई रुकने पर इनकी मांग भी तुरंत गिर सकती है.

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