16 फरवरी को राजस्थान के भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (ACB) ने जयपुर में भ्रष्टाचार में लिप्त एक गिरोह का भंडाफोड़ किया. यह गिरोह देखने में भले ही छोटा लगता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर रेबीज नियंत्रण के अभियान में बड़े गड़बड़झाले को उजागर करता है.
एक शिकायत के आधार पर कार्रवाई करते हुए ACB ने जयपुर नगर निगम (JMC) के संविदा कंप्यूटर ऑपरेटर जितेंद्र सिंह को गिरफ्तार किया. कंप्यूटर ऑपरेटर को 15 लाख रुपए की रिश्वत की पहली किस्त के रूप में कथित तौर पर 4 लाख रुपए लेते हुए पकड़ा गया.
जांचकर्ताओं के अनुसार, यह राशि JMC के दो पशु चिकित्सा अधिकारियों के लिए थी. इन अधिकारियों को यह रकम आवारा कुत्तों के नसबंदी एवं टीकाकरण रिकॉर्ड (यूट्रस/टेस्टिकल्स की गिनती और बिल फॉरवर्डिंग) को प्रमाणित करने के बदले में दी जानी थी.
भारत में पशु जन्म नियंत्रण (Animal Birth Control - ABC) कार्यक्रम के तहत यह अभियान चलाया जा रहा था. नसबंदी के बाद बिल पास करने से पहले निकाले गए अंडाशय और अंडकोष की गिनती प्रमाण के तौर पर अनिवार्य है, और इस पूरी प्रक्रिया को संबंधित पशु चिकित्सा अधिकारियों द्वारा प्रमाणित एवं फॉरवर्ड किया जाना था.
शिकायतकर्ता एक ठेकेदार है, जिसे जयपुर में आवारा कुत्तों की नसबंदी और एंटी-रेबीज टीकाकरण का ठेका मिला हुआ था. उसने आरोप लगाया कि ईमानदारी से काम पूरा करने के बावजूद, भुगतान के लिए उसके बिल आगे नहीं भेजे जा रहे थे.
ACB के मुताबिक, JMC हेरिटेज में एक अधिकारी ने लंबित बिल पास करने के बदले 12 लाख रुपए की मांग की, जबकि JMC ग्रेटर में दूसरे अधिकारी ने कथित तौर पर बिल पास करने के लिए नवंबर-दिसंबर 2025 के लिए प्रति माह 2 लाख रुपए की मांग की. इतना ही नहीं, जनवरी 2026 से यह राशि बढ़कर 3.5 लाख रुपये प्रति माह हो गई. कुल मिलाकर दोनों अधिकारियों की मांग 15 लाख रुपए की थी.
जयपुर में पूछताछ के बाद दो पशु चिकित्सा अधिकारियों समेत सभी गिरफ्तारियां भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत की गईं, लेकिन इस सनसनीखेज ऑपरेशन के पीछे एक परेशान करने वाला सवाल छिपा है. अगर नसबंदी कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं और फंड भी वितरित किए जा रहे हैं, तो भारत की सड़कों पर आवारा कुत्तों की संख्या और कुत्ते के काटने के मामलों में बढ़ोतरी क्यों हो रही है?
एक ध्यान रखने वाली बात यह है कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्यों को कुत्तों की नसबंदी के बारे में "मनगढ़ंत" और "अस्पष्ट" आंकड़े पेश करने के लिए फटकार लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारी की बेंच ने कई हलफनामों को "बिल्कुल दिखावा" बताया. झारखंड में दो महीनों में 189,000 कुत्तों की नसबंदी करने के दावे को भी भ्रामक और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया आंकड़ा बताया गया.
इस मामले में अदालत ने गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी और यहां तक कि मुख्य सचिवों को तलब करने का संकेत भी दिया. देश भर में कुत्तों के काटने की घटनाओं में वृद्धि के कारण जनता के गुस्से पर अदालत ने निराशा जाहिर की.
साथ ही अदालत ने कहा कि अगर आंकड़े फर्जी हैं, तो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह पता लगाना है कि नसबंदी पर खर्च किया गया पैसा कहां गया? केंद्र सरकार के एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) पोर्टल पर अपलोड किए गए आंकड़े कुछ इस तरह से लिखे हैं : 2022 में कुत्तों के काटने के 21 लाख मामले दर्ज किए गए.
2023 में यह आंकड़ा बढ़कर 30.50 लाख और 2024 में 30.71 लाख हो गया. जनवरी 2025 में महज एक महीने में कुत्तों के काटने के मामले 4.29 लाख पर पहुंच गए. ये आंकड़े डराने वाले हैं क्योंकि इस हिसाब से अगर कुत्तों के काटने की संख्या में गिरावट नहीं आती तो यह आंकड़ा बीते साल के मुकाबले काफी ज्यादा हो सकता है.
2024 में महाराष्ट्र में 485,000, तमिलनाडु 480,000, गुजरात 392,000, कर्नाटक 361,000 और बिहार में 263,000 कुत्तों को काटने से जुड़े चौंकाने वाले आंकड़े दर्ज किए गए. राजस्थान में ही कुत्ते के काटने के मामले 2022 में 88,029 से बढ़कर 2024 में 1,40,000 हो गए.
हालांकि, आधिकारिक तौर पर रेबीज से होने वाली मौतों की संख्या कम है. 2024 में रेबीज के कारण 54 लोगों की मौत हुई. फिर भी इनकी संख्या को व्यापक रूप से कम बताया जाता है. समय पर टीकाकरण से एक भी मौत को पूरी तरह से रोका जा सकता है.
ऐसी भी खबरें हैं कि अप्रभावी रेबीज रोधी टीकों का उपयोग किया जा रहा है और भंडारण के लिए कोल्ड चेन का इस्तेमाल नहीं हो रहा. इसके अलावा, बहुत कम लोग जानते हैं कि किसी आवारा कुत्ते के नाखून से खरोंच लगने से भी रेबीज हो सकता है. इतना ही नहीं, टीका लगाने के बाद भी अगर कोई कुत्ता बाकी आवारा कुत्तों के साथ रहता है तो वह टीकाकरण के बावजूद रेबीज फैला सकता है.
विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर नसबंदी और टीकाकरण दावों के मुताबिक काम कर रहे होते, तो काटने के मामलों में वृद्धि के बजाय स्थिरता या उनमें गिरावट आनी चाहिए थी. केंद्र सरकार का कहना है कि ABC कार्यक्रम का गहन कार्यान्वयन ही एकमात्र "तर्कसंगत और वैज्ञानिक" समाधान है.
पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 के तहत कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करके उन्हें उनके मूल क्षेत्रों में वापस छोड़ा जाना है. इसका तर्क पारिस्थितिक है. इसका मतलब यह माना जाता है कि नसबंदी किए गए कुत्ते अपने क्षेत्र पर कब्जा रखते हैं और बिना नसबंदी वाले कुत्तों को अपने क्षेत्र में प्रवेश करने से रोकते हैं.
राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (NRCP) कार्यक्रम को 2030 तक कुत्तों के काटने से होने वाले रेबीज को जड़ से खत्म करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ शुरू किया गया है. इस योजना के तहत केंद्र राज्यों को टीके, प्रशिक्षण, रेबीज-रोधी क्लीनिकों के मॉडल और निगरानी के जरिए सहायता प्रदान करता है.
2019 से अब तक 166,000 से ज्यादा स्वास्थ्य कर्मियों को रेबीज से लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जा चुका है. 279 रेबीज-रोधी क्लीनिकों के मॉडल कार्यरत हैं. कुछ चुनिंदा राज्यों में रेबीज हेल्पलाइन (15400) शुरू की गई है.
फिर भी, केंद्र सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि उसने कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने में ABC कार्यक्रम की प्रभावशीलता का कोई औपचारिक राष्ट्रव्यापी मूल्यांकन नहीं किया है. कार्यक्रम का कार्यान्वयन व्यापक रूप से अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग रहा है. बेंगलुरु में 2019 और 2023 के बीच आवारा कुत्तों की संख्या में मामूली 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. कई अन्य शहरों में तो विश्वसनीय आधारभूत आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं.
जयपुर मामले से पता चलता है कि भ्रष्टाचार किस तरह इस पूरे कार्यक्रम को उसके सबसे महत्वपूर्ण चरण यानी सत्यापन केदौरान खोखला कर सकता है. निकाले गए कुत्तों के अंडकोष की गिनती कोई घिनौनी रस्म नहीं है. यह ऑडिट का एक तरीका है. इसके बिना, नसबंदी के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताए जा सकते हैं. ठेकेदार अधिक संख्या का दावा कर सकते हैं और अधिकारी अधूरे काम के लिए बिल पास कर सकते हैं.
जयपुर के इस मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसने ईमानदारी से काम किया और रिश्वत देने से इनकार कर दिया. वहीं, संभव है कि झारखंड के मामले में नसबंदी के बिना भी रिश्वत ली गई हो. राजस्थान में जांचकर्ता इस बात की जांच कर रहे हैं कि आरोपी अधिकारियों ने तकनीकी रूप से अपना कार्यकाल पूरा कर लिया था, लेकिन वे ऐसे पदों पर बने रहे जिससे बिलों के निपटान पर उनका नियंत्रण बना रहा.
ठेकेदार का आरोप है कि उसे बताया गया था कि ईमानदारी से काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि रिश्वत तो वैसे भी देनी ही है. उसका कहना था कि पैसा ऊपर के अधिकारियों तक जाएगा. इसलिए, अगर प्रमाणन ही रिश्वतखोरी का जरिया बन जाता है, तो नसबंदी जनसंख्या नियंत्रण के बजाय कागजी कार्रवाई बनकर रह जाती है.
यहां नीतिगत विरोधाभास क्रूर है. सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार आवारा कुत्तों के नसबंदी, स्कूलों और अस्पतालों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से पशुओं को दूसरे जगहों पर स्थानांतरित करने पर जोर दिया है. वहीं दूसरी ओर कोर्ट ने गैरकानूनी पशु वध और हिंसक भीड़ के जरिए की जाने वाली कार्रवाइयों पर कड़ा रुख अपनाया है.
आवारा कुत्तों को नसबंदी के लिए पकड़ना आसान नहीं है. वे अपने क्षेत्र को लेकर संवेदनशील और सतर्क रहते हैं. मानवीय तरीके से पकड़ने के लिए प्रशिक्षित टीमों, जालों और स्थानीय भोजन उपलब्ध कराने वालों के साथ समन्वय की आवश्यकता होती है. ये लोग कुत्तों के समूह के व्यवहार को समझते हों. अगर ठीक से न संभाला जाए तो इस दौरान कुत्तों या पकड़ने वालों को चोट लग सकती है.
वन्यजीव अभियानों में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली बेहोश करने वाली डार्ट गनों का इस्तेमाल सुरक्षा जोखिमों के कारण घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में कम ही किया जाता है. इनके इस्तेमाल में सटीकता और चिकित्सा पर्यवेक्षण की आवश्यकता होती है. भारत का ABC मॉडल काफी हद तक मैन्युअल रूप से कुत्तों को पकड़ने पर निर्भर करता है.
जब नगरपालिका की टीमों में कर्मचारियों की कमी होती है या वे अपर्याप्त रूप से प्रशिक्षित होते हैं, तो परिणाम विपरीत भी हो सकता है. कई बार भ्रष्टाचार के कारण भी ये योजनाएं असफल हो जाती हैं. इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट की हवा में महल बनाने वाली तीखी टिप्पणी एक गहरी समस्या को दिखाती है. कोर्ट ने पाया कि आंकड़े भले ही हजारों कुत्तों की नसबंदी दिखाते हों, लेकिन हकीकत कुछ और ही है.
असम में 2024 के दौरान कुत्तों के काटने की 166,000 घटनाएं दर्ज की गईं, फिर भी अदालत को बताया गया कि वहां केवल एक ही कुत्ता नियंत्रण केंद्र है. जिन राज्यों में कुत्तों की अनुमानित आबादी अपेक्षाकृत कम है, वहां भी नसबंदी के आंकड़े अविश्वसनीय रूप से अधिक प्रतीत होते हैं.
स्वतंत्र ऑडिट के बिना तीसरे पक्ष के जरिए सत्यापन, GPS-टैग किए गए कैप्चर डेटा, फोटोग्राफिक साक्ष्य, माइक्रोचिप की डिजिटल ट्रैकिंग- ABC कार्यक्रम में हेरफेर की संभावना बनी रहती है. कुत्ते के काटने के मामलों में वृद्धि से प्रत्यक्ष रूप से वित्तीय और स्वास्थ्य संबंधी लागतें आती हैं.
सरकारी केंद्रों में रेबीज रोधी टीके और इम्युनोग्लोबुलिन मुफ्त में उपलब्ध कराए जाते हैं, लेकिन समय-समय पर इनकी कमी की खबरें आती रहती हैं. संपर्क में आने के बाद समय पर उपचार कराना आवश्यक है और देरी घातक हो सकती है.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी योजनाओं और शासन को लेकर लोगों का अविश्वास बढ़ता है. निवासी अधिक कुत्ते देखते हैं, काटने की घटनाओं के बारे में सुनते हैं और आधिकारिक दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं. इससे पशु अधिकार समूहों और निवासी कल्याण संघों के बीच बहस का मुद्दा बदल जाता है और अक्सर बात दुश्मनी तक पहुंच जाती है.
जयपुर में हुई गिरफ्तारियों से यह बात स्पष्ट होती है कि भ्रष्टाचार केवल धन की बर्बादी ही नहीं है, बल्कि यह शासन-प्रशासन को लेकर जनता के भरोसे को भी कमजोर करता है. इस घटना से साफ हो गया है कि सबसे पहले नसबंदी के आंकड़ों की पारदर्शी तरीके से जांच होनी चाहिए. अंगों की गिनती को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने के साथ-साथ डिजिटल, छेड़छाड़-रहित ट्रैकिंग की भी जरूरत हो सकती है- शायद माइक्रोचिपिंग और निगरानी निकायों के लिए सुलभ रीयल-टाइम रिपोर्टिंग ऐप्स के ज़रिए.
दूसरा, नगरपालिका पशु चिकित्सा पदों के लिए स्पष्ट कार्यकाल नियम और हितों के टकराव से बचाव के उपाय होने चाहिए, ताकि बिलों की मंजूरी के संबंध में किसी को अनुचित लाभ कमाने से रोका जा सके. तीसरा, प्रशिक्षित कर्मचारियों और सामुदायिक समन्वय के साथ आवारा कुत्तों को पकड़ने के अभियानों को बड़े पैमाने पर चलाया जाना चाहिए.
चौथा, आश्रय स्थलों और विशेषकर घायल और अनाथ पिल्लों की देखरेख के लिए भी व्यवस्था बनाए जाने की जरूरत है. पिल्लों के झुंड को मुख्य सड़कों पर छोड़ना न तो मानवीय है और न ही टिकाऊ.
जयपुर में ACB की इस कार्रवाई के मामले में सबूतों के आधार पर दोषियों को सजा मिल सकती है या बरी किया जा सकता है. चाहे जो भी हो, लेकिन इस घटना ने यह साफ कर ही दिया है कि एक बड़ा उद्देश्य भी सही निगरानी के आभाव व भ्रष्टाचार के कारण पटरी से उतर सकता है. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की एक अच्छी बात यह है कि वे ऐसे मामलों में ACB को पूरी छूट देते हैं.
भारत ने 2030 तक कुत्तों के काटने से फैलने वाले रेबीज को खत्म करने का लक्ष्य तय किया है और यह हासिल किया जा सकता है. इससे कहीं कम संसाधनों वाले देशों ने भी यह कर दिखाया है. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कुत्तों की नसबंदी करें, नियमित रूप से टीकाकरण करें और इस पूरे प्रक्रिया की पारदर्शी निगरानी रखें.

