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कॉकरोच जनता पार्टी का 'क्या बोलती पब्लिक' अभियान चुनावी कैंपेन से कितना अलग होगा?

नीट पेपर लीक आंदोलन के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने सितंबर 2026 से 'क्या बोलती पब्लिक' नाम से देशव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू करने का एलान किया है जिसके तहत वह राज्यों, शहरों और गांवों में जाकर सीधे आम जनता से संवाद करेगी

सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका के साथ पार्टी संस्थापक अभिजीत दिपके
अपडेटेड 6 अगस्त , 2026

नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर 36 दिनों तक चले धरने की सफलता के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) अब अपने आंदोलन को राष्ट्रव्यापी रूप देने की तैयारी में है. पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने गुरुवार को अपने गृह नगर छत्रपति संभाजी नगर में प्रवक्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका के साथ मीडिया से बातचीत में एलान किया कि सितंबर 2026 से सीजेपी 'क्या बोलती पब्लिक' नाम से एक देशव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू करेगी.

दीपके के मुताबिक यह किसी पारंपरिक चुनावी अभियान जैसा नहीं होगा. टीम देश के अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों में जाकर सीधे आम जनता से संवाद करेगी और उनकी बुनियादी समस्याओं को समझने की कोशिश करेगी. दिपके ने साफ किया कि पार्टी फिलहाल चुनावी राजनीति में उतरने का इरादा नहीं रखती बल्कि देश के लोकतांत्रिक संस्थानों और शासन-तंत्र में जवाबदेही तय कराने के लिए एक मजबूत दबाव समूह के तौर पर काम करती रहेगी.

एजेंडे में पहला मुद्दा 

दिपके ने बताया कि अभियान का सबसे पहला और प्राथमिक मुद्दा शिक्षा व्यवस्था होगी. उनका तर्क है कि स्कूल, कॉलेज और कोचिंग संस्थानों की लगातार बढ़ती फीस की वजह से आम परिवारों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है और बच्चों की पढ़ाई के लिए माता-पिता को कर्ज लेने की नौबत नहीं आनी चाहिए. सीजेपी ने कहा है कि वह सरकारी स्कूलों में सुधार और निजी संस्थानों की मनमानी फीस पर लगाम लगाने की दिशा में दबाव बनाएगी.

शिक्षा के अलावा पार्टी ने चार और मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल किया है- न्याय व्यवस्था को मजबूत और पारदर्शी बनाना, बेरोजगारी और चुनाव आयोग व मीडिया समेत लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा बहाल करना. दिपके ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि देश की करीब 60 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की है और इसी आयु वर्ग में बेरोजगारी सबसे ज्यादा है. जिनके पास नौकरी है भी, उनका वेतन इतना कम है कि घर चलाना मुश्किल हो जाता है.

जंतर-मंतर के आंदोलन में भी इसी युवा वर्ग की बड़ी भागीदारी देखी गई थी जो दिपके के मुताबिक आगे के अभियान की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी.

संस्थाओं पर तीखे सवाल

मीडिया से बातचीत में दिपके का लहजा संस्थागत जवाबदेही को लेकर काफी तीखा रहा. उन्होंने कहा कि देश के लगभग सभी बड़े संस्थानों से जनता का भरोसा लगातार कम होता जा रहा है और इसके पीछे गुस्सा बढ़ रहा है.

राजनीतिक दलों की टूट-फूट पर उन्होंने कहा कि सुबह किसी पार्टी को चुनने वाला नेता शाम तक किसी और पार्टी में पहुंच जाता है और जब कोई सरकार मनमाफिक काम नहीं करती तो जांच एजेंसियों के जरिए उसे तोड़ दिया जाता है. उनके मुताबिक यह सिलसिला अगर यूं ही चलता रहा तो यह देश के लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है.

चुनाव आयोग को लेकर भी दिपके ने तीखी टिप्पणी की. उनका कहना था कि पहले वोटर सरकार चुनते थे लेकिन अब हालात उलट गए हैं और सरकार तय कर रही है कि वोटर कौन होगा और वोट कौन दे पाएगा. उन्होंने चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करने की मांग करते हुए कहा कि अगर व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई तो चुनावों में हेरफेर जारी रहेगी.

न्यायपालिका पर भी उन्होंने सवाल उठाए और कहा कि आम आदमी की सुनवाई में देरी होती है जबकि बड़े कारोबारियों के मामलों में आधी रात तक सुनवाई हो जाती है. खासकर तब, जब किसी सरकार को गिराने से जुड़ा मामला हो.

झारखंड के छात्र आंदोलन को समर्थन

इसी बातचीत के दौरान सीजेपी प्रवक्ता ने झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी को लेकर चल रहे छात्र प्रदर्शनों पर भी पार्टी का रुख स्पष्ट किया. बताया गया कि टीम की झारखंड के प्रदर्शनकारी छात्रों से पहले ही विस्तृत बातचीत हो चुकी है और सीजेपी की तरफ से एक प्रतिनिधिमंडल रांची पहुंचकर छात्रों से मुलाकात करेगा और उन्हें जरूरी समर्थन देगा. पार्टी ने झारखंड सरकार से छात्रों की मांगें माने जाने की अपील की है.

जंतर-मंतर से यहां तक का सफर

सीजेपी का यह एलान उस आंदोलन की अगली कड़ी है जो जून-जुलाई 2026 में नीट पेपर लीक मामले को लेकर शुरू हुआ था. दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी ने 20 जून से 25 जुलाई तक लगातार 36 दिनों तक धरना दिया, जिसमें हजारों छात्र, अभिभावक और युवा शामिल हुए.

एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भी इस प्रदर्शन का हिस्सा बने और 26 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे. 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान छात्रों पर पुलिस लाठीचार्ज की घटना भी सामने आई थी. आखिरकार 25 जुलाई को तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सीजेपी ने धरना समाप्त करने का एलान किया.

दिपके ने इस पूरे सफर को याद करते हुए बताया कि जंतर-मंतर पर बैठे लोगों ने ही उन्हें सलाह दी थी कि आंदोलन को सिर्फ नीट पेपर लीक तक सीमित न रखा जाए बल्कि चुनाव आयोग और न्यायपालिका जैसे व्यापक मुद्दों पर भी आवाज उठाई जाए. यही सलाह-मशविरा अब 'क्या बोलती पब्लिक' अभियान की बुनियाद बना है.

पार्टी की पहचान पर सफाई

हाल में संगठन के नाम को लेकर उठे विवाद पर भी दिपके ने प्रतिक्रिया दी थी. उन्होंने बताया कि 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम प्रतीकात्मक और व्यंग्यात्मक तौर पर चुना गया था और शुरुआत में इसका मकसद किसी राजनीतिक दल की तरह काम करना नहीं बल्कि छात्रों और युवाओं की समस्याओं को सामने लाना था. उन्होंने दोहराया कि पार्टी की विचारधारा वही है जो संविधान की विचारधारा है और यह संगठन पारंपरिक राजनीति में नहीं बल्कि समाज सेवा में विश्वास रखता है. 

आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सीजेपी अपने पांच-सूत्री एजेंडे - शिक्षा, न्याय व्यवस्था, बेरोजगारी, चुनाव आयोग और मीडिया की जवाबदेही को जमीन पर कैसे उतारती है और जंतर-मंतर पर मिली सफलता को वह देशव्यापी जनसमर्थन में बदल पाती है या नहीं.

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