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CJP का ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान कैसे बना सरकारों का सिरदर्द?

CJP के इस अभियान में सरकारी स्कूलों की बदहाल तस्वीरें सामने आने के बाद यूपी समेत कई राज्यों में सरकारें सक्रिय हुईं तो विपक्षी दलों ने भी इसे चुनावी मुद्दा बनाना शुरू किया

CJP के अभिजीत दीपके एक स्कूल का मुआयना करते हुए (फाइल फोटो)
अपडेटेड 1 सितंबर , 2026

राज्यों में अगले विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले एक ऐसा मुद्दा राजनीतिक एजेंडे में आता दिख रहा है जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी. 2027 में उत्तर प्रदेश के चुनाव की तैयारियों के बीच सरकारी स्कूलों की हालत अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बनती दिख रही है.

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के तहत आम नागरिक और स्वयंसेवक सरकारी स्कूलों में जाकर टूटे शौचालय, असुरक्षित कक्षाएं, फर्नीचर की कमी, पीने के पानी और मिड-डे मील से जुड़ी समस्याएं, शिक्षकों की उपस्थिति और दूसरी कमियों के वीडियो बनाते हैं. 

अब यह अभियान उस नई राजनीतिक संस्था से आगे भी फैलता दिख रहा है, जिसने परीक्षा में गड़बड़ियों के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के साथ इसकी शुरुआत की थी.

मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री इस पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं. विपक्षी दलों ने भी स्कूलों को लेकर अभियान शुरू कर दिए हैं. स्कूलों में खुद मरम्मत का काम शुरू किया जा रहा है और साथ ही बाहरी लोगों के प्रवेश तथा पूरे परिसर में वीडियो बनाने पर रोक लगाई जा रही है. 

अदालतों और मानवाधिकार संस्थाओं की ओर से सरकारी स्कूलों की स्थिति और सुरक्षा की स्वतंत्र जांच भी कई असहज सवाल खड़े कर रही है.

यह अभियान अभी कुछ ही हफ्ते पुराना है लेकिन तेजी से फैल रहा है. CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका के मुताबिक, 1,200 से 1,500 स्वयंसेवकों ने करीब 1,500 स्कूलों का ऑडिट किया है. ये स्वयंसेवक महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, बिहार, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और दूसरे राज्यों में सक्रिय हैं.

जयपुर के पास एक सरकारी स्कूल का मुआयना करने पहुंची CJP की टीम पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया था
जयपुर के पास एक सरकारी स्कूल का मुआयना करने पहुंची CJP की टीम पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया था

इसका तरीका काफी आसान है : किसी स्कूल की स्थिति देखना, कमियों का वीडियो बनाना, उसे पोस्ट करना और सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर करना. इस अभियान के तहत सामने आए वीडियो में बच्चों को पीने के पानी, शौचालय, कक्षाओं और दूसरी समस्याओं की शिकायत करते देखा गया है.

उत्तर प्रदेश में इस अभियान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया खास तौर पर देखने लायक रही है. योगी आदित्यनाथ सरकार ने शुरुआत में इस जांच-पड़ताल का स्वागत करती हुई दिखाई दी और अपने ऑपरेशन कायाकल्प के तहत स्कूलों में शौचालय, पीने के पानी, फर्नीचर और स्मार्ट क्लासरूम में किए गए सुधारों का हवाला दिया. लेकिन कुछ ही दिनों बाद सरकार का रुख सख्त हो गया.

अधिकारियों को स्कूलों और कॉलेजों के बारे में ‘भ्रामक वीडियो’ फैलाने वालों के खिलाफ मामले दर्ज करने का निर्देश दिया गया. इसी दौरान मिड-डे मील और शौचालयों की जांच के आदेश भी दिए गए और जिलाधिकारियों को नियमित रूप से स्कूलों का निरीक्षण करने को कहा गया. 

बाद में मुख्य सचिव एस.पी. गोयल ने स्कूलों के बुनियादी ढांचे, साफ-सफाई और सड़क संपर्क से जुड़े निर्देश भी जारी किए.

इस राजनीतिक मौके को आम आदमी पार्टी (AAP) ने तुरंत लपक लिया. पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने AAP का अपना ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया. उन्होंने लोगों से जर्जर स्कूलों के वीडियो भेजने को कहा और इनकी स्थिति दिखाने के लिए एक प्रदर्शनी लगाने का वादा किया.

सिंह ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में BJP की ‘डबल इंजन सरकार’ के दावे का कोई सबूत नहीं दिखता. AAP के मुताबिक उसके अभियान के तहत जर्जर इमारतों, शौचालयों, डेस्क, मिड-डे मील और दूसरी कमियों के वीडियो जुटाए जा रहे हैं.

इसका असर उत्तर प्रदेश से बाहर भी दिख रहा है. राजस्थान में भजन लाल शर्मा सरकार ने स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए करीब 12,500 करोड़ रुपए की योजना का ऐलान किया है.

राजस्थान सरकार ने सरकारी स्कूलों पर 12500 करोड़ रु. खर्च करने का ऐलान किया है (सांकेतिक तस्वीर)
राजस्थान सरकार ने सरकारी स्कूलों पर 12500 करोड़ रु. खर्च करने का ऐलान किया है (सांकेतिक तस्वीर)

हाल में जयपुर के पास रामपुरा-कंवरपुरा गांव में एक सरकारी स्कूल की हालत को लेकर टकराव भी हुआ. यहां स्थानीय लोगों का CJP के कार्यकर्ताओं से सामना हुआ. सरकार ने इस स्कूल के लिए नई इमारत बनाने का आदेश दिया है. स्कूल की इमारत को असुरक्षित घोषित किए जाने के बाद यहां पढ़ने वाले बच्चे मवेशियों के बाड़े में पढ़ रहे थे.

स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार की यह बड़ी योजना इससे पहले 300 जर्जर स्कूलों में 409 करोड़ रुपए की लागत से नई इमारतें बनाने की योजना के बाद आई है. 

CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इसे "राजस्थान में CJP का असर" बताया था. 12,500 करोड़ रुपए की बड़ी योजना ऐसे समय में आई है जब सरकारी स्कूलों को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है, CJP की जांच सामने आ रही हैं और सरकारी स्कूलों में वीडियो बनाने पर रोक को लेकर विपक्षी दल सरकार की आलोचना कर रहे हैं.

अब ये पाबंदियां भी इस पूरे मामले का हिस्सा बन गई हैं. राजस्थान में स्कूल में प्रवेश के लिए अनुमति जरूरी है और फोटो या वीडियो बनाने के लिए लिखित सहमति लेनी होती है. 

महाराष्ट्र, हरियाणा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश से भी सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश को लेकर रोक या विरोध की खबरें आई हैं. महाराष्ट्र में दीपके और कुछ अन्य लोगों पर लातूर जिले के एक स्कूल में घुसने, सरकारी कामकाज में बाधा डालने, शिक्षकों के वीडियो बनाने और उन्हें धमकाने का आरोप लगा. इस मामले में केस दर्ज किया गया.

लेकिन CJP के लिए सरकार की इतनी ज्यादा प्रतिक्रिया उसके अभियान की सफलता का सबूत है. CJP की 34 वर्षीय राष्ट्रीय सचिव और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर चुकीं आफरीन नवाज ने कहा कि उन्होंने लगभग उसी समय स्कूलों में मरम्मत का काम शुरू होते देखा जब उनके कार्यकर्ता कमियों को सामने ला रहे थे.

खुले मैदानों में चल रहे स्कूलों पर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान लिया है (सांकेतिक फोटो)
खुले मैदानों में चल रहे स्कूलों पर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान लिया है (सांकेतिक फोटो)

वे बताती हैं, "मैं अपनी टीम के एक साथी का वीडियो देख रही थी. वह पूरा JCB स्कूल के अंदर ले आया है और इस वक्त स्कूल की मरम्मत करा रहा है. यह देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए." 

उन्होंने कहा, "जो काम सरकार को करना चाहिए था, वह हम कर रहे हैं. और इससे मुझे बहुत गर्व होता है. यह कोई छोटी बात नहीं है. किसी भी राजनीतिक पार्टी की सरकार हो, उसे यह सब करना चाहिए. यह बुनियादी जरूरत है."

नवाज के लिए इससे भी ज्यादा अहम यह है कि जब अधिकारियों को सिर्फ CJP के किसी स्कूल में आने की जानकारी मिलती है तो क्या होता है. वे बताती हैं, "जब एक स्कूल को पता चला कि अभिजीत दीपके वहां आ सकते हैं तो दो दिन के भीतर उन्होंने सब कुछ ठीक कर दिया. तो पहले ऐसा क्यों नहीं किया?"

CJP अब सरकार की प्रतिक्रियाओं को सार्वजनिक रूप से अपने अभियान की जीत बता रही है और कह रही है कि यह आंदोलन जारी रहेगा. इस बीच अदालतें भी स्कूलों की हालत को लेकर चल रही व्यापक बहस में शामिल हो गई हैं.

राजस्थान हाई कोर्ट जुलाई 2025 में झालावाड़ में स्कूल की इमारत गिरने से जुड़ी स्वत: संज्ञान वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है. इस हादसे में सात बच्चों की मौत हुई थी. 

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जर्जर इमारतों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. बाद की सुनवाई में अदालत ने स्कूलों की जरूरतों के मुकाबले 1,000 करोड़ रुपए के बजट को ‘समुद्र में एक बूंद’ बताया.

तेलंगाना और हरियाणा के मानवाधिकार आयोगों ने भी पेड़ों के नीचे, खुले मैदानों और यहां तक कि मवेशियों के बाड़ों में बच्चों को पढ़ाए जाने के मामले का स्वत: संज्ञान लिया है. दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में राजस्थान और उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और वीडियो बनाने पर लगी पाबंदियों पर सवाल उठाए गए हैं. 

याचिका में कहा गया है कि बच्चों की सुरक्षा जरूरी है लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि जर्जर स्कूलों की इमारतों का वीडियो बनाने पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए.

CJP के अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने स्कूलों की कमियों को एक आसान और दोहराए जा सकने वाले राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया है: अपने आसपास के स्कूल में जाइए, जो चीजें टूटी हैं उनका वीडियो बनाइए और पूछिए कि उन्हें अब तक ठीक क्यों नहीं किया गया. 

आम समस्याओं को लेकर इस तरह लोगों को एकजुट करना भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है. हालांकि, ऐसे सभी अभियानों के लिए शुरुआती जनरुचि को लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं रहा है.

हाल के समय में इसकी सबसे सीधी तुलना AAP से की जा सकती है. AAP अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली, फिर चुनावी राजनीति में आई और दिल्ली में उसकी स्कूल शिक्षा व्यवस्था उसके शासन के सबसे प्रमुख उदाहरणों में शामिल हो गई. 

दोनों के बीच समानताएं साफ हैं: विरोध के लिए एक और आंदोलन, किसी सार्वजनिक सेवा की कमी को बड़े जन अभियान में बदलने की एक और कोशिश और एक बार फिर शिक्षा का चुनावी मुद्दा बनना.

लेकिन नवाज CJP की तुलना AAP से नहीं करना चाहतीं. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि अब सभी को आम आदमी पार्टी से तुलना करना बंद कर देना चाहिए." वे अपनी बात आगे बढ़ाती हैं, "आप किसी भी राजनीतिक पार्टी का ग्राफ देखिए, चाहे वह शुरुआत में हो या बाद के दौर में. मुझे नहीं लगता कि किसी ने हम जितना असर पैदा किया है."

इंडिया टुडे के ताजा ‘देश का मिज़ाज सर्वे’ में दीपके उन नेताओं की सूची में AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल से आगे रहे, जिन्हें लोग भारत के अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं.

नवाज ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी से हमारी तुलना करने से हमारा कद बढ़ता है. इससे उनका कद बढ़ता है."

आने वाले वर्षों में CJP के इस आत्मविश्वास की परीक्षा होगी. आंदोलन किसी समस्या को ऐसा मुद्दा बना सकते हैं जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाए लेकिन लोगों का ध्यान लंबे समय तक बनाए रखना ज्यादा मुश्किल होता है. 

फिलहाल बदलाव दिख रहा है. मुख्यमंत्री अपने सरकार के कामकाज का बचाव कर रहे हैं. सरकारें स्कूलों के निरीक्षण और मरम्मत के आदेश जारी कर रही हैं. अदालतें और मानवाधिकार संस्थाएं उस माहौल पर सवाल उठा रही हैं जिसमें बच्चे पढ़ रहे हैं. सवाल बेहद बुनियादी है: आपके आसपास के सरकारी स्कूल की हालत कैसी है?

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