कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का भारत दौरा एक ऐसे वक्त पर हो रहा है जब नई दिल्ली और ओटावा, दोनों ही खामोशी से अपने रिश्तों की मरम्मत करने और नई उम्मीदें तलाशने में जुटे हैं. पिछले साल मार्च में सत्ता संभालने के बाद कार्नी पहली बार भारत आ रहे हैं. उनका यह दौरा उस 'राजनयिक कड़वाहट' के पन्ने को पलटने की एक कोशिश है, जिसने पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच रिश्तों को जमा रखा था.
26 फरवरी से शुरू हो रहे इस दौरे में कार्नी पहले मुंबई और फिर दिल्ली जाएंगे, जहां उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य वरिष्ठ नेताओं से होगी. कहने को तो बातचीत का एजेंडा 'व्यापार और तकनीक' है, लेकिन इसकी असली बात 'राजनीति' है. यह कोशिश है उस रिश्ते को एक नया ढांचा देने की, जो लंबे समय से अविश्वास, घरेलू राजनीति के दबाव और आर्थिक साझेदारी के अधूरे वादों के बोझ तले दबा हुआ था.
कार्नी के इस मिशन के सेंटर में है 'कम्प्रेहैन्सिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट' (CEPA) को फिर से जिंदा करना, जो भारत और कनाडा के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का औपचारिक ढांचा है. CEPA पर बातचीत एक दशक से ज्यादा समय से चल रही थी, लेकिन 2023 में कनाडा में सिख अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या और उसके बाद आरोपों व राजनयिकों के निष्कासन विवाद के चलते यह टूट गई थी. लगभग दो साल तक, दोनों देशों ने रूटीन काम के अलावा शायद ही कोई बात की. वह चुप्पी पिछले साल के आखिर में टूटनी शुरू हुई, जब दोनों सरकारें बातचीत फिर से शुरू करने और 'ट्रेड' को ही भरोसा बनाने की नींव मानने पर राजी हुईं.
CEPA के लिए कनाडा का जोर बहुत पुराना है. 2014 से ही ओटावा टैरिफ कटौती और इन्वेस्टमेंट सुरक्षा पर भारत से तेजी की मांग कर रहा था, लेकिन एग्रीकल्चर, सर्विसेज़ और इन्वेस्टर-स्टेट विवादों पर नई दिल्ली के सतर्क रवैये से वह निराश था. इन्हीं मतभेदों और राजनीतिक तनाव ने इस डील को फ्रीज कर रखा था. कार्नी के दौरे का मकसद अब बातचीत को औपचारिक रूप से फिर शुरू करना और उन शर्तों को फाइनल करना है जो अंतिम समझौते का रास्ता तैयार कर सकें. इस छोटे से दौरे में किसी डील पर साइन होने की उम्मीद तो नहीं है, लेकिन इरादा साफ है: बातचीत को रफ्तार देना और इसे पूरा करने के लिए एक साल का लक्ष्य रखना. बैकग्राउंड ब्रीफिंग में बताया गया टारगेट यह है कि दशक के अंत तक बाइलेटरल ट्रेड को मौजूदा 30 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर लगभग 70 बिलियन डॉलर कर दिया जाए.
इस ट्रेड डिप्लोमेसी के पीछे एक बड़ा जियो-पॉलिटिकल गणित भी है. कार्नी के नेतृत्व में कनाडा अपनी फॉरेन पॉलिसी को इंडो-पैसिफिक की ओर मोड़ रहा है, ताकि अमेरिका पर अपनी भारी आर्थिक निर्भरता कम कर सके. वहीं, भारत ने खुद को एक मल्टीपोलर एशियन ऑर्डर के सेंटर में रखा है, जो वेस्टर्न डेमोक्रेसीज़ के साथ गहरी पार्टनरशिप के लिए तो खुला है, लेकिन अपनी शर्तों पर. दोनों देशों के लिए CEPA सिर्फ बिजनेस नहीं बल्कि पॉलिटिकल सिग्नल भी है. यह शिकायतों की बयानबाजी से आगे बढ़ने और 'प्रैक्टिकल पार्टनर्स' के रूप में जुड़ने की इच्छा को दर्शाता है.
मुंबई में, कार्नी बिजनेस लीडर्स से मिलेंगे, कनाडा को इन्वेस्टमेंट के लिए बेहतरीन जगह बताएंगे और इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लीन एनर्जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग में मौके तलाशेंगे. कनाडाई पेंशन फंड्स का भारतीय रियल एस्टेट और लॉजिस्टिक्स में पहले से ही बड़ा हिस्सा है और वे इसे और बढ़ाना चाहते हैं. कार्नी जो संदेश ला रहे हैं वह 'निरंतरता और भरोसे' का है कि राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद, कनाडा भारत की ग्रोथ स्टोरी का भरोसेमंद साथी है. एनर्जी को-ऑपरेशन भी प्रमुखता से चर्चा में रहेगा. 10 साल के यूरेनियम सप्लाई ढांचे और क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन के लिए जरूरी 'क्रिटिकल मिनरल्स' में सहयोग पर बातचीत चल रही है. नेचुरल रिसोर्सेज में कनाडा की ताकत और भरोसेमंद एनर्जी सोर्सेज के लिए भारत की भूख इसे आपसी हित का क्षेत्र बनाती है.
टेक्नोलॉजी और AI भी नए मोर्चे के रूप में उभर रहे हैं, जिसमें दोनों पक्ष ऐसे इनोवेशन प्रोग्राम्स की तलाश कर रहे हैं जो कनाडाई रिसर्च को भारत के बड़े मार्केट से जोड़ सकें. डिफेंस और सिक्योरिटी बातचीत का खामोश हिस्सा होंगे, लेकिन इनका रणनीतिक महत्व बढ़ रहा है. उम्मीद है कि कार्नी की टीम मिलिट्री एक्सचेंज, समुद्री सुरक्षा और साइबर सहयोग पर बातचीत फिर शुरू करेगी. भले ही कनाडा 'क्वाड' (Quad) का हिस्सा नहीं है, लेकिन इंडो-पैसिफिक में उसका बढ़ता जुड़ाव उसे नई दिल्ली की चिंताओं के करीब लाता है.
कार्नी और मोदी क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने और उभरते सुरक्षा खतरों का मुकाबला करने में अपने साझा हितों की पुष्टि करेंगे. हालांकि, सबसे नाजुक बातचीत बंद दरवाजों के पीछे होगी. उम्मीद है कि भारत खालिस्तानी चरमपंथी नेटवर्क, गैंगस्टरों और आर्थिक अपराधियों का मुद्दा उठाएगा, जिनके बारे में माना जाता है कि वे कनाडाई जमीन से काम कर रहे हैं. भारत उन पर कार्रवाई और इंटेलिजेंस शेयर करना चाहता है. इस लिस्ट में गुरपतवंत सिंह पन्नू, इंद्रजीत सिंह गोसल, अर्शदीप सिंह (अर्श डल्ला), गोल्डी बराड़, लखबीर सिंह (लंडा) और अन्य शामिल हैं.
कनाडा के लिए, अपनी घरेलू राजनीति को बैलेंस करते हुए इन चिंताओं को स्वीकार करना भरोसा बनाने के लिए बहुत जरूरी है. इस स्तर पर इंटेलिजेंस शेयरिंग या प्रत्यर्पण पर किसी फॉर्मल एग्रीमेंट की संभावना कम है, लेकिन दोनों पक्ष मौजूदा ढांचों, जैसे NSA लेवल की बातचीत, के जरिए सहयोग गहराने का संकेत दे सकते हैं.
इस दौरे के अंत तक जो सामने आएगा, वह एक नपा-तुला 'रीसेट' होगा. शायद कोई बड़ा धमाका न हो - न कोई ट्रेड पैक्ट साइन हो, न कोई बड़ा सिक्योरिटी एग्रीमेंट - लेकिन सिम्बॉलिज्म ही असली काम करेगा. CEPA और एनर्जी पार्टनरशिप पर संयुक्त बयान उस चैनल को औपचारिक रूप से फिर से खोलने का प्रतीक होगा जो लगभग टूट चुका था. नई दिल्ली में कार्नी की मौजूदगी ही यह संदेश होगी कि दोनों देश पुराने गिले-शिकवे भुलाकर आपसी फायदे पर ध्यान देने के लिए तैयार हैं.
भारत के लिए, कार्नी के साथ जुड़ना कनाडा को अपने व्यापक इंडो-पैसिफिक विजन में शामिल करने और लॉग-टर्म कैपिटल को उन सेक्टरों में लाने का मौका है जो उसके भविष्य के लिए जरूरी हैं. कनाडा के लिए, यह अमेरिका और चीन से हटकर विविधता लाने की इच्छा को रेखांकित करता है.
यह दौरा तत्काल नतीजों के बारे में कम और भरोसा बहाल करने के बारे में ज्यादा है - डिप्लोमेसी में, बिजनेस में और इस विचार में कि भारत और कनाडा, अपने तमाम मतभेदों के बावजूद, फिर से एक कॉमन ग्राउंड तलाश सकते हैं. कार्नी का भारत दौरा भरोसे के बारे में है. बरसों के शक और चुप्पी के बाद दोनों देश फिर से बात करने, फिर से ट्रेड करने और सावधानी से उस पार्टनरशिप की क्षमता को फिर से खोजने के लिए तैयार हैं, जो लंबे समय से 'पॉज' बटन पर अटकी हुई थी.

