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RSS से कम प्रचारक मिले तो BJP ने कैसे बदली संगठन की रणनीति?

महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल तक BJP ने संगठन के अनुभवी चेहरों की जिम्मेदारियां बदली हैं. संघ से प्रचारकों की सीमित उपलब्धता के बीच पार्टी ने अपने संगठनात्मक ढांचे को नए सिरे से बांटा है

BJP अध्यक्ष नितिन नवीन (फाइल फोटो)
अपडेटेड 28 सितंबर , 2026

कई महीनों से महाराष्ट्र BJP के संगठनात्मक नक्शे में कुछ अलग स्थिति वाला राज्य बना हुआ था. देश के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्यों में शामिल महाराष्ट्र में पूर्णकालिक महासचिव (संगठन) नहीं था. यह पद सिर्फ औपचारिक नहीं होता. 

महासचिव (संगठन) पार्टी की आंतरिक मशीनरी को संभालता है, राज्य नेतृत्व के साथ समन्वय करता है, कैडर, प्रशिक्षण और बूथ ढांचे पर नजर रखता है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ संगठनात्मक संबंध बनाए रखता है. 

24 सितंबर को BJP ने इस पद को भर दिया. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का काम देख रहे अजय जामवाल को महाराष्ट्र भेज दिया गया है. पश्चिम बंगाल के प्रभारी रहे सतीश धोंड को भी महाराष्ट्र लाया गया है. उन्हें संयुक्त महासचिव (संगठन) बनाया गया है और गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र में आदिवासी पहुंच की अलग जिम्मेदारी भी दी गई है.

इसके बाद बाकी नामों की घोषणा हुई. राजस्थान विधानसभा चुनाव में BJP की जीत के नायक रहे चंद्रशेखर, जिन्हें बाद में तेलंगाना भेजा गया था, अब मध्य प्रदेश भेजे गए हैं. झारखंड का काम देख रहे कर्मवीर को छत्तीसगढ़ भेजा गया है, जबकि पवन साय उनकी जगह झारखंड की जिम्मेदारी संभालेंगे. 

धोंड ने पश्चिम बंगाल का जिम्मा छोड़ दिया है. एक पद खाली था, जिसे भर दिया गया लेकिन इस प्रक्रिया में दूसरे राज्यों में भी नए बदलाव हुए. किसी एक नियुक्ति से ज्यादा यही बात BJP के इस ताजा संगठनात्मक फेरबदल को महत्वपूर्ण बनाती है.

पिछले एक दशक में BJP का राजनीतिक विस्तार काफी हुआ है. ऐसे में पार्टी को अनुभवी संगठन नेताओं को लगातार एक राजनीतिक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भेजना पड़ रहा है. अब ऐसे ज्यादा राज्य हैं, जहां BJP एक गंभीर चुनावी ताकत है. ऐसे भी कई इलाके हैं जहां पार्टी जमीनी स्तर से संगठन खड़ा करना चाहती है. साथ ही कई सामाजिक वर्गों पर भी संगठनात्मक स्तर पर खास ध्यान देने की जरूरत बढ़ी है.

BJP के लगातार विस्तार के साथ उसमें संघ से प्रशिक्षित लोगों की मांग बढ़ी है (सांकेतिक फोटो)
BJP के लगातार विस्तार के साथ उसमें संघ से प्रशिक्षित लोगों की मांग बढ़ी है (सांकेतिक फोटो)

इसी वजह से पार्टी की मशीनरी बनाने और चलाने का अनुभव रखने वाले लोगों, खासकर संघ से प्रशिक्षित प्रचारकों की मांग बढ़ी है. पिछले दो वर्षों से पार्टी नेतृत्व लगातार नए प्रचारकों की मांग कर रहा है ताकि राज्य और केंद्रीय इकाइयों में उन्हें जिम्मेदारी दी जा सके. 

आठ राज्यों- महाराष्ट्र, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, गोवा और अरुणाचल प्रदेश में पूर्णकालिक महासचिव (संगठन) नहीं थे. BJP ने RSS से अतिरिक्त प्रचारकों की भी मांग की थी ताकि कुछ ऐसे प्रचारकों की जगह ली जा सके जो उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर रहे थे या जिनका प्रदर्शन कमजोर था.

इस पूरे मामले की एक बड़ी पृष्ठभूमि भी है. 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान BJP के तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि पार्टी का विस्तार हो चुका है और अब वह अपने कामकाज को खुद संभालने में सक्षम है. 

उन्होंने BJP की मौजूदा स्थिति की तुलना उस दौर से की थी, जब पार्टी छोटी थी और RSS पर ज्यादा निर्भर रहती थी. इन टिप्पणियों के बाद दोनों संगठनों के रिश्तों को लेकर असामान्य रूप से सार्वजनिक चर्चा शुरू हुई. बाद में RSS ने इसे ‘परिवार का मामला’ बताया. उसने यह भी माना कि BJP और संघ के बीच कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन्हें सुलझाने की जरूरत थी.

संघ और BJP ने कुछ अहम मुद्दों पर फिर से तालमेल बनाया है. इनमें कुछ नियुक्तियां और महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों के चुनावी प्रबंधन में बेहतर समन्वय भी शामिल है. हालांकि प्रचारकों के हालिया फेरबदल से यह संकेत मिलता है कि दोनों संगठनों के रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए अभी और सुधार की जरूरत है.

RSS की अपनी संगठनात्मक जिम्मेदारियां हैं जबकि BJP की जरूरतें भी बढ़ी हैं. प्रचारकों की सीमित उपलब्धता संघ का सोचा-समझा फैसला है, उसकी अपनी मानव संसाधन जरूरतों का नतीजा है या फिर बहुत बड़े हो चुके राजनीतिक संगठन की मांगों का असर, यह केवल इस फेरबदल से तय नहीं किया जा सकता. लेकिन इससे यह पता जरूर चलता है कि BJP इस कमी से कैसे निपट रही है.

BJP संगठन के पदाधिकारी पीएम मोदी और अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ (फाइल फोटो)
BJP संगठन के पदाधिकारी पीएम मोदी और अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ (फाइल फोटो)

इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण दो वरिष्ठ संगठन नेताओं शिवप्रकाश और सौदान सिंह के इर्द-गिर्द बनाए गए नए क्षेत्रीय नक्शे में दिखता है. शिवप्रकाश अब आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गोवा की जिम्मेदारी संभालेंगे और उनका केंद्र मुंबई होगा. 

BJP के सबसे वरिष्ठ संगठन प्रबंधकों में शामिल सौदान सिंह को पूर्व की ओर भेजा गया है. वे बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी संभालेंगे और उनका केंद्र भुवनेश्वर होगा.

सौदान सिंह के लिए यह क्षेत्र में बड़ा बदलाव है. कई वर्षों से उत्तर भारत के राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े रहे संगठन नेता अब बिहार और झारखंड से लेकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल तक के पूर्वी हिस्से में काम करेंगे. इनमें से तीन ऐसे राज्य हैं जहां BJP पहली बार मुख्यमंत्री की अगुवाई वाली सरकार चला रही है.

दक्षिण में भी पार्टी कुछ ऐसा ही कर रही है. मधुकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का काम देखेंगे जबकि दशरथ को तेलंगाना का संगठनात्मक प्रभार दिया गया है और उनका आधार वारंगल होगा. दूसरी जगहों पर पवन राणा दिल्ली की जिम्मेदारी संभालते रहेंगे और हरियाणा का काम भी देखेंगे. मंत्री श्रीनिवासुलु पंजाब और चंडीगढ़ का जिम्मा संभालते रहेंगे. धर्मपाल उत्तर प्रदेश के साथ बने रहेंगे.

ताजा सूची यह भी दिखाती है कि BJP उन क्षेत्रों को लेकर ज्यादा स्पष्ट हो रही है जहां वह संगठनात्मक स्तर पर ध्यान देना चाहती है. वी. सतीश को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति मोर्चों और संसदीय कार्यालय की जिम्मेदारी दी गई है. नागेंद्र को वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से संपर्क की जिम्मेदारी मिली है. धोंड को चार राज्यों में आदिवासियों को साधने की जिम्मेदारी दी गई है.

इसके बाद क्षेत्रीय संगठक भी हैं. पूर्वोत्तर में मणिपुर और नागालैंड समेत संगठनात्मक पदों पर काम कर चुके अभय गिरी को अब ब्रज क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई है और उनका केंद्र आगरा होगा. BJP के अरुणाचल प्रदेश में संगठन सचिव रह चुके अनंत नारायण मिश्रा को भागलपुर, पूर्णिया और कोसी क्षेत्रों में भेजा गया है. 

इस तरह की नियुक्तियों पर पार्टी के बाहर ज्यादा ध्यान नहीं जाता. लेकिन इनसे पता चलता है कि BJP संगठन के प्रबंधन को राजनीतिक जमीन के और करीब ले जाने की कोशिश कर रही है.

पार्टी के विस्तार ने पुराने राज्य-दर-राज्य ढांचे को और जटिल बना दिया है. अब किसी वरिष्ठ संगठन नेता के पास कई राज्यों की जिम्मेदारी हो सकती है. किसी राज्य में महासचिव (संगठन) के साथ संयुक्त सचिव भी हो सकता है. राज्य के भीतर किसी क्षेत्र का अपना संगठनकर्ता हो सकता है. वहीं किसी खास सामाजिक वर्ग के लिए अलग संगठनात्मक जिम्मेदारी भी हो सकती है.

यह अनुभवी लोगों की संख्या बढ़ाए बिना उनके अनुभव का अलग-अलग जगह इस्तेमाल करने का तरीका है. यह अंतर महत्वपूर्ण है. BJP राजनीतिक नेताओं की व्यवस्था कर सकती है. वह नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर सकती है, किसी प्रभारी को बदल सकती है या किसी मंत्री को चुनाव अभियान की जिम्मेदारी दे सकती है. 

संगठन सचिव का काम अलग है. यह कैडर नेटवर्क के भीतर वर्षों के काम और पार्टी की संगठनात्मक संस्कृति की समझ पर आधारित होता है. इसके लिए अलग तरह के राजनीतिक अनुभव की जरूरत होती है जिसमें से काफी कुछ सार्वजनिक नजरों से दूर रहकर हासिल होता है.

ऐसे लोगों की बड़ी संख्या को जल्दी तैयार करने का कोई आसान तरीका नहीं है. इसलिए 24 सितंबर की सूची फेरबदल से ज्यादा जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण जैसी दिखती है. महाराष्ट्र को जामवाल मिले. मध्य प्रदेश को चंद्रशेखर मिले. छत्तीसगढ़ को कर्मवीर मिले. झारखंड को पवन साय मिले. बंगाल ने धोंड को खो दिया. 

एक ही संगठनात्मक अनुभव को एक राज्य से दूसरे राज्य तक ले जाया जा रहा है. इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि BJP का संगठन कमजोर हो रहा है. यह इस कोशिश का भी हिस्सा हो सकता है कि जिन जगहों पर नेतृत्व को ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है वहां अनुभवी लोगों का इस्तेमाल किया जाए. लेकिन यह एक सीमा की ओर जरूर इशारा करता है.

BJP का राजनीतिक विस्तार अनुभवी संगठन प्रबंधकों की उपलब्धता से ज्यादा तेज हुआ है. यह बात खास तौर पर नितिन नवीन के लिए महत्वपूर्ण है जो अब पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर अपनी छाप छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. 

उनके फेरबदल से साफ क्षेत्रीय जिम्मेदारियों, ज्यादा विशेषीकृत संपर्क और राज्यों में कड़ी निगरानी को प्राथमिकता देने के संकेत मिलते हैं. एक दिन पहले की नियुक्तियां मुख्य रूप से पार्टी के राजनीतिक चेहरे से जुड़ी थीं. 24 सितंबर की सूची उसके पीछे काम करने वाली मशीनरी से जुड़ी थी. यह अंतर महत्वपूर्ण है.

चुनाव उन नेताओं के जरिए जीते जाते हैं जो प्रचार करते हैं, संवाद करते हैं और लोगों को जुटाते हैं. लेकिन चुनाव हजारों ऐसे लोगों के जरिए भी लड़े जाते हैं जिनके नाम खबरों में शायद ही कभी आते हैं. ये लोग महीनों तक बूथ समितियां बनाने, स्थानीय नेटवर्क संभालने, कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने और चुनावों के बीच पार्टी की मशीनरी को चलाए रखने का काम करते हैं. ऐसे लोगों की जगह लेना ज्यादा मुश्किल होता है.

इसलिए BJP की संगठनात्मक कहानी सिर्फ इस बारे में नहीं है कि किसे कहां नियुक्त किया गया है. यह इस बारे में भी है कि पार्टी अपने राजनीतिक विस्तार और बढ़ती संगठनात्मक जरूरतों के साथ खुद को कैसे ढाल रही है. फिलहाल इसका जवाब जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण में दिखाई देता है. 

नए नक्शे में अनुभवी लोगों के एक अपेक्षाकृत छोटे समूह पर ज्यादा जिम्मेदारी डाली गई है. कुछ लोगों को कई राज्यों की जिम्मेदारी दी गई है, कुछ को छोटे क्षेत्रीय इलाकों में भेजा गया है और कुछ अन्य को खास सामाजिक वर्गों तक पहुंच की जिम्मेदारी दी गई है. यह व्यवस्था BJP की बढ़ती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ कितना तालमेल बैठा पाती है, यह दिल्ली में नहीं बल्कि जमीन पर अगली चुनावी लड़ाइयों के दौरान ज्यादा साफ होगा.

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