
उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में अपनी लंबी और विवादित पारी के लिए चर्चित आईएएस अधिकारी आंजनेय कुमार सिंह आखिरकार यूपी से विदा हो रहे हैं. 2005 बैच के सिक्किम कैडर के इस अधिकारी को केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग यानी डीओपीटी से आठवां सेवा विस्तार नहीं मिला.
14 अगस्त 2026 को प्रतिनियुक्ति की अवधि समाप्त होने के बाद वे अवकाश पर चले गए थे. अब 23 अगस्त की देर रात यूपी सरकार ने मुरादाबाद मंडल में उनकी जगह 2009 बैच की आईएएस अधिकारी संगीता सिंह को नया मंडलायुक्त नियुक्त कर दिया. इसके साथ ही यह साफ हो गया कि आंजनेय सिंह को अपने मूल कैडर सिक्किम लौटना होगा.
आंजनेय सिंह की यूपी से विदाई इसलिए भी अहम है क्योंकि उनका नाम समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और रामपुर के पूर्व सांसद आजम खान के साथ हुए सबसे चर्चित प्रशासनिक-राजनीतिक टकराव से जुड़ा रहा है. रामपुर के जिलाधिकारी के रूप में आंजनेय सिंह के कार्यकाल में आजम खान और उनके परिवार के खिलाफ जिस तरह प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई का सिलसिला चला, उसने यूपी की राजनीति में एक अलग ही अध्याय लिख दिया.
सवाल यह है कि जिस अफसर को आजम खान के राजनीतिक प्रभाव को कमजोर करने वाली कार्रवाई का प्रमुख चेहरा माना गया, उसके यूपी से बाहर जाने से क्या आजम खान को अब वाकई राहत मिलेगी? राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में इसका जवाब सीधा नहीं है.
आजम खान से टकराव
आंजनेय कुमार सिंह मूल रूप से मऊ जिले के रहने वाले हैं और सिक्किम कैडर के 2005 बैच के आईएएस अधिकारी हैं. उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और मास कम्युनिकेशन में उच्च शिक्षा लेने के बाद पत्रकारिता से भी जुड़े रहे. बाद में सिविल सेवा में आए.
22 फरवरी 2015 को यूपी में पांच साल के लिए प्रतिनियुक्ति पर आए थे. उस वक्त आंजनेय तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पसंद बताए गए थे. प्रतिनियुक्ति पर आते ही उन्हें सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग का विशेष सचिव नियुक्त किया गया.
जुलाई 2016 में उनका तबादला बुलंदशहर में जिला मजिस्ट्रेट के रूप में किया गया. प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद अप्रैल 2017 में उन्हें वाणिज्य कर का अतिरिक्त आयुक्त बनाया गया. हालांकि बाद में आंजनेय मुख्यमंत्री योगी के करीब आ गए. जिसके बाद वह फतेहपुर और फिर 19 फरवरी 2019 को सपा के राष्ट्रीय महासचिव आजम खान के गृह जिले रामपुर के डीएम बने. उस वक्त आजम खां की सियासत बुलंदी पर थी.
यहीं से आजम खान और आंजनेय कुमार सिंह में तनातनी शुरू हो गई. यह अपने चरम पर पहुंची जब आजम खान ने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में एक सभा के दौरान रामपुर के डीएम आजम खान पर एक विवादित बयान दे दिया.
आजम ने जनता के सामने कहा था कि चुनाव के बाद इसी डीएम से जूते साफ कराएंगे. इसके बाद आजम के खिलाफ कानूनी शिकंजा कसता चला गया. जौहर ट्रस्ट के जरिए रामपुर में जमीनों पर हुए बड़े पैमाने पर हुए कब्जों पर कार्रवाई शुरू हुई.
आजम के खिलाफ अलग अलग धाराओं में करीब 90 मुकदमे दर्ज हुए. उनको बाद में जेल भेज दिया गया. कोर्ट से आजम को तीन साल की सजा हुई और उन्हें विधानसभा की सदस्यता से भी हाथ धोना पड़ा. आजम की पत्नी तंजीन फातिमा और बेटे अब्दुल्ला आजम पर भी कानूनी शिकंजा कसा गया.
यही वह दौर था जब आंजनेय सिंह की पहचान एक ऐसे अधिकारी के रूप में बनी जिसने रामपुर में आजम खान के प्रभावशाली राजनीतिक तंत्र को प्रशासनिक स्तर पर सीधी चुनौती दी थी.
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि यह कहना कि आजम खान को जेल सिर्फ आंजनेय सिंह ने भिजवाया, कानूनी प्रक्रिया की जटिलता को सरल बना देना होगा. मुकदमों में पुलिस, प्रशासन, अभियोजन और अदालतों की अलग-अलग भूमिकाएं थीं. लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह धारणा जरूर मजबूत हुई कि रामपुर में आजम खान के खिलाफ कार्रवाई को गति देने वाले प्रमुख प्रशासनिक चेहरों में आंजनेय सिंह सबसे आगे थे.
यही वजह है कि आंजनेय सिंह की यूपी से विदाई को आजम खान के राजनीतिक सफर के संदर्भ में देखा जा रहा है.
सात असाधारण एक्सटेंशन
आंजनेय सिंह की यूपी में मौजूदगी खुद में असाधारण रही है. रामपुर में जिलाधिकारी रहने के दौरान ही आंजनेय की प्रतिनियुक्ति खत्म हुई और पहली बार फरवरी 2020 को केंद्र सरकार ने इन्हें पहला एक्सटेंशन दिया.
बीजेपी सरकार में आंजनेय कुमार सिंह की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें एक-एक साल के 6 एक्सटेंशन और 6-6 माह के दो एक्सटेंशन मिल चुके थे. यह पहली बार था कि किसी आईएएस अधिकारी को सातवीं बार प्रतिनियुक्ति पर एक्सटेंशन मिला था.

डीओपीटी के नियमों के मुताबिक अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति अधिकतम 5 साल के लिए ही हो सकती है. बहुत जरूरी होने पर इसमें संबंधित राज्य सरकार की सिफारिश पर केंद्र सरकार एक वर्ष का एक्सटेंशन दे सकती है. अधिकतम 2 एक्सटेंशन देने की परंपरा रही है. हालांकि, आईएएस आंजनेय कुमार सिंह की प्रतिनियुक्ति अवधि यूपी में पांच साल की जगह अब 11 साल हो गई थी और उन्हें कुल 07 एक्सटेंशन मिल चुके हैं. अंतिम विस्तार की अवधि 14 अगस्त 2026 तक थी.
इस दौरान आंजनेय कुमार सिंह का प्रमोशन भी हुआ और मार्च 2021 में उन्हें मुरादाबाद मंडल, जिसमें रामपुर, संभल जिले आते हैं, का कमिश्नर बनाया गया. इसके बाद करीब साढ़े पांच साल तक वह इसी मंडल में रहे. यह अवधि किसी एक मंडल में कमिश्नर के रूप में उनकी लंबी पारी को अलग पहचान देती है. इस दौरान रामपुर और संभल जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिलों के प्रशासन की निगरानी की जिम्मेदारी भी उनके पास रही.
मुरादाबाद में आंजनेय कुमार सिंह के कमिश्नर रहते हुए पड़ोस का जिला संभल वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव बाद सुर्खियों में आ गया था. नवंबर 2024 में संभल में एक मस्जिद के अदालती आदेश पर किए गए सर्वेक्षण के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी, जिसके बारे में कुछ लोगों का दावा था कि वह एक मंदिर के ऊपर बनी थी. इसी क्रम में अखिलेश यादव और आंजनेय कुमार सिंह ने सोशल मीडिया पर काव्यात्मक व्यंग्य किए थे.
उनकी कार्यशैली को लेकर समर्थकों की राय रही कि वह दबाव में काम करने वाले अधिकारी नहीं थे. कोरोना महामारी के दौरान मंडल में प्रशासनिक कामकाज, विकास योजनाओं और जनसुनवाई से लेकर गजेटियर और सांस्कृतिक आयोजनों तक में उनकी सक्रियता की चर्चा हुई. मुरादाबाद में राष्ट्रीय स्तर के उदीषा साहित्य उत्सव का आयोजन भी उनके कार्यकाल की चर्चित उपलब्धियों में गिना गया. लेकिन इसी के साथ उनके प्रशासनिक करियर का दूसरा पहलू भी रहा.
समाजवादी पार्टी और उसके नेताओं की ओर से समय-समय पर उन पर राजनीतिक पक्षधरता के आरोप लगाए गए. अखिलेश यादव ने भी आजम खान के खिलाफ कार्रवाई के संदर्भ में आंजनेय सिंह की भूमिका पर सवाल उठाए थे. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उनके सेवा विस्तार को लेकर भी राजनीतिक आपत्ति दर्ज कराई गई थी.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, आंजनेय सिंह को केवल एक ‘कठोर अधिकारी’ के रूप में देखना अधूरा होगा. उनके लंबे कार्यकाल ने उन्हें पश्चिमी यूपी की प्रशासनिक और राजनीतिक संरचना की गहरी समझ दी.
यही कारण है कि सत्ता पक्ष में उन्हें एक ऐसे अफसर के रूप में देखा गया जो जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील परिस्थितियों में फैसले लेने से पीछे नहीं हटते थे. यही भूमिका 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच उनके आठवें विस्तार की अटकलों का आधार भी बनी थी. लेकिन इस बार केंद्र की मंजूरी नहीं मिली और उनकी यूपी की पारी खत्म हो गई. हालांकि आंजनेय कमिश्नर के रूप में एक ही मंडल में लगातार साढ़े पांच साल तैनात रहने का रिकॉर्ड भी बना गए हैं जिसे किसी दूसरे के लिए तोड़ पाना काफी मुश्किल होगा.
आजम को कितनी राहत?
आंजनेय सिंह के यूपी से जाने का सबसे बड़ा सवाल रामपुर को लेकर है. आजम खान के लिए इसका प्रतीकात्मक महत्व जरूर है. जिस अधिकारी का नाम उनके खिलाफ चली प्रशासनिक कार्रवाई से सबसे ज्यादा जोड़ा गया, वह अब रामपुर-मुरादाबाद मंडल की प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहेगा. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इसे आजम खान के लिए तत्काल ‘बड़ी राहत’ मानना जल्दबाजी होगी. इसकी पहली वजह यह है कि आंजनेय सिंह के कार्यकाल में लिए गए फैसले व्यक्तिगत स्तर पर नहीं थे.
जमीन, विश्वविद्यालय, ट्रस्ट, सरकारी संपत्ति, अतिक्रमण और अन्य मामलों में कार्रवाई संस्थागत प्रक्रियाओं से हुई है. कई मामलों में अदालतों में सुनवाई चल रही है और फैसलों का असर किसी एक अधिकारी के तबादले से समाप्त नहीं होगा.
दूसरी वजह यह है कि आंजनेय सिंह अब भले यूपी में नहीं होंगे, लेकिन उनके कार्यकाल में दर्ज मामले और प्रशासनिक आदेश अपनी जगह मौजूद रहेंगे. जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े मामलों में भी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया जारी है.
दिलचस्प यह है कि जौहर विश्वविद्यालय की 38 इमारतों के ध्वस्तीकरण से जुड़े मामले में आंजनेय ने जिलाधिकारी के आदेश पर रोक लगाकर आजम को राहत भी दी थी. उनकी भूमिका ने इस पुराने टकराव को नया मोड़ दिया था. यानी तस्वीर सिर्फ ‘आजम बनाम आंजनेय’ की नहीं है. कई मामलों में आंजनेय सिंह कार्रवाई के पक्ष में प्रशासनिक चेहरा रहे तो कुछ मामलों में वही अधिकारी न्यायिक प्रक्रिया के तहत आजम खान से जुड़े पक्ष की सुनवाई कर रहे थे.
यह विरोधाभास बताता है कि किसी अधिकारी की विदाई से किसी राजनीतिक नेता के खिलाफ चल रही पूरी कानूनी प्रक्रिया खत्म नहीं होती.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आंजनेय सिंह की विदाई को आजम खान के लिए राहत की शुरुआत तो माना जा सकता है लेकिन इसे निर्णायक राजनीतिक राहत कहना मुश्किल है. असल परीक्षा नए मंडलायुक्त और रामपुर प्रशासन की कार्यशैली से होगी.
मुरादाबाद की नई मंडलायुक्त संगीता सिंह 2009 बैच की आईएएस अधिकारी हैं. इससे पहले वह अलीगढ़ मंडल की मंडलायुक्त थीं और सुल्तानपुर की जिलाधिकारी भी रह चुकी हैं. अब उनके सामने मुरादाबाद मंडल के प्रशासन को संभालने के साथ-साथ रामपुर और संभल जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिलों में संतुलन बनाए रखने की चुनौती होगी.
असली सवाल अब यह भी होगा कि नई प्रशासनिक टीम रामपुर में पुराने मामलों को किस नजर से देखती है और 2027 के चुनाव से पहले आजम खान अपनी राजनीतिक जमीन कितनी वापस हासिल कर पाते हैं. यही आंजनेय सिंह की यूपी से विदाई को सिर्फ एक प्रशासनिक फेरबदल के बजाय 2027 की राजनीति से जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है.

