
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 24 सितंबर को रायबरेली से पीडीए रथयात्रा की शुरुआत कर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपने सामाजिक गठजोड़ के विस्तार का संकेत दिया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र से पीडीए यात्रा शुरू करने के कारण यह कार्यक्रम इंडिया गठबंधन की राजनीति के लिहाज से भी चर्चा में रहा.
लेकिन सपा के इस कार्यक्रम का एक अहम राजनैतिक संदेश लोध मतदाताओं के लिए था. अखिलेश पीडीए रथ पर सवार होकर हरचंदपुर विधानसभा क्षेत्र के सपा विधायक राहुल लोधी के घर चाय पीने पहुंचे. यात्रा की शुरुआत से पहले वे रायबरेली के प्रसिद्ध श्री पिपलेश्वर हनुमान मंदिर, चुरवा धाम में दर्शन करने गए.
लोधी के घर जाने से पहले जीआइसी मैदान में आयोजित जनसभा में अखिलेश ने कहा, “रायबरेली में ऐसा लग रहा है कि यहां पीडीए बनाम भाजपा तो है ही, इस चुनाव में ‘लोधी बनाम योगी’ भी हो सकता है.” अखिलेश का यह बयान सीधे तौर पर लोध मतदाताओं की राजनैतिक अहमियत की ओर इशारा था.
उनके बयान के कुछ ही देर बाद कल्याण सिंह के पौत्र और योगी सरकार में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संदीप सिंह ने पलटवार किया. उन्होंने वीडियो जारी कर कहा, “अखिलेश यादव को चुनाव नजदीक आते ही पिछड़े और खासकर लोधी समाज की याद आती है. उनका कहना था कि सत्ता में रहते हुए सपा प्रमुख ने लोधी समाज के लिए कभी कुछ नहीं किया, लेकिन अब वोट के लिए समाज के बीच पहुंच रहे हैं.”
रायबरेली से पीडीए यात्रा की शुरुआत और राहुल लोधी के घर अखिलेश का जाना स्थानीय राजनीति से आगे का संकेत माना जा रहा है. इसके पीछे तात्कालिक कारण 17 सितंबर को रायबरेली के फिरोज गांधी डिग्री कॉलेज में समाजवादी छात्र सभा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के बीच हुआ विवाद था.
मामले की शिकायत को लेकर सपा छात्र सभा के कार्यकर्ता और विधायक लोधी पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे थे. लोधी ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और कार्रवाई में जातिगत भेदभाव किया.
पुलिस ने आरोपों को खारिज किया था. अखिलेश ने इस घटनाक्रम को पीडीए पर हमले से जोड़ा और लोधी के समर्थन में उनके घर जाने का ऐलान किया था. असल में राजनैतिक प्रभाव के लिहाज से लोध समाज की मौजूदगी को नजरअंदाज करना आसान नहीं. मेरठ से लेकर बस्ती, कौशांबी और पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र की कुल करीब 150 विधानसभा सीटों में से हरेक पर लोध मतदाताओं की संख्या 10,000 से एक लाख के बीच मानी जाती है.
2022 के विधानसभा चुनाव में लोध जाति के कुल 17 विधायक चुने गए थे, जिनमें तीन समाजवादी पार्टी से थे. यही वह सामाजिक आधार है जिसे सपा 2027 में अपने पीडीए गठजोड़ में ज्यादा मजबूती से जोड़ना चाहती है.

रायबरेली से शुरू हुई यात्रा के लिए करीब नौ साल पुरानी, 15 मीटर लंबी मल्टीएक्सल मर्सिडीज बस को पीडीए रथ में तब्दील किया गया था. बस के लाल रंग के बीच इस बार नीले रंग की पट्टी भी थी. उस पर सफेद रंग से “जो पीड़ित, वो पीडीए” नारा लिखा था. लाल और नीले रंग के इस संयोजन के जरिए सपा ने अपने पारंपरिक राजनैतिक प्रतीकों के साथ दलित और बहुजन राजनीति से जुड़ा संदेश भी देने की कोशिश की.
रायबरेली से शुरू हुआ यह अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सपा अब पीडीए को केवल यादव-मुस्लिम आधार तक सीमित राजनैतिक गठजोड़ के रूप में नहीं, बल्कि गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलितों तक विस्तार देने की रणनीति के रूप में आगे बढ़ा रही है.
सपा के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता सुनील सिंह यादव कहते हैं, “पार्टी की प्राथमिकता अपने मूल वोटबैंक को बचाकर पिछड़ों तथा दलितों को जोड़कर और नौजवानों के लिए योजना लाकर 2027 के चुनाव से पहले सपा के जनाधार में बढ़ोतरी करने की है.”
उनका कहना है, “भाजपा की सरकार लगातार अति पिछड़ों ने बनाई है. अब सपा के साथ पटेल, लोधी, मौर्य, निषाद, राजभर जैसी जातियां जुड़ रही हैं. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में इन सभी जातियों के नेता सपा के टिकट पर सांसद बने हैं.” सपा के इस तर्क का आधार 2024 का लोकसभा चुनाव है, जब पार्टी ने 37 सीटें जीतीं. यह उसके किसी भी लोकसभा चुनाव में अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा रहा.
पार्टी ने इस चुनाव में पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक पर आधारित पीडीए को प्रमुख सामाजिक-राजनैतिक फॉर्मूले के रूप में पेश किया था और अब उसी सफलता को 2027 के विधानसभा चुनाव में दोहराने के लिए सामाजिक आधार और संगठन दोनों को विस्तार देने की कोशिश कर रही है.
भाजपा ने 2022 के विधानसभा चुनाव में अपने सहयोगियों के संग 43.82 फीसद मतों के साथ 273 सीटें जीती थीं जबकि सपा गठबंधन को 36.60 प्रतिशत वोट के साथ 125 सीटें मिली थीं. सपा के लिए 2027 की चुनौती इसी अंतर को सामाजिक विस्तार के जरिए कम करना है.
पार्टी अब केवल सीटों के हिसाब से चुनावी तैयारी नहीं कर रही, बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र में अतिरिक्त वोट जोड़ने का गणित भी तैयार कर रही है. अखिलेश ने हर सीट पर 27,000 वोट बढ़ाने की रणनीति तय की है.
पार्टी के आकलन के मुताबिक, 2022 में भाजपा ने 141 सीटें 27,000 तक के अंतर से जीती थीं जबकि सपा ने 93 सीटों पर इसी तरह के अंतर से जीत दर्ज की थी. सपा का लक्ष्य है कि हर सीट पर 27,000 अतिरिक्त वोट जोड़कर 2027 में कुल 234 सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत की जाए.
इस गणित को बूथ स्तर तक पहुंचाने के लिए हर बूथ पर पीडीए सदस्यता अभियान तेज करने के निर्देश दिए गए हैं. सपा के एक प्रदेश सचिव के मुताबिक, “हर बूथ पर कम से कम 300 नए सदस्य जोड़ने का लक्ष्य लेकर पार्टी अपने कार्यक्रम संचालित कर रही है.”
पीडीए विस्तार की रणनीति केवल लोध या अन्य पिछड़ी जातियों तक सीमित नहीं. सपा दलित मतदाताओं के बीच भी अपनी राजनैतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है. इसी क्रम में 8 सितंबर को अखिलेश ने समाजवादी छात्र सभा के लिए नीली टी-शर्ट, नीली जींस और लाल टोपी वाला नया ड्रेस कोड लॉन्च किया.
अखिलेश ने नीले रंग को लोकतंत्र और संविधान के साथ-साथ बहुजन समाज और डॉ. बी.आर. आंबेडकर से जोड़ा. सपा के लिए यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दलित राजनीति पर लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव रहा है.
छात्र सभा के जरिए नीले रंग और आंबेडकरवादी प्रतीकों को सामने रखकर पार्टी दलित युवाओं और बहुजन राजनीति से संवाद बढ़ाने की कोशिश कर रही है. यह उसी पीडीए रणनीति का विस्तार है जिसे सपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रमुखता से आगे बढ़ाया था.
सपा अपने संगठन और नेतृत्व में भी इस सामाजिक बदलाव को दिखाने की कोशिश कर रही है. उन्नाव में यादव जाति के नेता को जिलाध्यक्ष पद से हटाकर जयचंद विमल को जिम्मेदारी दी गई जो धोबी जाति से ताल्लुक रखते हैं.

पार्टी की कोशिश है कि अलग-अलग जातियों में पकड़ रखने वाले स्थानीय नेताओं को संगठन में भूमिका देकर उस समुदाय तक सीधा राजनैतिक संपर्क बनाया जाए. इसी रणनीति के तहत कानपुर के रहने वाले, पिछड़ी जाति के कद्दावर नेता रामआसरे कुशवाहा ने 17 सितंबर को भाजपा छोड़कर सपा का दामन थामा.
छह बार मंत्री रहे कुशवाहा 2013 में सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे. उनका वापस सपा में आना गैर-यादव पिछड़ी जातियों के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाने की कोशिश का एक और उदाहरण है.
अपने जनाधार को विस्तार देने के लिए सपा ने भाजपा के मजबूत इलाकों को भी अपने कार्यक्रमों का केंद्र बनाया है. पार्टी ने आगरा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश दलित सम्मेलन और नवंबर में गोरखपुर में दो दिन के ट्रेनिंग कैंप की योजना बनाई है.
आगरा के दलित सम्मेलन की जिम्मेदारी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामजी लाल सुमन को दी गई है. आगरा और आसपास के जिलों में अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी है. 2011 की जनगणना के अनुसार, अकेले आगरा में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 22 फीसद है.
इनमें जाटव समुदाय की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है. आगरा और आसपास का क्षेत्र लंबे समय से आंबेडकरवादी राजनीति से जुड़ा रहा है और बसपा का मजबूत आधार माना जाता रहा है. इसके बावजूद 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने आगरा जिले की सभी नौ विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी.
सपा की नजर अब आगरा के साथ मथुरा, इटावा, हाथरस, मैनपुरी और फिरोजाबाद जैसे जिलों के दलित मतदाताओं पर है, जहां दलित वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं. पीडीए विस्तार का दूसरा बड़ा पड़ाव गोरखपुर है.
नवंबर में दीवाली के आसपास दो दिन का ट्रेनिंग कैंप आयोजित करने की योजना है. 2022 में गोरखपुर मंडल की 28 में से 27 सीटें भाजपा और उसके सहयोगियों ने जीती थीं. ऐसे में यहां संगठनात्मक प्रशिक्षण कैंप आयोजित करने के पीछे सपा का उद्देश्य अपने कार्यकर्ताओं को उन सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने के लिए तैयार करना है जो लंबे समय से भाजपा के सामाजिक आधार का हिस्सा रहे हैं.
सपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, “पूर्वी यूपी में पार्टी पहले से ही उन समुदायों पर ध्यान केंद्रित कर रही है जो भाजपा के व्यापक सामाजिक आधार का हिस्सा हैं, जिनमें निषाद, कुर्मी और ब्राह्मण शामिल हैं.”
सपा की पीडीए रणनीति का एक अहम हिस्सा उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक विस्तार है. पार्टी आरक्षित सीटों के अलावा सामान्य विधानसभा सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है. करीब 14-15 सामान्य सीटों पर दलित प्रत्याशी उतारने के संकेत दिए गए हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सपा ने दो सामान्य सीटों से दलित उम्मीदवार उतारे थे.
फैजाबाद से अवधेश प्रसाद चुनाव जीते, जबकि मेरठ में सपा उम्मीदवार को करीबी मुकाबले में हार मिली. उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में से 84 अनुसूचित जाति और दो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं.
सपा का फोकस उन सामान्य सीटों पर है जहां दलित मतदाताओं की हिस्सेदारी 20 से 25 फीसद तक है और वे चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. अगर यह रणनीति अपनाई जाती है तो आरक्षित सीटों के अलावा सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवारों की मौजूदगी बढ़ेगी और सपा के कुल दलित तथा जनजातीय उम्मीदवारों की संख्या करीब 100 तक पहुंच सकती है.
अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार को बनाए रखते हुए उसके बाहर नए सामाजिक समूह जोड़ने की सपा की रणनीति जितना कामयाब होगी, पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में सत्ता के उतने ही करीब भी होगी.

