
सितंबर के अंत तक मणिपुर में डर और हिंसा के तीन वर्ष पुराने दौर में एक नया आयाम जुड़ गया. 26 सितंबर को सेनापति जिले के कालेनजांग में दो नगा लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई जबकि दो अन्य घायल हो गए.
महज सितंबर महीने में ही यह इस तरह की छठी घटना थी. कुकी-नगा झड़पों में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती आई है. लेकिन सितंबर खासा घातक साबित हुआ जिसमें 14 लोगों ने जान गंवाई. 4 फरवरी को युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद से कुल मौतों का आंकड़ा 40 से ज्यादा हो चुका है, और सितंबर मध्य तक 100 से ज्यादा घर आग के हवाले किए जा चुके थे.
फरवरी में नगाओं और कुकी-जो समुदाय के बीच तल्खी की जो दरार बनी थी, वह अब और चौड़ी हो चुकी है. यह इस बात का साफ संकेत है कि संघर्ष कैसे और फैलते हुए नए पक्षों को भी इसमें शामिल करता जा रहा है.
तीन साल पहले जब 3 मई, 2023 को मणिपुर में हिंसा भड़की, तब मुख्य संघर्ष मैतेई-बहुल इंफाल घाटी और कुकी-जो की बहुसंख्यक आबादी चुड़ाचांदपुर तथा कांगपोकपी के पहाड़ी इलाकों के बीच ही केंद्रित था. सेनापति, उखरुल, तमेंगलांग, कामजोंग और नोनी जैसे जिलों में रहने वाले नगा काफी हद तक उससे दूर ही रहे.
दरअसल, नगा इलाके में कुछ ऐसे रास्ते बने थे, जहां से विभिन्न समुदायों के लोग जातीय संघर्ष की चपेट में आने की आशंका के बिना आ-जा सकते थे. लेकिन अब वह तटस्थता का दौर बीती बात हो चुका.

एक नई दरार
करीब साल भर तक राष्ट्रपति शासन के बाद खेमचंद सत्ता में आए और उनके पद संभालने के महज तीन दिन बाद 7 फरवरी को उखरुल जिले के लिटन सरेइखोंग में कुकी-जो पुरुषों और एक तंगखुल नगा व्यक्ति के बीच कहासुनी एकाएक आक्रामक हो गई.
थोड़ी ही देर में विवाद हिंसक हो गया और पथराव, आगजनी के साथ गोलीबारी भी हुई. दोनों समुदायों के घरों में आग लगाई गई और लोग साझा आबादी वाली बस्तियां छोड़कर भागने लगे.
वैसे तनाव लिटन के वाकए से पहले से ही पनप रहा था. जनवरी में टाइगर-जर्मन रोड को लेकर कांगपोकपी में विवाद बढ़ गया था. यह रास्ता कुकी-जो समूहों ने मैतेई-बहुल घाटी से गुजरे बिना कांगपोकपी को सीधे चुड़ाचांदपुर से जोड़ने के लिए बनाया था. मार्ग का कुछ हिस्सा नगा गांवों के दावे वाले क्षेत्रों से होकर गुरता है, जिनका कहना है कि यह सड़क उनकी पैतृक भूमि का अतिक्रमण करती है.
वहीं, कुकी संगठनों के लिए यह रास्ता 2023 की हिंसा के बाद जातीय अलगाव के कारण जीवनरेखा की तरह है. उधर, जिलियांगरोंग नगा समुदाय के राजनैतिक/उग्रवादी संगठन जिलियांगरोंग यूनाइटेड फ्रंट के एक धड़े ने अफीम की अवैध खेती से जुड़े कुछ ढांचे जला दिए.
उसके बाद 13 मई को चुड़ाचांदपुर से कांगपोकपी जा रहे तीन कुकी-जो चर्च नेताओं की घात लगाकर हत्या कर दी गई. उनमें रेवरेंड वुमथांग सितल्हो भी शामिल थे, जो सम्मानित बैपटिस्ट नेता और नगा-कुकी सुलह कराने में मध्यस्थ रहे थे.

हमले की जिम्मेदारी अभी तक तय नहीं हो पाई है. कुकी संगठनों ने इसके लिए नगाओं को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि नगाओं ने इस आरोप को खारिज करते हुए जांच की मांग की है. फिलहाल राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) इसकी जांच कर रही है.
कुछ ही दिनों के भीतर दोनों पक्षों की ओर से अपहरण का सिलसिला शुरू हो गया, हालांकि ज्यादातर बंधकों की अदला-बदली हुई या फिर उन्हें रिहा कर दिया गया. लेकिन छह नगा वापस नहीं लौटे और 10 जून को उनके शव बरामद किए गए. कुकी-जो काउंसिल ने बाद में इन हत्याओं को एक “भारी गलती” बताया. साथ ही स्पष्ट किया कि ऐसा नेतृत्व के इशारे पर नहीं किया गया था.
इन हत्याओं ने संघर्ष का दायरा और बढ़ा दिया. अभी तक जो संघर्ष मुख्यत: उखरुल के आसपास तंगखुल नगाओं और कुकी बस्तियों तक ही सीमित था, अब उसमें जिलियांगरोंग नगा और सेनापति, नोनी, तामेंगलोंग तथा कांगपोकपी के इलाके भी शामिल हो गए.
जल्द ही सड़कें बंद कर दी गईं और गांवों को जातीय आधार पर अलग कर दिया गया. मणिपुर का जातीय विभाजन घाटी बनाम पहाड़ी क्षेत्र का मुद्दा नहीं रह गया, अब पहाड़ी क्षेत्र में भी दरारें आ गई हैं.
एनआरसी ने बढ़ाई जटिलता
इस सबके बीच भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार ने पूरे मणिपुर में सितंबर से शुरू होने वाले जनगणना 2027 के मकानों की सूची बनाने वाले चरण को स्थगित कर दिया है. इंफाल घाटी और नगा क्षेत्रों में गूंजते एक नारे “एनआरसी नहीं, तो जनगणना नहीं” ने इस भावना को स्पष्ट रूप से दर्शाया है.
मैतेई और नगा संगठन चाहते हैं कि मणिपुर की आबादी की गिनती करने से पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को अपडेट किया जाए. वहीं कुकी-जो संगठन पहले जनगणना चाहते हैं और 1951 (आजादी के बाद पहली बार जनगणना) के मानदंड पर आधारित एनआरसी का विरोध करते हैं, जो उनकी नजर में अविश्वसनीय और भेदभावपूर्ण है.
हिंसा और जनगणना का यह गतिरोध जमीन, प्रवासन, नागरिकता और राजनैतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े उन्हीं पुराने अनसुलझे सवालों में निहित है. लगभग हर बहस के केंद्र में कुकी-जो आबादी खड़ी है. मैतेई समुदाय के लिए कुकी-जो का मुद्दा म्यांमार से होने वाली अवैध आमद, जंगलों पर अतिक्रमण, अफीम की खेती और अलग प्रशासन की मांग से जुड़ा है.
वहीं नगा संगठनों के लिए मामला उन्हीं पहाड़ियों पर वर्चस्व के दावों, कुकी राजनैतिक क्षेत्र के विस्तार और उन सड़कों तथा बस्तियों पर नियंत्रण का है जिन्हें नगा अपनी पैतृक भूमि मानते हैं.
कुकी-जो संगठनों का कहना है कि भारतीय कुकी-जो लोगों को म्यांमार और अन्य शरणार्थियों के साथ एक ही श्रेणी में मिलाकर देखा जा रहा है. उनका तर्क है कि जातीयता के आधार पर नागरिकता या आपराधिक चरित्र तय नहीं किया जा सकता.
असामान्य सहमति
उन्नीस सौ नब्बे के दशक का नगा-कुकी संघर्ष (जिसमें करीब 700 लोग मारे गए थे) राज्य के इतिहास के सबसे खूनी अध्यायों में से एक था. उसकी वजहें भले आज भी विवादास्पद हों लेकिन जमीन और इलाके पर दावा जताना उसके केंद्र में भी था.
सीमावर्ती व्यापारिक शहर मोरेह के आसपास इस संघर्ष का एक आर्थिक पहलू भी था, जहां से कानूनी और गैर-कानूनी—जिसमें नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी शामिल—दोनों तरह का व्यापार होता था. 2023 के बाद अलग कुकी-जो प्रशासन की मांग ने उन पुराने अंदेशों को फिर से आग दिखा दी.
इस नई नगा-कुकी दरार ने एक असामान्य राजनैतिक सहमति को भी जन्म दिया है. मैतेई और नगा संगठन हमेशा से एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं. नगाओं की क्षेत्रीय एकीकरण की मांगें हमेशा मणिपुर की मौजूदा सीमाओं को बनाए रखने की मैतेई मोर्चाबंदी से टकराती रही हैं. फिर भी एनआरसी के मुद्दे और कुकी सशस्त्र समूहों तथा प्रवासन से जुड़ी चिंताओं पर, दोनों समुदाय साझा राय रखते हैं.
यह सहमति इस ताजा हिंसा से भी पुरानी है. जून 2022 में मैतेई-आधारित कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटिग्रिटी और यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) ने साझा तौर पर एनआरसी और राज्य जनसंख्या आयोग की मांग की थी.
मणिपुर विधानसभा ने अगस्त 2022 में दोनों का समर्थन करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और मार्च 2024 में एनआरसी की मांग को दोहराया. विधानसभा ने इस सितंबर में जनगणना से पहले एनआरसी का फिर से समर्थन किया.
जुलाई में नगा और मैतेई संगठनों ने कुकी उग्रवादी समूहों के साथ कार्रवाई टालने के समझौते (एसओओ) को रद्द करने की मांग को लेकर एक साथ प्रदर्शन किया. अगस्त में यूएनसी ने फिर मैतेई संगठनों के साथ आकर जनगणना या परिसीमन से पहले एनआरसी की मांग पर जोर दिया.
यूएनसी के अध्यक्ष एनजी. लोर्हो कहते हैं, “नागरिकता सत्यापन से पहले जनगणना कराने से मणिपुर के जनसांख्यिकी रिकॉर्ड में गैर-नागरिकों के भी दर्ज होने का जोखिम है. एनआरसी पहले होनी चाहिए, खासकर जब मौजूदा संघर्ष और अनसुलझे क्षेत्रीय विवाद पहले ही जनगणना को चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं.”
जनगणना 2027 पर विवाद दर्शाता है कि जनसांख्यिकीय आंकड़े राजनैतिक रूप से इतने संवेदनशील क्यों हैं. जनगणना नागरिकता तय नहीं करती; यह किसी क्षेत्र में रहने वाली कुल आबादी की गिनती करती है, जिसमें गैर-नागरिक भी शामिल हो सकते हैं.
दूसरी तरफ, एनआरसी का उद्देश्य नागरिकों की पहचान करना है. मैतेई और नगा समूह एनआरसी के कट-ऑफ के लिए 1951 की जनगणना को आधार बनाना चाहते हैं. गृह मंत्री गोविंददास कोंथौजम ने भी 7 सितंबर को विधानसभा में कहा था कि राज्य सरकार 1951 के पक्ष में है.
कुकी-जो काउंसिल व्यावहारिक और राजनैतिक दोनों आधारों पर इसका विरोध करती है. उसका तर्क है कि 1951 में कई पर्वतीय इलाके दुर्गम, अछूते और कागजी तौर पर ठीक तरह से दर्ज नहीं थे. उन रिकॉर्डों का उपयोग करने से वे परिवार बाहर हो सकते हैं जो कट-ऑफ तारीख से पहले से मणिपुर में रह रहे हैं, लेकिन उनके पास दस्तावेजी सबूत नहीं हैं.
कुकी, चिन और जोमी आबादी ऐतिहासिक रूप से म्यांमार के साथ लगती सीमा के दोनों ओर बसी है, इसलिए कागजों पर पहचान का यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है. इसके अलावा, म्यांमार में फरवरी 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद, खुली सीमा के रास्ते बहुत-से शरणार्थी मणिपुर में दाखिल हो गए.
हालांकि, कुकी-जो काउंसिल के सूचना और प्रचार सचिव गिंजा वुअलजोंग इसे एक साजिश के तौर पर देखते हैं. वे कहते हैं, “जनगणना से पहले एनआरसी की मांग कुकी-जो आबादी के संबंध में निराधार आरोपों से प्रेरित है. पहले जनगणना को जनसांख्यिकीय तथ्य स्थापित करने दें. नागरिकता संदेह से तय नहीं हो सकती, और न ही कोई राज्य या समुदाय एनआरसी की शर्तें थोप सकता है.”
यह जातीय विभाजन अब सरकार के स्तर तक भी पहुंच चुका है. 10 सितंबर को नगा उप-मुख्यमंत्री लोसी दिखो ने कैबिनेट बैठक का बहिष्कार किया क्योंकि उसमें कुकी समुदाय से आने वाली उप-मुख्यमंत्री नेमचा किपगेन शामिल हो रही थीं. यूएनसी ने किपगेन को पद से हटाने की मांग रखी है.
परिसीमन ने मामले को और जटिल बना दिया है. मणिपुर में 60 विधानसभा सीटें हैं—40 घाटी में और 20 पहाड़ी क्षेत्र में. मौजूदा ढांचा 1971 की जनगणना के आधार पर हुए 1973 के परिसीमन पर आधारित है.
2001 की जनगणना के आधार पर बाद में होने वाला परिसीमन जनसंख्या के आंकड़ों पर विवाद के कारण लागू नहीं हो सका था. ऐसे में एक नई जनगणना घाटी और पहाड़ियों के बीच राजनैतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन को पूरी तरह बदल सकती है.

अफीम की सियासत
कुकी-बहुल क्षेत्रों में अफीम की अवैध खेती के आरोप 2023 की हिंसा से पहले भी लगाए जाते रहे हैं. हालांकि, फसल नष्ट किए जाने के ताजा आंकड़े बताते हैं कि इसे केवल जातीय नजरिए से नहीं देखा जा सकता. 1 जनवरी से 28 फरवरी के बीच प्रशासन ने मणिपुर के सात जिलों में 957 हेक्टेयर अफीम की खेती नष्ट की.
इसमें सबसे बड़ा क्षेत्रफल कुकी-जो बहुल कांगपोकपी या चुड़ाचांदपुर में नहीं, बल्कि नगा-बहुल उखरुल में था, जहां 634 हेक्टेयर फसल नष्ट की गई. कांगपोकपी में 98 हेक्टेयर और चुड़ाचांदपुर में 94 हेक्टेयर फसल नष्ट की गई. 2024 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2017 के बाद से कांगपोकपी में सबसे ज्यादा फसल नष्ट की गई, जिसके बाद उखरुल और चुड़ाचांदपुर का नंबर रहा.


आंकड़े काफी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इससे पता चलता है कि अफीम की खेती पूरे पहाड़ी इलाके में आपराधिक गतिविधियों का केंद्र है. यह आजीविका और अर्थव्यवस्था का आधार भी है. इसके लिए किसी एक समुदाय को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
मणिपुर की सीमा म्यांमार से लगती है जो नशीले पदार्थों के व्यापार से जुड़े गोल्डन ट्रायंगल के काफी करीब है. सशस्त्र संगठन, तस्कर और स्थानीय नेटवर्क रास्तों, अवैध वसूली और सीमा पार कारोबार में वर्चस्व बनाने में जुटे रहे हैं.
मणिपुर का खतरा अब जातीय संघर्ष तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक-दूसरे से जुड़े टकरावों की शृंखला बन चुका है जो नागरिकता, जमीन, नशीले पदार्थ और राजनैतिक प्रतिनिधित्व के खाद-पानी से अपनी जड़ें जमाता जा रहा है.
राज्य सरकार जब तक हथियारों पर नियंत्रण बहाल नहीं करती, क्षेत्रीय दावों का समाधान नहीं करती और नागरिकता को जातीयता से अलग नहीं करती तब तक हर नया विवाद पुराने जख्म को फिर से हरा करता रहेगा.

