scorecardresearch
डार्क मोड

प्रधान संपादक की कलम से

महज सावधानी ही त्रासदियों को रोक सकती है. पहली जरूरत नेपाल, भूटान और चीन के साथ वास्तविक समय में आंकड़े साझा करने और संयुक्त नियम बनाने की है. प्रकृति सीमा पर नहीं रुकती, इसलिए हमारी निगरानी व्यवस्था भी वहां नहीं रुक सकती

16 सितंबर, 2026 का आवरण
अपडेटेड 12 सितंबर , 2026

अगस्त की 26 तारीख को ग्लेशियर की बर्फ और आधार चट्टान का एक विशाल हिस्सा नेपाल-तिब्बत सीमा पर लांगटांग लिरुंग पर्वत की चोटी से टूट गया. उसका फैलाव एक कतार में रखे 10 क्रिकेट स्टेडियमों जितना था. वह एक किलोमीटर से ज्यादा नीचे खाइयों में जा गिरा. इससे पिसी चट्टान, बर्फ और कीचड़ का विशाल सैलाब 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ा.

ल्हेंदे खोला और भोटे कोशी नदी घाटियों के लोगों को संभलने के लिए कुछ ही मिनट मिले. हमने अनगिनत वीडियो में पूरे गांव, सीमा चौकियां, पुल, सड़कें और वाहन बहते देखे. 1,200 से ज्यादा लोग मारे गए और करीब 5,000 लापता हैं.

ऐसी घटनाओं के पैमाने को सामान्य समझ से पकड़ना मुश्किल है. यहां शुरुआती झटका रिक्टर पैमाने पर 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर था. उत्तराखंड के चमोली में 2021 में ग्लेशियर टूटने से निकली ऊर्जा हिरोशिमा पर गिराए गए 15 परमाणु बमों के बराबर थी.

ये छिटपुट घटनाएं नहीं हैं. भारत की पूरी उत्तरी सीमा दुनिया की सबसे ऊंची और भूगर्भीय रूप से सबसे अस्थिर पर्वत शृंखला से घिरी है. हम इन्हें इंसानी आकलन से परे ईश्वरीय घटनाएं मानते नहीं रह सकते. हमें खतरे का सही अंदाजा लगाना होगा.

खतरे का बुनियादी नक्शा भी कोई शक नहीं छोड़ताः भारत बहुत बड़े जोखिम के बीच रह रहा है. जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय अब नए खतरे पैदा कर रहा है.

यह जोखिम लद्दाख और जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक 11 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में फैली हमारी 2,500 किलोमीटर लंबी पर्वतीय सीमा तक ही सीमित नहीं है. इन पहाड़ों से उतरने वाली नदियां उत्तरी मैदानों को पानी देती हैं और हमेशा से बाढ़ की आशंका वाली रही हैं.

इन दोनों भौगोलिक क्षेत्रों के करीब 70 करोड़, यानी देश की आधी आबादी ऊंचे पहाड़ों की आपदाओं के दायरे में है. इसी क्षेत्र में सैकड़ों पनबिजली परियोजनाएं हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 45,000 मेगावाट से ज्यादा है. इस तरह भारत का कुछ सबसे महंगा बुनियादी ढांचा संभावित आपदा के ठीक रास्ते में खड़ा है.

इन घटनाओं में तेजी की वजह समझने के लिए हिमालयी चोटियों की शांत दिखने वाली तस्वीर के पार देखना होगा. ये युवा पहाड़ हैं, जो अब भी हर साल 10 मिलीमीटर तक ऊंचे हो रहे हैं. इसलिए इनकी आधार चट्टान सूक्ष्म भूकंपीय अस्थिरता की शिकार हो सकती है. इसके ऊपर ग्लोबल वार्मिंग का असर है, जो चोटियों पर सदियों से स्थिर पर्माफ्रॉस्ट को तेजी से पिघला रहा है. इसका पानी आधार चट्टान के छिद्रों में रिसकर उसे भीतर से कमजोर करता है.

बर्फ पीछे हटती है तो आसपास की ढलानों का सहारा भी खत्म हो जाता है. इसीलिए नेपाल या चमोली में सिर्फ ग्लेशियर नहीं टूटा था. उसके नीचे की आधार चट्टान भी ढह गई थी.

1 अक्तूबर, 2025 का आवरण

दूसरा खतरा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लॉफ) का है. ऊंचे पहाड़ों में बर्फ पिघलने से अक्सर पानी जमा होता रहता है, जिसे चट्टानों का बांध रोके रखता है. ज्यादा भार पड़ने पर यह बांध अचानक टूट जाता है. सिक्किम में अक्तूबर 2023 में पर्माफ्रॉस्ट वाले क्षेत्र का भूस्खलन दक्षिण ल्होनक झील में गिरा और सूनामी जैसी लहर बनकर तीस्ता नदी में बह निकला. वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी में बादल फटने से ग्लॉफ की घटना हुई.

भारत की सीमाओं के भीतर 16,627 ग्लेशियर और 7,570 बड़ी ग्लेशियल झीलें हैं. पूरे हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में 63,000 से ज्यादा ग्लेशियर और हिमालयी क्षेत्र में 28,000 से अधिक ग्लेशियल झीलें हैं.

यह आंकड़ा अहम है क्योंकि प्रकृति की अस्थिरता राष्ट्रीय सीमाएं नहीं मानती. इसरो ने अपने अध्ययन में पाया कि 1984 के बाद 676 हिमालयी झीलें काफी फैल गईं और 600 से ज्यादा का आकार दोगुना हो गया. हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाट झील 1989 से 2022 के बीच 178 फीसद फैल गई. इसकी वजह ग्लेशियरों का तेज पिघलाव है.

हाल के वर्षों में हर दशक तापमान 0.60 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ा है और बर्फ की सतह चार डिग्री से ज्यादा गर्म हुई है. कुल 195 झीलों की पहचान ग्लॉफ के अधिक खतरे वाली झीलों के रूप में हुई है. उनके ऊपर सैकड़ों लटकते ग्लेशियर मौजूद हैं.

महज सावधानी ही त्रासदियों को रोक सकती है. पहली जरूरत नेपाल, भूटान और चीन के साथ वास्तविक समय में आंकड़े साझा करने और संयुक्त नियम बनाने की है. प्रकृति सीमा पर नहीं रुकती, इसलिए हमारी निगरानी व्यवस्था भी वहां नहीं रुक सकती.

दूसरी जरूरत ऐसी पूर्व चेतावनी शृंखला बनाने की है, जो शुरू से अंत तक सचमुच काम करे. स्रोत पर फैलती झीलों, पिघलते ग्लेशियरों, बारिश, नदी के बहाव और भूकंपीय हलचल की लगातार निगरानी करने वाले सेंसर लगें. सैटेलाइट और रेडियो संपर्क इतने मजबूत हों कि आपदा के साथ आने वाले खराब मौसम में भी सूचना भेज सकें.

आपदा नियंत्रण कक्ष और स्वचालित अलार्म बांध संचालकों, जिला प्रशासन और निचली बस्तियों को कार्रवाई के लिए पर्याप्त समय रहते चेतावनी दे सकें. सुरक्षित सीमा से ज्यादा फैलती ग्लेशियल झीलों का पानी कई मामलों में संकट आने से पहले साइफन, पंप या नियंत्रित निकास से कम किया जा सकता है. चेतावनी मिलते ही कुछ मीटर ऊंची जगह पर चले जाना भी कारगर हो सकता है.

इस हफ्ते की आवरण कथा में सीनियर एसोसिएट एडिटर जुमाना शाह ने भारत पर मंडराते हिमालयी खतरे के पूरे दायरे और उसे कम करने के उपायों का खाका पेश किया है. लाखों लोगों ने 26 अगस्त की घटनाएं अपने फोन पर देखीं. वे दृश्य इतने भयावह थे कि काफी समय तक लोगों का ध्यान खींचे रहे. लेकिन इस मुद्दे पर नीतिगत ध्यान इससे कहीं ज्यादा लंबे समय तक, लगातार और गंभीरता से बना रहना चाहिए.

उन पहाड़ों में हो रहे बदलावों के निचले इलाकों में 70 करोड़ भारतीय रहते हैं. लिहाजा, इस आंकड़े को अगली आपदा समीक्षा तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

ADVERTISEMENT
Advertisement