
भारत की अर्थव्यवस्था ने तमाम लोगों की उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के अनिश्चतता भरे माहौल में भी इसकी मजबूती बरकरार है. अप्रैल-जून तिमाही (वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही) में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)—जो अर्थव्यवस्था के आकार और वृद्धि का मानक पैमाना होता है—में सालाना आधार पर 7.8 फीसद का इजाफा हुआ.
इसकी तुलना में, साल भर पहले इसी तिमाही (वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही) में यह वृद्धि 6.9 फीसद रही थी. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ओर से 31 अगस्त को जारी ये आंकड़े विश्लेषकों के अनुमानों और भारतीय रिजर्व बैंक के सात फीसद के आकलन से कहीं ज्यादा हैं.
यह बढ़ोतरी खासतौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान युद्ध के बाद की यह पहली पूरी तिमाही थी जिसमें यह वृद्धि हासिल की गई है. इस अवधि में दुनिया की अर्थव्यवस्था ने ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के झटकों को झेला है. वहीं, महंगाई को एडजस्ट किए बिना अगर मौजूदा बाजार मूल्य पर मापी गई नॉमिनल जीडीपी को देखें तो उसमें 10.3 फीसद वृद्धि हुई है. साल भर पहले यह करीब आठ फीसद थी.
सवाल यह है कि क्या अर्थव्यवस्था साल की दूसरी छमाही में आने वाली चुनौतियों का सामना कर पाएगी?
वैश्विक एनालिटिक्स कंपनी क्रिसिल ने अर्थव्यवस्था की मजबूती के तीन कारण बताए हैं. पहली वजह घरेलू खपत थी. क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी कहते हैं, “पिछले वित्त वर्ष में आयकर में दी गई राहत और माल और सेवा कर (जीएसटी) के ढांचे में सुधार से घरेलू खर्च को प्रोत्साहन मिला.”
ऑटोमोबाइल बाजार इसका शानदार मिसाल है. यात्री वाहनों की बिक्री में सालाना आधार पर 25.6 फीसद की बढ़ोतरी हुई जबकि दुपहिया वाहनों की बिक्री 20.6 फीसद बढ़ी. इससे “सभी आय समूहों की व्यापक मांग” जाहिर होती है. वे कहते हैं, “खाद्य सुरक्षा योजना के साथ राज्यों का नकद हस्तातंरण कार्यक्रम भी मददगार रहा है जिनसे परिवारों की आर्थिक स्थिति संभालने और खर्च की रफ्तार बनाए रखने में मदद मिली है.”
दूसरा कारण सार्वजनिक निवेश रहा. केंद्र सरकार का पूंजी खर्च वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में सालाना आधार पर 23.7 फीसद बढ़ा, जिससे ग्रोथ को बढ़ावा देने में सरकार की भूमिका और मजबूत हुई. राज्यों ने भी इस गति को बरकरार रखने में योगदान दिया; 17 प्रमुख राज्यों का कुल पूंजी खर्च साल भर पहले की तुलना में 6.8 फीसद बढ़ा.
केयरएज रेटिंग्स में मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा कहती हैं, “कैपेक्स-आधारित ग्रोथ पर सरकार के लगातार जोर देने से लगातार दो तिमाहियों में निवेश में डबल-डिजिट में बढ़ोतरी हुई है.” व्यापक स्तर पर भी निवेश मजबूत हुआ. सकल स्थायी पूंजी निर्माण, जिसमें सरकारी और निजी दोनों तरह का निवेश शामिल होता है, में लगभग 12 फीसद की बढ़ोतरी हुई और यह पिछली 13 तिमाहियों में सबसे ज्यादा रहा है. एक साल पहले यह 6.7 फीसद था और पिछली तिमाही (वित्त वर्ष 26 की चौथी तिमाही) में 10.5 फीसद था.
मदद का तीसरा सहारा निर्यात रहा और दुनिया के मुश्किल हालात के बावजूद निर्यात ने अच्छा प्रदर्शन किया. जोशी कहते हैं, “कुल निर्यात में वास्तविक रूप से 12 फीसद की बढ़ोतरी हुई, जिससे बाहर की मांग में उतार-चढ़ाव के बीच भारतीय निर्यात में तेजी जाहिर होती है.” सेवा क्षेत्र सबसे मजबूत व्यापक सेक्टर रहा और इसमें 10 फीसद का इजाफा हुआ. वित्त, रियल एस्टेट, आइटी और प्रोफेशनल सेवाओं में 12.1 फीसद की बढ़ोतरी हुई, जबकि वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही में यह वृद्धि 8.8 फीसद थी.
मैन्युफैक्चरिंग और बिजली सेक्टर के दम पर उद्योग 8.6 फीसद की दर से बढ़ा. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ भी 8.3 फीसद से बढ़कर 9.2 फीसद हो गई. सकल मूल्य वर्धन यानी ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (जीवीए) में 8.2 फीसद का इजाफा हुआ. जीवीए को अर्थव्यवस्था के असल प्रदर्शन को मापने का बेहतर पैमाना माना जाता है.

मांग का लाभ
कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह की नजर में इस तेजी को और आगे बढ़ाने का मौका है. वे कहते हैं, “2010 में हम दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थे, आज हम पांचवें नंबर पर हैं. इस रास्ते पर आगे बढ़ने और टिके रहने की जरूरत है. हमें अगले कुछ वर्षों में जापान और जर्मनी से आगे निकलने पर ध्यान देना चाहिए.”
कंपनियों का प्रदर्शन भी मजबूत रहा है और भारतीय कंपनियों ने पिछली दो तिमाहियों में दोहरे अंक में कमाई में बढ़ोतरी दर्ज की है. शाह बताते हैं कि यह बढ़ोतरी तेल की कीमतों में अनिश्चितता, सप्लाइ-चेन की बाधाओं के बीच रुपए की गिरती कीमत और मॉनसून संबंधी मुश्किलों के बावजूद हुई है.
औद्योगिक आंकड़े भी मजबूत मांग की ओर इशारा करते हैं. कंज्यूमर-ड्यूरेबल्स की ग्रोथ पिछली तिमाही के दो फीसद से बढ़कर आठ फीसद हो गई और यह पिछले वित्त वर्ष के 3.2 फीसद के औसत से भी ज्यादा रही.
मोटर गाड़ियों के उत्पादन में 15.3 फीसद का इजाफा हुआ, परिवहन से जुड़े अन्य वाहनों में 19.7 फीसद की वृद्धि हुई. दोनों को लगातार बरकरार मांग और जीएसटी में सुधार से फायदा मिला.
आगे की मुश्किलें
फिर भी अर्थव्यवस्था की कुछ कमजोरियां पहले से ही नजर आ रही हैं. खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों का जीवीए 3.9 फीसद से घटकर 3.6 फीसद रह गया, जिसकी एक वजह खरीफ की बुआई में देरी रही.
जून में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर रहा और महीने के आखिर तक बारिश लंबे समय के औसत का सिर्फ 60 फीसद थी, जबकि साल भर पहले यह 109 फीसद थी. इसलिए 25 जून तक खरीफ की बुआई साल भर पहले की तुलना में 22.7 फीसद कम हुई. उम्मीद से ज्यादा मजबूत पहली तिमाही के बाद क्रिसिल ने वित्त वर्ष 27 के लिए जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 6.6 फीसद से बढ़ाकर सात फीसद कर दिया है.
हालांकि एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी को आगे कुछ नरमी की उम्मीद है. वे कहती हैं, “भले जीडीपी ग्रोथ अभी तक अच्छी रही है लेकिन साल की बाकी तिमाहियों में ऊंचे आधार, सार्वजनिक पूंजी खर्च में कुछ कमी (राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पूरा करने के लिए), कमजोर बुआई (और कम बारिश) का असर, जीएसटी दर कटौती का असर कम पड़ जाने और मैन्युफैक्चरिंग फ्रंटलोडिंग (इस कारण तैयार माल का स्टॉक 10 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है) खत्म होने से कुछ नरमी आ सकती है.”
ये आंकड़े कुछ हद तक भरोसा देते हैं पर आने वाले महीने परखेंगे कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार कितनी रह सकती है क्योंकि कुछ मौजूदा सपोर्ट धीरे-धीरे कम होने लगी हैं.
जीडीपी के ऊंचे आंकड़ों पर सवाल
पहली तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों ने अर्थशास्त्रियों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है. कुछ लोग इन आंकड़ों के लिए इस्तेमाल तरीके पर सवाल उठा रहे हैं और पूछ रहे हैं कि क्या ये आंकड़े आर्थिक सचाई को सही ढंग से दिखाते हैं? खासकर नौकरियों और आय के मामले में. कांग्रेस ने भी आरोप लगाया है कि जीडीपी के आंकड़ों में “हेराफेरी” की गई है.
इस विवाद को समझने के लिए नॉमिनल जीडीपी और रियल जीडीपी के बीच अंतर समझना जरूरी है. नॉमिनल जीडीपी में मौजूदा कीमतों पर वस्तुओं और सेवाओं की वैल्यू मापी जाती है और कीमतों में हुए परिवर्तन का असर भी इसमें शामिल होता है.
रियल जीडीपी में कीमतों में होने वाले बदलावों को शामिल नहीं किया जाता और यह देखा जाता है कि आउटपुट के लिहाज से अर्थव्यवस्था में वास्तव में कितनी वृद्धि हुई है.
सरकार ‘जीडीपी डिफ्लेटर’ या ‘इम्प्लिसिट प्राइस डिफ्लेटर’ का इस्तेमाल करके वास्तविक जीडीपी का आंकड़ा निकालती है. इसमें मौजूदा कीमतों पर जीडीपी की तुलना बेस-ईयर यानी आधार वर्ष की कीमतों पर जीडीपी से की जाती है और कीमतों में हुए कुल बदलाव को मापा जाता है. इससे यह समझने में मदद मिलती है कि उत्पादन के मूल्य में कितनी वृद्धि उत्पादन बढ़ने के बजाए ऊंची कीमतों के कारण हुई है. वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही के लिए इस तरह नॉमिनल जीडीपी वृद्धि 10.3 फीसद और वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 फीसद रही.
पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इन आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं. उनका तर्क है कि सरकार ने इस साल की ग्रोथ रेट को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए पिछले साल के जीडीपी आंकड़ों को कम कर दिया. उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया होता तो “असली ग्रोथ” सिर्फ 2.6 फीसद होती. उनके शब्दों में, “सरकार ने 30 अगस्त को कहा था कि पिछले वित्त वर्ष यानी वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही के लिए मौजूदा कीमतों पर जीडीपी 86 लाख करोड़ रुपए (समग्र रूप में) थी.
उस जीडीपी को घटाकर 80 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है. इसलिए मौजूदा बढ़ोतरी 10.3 फीसद दिख रही है.” उन्होंने तर्क दिया कि अगर सरकार ने 86 लाख करोड़ रुपए के पुराने आंकड़े को ही रखा होता तो ग्रोथ सिर्फ 2.6 फीसद होती. उन्होंने कहा, “हम सभी यही सवाल उठा रहे हैं कि 86 लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा 80 लाख करोड़ रुपए कैसे हो गया?” उनका कहना है कि जीडीपी अनुमान में छह लाख करोड़ रुपए का अंतर बहुत बड़ा और अप्रत्याशित है.

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पार्ट-टाइम सदस्य गौरव वल्लभ ने इसका प्रतिकार किया और कहा कि जीडीपी की गणना के लिए इस्तेमाल होने वाले आधार वर्ष (बेस ईयर) में बदलाव हुआ है, जिसे 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया गया है.
अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों को दिखाने के लिए इस साल फरवरी में यह बदलाव किया गया था जिससे मूल डेटा और तरीके में भी बदलाव आया है. उन्होंने कहा, “अगस्त में जो जीडीपी डेटा जारी किया गया था, वह पहला अग्रिम अनुमान था. नवंबर 2026 में उसी तिमाही के लिए दूसरा अग्रिम अनुमान आएगा...यही प्रक्रिया है.”
उनका कहना था, “हम अलग बेस ईयर में डिनॉमिनेटर को कैसे माप सकते हैं, और फिर यह कैसे कह सकते हैं कि भारत की नॉमिनल ग्रोथ रेट लगभग 2 फीसद है या रियल ग्रोथ रेट शून्य फीसद है? यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है.”
केंद्र सरकार का भी कहना था कि वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही की ग्रोथ रेट को “मैकेनिकल तरीके से” बढ़ाकर 7.8 फीसद करने के लिए पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी में जानबूझकर कोई कमी नहीं की गई. लेकिन गर्ग ने तर्क दिया कि मसला महज आधार वर्ष में बदलाव का नहीं है. “वैल्यू में बहुत बड़ा बदलाव होना छोटी-मोटी बात नहीं है और यह बताना जरूरी है कि जिस चीज को पहले प्रोडक्शन वैल्यू (उत्पादन मूल्य) में शामिल किया गया था, उसे अब क्यों नहीं शामिल किया जा रहा है? यह बहुत गंभीर मामला है."
उन्होंने वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग के लिए नेगेटिव डिफ्लेटर पर भी सवाल उठाए जबकि मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट और इनपुट, दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है.
केंद्र ने मैन्युफैक्चरिंग के लिए नेगेटिव इम्प्लिसिट प्राइस डिफ्लेटर (जब किसी सेक्टर में वास्तविक उत्पादन की वृद्धि दर नॉमिनल वृद्धि दर से ज्यादा हो जाती है, तो यह दर ऋणात्मक हो जाती है) का यह कहते हुए बचाव किया कि इससे यह बात जाहिर होती है कि इनपुट की कीमतें आउटपुट की कीमतों की तुलना में तेजी से बढ़ीं.
उसने यह भी स्पष्ट किया कि उसने ‘डबल-डिफ्लेशन अप्रोच’ का इस्तेमाल किया है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत तरीका है. इसमें मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट और उसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले इंटरमीडिएट इनपुट की कीमतों को अलग-अलग एडजस्ट किया जाता है.
इसके बाद मंहगाई को समायोजित करते हुए आउटपुट की वैल्यू में से इंटरमीडिएट खपत की वैल्यू (महंगाई-एडजस्ट करने के बाद) घटाई जाती है और इस तरह रियल ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) की गणना की जाती है.

