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चेतावनी के संकेत

एनडीए के पास बेहद स्पष्ट बहुमत और प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बरकरार, मगर बेरोजगारी, महंगाई और जेन ज़ी असंतोष से भाजपा मुसीबत में

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
अपडेटेड 8 सितंबर , 2026

इसी साल मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीसरे कार्यकाल में पहले से कहीं ज्यादा अजेय दिखाई दे रहे थे. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारी जीत हासिल की थी. यह न सिर्फ पूर्वी भारत के एक प्रमुख राज्य में भाजपा की पहली ऐतिहासिक जीत थी, बल्कि उससे 2024 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद बिहार, महाराष्ट्र, असम, हरियाणा और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में पार्टी की शानदार जीत का एक चक्र भी पूरा हुआ था.

बंगाल की इस बड़ी जीत के बाद भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार देश के 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 22 तक में फैल गई.इससे लगा कि पार्टी ने लोकसभा चुनाव में बहुमत न मिलने से पैदा हुई अनिश्चितता को पीछे छोड़ दिया है. उस चुनाव में भाजपा को 240 सीटें मिली थीं, जो 272 के साधारण बहुमत से 32 कम थीं.

इसलिए उसे केंद्र में सरकार बनाने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों पर निर्भर होना पड़ा था.इसलिए मोदी सरकार झटकों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थी, जब एक के बाद एक कई प्रतिकूल हालात ने प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी, दोनों को बचाव की मुद्रा में ला दिया.

मोदी खुद को लगातार ऐसी हालत में फंसा हुआ पाने लगे, जहां देश के भीतर और विदेश नीति के मोर्चे, दोनों तरफ मुश्किलें थीं, यानी आगे कुआं, पीछे खाई. बंगाल में भाजपा की जीत का जश्न अभी अपने चरम पर पहुंच ही रहा था कि मोदी सरकार के लिए मुश्किलें पैदा होने लगीं.

मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए 3 मई को हुई 2026 की राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) का प्रश्नपत्र लीक हो गया.

इससे केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को परीक्षा रद्द करनी पड़ी. एक अनौपचारिक टिप्पणी से जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को जंतर मंतर पर विशाल विरोध प्रदर्शन करने का सही मौका मिल गया. यह आंदोलन आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर जाकर खत्म हुआ.

यह संकट अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौता टूटने के बाद महंगाई फिर बढ़ने लगी. इससे होर्मुज जलडमरूमध्य में दोनों देशों के बीच नुक्सानदेह टकराव और लंबा खिंच गया तथा भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गईं.

सरकार की चिंता बढ़ाने वाली एक और वजह अल नीनो का खतरा और अनियमित बारिश थी. इससे खेती के उपज में तेज गिरावट का अंदेशा पैदा हो गया.

कई संकटों का प्रधानमंत्री पर असर
इन एक साथ उभरे कई संकटों का प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी की लोकप्रियता पर पड़ा असर इंडिया टुडे-सीवोटर के ताजा छमाही देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण में साफ दिखाई देता है.

इस सर्वेक्षण के मुताबिक, अगर अभी लोकसभा चुनाव होते हैं तो भाजपा 261 सीटें जीतेगी, जो अपने दम पर साधारण बहुमत से 11 सीटें कम हैं. यह जनवरी के सर्वेक्षण से 26 सीटों की गिरावट है.

उस सर्वेक्षण में भाजपा के लिए 287 सीटों का कहीं अच्छी स्थिति का अनुमान लगाया गया था. इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक, पार्टी को पश्चिम बंगाल में जीत नहीं मिली होती तो सीटें ज्यादा घट‌तीं.

हालांकि मोदी सरकार पर फिलहाल कोई तात्कालिक खतरा नहीं है. जनवरी 2026 के सर्वेक्षण के मुकाबले एनडीए की सीटें 26 घटने का अनुमान है, फिर भी गठबंधन के पास 326 सीटों का मजबूत और स्पष्ट बहुमत है.

यह अनुमान मई 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को मिली 293 सीटों से काफी ज्यादा है. हालांकि, इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा भाजपा के महाराष्ट्र में शिंदे शिवसेना और अजित पवार की राकांपा जैसे राजनैतिक गुटों तथा हाल में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के अलग हुए धड़े को अपने साथ मिलाने से आया है. एनडीए का कुल वोट शेयर दो प्रतिशत अंक घटा है.

इसकी मुख्य वजह भाजपा के अपने वोट शेयर में आई गिरावट है. इसके बावजूद गठबंधन के पास अब भी 45.1 फीसद का प्रभावशाली वोट शेयर है, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे 42.5 फीसद वोट मिले थे.

इसके मुकाबले कांग्रेस की अगुआई वाला इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (इंडिया) पिछले सात महीनों में मोदी सरकार की मुश्किलों का कोई बड़ा राजनैतिक फायदा नहीं उठा पाया है.

उसकी सीटें घटकर 185 रह गई हैं, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में जीती गई 234 सीटों से बहुत बड़ी गिरावट है. इस कमी का बड़ा कारण गठबंधन के प्रमुख दलों को विधानसभा चुनावों में मिली हार है.

इनमें ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) शामिल है. आप इसके बाद इंडिया ब्लॉक से अलग हो गई. इंडिया ब्लॉक की मुश्किलें तब और बढ़ीं जब एम.के. स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक) मई में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव हार गई.

इसके बाद कांग्रेस ने विजय की सत्तारूढ़ तमिलगा वेत्री कलगम (टीवीके) को समर्थन दिया तो नाराज द्रमुक ने भी गठबंधन छोड़ दिया.

इस बार बदलाव यह है कि कांग्रेस ने इंडिया ब्लॉक की सीटों को सहारा दिया है. कांग्रेस की सीटें जनवरी के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण की 80 से बढ़कर अब 106 हो गई हैं.

यह 26 सीटों की बढ़त है और 2024 के लोकसभा चुनाव में जीती गई उसकी 99 सीटों से भी सात ज्यादा है. कांग्रेस का वोट शेयर भी 19.6 फीसद से बढ़कर 21.1 फीसद हो गया है, यानी 1.5 प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी हुई है.

इससे मौजूदा सर्वेक्षण में इंडिया ब्लॉक का कुल वोट शेयर मामूली बढ़कर 39.1 फीसद हो गया, जो अब भी 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे मिले 40.6 फीसद वोट शेयर से नीचे है.

भाजपा की सीटों में गिरावट दिखती है तो उसके सबसे बड़े और सबसे पहचाने जाने वाले नेता मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता भी इस सर्वेक्षण में घटी है. अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त नेता कौन है, इस सवाल पर मोदी की रेटिंग छह प्रतिशत अंक गिरकर जनवरी के सर्वेक्षण के 54.7 फीसद से अब 48.7 फीसद रह गई है.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को शायद ऐसी रेटिंग मिलती तो वे खुशी से उछल पड़ते, लेकिन मोदी के लिए 50 फीसद से नीचे जाना चेतावनी का संकेत है. खासकर इसलिए कि अगस्त 2020 में, कोविड-19 की पहली लहर के बीच और उनके दूसरे कार्यकाल के शुरू होने के मुश्किल से एक साल बाद, उनकी रेटिंग 66 फीसद के शिखर पर पहुंची थी.

उसके बाद मोदी की रेटिंग जनवरी 2021 में गिरकर सबसे निचले स्तर 24 फीसद पर आ गई थी. लेकिन उसके बाद 50 फीसद के आसपास बनी रही है.

राहुल को भी राहत नहीं
प्रधानमंत्री की रेटिंग में छह अंकों की गिरावट का कोई खास फायदा उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी को नहीं मिला है. उनकी रेटिंग पिछले देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के मुकाबले सिर्फ 0.5 प्रतिशत अंक बढ़कर 27.1 फीसद हुई है.

हालांकि राहुल के खाते में यह बात जरूर जाती है कि पिछले पांच देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में उन्होंने करीब 25 फीसद का स्थिर औसत बनाए रखा है. लोकसभा चुनाव से पहले फरवरी 2024 के सर्वेक्षण में उनकी रेटिंग गिरकर 13.8 फीसद के निचले स्तर पर पहुंच गई थी.

इस सर्वेक्षण का बड़ा आश्चर्य तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय का तेजी से उभार है. उन्होंने पहली बार इस सूची में जगह बनाते हुए 9.2 फीसद की चौंकाने वाली रेटिंग हासिल की है और ममता बनर्जी, अखिलेश यादव तथा अरविंद केजरीवाल से काफी आगे निकल गए हैं.

आम आदमी पार्टी के पूर्व सदस्य तथा सीजेपी के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने भी इस सूची में अप्रत्याशित एंट्री की है. उनकी रेटिंग उनके पुराने बॉस केजरीवाल से थोड़ी ज्यादा है.

प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ एनडीए के लिए कुछ दूसरे खतरे के संकेत भी हैं. प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के कामकाज की रेटिंग पूछे जाने पर उसे ‘बेहतरीन’ बताने वालों की संख्या 35.6 फीसद से घटकर 30.1 फीसद रह गई है.

कुल मिलाकर उनके कामकाज को ‘अच्छा’ से ‘बेहतरीन’ मानने वालों की हिस्सेदारी जनवरी के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के बाद 5.7 प्रतिशत अंक घटी है. यह आंकड़ा 57 फीसद से गिरकर 51.3 फीसद हो गया है.

ये आंकड़े अब भी प्रभावशाली हैं. बतौर प्रधानमंत्री मोदी 13वें वर्ष में हैं और लंबे समय से सत्ता में रहने का बोझ स्वाभाविक रूप से बढ़ रहा है. मौजूदा रेटिंग उनकी सरकार के शुरुआती वर्षों में लोकप्रियता से काफी नीचे हैं.

टीम मोदी के कामकाज की रेटिंग भी 1.7 प्रतिशत अंक घटी है. फिर भी 50.4 फीसद की रेटिंग अब भी सम्मानजनक है. इसके बावजूद एनडीए के लिए संदेश साफ हैः उसे इस धीमी गिरावट को रोकना होगा.

एनडीए की सफलता और चूक
एनडीए सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि बताने के लिए कहा गया तो लोगों ने राजनैतिक स्थिरता को सबसे ऊपर रखा. इसके ठीक बाद राम मंदिर का निर्माण, इन्फ्रास्ट्रक्चर और विकास तथा भ्रष्टाचार से मुक्त सरकार देने को प्रमुख उपलब्धियां माना गया.

अनुच्छेद 370 हटाने और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की भी लोगों ने सराहना की है. फिर भी इन कुछ मजबूत पक्षों के साथ अब सवाल और शर्तें भी जुड़ गई हैं.

स्थिरता अच्छी बात हो सकती है, लेकिन देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में जेन ज़ी के जवाब साफ बताते हैं कि वह मौजूदा स्थिति से अधीर हो चुकी है और ज्यादा तेज बदलाव चाहती है.

राम मंदिर की उपलब्धि पर भी ‘चंदा चोरी’ घोटाले का दाग लगा है. करीब 46.6 फीसद लोगों का कहना है कि इस घोटाले ने मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की अगुआई वाली भाजपा सरकार, दोनों को लेकर उनकी राय पर खराब असर डाला है.

मोदी सरकार ने भले ही पूर्ववर्ती यूपीए सरकार जैसे बड़े भ्रष्टाचार घोटालों का सामना नहीं किया हो, फिर भी 43.2 फीसद यानी लगभग हर दो में से एक व्यक्ति मानता है कि एनडीए सरकार के दौरान भ्रष्टाचार बढ़ा है.

भ्रष्टाचार से मुक्त सरकार की छवि भाजपा की एक और बड़ी बढ़त थी, लेकिन हाल की घटनाओं ने इस बढ़त का असर काफी कम कर दिया है. हालांकि सबसे बड़ी चेतावनियां अर्थव्यवस्था के मोर्चे से आ रही हैं. इस सर्वे में बेरोजगारी एनडीए सरकार की अकेली सबसे बड़ी नाकामी बनकर उभरी है और उसके ठीक बाद महंगाई का स्थान है.

वोटर किसानों की बदहाली और परिवारों की घटती आमदनी को भी सरकार की प्रमुख कमियों में गिनते हैं. इन सबको एक साथ देखें तो सरकार की बताई गई नाकामियों में आर्थिक मुद्दों की हिस्सेदारी 54.4 फीसद है.

यह हालत तब है, जब भारत अब भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है और वैश्विक उथल-पुथल के बीच स्थिर आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के लिए मोदी सरकार को सराहना मिली है.

देश के बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य को लेकर आशावाद भी बना हुआ है. सर्वेक्षण में करीब 58 फीसद लोग 2047 तक भारत को विकसित भारत बनाने के मोदी के नजरिए को लेकर उत्साहित हैं.

लेकिन सर्वेक्षण के दूसरे हिस्सों में आर्थिक हालात को लेकर नाराजगी जोरदार और बिल्कुल साफ ढंग से सामने आती है. लगभग आधे लोग अब एनडीए सरकार के आर्थिक कामकाज को या तो ‘औसत’ या ‘खराब’ मानते हैं.

आने वाले समय को लेकर भी ज्यादा उम्मीद दिखाई नहीं देती. बहुमत, 54.5 फीसद लोगों का मानना है कि आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था या तो ‘जस की तस’ या ‘और खराब हो जाएगी’.

आमदनी की गैर-बराबरी को लेकर चिंता भी उतनी ही गहरी है. करीब 43.7 फीसद लोगों का मानना है कि मोदी सरकार की नीतियों से अमीरों को सबसे ज्यादा फायदा मिला है.

इस धारणा को उन 55.7 फीसद लोगों की राय और मजबूत करती है, जिन्हें लगता है कि सरकार की आर्थिक पहलकदमियों से छोटे कारोबारियों और किसानों की कीमत पर बड़े कारोबारों को सबसे ज्यादा लाभ हुआ है.

हैरान करने वाले 65 फीसद लोगों का कहना है कि उन्हें कर्ज लिए बिना अपने घर का बजट संभालने में मुश्किल होती है. करीब दो-तिहाई लोग बेरोजगारी की स्थिति को या तो ‘बहुत गंभीर’ या ‘गंभीर’ बताते हैं.

इन सभी नतीजों को एक साथ देखें तो देश की प्रभावशाली ऊंची विकास दर और सामान्य परिवारों के भीतर महसूस की जाने वाली आर्थिक सुरक्षा के बीच लगातार बढ़ता फासला साफ दिखाई देता है.

बेरोजगारी की समस्या
सबसे ऊपर तो जेन ज़ी की चिंताओं की सूची में बेरोजगारी है. वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी यह पीढ़ी कुल मतदाताओं का करीब 30 फीसद है. युवाओं में उठती बेचैनी और गुस्सा पहले जंतर मंतर पर फूटा, जहां सीजेपी का जन्म हुआ, और बाद में झारखंड में भी दिखाई दिया.

इसी को देखते हुए इस देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में जेन ज़ी की सोच का अलग से अध्ययन किया गया है. नतीजे बताते हैं कि ज्यादातर मुद्दों पर जेन ज़ी मोटे तौर पर देश की पूरी वोटर आबादी की दिशा में ही सोचती है.

लेकिन रोजगार, राजकाज और अपने भविष्य के मामले में वह साफ तौर पर ज्यादा तीखी, फिक्रमंद और बेचैन है (देखें: युवाओं का आक्रोश और बेचैनी). मुख्य सर्वेक्षण में भी जेन ज़ी के जवाबों को अलग करके देखें तो वह आबादी के दूसरे वर्गों के मुकाबले मोदी के कामकाज को काफी कम रेटिंग देती है.

मसलन, जेन ज़ी के सिर्फ 25.8 फीसद लोगों ने मोदी के कामकाज को ‘बेहतरीन’ बताया, जबकि सभी लोगों के बीच यह आंकड़ा 30.1 फीसद है. इसी तरह कम युवा मोदी को ‘अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त’ मानते हैं. जेन ज़ी में यह आंकड़ा 43.9 फीसद है, जबकि सभी लोगों के बीच 48.7 फीसद है.

यह फासला बहुत बड़ा न लगे, लेकिन उस पीढ़ी के लिए अहम है जिसकी कुल वोटरों में हिस्सेदारी लगातार बढ़ेगी और ज्यादा निर्णायक होती जाएगी. यह ऐसी चेतावनी है, जिसे नजरअंदाज करना भाजपा के लिए भारी पड़ सकता है.

जेन ज़ी की निराशा खासकर तब विस्फोटक हो जाती है, जब योग्यता और निष्पक्षता पर उसका भरोसा टूटने लगता है. मध्यवर्गीय परिवार इस उम्मीद में शिक्षा और कोचिंग पर बड़ी रकम खर्च करते हैं कि आखिरकार मेहनत और काबिलियत का फल मिलेगा.

प्रश्नपत्र लीक और परीक्षाओं से जुड़े विवाद इस भरोसे की बुनियाद पर चोट करते हैं और ज्यादा जवाबदेही की मांग को तेज बनाते हैं. युवा वोटर राजनैतिक दलों और नेताओं के सत्ता के लिए लगातार पाला बदलने को भी सख्त नापसंद करते हैं.

वे ऐसे व्यवहार को अनैतिक और उस व्यवस्था की एक और मिसाल मानते हैं, जिसे बदलने की जरूरत है. फिर भी इसका मतलब भाजपा के बड़े वैचारिक एजेंडे को पूरी तरह खारिज करना नहीं है.

कई बड़े राजनैतिक सवालों पर जेन ज़ी की सोच बाकी लोगों से मोटे तौर पर मेल खाती है. समान नागरिक संहिता पर समर्थन लगभग एक-सा है. जातिगत आरक्षण और अवैध घुसपैठ पर भी उसकी राय करीब-करीब वही है, विकसित भारत को लेकर उत्साह बना हुआ है.

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दरकता ढांचा
जनमत सर्वेक्षण देश का मिज़ाज इंडिया टुडे के लिए करने वाली सीवोटर के संस्थापक यशवंत देशमुख का मानना है कि मोदी और भाजपा के दबदबे को बनाए रखने वाला तानाबाना अब किनारों से दरकने लगा है.

उनके मुताबिक, सरकार की एक गलती यह है कि वह लोगों की रोजमर्रा की आर्थिक परेशानी का जवाब ऐसे आंकड़ों से देने की कोशिश करती है, जो बेरोजगारी और महंगाई को तुलनात्मक रूप से कम बताते हैं.

वे कहते हैं, “बढ़ती कीमतों को लोग दूध, चीनी या पेट्रोल जैसी चीजें खरीदते समय महसूस करते हैं. आप उनके सामने आंकड़ों की तकनीकी भाषा नहीं फेंक सकते, क्योंकि वे महंगाई को अपनी जिंदगी में जी रहे हैं.”

दूसरी चुनौती जेन ज़ी से सत्तारूढ़ पार्टी का जुड़ाव न होना है. देशमुख बताते हैं कि इस पीढ़ी के पास यूपीए के वर्षों की बहुत कम राजनैतिक बातें याद है. वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव तक करीब 30 फीसद वोटरों ने केंद्र में सिर्फ भाजपा का शासन ही देखा होगा.

इसलिए अपने कामकाज की तुलना पिछली कांग्रेस सरकारों से करने की भाजपा की पुरानी रणनीति लगातार कम असरदार होती जा रही है. देशमुख पूछते हैं, “जब उन्हें मनमोहन सिंह से कोई मतलब नहीं है तो नेहरू से कैसे होगा?”

इसलिए इस पीढ़ी के लिए सवाल अब यह नहीं है कि एनडीए ने यूपीए से कितना बेहतर काम किया. उसका सवाल ज्यादा सीधा और आज से जुड़ा हैः मोदी सरकार अभी उनके लिए क्या कर रही है?

जेन ज़ी की चिंताएं निजी और रोजमर्रा की हैं: नौकरी, महंगाई, आमदनी और अवसर. प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में 2047 के विकसित भारत के दूर के सपने को सामने रखा था. लेकिन युवा भारतीय और उनके माता-पिता जानना चाहते हैं कि उनकी सरकार 2027 में उनके लिए क्या करेगी, खासकर रोजगार और आमदनी के मामले में.

नौकरियों की समस्या इसलिए भी ज्यादा गंभीर है, क्योंकि स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं में आर्थिक और सामाजिक तरक्की की उम्मीदें बढ़ाई थीं. लेकिन ढेरों स्नातकों ने पाया कि अच्छी तनख्वाह की नौकरी पहुंच से बाहर है.

वोटर मोदी सरकार के इन्फ्रास्ट्रक्चर अभियान की सराहना करते हैं, लेकिन कल की विलासिता आज का अधिकार और सामान्य अपेक्षा बन गई है. हाइवे और बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर को अब लगातार सामान्य उपलब्धि माना जा रहा है.

युवाओं के लिए सवाल अब यह नहीं है कि कितनी सड़कें बनाई गईं. देशमुख के मुताबिक, उनकी सोच है, “ठीक है, अच्छा है. लेकिन इसके बाद क्या? मुझे अब भी नौकरी नहीं मिल रही है.” रोजगार पैदा किए बिना होने वाला आर्थिक विकास उन्हें नहीं भाता. वे ऐसा विकास चाहते हैं, जो उनके लिए वास्तविक और अच्छी नौकरियां भी पैदा करे.

असहमति का कॉकटेल
असंतोष के कॉकटेल की वजह से फिर भाजपा की स्थिति में ज्यादा नाटकीय गिरावट क्यों नहीं आई? दो बातों ने ढाल का काम किया.

पहली बात यह कि गुस्से और आक्रोश का बड़ा हिस्सा मोदी के खिलाफ निजी बैर या दुश्मनी में नहीं बदला, जिन्होंने नेतृत्व के मामले में अपनी अच्छी-खासी बढ़त कायम रखी है और जिन्हें अब भी कई मतदाता इस काम के लिए सबसे अच्छा व्यक्ति मानते हैं.

दूसरे, भाजपा के प्रति असंतोष राहुल गांधी या कांग्रेस के पक्ष में उतने ही बड़े समर्थन की उछाल में नहीं बदला. विकल्प की तलाश कर रहे लोगों को राहुल में समाधान देने वाला व्यक्ति नजर नहीं आता.

इसके बजाए युवा मतदाता तीसरे विकल्प की खोजबीन के लिए ज्यादा से ज्यादा तत्पर दिखाई देते हैं, फिर चाहे वे विजय हों या प्रशांत किशोर या राज्य और निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर चुनौती देने वाला कोई अन्य विश्वसनीय व्यक्ति. 

यही वजह है कि भाजपा के लिए खतरा तत्काल चुनावी पराजय का कम और उन धारणाओं के धीरे-धीरे ध्वस्त होते जाने का ज्यादा है जिन पर उसका दबदबा टिका हुआ है.

मोदी की लोकप्रियता पार्टी की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है, लेकिन उन पर उसकी जबरदस्त निर्भरता का यह मतलब भी है कि उनके निजी प्रभाव और शक्ति में थोड़ी भी गिरावट बहुत ज्यादा नुक्सानदेह साबित हो सकती है. न ही यह मसला राजनैतिक संवाद को इंस्टाग्राम पर ले जाने भर से हल हो सकता है.

देशमुख कहते हैं, “समस्या माध्यम में नहीं बल्कि संदेश देने में है.” जेन ज़ी उस आक्रामक राजनैतिक भाषा से दबने-डरने को तैयार नहीं है जो पहले की पीढ़ियों पर ज्यादा असरदार रही हो सकती है. सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान से असहमत लोगों को राष्ट्र-विरोधी ठहराए जाने के और ज्यादा उलटे नतीजे मिल सकते हैं.

सत्तारूढ़ व्यवस्था के लिए मुंह बाए खड़ी चुनौती उन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव होंगे जहां वह फिलहाल सत्ता में है. इनमें सबसे खास उत्तर प्रदेश है जहां जमा होते आ रहे असंतोष को मतपेटियों में अपनी अभिव्यक्ति का जरिया मिल सकता है.

इस देश का मिज़ाज सर्वेक्षण का बड़ा संदेश यह है कि जहां भाजपा और एनडीए चुनावी तौर पर मजबूत बने हुए हैं, वहीं कहीं गहराई में पीढ़ीगत और आर्थिक बदलाव उनकी बढ़त को लगातार कुतरता रह सकता है, जब तक कि वे राजनीति के तौर-तरीके नहीं बदलते.

विपक्ष के लिए भी एक चेतावनी है कि महज सरकार का विरोध करना काफी नहीं होगा, उसे रोजी-रोटी से जुड़ी चिंताओं के विश्वसनीय हल देने होंगे, जो कामकाज को मापने का नया पैमाना बनता जा रहा है.

जेन ज़ी ने किया यह है कि उसने राजनैतिक मोलभाव के पुराने नियमों को झकझोर दिया है. पार्टियां इसके अनुरूप अपने को जिस तरह ढालेंगी, उसी से तय होगा कि वे जीतेंगी या हारेंगी.

सर्वेक्षण का तरीका

सामाजिक-आर्थिक शोध के क्षेत्र में चर्चित सीवोटर ने इंडिया टुडे देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण 1 जुलाई से 25 अगस्त के बीच किया. उसमें सभी राज्यों के सभी लोकसभा क्षेत्रों के हिस्सों में रहने वाले 25,184 लोगों से बातचीत की गई. इन सैंपल के अलावा, लंबे वक्त के रुझान निकालने और उनके आधार पर वोट और सीटों के अनुमानों की गणना करने के लिए सीवोटर के नियमित ट्रैकर डेटा पर पिछले 24 हफ्तों में किए गए 91,795 इंटरव्यू का विश्लेषण किया गया.

इस तरह इंडिया टुडे के इस देश का मिज़ाज सर्वेक्षण की रिपोर्ट के लिए कुल 1,16,644 लोगों की राय पर विचार किया गया. तकरीबन 95 प्रतिशत सटीकता के भरोसे के साथ त्रुटि की गुंजाइश रिपोर्टिंग के वृहद स्तर पर +/- 3 प्रतिशत और बारीक स्तर पर +/- 5 प्रतिशत है.

सीवोटर का ट्रैकर मई 2009 से ही हर हफ्ते, यानी कैलेंडर वर्ष में 52 बार, देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 11 भाषाओं में चलाया जा रहा है, जिसमें प्रत्येक तिमाही 60,000 के सैंपल आकार को लक्ष्य किया जाता है. प्रत्युत्तर की औसत दर 55 फीसद है. सीवोटर 1 जनवरी, 2019 से दैनिक आधार पर ट्रैकर चला रहा है, जिसमें ट्रैकर विश्लेषण के लिए सात दिनों के बचे हुए सैंपल का इस्तेमाल होता है.

ये सारे सर्वेक्षण दुनिया भर में इस्तेमाल की जाने वाली मानकीकृत पद्धति रैंडम प्रॉबेबिलिटी सैंपल या बेतरतीब पद्धति के आधार पर किए जाते हैं, जिन्हें सभी भौगोलिक और जनसांख्यिकी हिस्सों में प्रशिक्षित शोधकर्ता करते हैं. यह सर्वेक्षण सभी हिस्सों में वयस्क लोगों के साथ सीएटीआइ बातचीत पर आधारित है. बेतरतीब आंकड़े निकालने के लिए देश में सभी दूरसंचार मंडलों में काम करने वाले सभी ऑपरेटर को दी गई सभी फ्रीक्वेंसी सीरीज को शामिल करते हुए मानक आरडीडी का इस्तेमाल किया गया है.

सीवोटर डेटा की सांख्यिकीय नाप-तौल करके सही प्रातिधिनिक विश्लेषण तय करता है ताकि यह जनगणना के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार स्थानीय आबादी का प्रतिनिधित्व करे. डेटा को लिंग, आयु, शिक्षा, आय, धर्म, जाति, शहरी/ग्रामीण और पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में दिए गए वोट सहित जनगणना की ज्ञात पहचानों के अनुरूप नापा-तौला जाता है.

विश्लेषण के लिए सीवोटर अपने स्वामित्व की एल्गोरिद्म का इस्तेमाल करके स्प्लिट-वोटर या वोटरों के बंटने की परिघटना के आधार पर प्रादेशिक और क्षेत्रीय वोट हिस्सेदारी की गणना करता है. सीवोटर वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ पब्लिक ओपिनियन रिसर्च की तरफ से तैयार पेशेवर आचरण संहिता और प्रथाओं का और भारतीय प्रेस परिषद की तरफ से निर्देशित जनमत सर्वेक्षण के आधिकारिक दिशानिर्देशों का पालन करता है.

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