
कोविड महामारी, यूक्रेन युद्ध या पश्चिम एशिया के संघर्ष जैसी वैश्विक उथल-पुथल के बीच अर्थव्यवस्था को संभाले रखने का श्रेय मोदी सरकार को मिलता आया है. विकास दर करीब सात फीसद रही, जो दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से कहीं बेहतर है.
लेकिन अब कुछ सवाल जोर-शोर से उठ रहे हैं: इस विकास दर के नतीजे आखिर सामाजिक स्तर पर देखने को क्यों नहीं मिले? मसलन, जीवन स्तर में बढ़ोतरी क्यों नहीं हुई? ज्यादा नौकरियां और ऊंची तनख्वाह क्यों नहीं मिली? लगातार विकास के बावजूद अमीर और गरीब के बीच की खाई न सिर्फ बरकरार रही बल्कि और बढ़ कैसे गई?
अगस्त 2026 में हुए इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में इन सवालों को लेकर लोगों की बढ़ती चिंता साफ दिखाई देती है. जब लोगों से पूछा गया कि वे अर्थव्यवस्था संभालने के मामले में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के काम को कैसे देखते हैं, तो करीब आधे लोगों यानी 47 फीसद ने इसे ‘औसत’, ‘खराब’ या ‘बहुत खराब’ बताया.
वहीं, 47.2 फीसद लोगों ने सरकार के काम को ‘शानदार’ या ‘अच्छा’ माना. अगस्त 2023 के देश का मिज़ाज सर्वे के बाद यह सबसे कम रेटिंग है. जनवरी के सर्वे के मुकाबले भी इसमें 1.6 फीसद अंक की गिरावट आई है. ये आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि विकास की बड़ी-बड़ी सुर्खियां लोगों में वैसा आर्थिक भरोसा पैदा नहीं कर पा रही हैं.
यही सोच अगले सवाल के जवाब में भी दिखाई देती है. लोगों से पूछा गया कि अगले छह महीनों में अर्थव्यवस्था का हाल कैसा रहेगा? ज्यादातर लोगों यानी कि 54.5 फीसद का मानना था कि हालात या तो ‘जैसे हैं वैसे ही रहेंगे’ या ‘और बिगड़ेंगे’. इनमें 32.5 फीसद लोगों को लगता है कि अर्थव्यवस्था की हालत खराब होगी. इससे साफ है कि लोगों को बहुत भरोसा नहीं है कि अर्थव्यवस्था बेहतर नौकरियां और ज्यादा कमाई के मौके पैदा कर पाएगी.

अमीरी-गरीबी की खाई
महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था जिस निचले स्तर तक पहुंच गई थी, वहां से उसने वापसी तो की लेकिन उसके बाद हुए विकास का ज्यादा पैसा अमीरों के हाथ में गया. अर्थशास्त्री इसे ‘के-शेप’ ग्रोथ कहते हैं. यानी ऐसी तरक्की जिसमें अमीर और अमीर होता जाता है, जबकि गरीब की हालत और खराब होती जाती है.
वैश्विक रिसर्च सेंटर वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब की जारी ‘वर्ल्ड इनइक्वैलिटी रिपोर्ट 2026’ के मुताबिक, भारत में आमदनी की गैरबराबरी दुनिया में सबसे ज्यादा है. रिपोर्ट बताती है कि देश के सबसे ज्यादा कमाने वाले 10 फीसद लोगों के हिस्से में राष्ट्रीय आय का 58 फीसद आया. वहीं, सबसे नीचे के 50 फीसद लोगों को इसका महज 15 फीसद हिस्सा मिला.








लोगों के जवाब में यह सोच भी दिखाई देती है कि देश में सरकार से करीबी रखने वाले कारोबारियों को फायदा पहुंचाने वाला पूंजीवाद अब भी खूब चल रहा है. जब लोगों से पूछा गया कि क्या भारत के आर्थिक विकास का फायदा आम आदमी तक पहुंच रहा है, तो 43.7 फीसद ने कहा कि इसका फायदा केवल अमीरों को हुआ है.
जनवरी 2026 के सर्वे में ऐसा मानने वालों की संख्या 39.6 फीसद थी. इसके अलावा 7.5 फीसद लोगों का कहना है कि इस विकास से आम आदमी को कोई फायदा नहीं मिला.
वहीं, 18.1 फीसद लोगों का मानना है कि सरकारी नीतियों का फायदा सिर्फ मिडिल क्लास को हुआ है. मुमकिन है कि उनका इशारा फरवरी 2025 के केंद्रीय बजट में मिडिल क्लास की खपत बढ़ाने के लिए दी गई टैक्स राहत की ओर हो.

इसके बाद पूछे गए एक और सवाल ने इस धारणा को और मजबूत किया. जब लोगों से पूछा गया कि एनडीए सरकार की आर्थिक नीतियों का सबसे ज्यादा फायदा किसे हुआ, तो 55.7 फीसद ने बड़े कारोबारी घरानों का नाम लिया.
इसके मुकाबले सिर्फ आठ फीसद लोगों ने किसानों, 7.4 फीसद ने नौकरीपेशा लोगों और 6.4 फीसद ने छोटे कारोबारियों को सबसे बड़ा लाभार्थी माना. कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था की वापसी का फायदा समाज के सभी तबकों में बराबर नहीं बंटा, यह सोच साफ दिखाई देती है.
फिर भी, जब कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार में 2005 से 2014 तक प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह से तुलना की गई तो सबसे बड़ा हिस्सा यानी 47.3 फीसद लोगों ने माना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से संभाला है. हालांकि, जनवरी के देश का मिज़ाज सर्वे में ऐसा मानने वालों की संख्या 53.5 फीसद थी.
जेब पर बढ़ता बोझ
लोग अपनी आर्थिक हालत जिस तरह देख रहे हैं, उससे परेशानी की एक और तस्वीर सामने आती है. साफ बहुमत यानी 61.6 फीसद कहते हैं कि 2014 में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से उनकी आर्थिक हालत या तो ‘जैसी थी वैसी ही है’ या ‘और खराब हुई है’. सिर्फ 34.2 फीसद को लगता है कि उनकी हालत बेहतर हुई है. जनवरी के सर्वे में ऐसा मानने वाले 35 फीसद थे.
भविष्य को लेकर भी तस्वीर उत्साह बढ़ाने वाली नहीं है. करीब 64.2 फीसद लोगों को लगता है कि उनके परिवार की आमदनी या सैलरी या तो ‘जितनी है उतनी ही रहेगी’ या ‘कम हो जाएगी’. जनवरी में ऐसा मानने वाले 62.4 फीसद थे. सिर्फ 23.7 फीसद लोगों को आय बढ़ने की उम्मीद है. सात महीने पहले 28.3 फीसद लोगों ने ऐसी उम्मीद जताई थी.
पश्चिम एशिया की जंग के बीच कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और खेती पर माॅनसून की मार के चलते महंगाई फिर बढ़ रही है. खुदरा महंगाई जून के 4.4 फीसद से मामूली बढ़कर जुलाई में 4.5 फीसद हो गई. खाने-पीने की चीजों की महंगाई भी बढ़कर 5.2 फीसद पर पहुंच गई. भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में खुदरा महंगाई दर पांच फीसद रहेगी.
इसका दबाव परिवारों के बजट पर अभी से दिखाई देने लगा है. सर्वे में शामिल 65 फीसद लोगों का कहना है कि उनके लिए ‘मौजूदा खर्चे संभालना मुश्किल हो गया है’. जनवरी 2026 में ऐसा कहने वालों की संख्या 63.2 फीसद और अगस्त 2025 में 60.6 फीसद थी.


नौकरियों का संकट
शिक्षा और परीक्षाओं के मामले में सरकार से ज्यादा जवाबदेही की मांग को लेकर देशभर में हुए जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शनों ने नौकरियों के सवाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
भारत में 15 से 29 साल के 36.7 करोड़ से ज्यादा युवा हैं. यह दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है. साल 2022 से 2025 के बीच इस आयुवर्ग में सेकंडरी या ज्यादा पढ़ाई पूरी कर चुके लोगों की हिस्सेदारी 56.5 फीसद से बढ़कर 62.6 फीसद हो गई. लेकिन ज्यादा पढ़ाई का मतलब बेहतर नौकरी नहीं बन पाया.
युवाओं में बेरोजगारी की दर 10 फीसद है, जो देश की कुल बेरोजगारी दर से तीन गुना ज्यादा है. जॉब कंसल्टेंसी फर्म मर्सर के मुताबिक, भारत के सिर्फ 42.6 फीसद ग्रेजुएट नौकरी के लायक हैं. यह आंकड़ा देश के युवाओं में जरूरी हुनर की कमी की ओर इशारा करता है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के िवभिन्न उद्योगों में तेजी से बढ़ते इस्तेमाल से यह फासला बढ़ सकता है.
हैरानी नहीं कि सर्वे में शामिल 66.1 फीसद लोगों ने रोजगार की स्थिति को ‘बहुत गंभीर’ या ‘गंभीर’ बताया. जनवरी में ऐसा मानने वाले 64.8 फीसद थे. फिर भी करीब 17 फीसद लोग नौकरियों के संकट को गंभीर चिंता नहीं मानते. एआइ का खतरा साफ दिखाई दे रहा है. करीब 53 फीसद लोगों का कहना है कि एआइ उनकी नौकरी छीन सकता है या उनके कुछ कामों की जगह ले सकता है.

सर्वे में शामिल लोगों का एक बड़ा हिस्सा कारोबार को सरकारी दखल से मुक्त देखना चाहता है. करीब 40.6 फीसद लोगों का कहना है कि कारोबार चलाना सरकार का काम नहीं. वहीं, 36.8 फीसद लोग घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों के विनिवेश के पक्ष में हैं.
उनका मानना है कि इससे इन कंपनियों की पूरी क्षमता सामने आ सकती है. इसके अलावा 34.6 फीसद लोगों की नजर में अफसरशाही अब भी देश के आर्थिक विकास की राह में ‘रुकावट’ है.
इस सर्वेक्षण का संदेश यह नहीं है कि विकास की कहानी नाकाम हो गई है. असल बात यह है कि इसका फायदा अब भी समाज के निचले स्तर तक पूरी तरह नहीं पहुंचा है. सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती मजबूत आर्थिक आंकड़ों को ऐसी तरक्की में बदलने की है, जो लोगों की आमदनी, नौकरियों और रोजमर्रा की जिंदगी में भी साफ दिखाई दे.

