
भारत अपनी आजादी के 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी मुश्किल से 13.8 फीसद है. महिला वोटर कुल मतदाताओं का 49 फीसद हैं. वे लगातार दो आम चुनावों में पुरुषों से ज्यादा वोट डाल चुकी हैं. लोकतांत्रिक प्रक्रिया में वे हर मायने में बराबर भागीदार हैं लेकिन वे बराबर लाभार्थी नहीं हैं.
राजनैतिक प्रतिनिधित्व की इसी पुरानी असमानता को ठीक करने के लिए 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम कानून बना. लोकसभा की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. यह सुधार बहुत पहले हो जाना चाहिए था. पंचायती राज का 33 साल का अनुभव बताता है कि इस तरह का अफर्मेटिव ऐक्शन सचमुच काम करता है.
आज भारत के गांवों की संस्थाओं में 14.5 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं. यह प्रक्रिया सचमुच बदलाव लाने वाली रही है. बिहार के शादीपुर गांव की सरपंच डॉली ने अपने गांव में एक तरह का अर्ध-न्यायिक तंत्र बनाया है ताकि स्थानीय लोगों को विवाद सुलझाने के लिए अदालतों का दरवाजा न खटखटाना पड़े.
राजस्थान के लांबी अहीर गांव में घाघरा पहने सरपंच नीरू यादव ने लड़कियों के लिए हॉकी ट्रेनिंग का पूरा ईकोसिस्टम खड़ा किया है. उन्होंने कड़े विरोध और सदियों पुरानी दमघोंटू पितृसत्ता को पार करते हुए यह किया. ये महिलाएं दिखाती हैं कि जब महिलाओं को नेतृत्व करने की जगह और मौका मिलता है, तो क्या हो सकता है.
यह स्वतंत्रता दिवस विशेषांक उसी संभावना को हमारा सलाम है. हम इसे ‘50 से कम वय की 50ः स्त्रियां जीवट वाली’ कह रहे हैं. यानी 50 साल से कम उम्र की 50 सेल्फ-मेड महिलाएं, जो दिखाती हैं कि भारतीय महिलाएं क्या कर सकती हैं, जब मुश्किलें पूरी तरह खत्म न भी हों तो कम से कम उनसे रास्ता निकालने की गुंजाइश बने.
चयन के मानदंड सोच-समझकर तय किए गए हैं. यह सूची किसी अमीर वारिस, बड़े कॉर्पोरेट दिग्गज की पत्नी या बॉलीवुड में भाई-भतीजा खोजने की जगह नहीं है. ये महिलाएं अपने प्रयास, अपनी सूझबूझ और हालात बदलने की जिद के दम पर आगे आई हैं.

हमने उम्र की सीमा 50 साल रखी है, क्योंकि ज्यादातर महिलाओं को मुश्किलों के खिलाफ अकेली चढ़ाई चढ़कर अपनी जगह बनाने में समय लगता है.
यह सूची भारत की 50 साल से कम उम्र की करीब 56 करोड़ महिलाओं के लिए रोल मॉडल्स की एक गैलरी पेश करती है. ये देश की महिला आबादी का 78 फीसद हैं. हमने राजनैतिक दलों से जुड़ी महिलाओं को इसमें शामिल नहीं किया है. इसका मतलब उस क्षेत्र को कम आंकना नहीं है, बल्कि वहां निजी उपलब्धि और सशक्तीकरण का निष्पक्ष आकलन करना मुश्किल हो जाता है. हमने पांच श्रेणियां चुनी हैं: आंत्रप्रेन्योर, इनोवेटर, प्रोफेशनल, आर्टिस्ट और खिलाड़ी. ये 50 महिलाएं राजनीति से आगे के प्रतिनिधित्व का चेहरा हैं.
उनके लिए आजादी का मतलब है आर्थिक स्वतंत्रता, पेशेवर अवसरों को पाने और उनमें उत्कृष्टता हासिल करने की क्षमता, खुद को रचनात्मक रूप से व्यक्त करना और उन बेड़ियों को तोड़ना, जिन्हें भारतीय समाज ने ऐतिहासिक रूप से उन पर डाला.
फरजाना अफरीदी की जीवन-यात्रा इसकी मिसाल है. बिहार के अपने सीमित सामाजिक माहौल के खिलाफ जाते हुए उनके पिता ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित किया. वे अपने परिवार की पहली सदस्य बनीं जिन्होंने विदेशी विश्वविद्यालय से पीएचडी हासिल की. अब वे इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर हैं. महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण पर उनकी अहम रिसर्च ने पिछले दशक में भारत की पब्लिक पॉलिसी को आकार दिया है.
जैसा कि वे कहती हैं, “भारत की युवतियों को अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह एकाग्र रहना होगा और ऐसे अवसरों को पकड़ना होगा, जो पारंपरिक उम्मीदों से आगे जाकर उद्देश्य का एहसास दें. एक महिला की जिंदगी से चुनौतियां कभी खत्म होने का नाम नहीं लेती हैं. मेरी जिंदगी में तो यकीनन नहीं.”
अफरीदी सही कहती हैं. आजादी के बाद से भारत के जेंडर इंडेक्स में काफी सुधार हुआ है, लेकिन कुछ सख्त आंकड़े हमारी खुशी को संतुलित कर देते हैं. महिलाएं अब भी असमान पैदा होती हैं. सचमुच. प्रति 1,000 पुरुषों पर 939 महिलाओं का सेक्स रेशियो दुनिया के सबसे कम अनुपातों में से एक है.
महिला साक्षरता दर 74.9 फीसद है, यानी पूरी एक-चौथाई महिलाएं अब भी इससे बाहर हैं. यह पुरुषों से करीब 13 पॉइंट पीछे भी है. लिस्टेड कंपनियों में महिलाएं सिर्फ 5.21 फीसद सीईओ हैं. श्रम बल में उनकी भागीदारी केवल 40 फीसद है, और उसमें भी बड़ी संख्या कम भुगतान वाली खेती-किसानी से जुड़े कामों में है.
महिलाओं के खिलाफ अपराध राष्ट्रीय शर्म बने हुए हैं, रोजाना करीब 1,200 मामले दर्ज होते हैं. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों ने फर्क डाला है, लेकिन उतना नहीं जितना जरूरी था. हालिया जेन ज़ी आंदोलन उन सांख्यिकीय खाइयों की सामाजिक अभिव्यक्ति था. उसमें महिलाओं की मजबूत भागीदारी मौजूदा व्यवस्था से उनकी असंतुष्टि दिखाती है.
इस गंभीर पृष्ठभूमि के बीच ये कहानियां एक बात साफ करती हैं: सफल होने का भीतर से निकला दृढ़ निश्चय. एक वैज्ञानिक जो यह समझने पर रोशनी डालती है कि डीएनए खुद की मरम्मत कैसे करता है. एक संरक्षणवादी जो एक संकटग्रस्त प्रजाति को बचाने की बड़ी कोशिश के हिस्से के रूप में ग्रामीण सोच को बदलती है. दो नौसेना अधिकारी जो दुनिया की परिक्रमा करती हैं. एक फाइटर पायलट.
हिप-हॉप स्टार दैयाफी लामारे उर्फ रेबल ने हमें बताया, “जब मैंने संगीत को खोजा, तो मैंने आत्मविश्वास को खोजा.” रेबल ने धुरंधर में कदम थिरकाने वाला नंबर ‘मैं और तू’ दिया. असाधारण लोग कई बार अपवाद जैसे लग सकते हैं.
यह सूची बताती है कि वे अपवाद नहीं हैं. वे देश में हो रहे एक बहुत बड़े बदलाव का दिखाई देने वाला सिरा हैं जो दिखता है छोटे शहरों और महानगरों में, खेतों और फैक्ट्रियों में, अदालतों और प्रयोगशालाओं में, जहां भी भारतीय महिलाएं अपनी शर्तों पर जीने का चुनाव कर रही हैं.
यह विशेषांक उसी चुनाव का उत्सव है.
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं.

