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डार्क मोड

उड़ान को लगे नए पंख

छोटे शहरों और पहली बार विमान यात्रा करने वालों के लिए दशक भर पहले उड़ान योजना के तहत शुरू हुई थीं हवाई सेवाएं. अब उसी योजना को दिया गया नया रूप, जिसका मकसद है क्षेत्रीय हवाई सेवाओं को टिकाऊ और कामयाब बनाना

महानगरों से हटकर उड़ान स्कीम के तहत 2020 में चालू दरभंगा एअरपोर्ट पर विमान में सवार होते यात्री
अपडेटेड 17 अगस्त , 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब ‘उड़े देश का आम नागरिक’ (उड़ान) योजना के नए बदले स्वरूप को 4 जुलाई को जोधपुर एअरपोर्ट के नए टर्मिनल भवन से लॉन्च किया तो उन्होंने इसे भारत की क्षेत्रीय हवाई सेवा के सफर में एक अहम कदम बताया.

मार्च में केंद्रीय कैबिनेट से मंजूर इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2027 से वित्त वर्ष 2036 तक के लिए 28,840 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है. इसमें ज्यादा रकम के साथ ज्यादा हवाईअड्डों का वादा किया गया है. इसे ध्यान से देखें तो साफ है कि यह महज विस्तार नहीं, बल्कि योजना के पहले दशक के अनुभवों से सबक लेते हुए इसे नए सिरे से तैयार किया गया है.

उड़ान योजना के 2016 में शुरू होने पर उसका मकसद था भारत के छोटे शहरों को राष्ट्रीय विमानन नेटवर्क से जोड़ना ताकि वे लोग भी कम कीमत में हवाई यात्रा कर सकें, जिन्होंने कभी हवाई सफर नहीं किया है. वित्त वर्ष 26 के आखिर तक 95 हवाईअड्डे, हेलीपोर्ट और वॉटर एरोड्रोम पर 663 रूट चल रहे थे. इस दौरान 55 उजाड़ हवाई पट्टियों को फिर से चालू किया गया. योजना के कारण 3,44,000 से ज्यादा उड़ानों में 1.63 करोड़ से ज्यादा लोगों ने यात्रा की.

लेकिन इन आंकड़ों में अनेक बुनियादी खामियां थीं. कई रूट कभी फायदे में नहीं आ पाए और सब्सिडी खत्म होने के बाद कंपनियों ने हवाई सेवाएं बंद कर दीं. सरकार ने खुद माना कि उड़ान के तहत शिमला, पाक्योंग, पठानकोट, लुधियाना, आजमगढ़, मुरादाबाद, भावनगर, राउरकेला, अंबिकापुर, दतिया और कलबुर्गी समेत 15 एअरपोर्ट खोले या पुनर्जीवित किए गए लेकिन अब वहां से संचालन ठप है.

संशोधित उड़ान योजना में तीन बुनियादी बदलावों के जरिए ये खामियां दूर करने की कोशिश की गई है: हवाईअड्डे बनाना और फिर कंपनियों को उड़ानों के लिए कहना, शुरू होने के बाद छोटे हवाईअड्डों को आर्थिक रूप से चलने लायक बनाए रखना, और क्षेत्रीय हवाई मार्गों को ज्यादा समय देना ताकि वे लाभ में आ सकें.

रूट से पहले एअरपोर्ट

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि सरकारी पैसा किसे और कब दिया जाएगा. मूल योजना के तहत एअरलाइंस एक अनुमोदित सूची में से एअरपोर्ट चुनती थीं. मांग के हिसाब से बुनियादी सुविधाएं विकसित होती थीं. यह लगता तो था मार्केट फ्रेंड्ली पर यह कारगर न हुआ. एअरलाइनों से उम्मीद की गई थी कि वे उन हवाईपट्टियों के आस-पास काम लायक नेटवर्क बनाएं, जहां भरोसेमंद उड़ानों के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं थीं.

संशोधित योजना में एअरलाइंस के राजीनामे की बजाए सरकार पहले ‘चैलेंज मोड’ के जरिए हवाईअड्डों की पहचान और उन्हें विकसित करेगी. इसके लिए उन हवाईपट्टियों पर 100 एअरपोर्ट बनाने के वास्ते 12,159 करोड़ रुपए (महंगाई एडजस्ट करते हुए) रखे गए हैं जहां न कोई उड़ान आती है न जाती. यानी हर एअरपोर्ट पर करीब 100 करोड़ रुपए खर्च होंगे.

नई एप्रोच के तहत प्रतिस्पर्धी प्रस्तावों को काम करने की रफ्तार और क्वालिटी के आधार पर परखा जाएगा, न कि सिर्फ मंजूरी देकर उन्हें छोड़ दिया जाएगा कि वे अपनी रफ्तार से काम करें. केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू के शब्दों में, बदली स्कीम को इस तरह बनाया गया है ताकि वह “टियर-2 और टियर-3 शहरों की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाए”.

उनके मुताबिक, ‘चैलेंज मोड’ में समय पर काम पूरा करने और क्वालिटी के साथ इनोवेशन और सस्टेनेबिलिटी को भी प्राथमिकता दी जाएगी. मानकर चला जा रहा है कि विमान सेवाएं शुरू होने से पहले ही सुविधाएं तैयार हो जाएं तो उनके टिके रहने की संभावनाएं रहेंगी.

ताकि चलते रहें छोटे हवाईअड्डे

दूसरे बड़े सुधार के तहत उस समस्या का तोड़ निकाला गया है जिसका जिक्र एअरपोर्ट ऑपरेटर बरसों से करते आ रहे थे और जिसे मूल योजना में नजरअंदाज कर दिया गया था. रीजनल एअरपोर्ट बनाना एक बार का निवेश है; लेकिन उसे चालू रखने पर तो लगातार खर्चा आता ही है. विमान पूरे भरे हों, आधे खाली हों या आएं ही नहीं, स्टाफ, नैविगेशन, सुरक्षा और रखरखाव का खर्च तब भी होता ही है.

उड़ान की मूल योजना में निर्माण के बाद सरकारी मदद काफी हद तक रुक जाती थी. एअरपोर्ट शुरू हो जाने के बाद उसे चालू रखना किसी और का जिम्मा होता था. नई योजना में परिचालन और रखरखाव (ओऐंडएम) के लिए 2,577 करोड़ रुपए खास तौर पर रखे गए हैं. विकसित एअरपोर्ट को तीन साल तक 3.06 करोड़ रु. तक सालाना मदद मिलेगी जबकि हेलीपोर्ट और वॉटर एरोड्रोम इसी अवधि में 90 लाख रुपए सालाना तक की मदद के हकदार होंगे. इससे 441 एरोड्रोम को फायदा होने की उम्मीद है.

भारत के बुनियादी ढांचे पर जितना खर्च हो रहा है, उसके मुकाबले यह रकम बहुत छोटी है, लेकिन इससे यह तय हो सकता है कि कोई छोटा एअरपोर्ट शुरुआती कुछ सालों के बाद आगे भी चलता रहेगा या नहीं.

टिके रहें हवाई मार्ग

रीडिजाइन के तीसरे पहलू में एअरलाइंस के आर्थिक गणित को सुधारने पर जोर दिया गया है. नए रीजनल हवाई मार्ग शायद ही कभी बहुत जल्द मुनाफे में आते हों. उन्हें मांग पैदा करने, यात्रा की आदत बनाने और बड़े एअरलाइन नेटवर्क में शामिल होने के लिए वक्त चाहिए होता है. मूल उड़ान योजना में वायबिलिटी गैप फंडिंग (वीजीएफ)—यानी घाटे वाले रूटों पर उड़ानें भरने के लिए एअरलाइंस को दी जाने वाली सब्सिडी—तीन साल ही मिलती थी. सब्सिडी खत्म हो जाने पर विमानन कंपनियां उन रूटों को बंद कर देती थीं जिनमें आर्थिक रूप से कुछ मिलता नहीं था.

संशोधित उड़ान योजना में सब्सिडी की अवधि बढ़ाकर पांच साल की गई है. जैसे-जैसे रूट चलने लगेंगे, मदद धीरे-धीरे कम की जाएगी. इसके तहत एअरलाइंस को तीसरे साल में जाकर सब्सिडी का सिर्फ 75 फीसद, चौथे साल में 50 फीसद और पांचवें साल में 25 फीसद मिलेगा. सरकार ने योजना की 10 साल की अवधि के लिए वीजीएफ की मद में 10,043 करोड़ रु. रखे हैं. लेकिन रूट एक्सक्लूसिविटी यानी एकाधिकार तीन ही साल रहेगा ताकि एक एअरलाइन की लंबे समय तक मोनोपोली न बने और अतिरिक्त सहायता भी मिलती रहे.

पात्रता के मानदंड भी कड़े किए गए हैं. एअर ऑपरेटर की मंजूरी के बगैर एअरलाइनें किसी रूट के लिए बोली नहीं लगा सकेंगी. एअरलाइनें तय समय में परिचालन शुरू नहीं कर पाती हैं तो रूट वापस लिए जा सकते हैं, उनकी दोबारा नीलामी हो सकती है. इसमें राज्यों की भी बड़ी भूमिका होगी क्योंकि आवंटन के दौरान उनके सुझाए रूटों को प्राथमिकता दी जाएगी.

योजना के तहत पहली बार ऐसा होगा जब बड़े महानगरों में “उपयोगी समय” पर विमानों के उतरने और उड़ान भरने के स्लॉट हासिल करने की कोशिश की जाएगी. इसमें किसी एअरपोर्ट को पर्याप्त ‘उड़ान वाला’ मानने के लिए जरूरी शर्तों का दायरा बढ़ाया गया है. पहले इसका मतलब था हफ्ते में सात से ज्यादा उड़ानें. नए मानदंडों के तहत किसी एअरपोर्ट से हफ्ते में 14 से ज्यादा उड़ानें जरूरी की गई हैं, साथ ही उसे दो से ज्यादा शहरों को सेवा देनी होगी और सालाना 40,000 से ज्यादा यात्री ढोने होंगे.

कुछ और भी छोटे पर अहम बदलाव किए गए हैं, जिनका मकसद पहले चरण में सामने आई कमियां दुरुस्त करना है. नई स्कीम में उस पुरानी सीमा को हटा दिया गया है जिसके तहत अधिकतम 40 सीटों के लिए सब्सिडी वाले किराए की सीमा थी. 80 से ज्यादा सीटों वाले बड़े विमानों में अब केबिन की आधी सीटें निर्धारित किराए पर बेची जा सकेंगी, जिससे सस्ती उड़ान का मकसद बना रहेगा. सरकार की योजना पहाड़ी और द्वीपों वाले ऐसे इलाकों में भी 200 हेलीपैड बनाने की है, जहां पारंपरिक रनवे बनाना व्यावहारिक नहीं. हेलीपैड पर 3,661 करोड़ रु. खर्च आएगा.

हवाई कारोबार की सचाई

उद्योग के जानकारों की नजर में संशोधित योजना में ज्यादा घरेलू एअरलाइनों को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है. साथ ही इसका मकसद इंडिगो और एअर इंडिया के दबदबे वाले हवाई बाजार में होड़ बढ़ाना है. लेकिन विमानन सलाहकार फर्म कापा इंडिया और पश्चिम एशिया के चीफ एग्जीक्यूटिव कपिल कौल का मानना है कि नई योजना में पहले चरण की कुछ कमियां दूर तो की गई हैं पर इससे विमानन की व्यापारिक हकीकत नहीं बदलती.

जैसे-जैसे देश में हवाई यात्रा का विस्तार हुआ है, विमानन कंपनियों ने ट्रंक रूटों या मुख्य वायु मार्गों पर ज्यादा ध्यान दिया है, क्योंकि इन पर विमान पूरे भरे होते हैं और उनकी उड़ानें भी ज्यादा होती हैं. क्षेत्रीय सेवाओं का हिसाब अलग होता है. कम मांग वाले बाजार में छोटे विमानों से कम रिटर्न मिलता है, और एक बार सब्सिडी खत्म हो जाने पर अक्सर मुनाफा भी खत्म हो जाता है. बेहतर एअरपोर्ट और लंबे समय की फंडिंग से ये दिक्कतें कम तो हो सकती हैं, पर खत्म नहीं. कौल कहते हैं, “उड़ान के साथ चुनौती यह है कि रीजनल एविएशन मुश्किल कारोबार है. सब्सिडी भर से कुछ नहीं बदलेगा.”

फ्लाई91 के प्रबंध निदेशक मनोज चाको की कंपनी उन रीजनल एयरलाइंस में से एक है जिसे इस स्कीम से मदद मिलने की उम्मीद है. उनका कहना है कि संशोधित स्कीम एयरलाइनों का विमानन बेड़ा बढ़ाने के लिए धन जुटाने के तरीके में कोई खास मददगार नहीं होगी. वे बताते हैं, “लीज पर विमान देने वाली कंपनियां पहले खास तौर पर एयरलाइन की आर्थिक हैसियत, उसके शेयरहोल्डर और उसके बिजनेस मॉडल की मजबूती देखती हैं.

नई स्कीम से क्षेत्रीय हवाई सेवाओं का ढांचा मजबूत होता है, खासकर उन हवाई अड्डों को ज्यादा मदद मिलती है जहां उड़ानें कम हैं. यह अच्छा कदम है, लेकिन विमान का मिलना अब भी एयरलाइन की बुनियादी ताकत पर ही निर्भर करेगा.”

चाको को वीजीएफ की अवधि बढ़ाने के रूप में एक अहम बदलाव दिखता है. उनका कहना है कि इससे “एअरलाइनों को रीजनल रूटों पर मांग बढ़ाने के लिए ज्यादा समय मिलेगा”. उनकी राय में बोली लगाने वालों के लिए पात्रता के नियम कड़े करना भी अहम सुधार है. “पहले, महज एनओसी रखने वाली कंपनियां भी हिस्सा लेती थीं, और जिन रूटों को मंजूरी मिली, वे कभी शुरू ही नहीं हो पाए क्योंकि उन एअरलाइनों ने उड़ान ही नहीं भरी.”

खैर, भारतीय विमानन उद्योग में तेजी की हवाओं से सरकार को इस बार ज्यादा भरोसा है. नायडू कहते हैं, “भू-राजनीतिक तनाव के दौरान भी देश में घरेलू हवाई यात्रियों की संख्या अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर रही.” मंत्री के अनुसार, हवाई यात्रा में बढ़ोतरी का अगला दौर खचाखच भरे रूटों से नहीं, बल्कि छोटे शहरों से आएगा.

उनका तर्क है कि सरकार का काम ऐसी स्थितियां बनाना है ताकि ऐसे बाजार पल्लवित हो सकें, न कि यह उम्मीद करना कि कंपनियां बिना किसी मदद के ऐसा कर लेंगी. राज्य की भूमिका उन बाजारों के उभरने के लिए माहौल बनाना है, न कि वाणिज्यिक शक्तियों से बिना किसी मदद के इसकी अपेक्षा करना. इसलिए दोबारा तैयार योजना की कसौटी सीधी है: क्या यह सरकारी समर्थन कम होने के बाद भी बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय मार्गों को व्यावसायिक रूप से फायदेमंद बनाए रख पाएगी. 

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