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डार्क मोड

चिप के क्षेत्र में अगली छलांग

'सेमीकॉन 2.0' के जरिए भारत की अपनी महत्वाकांक्षाओं को पंख लगे. दुनिया की चिप निर्माता कंपनियों को आकर्षित करने के अलावा अब उसका लक्ष्य है डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च और प्रतिभाओं के मामले में देश के भीतर ही सेमीकंडक्टर का ईको-सिस्टम तैयार करना

सिलकॉन पर जोर पीएम मोदी साणंद में 28 फरवरी को माइक्रॉन की सेमीकंडक्टर इकाई में
अपडेटेड 7 अगस्त , 2026

केंद्र सरकार ने ‘सेमीकॉन 2.0’ शुरू करके सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में अपनी महत्वाकांक्षाओं को पंख लगा दिए हैं. इसके लिए 1.27 लाख करोड़ रुपए का बजट तय किया गया है. कार्यक्रम का मकसद दुनिया की दिग्गज चिप निर्माता कंपनियों को आकर्षित करने से कहीं ज्यादा है.

असल में भारत सेमीकंडक्टर का अपना समूचा तानाबाना खड़ा करना चाहता है. इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (आइएसएम) के अगले चरण का जोर चिप डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, रिसर्च और टैलेंट के मामले में देश की क्षमताओं को बढ़ाने पर है. साथ ही एक ऐसे उद्योग में भारत की स्थिति को मजबूत करना है जो आज आर्थिक प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रीय सुरक्षा की धुरी बन गया है.

आज की लगभग हर आधुनिक टेक्नोलॉजी में छोटी-छोटी चिपों की जरूरत होती है. इनमें स्मार्टफोन, कंप्यूटर और दूरसंचार उपकरणों से लेकर ऑटोमोबाइल, मेडिकल डिवाइस, रक्षा प्लेटफॉर्म और एआइ सिस्टम तक शामिल है. मार्केट रिसर्च फर्म आइडीसी के अनुसार, 2026 में दुनिया का सेमीकंडक्टर रेवेन्यू एक खरब डॉलर (96 लाख करोड़ रु.) से ज्यादा होने की उम्मीद है.

भारत का बाजार अभी 45-50 अरब डॉलर (4.3-4.8 लाख करोड़ रु.) का है. लेकिन इसके भी 2030 तक दोगुना से ज्यादा हो जाने और 100-110 अरब डॉलर (9.6-10.6 लाख करोड़ रु) तक पहुंचने का अनुमान है.

इस मिशन का पहला चरण दिसंबर 2021 में शुरू किया गया और दूसरे चरण की नींव इसी पर रखी गई. सेमीकॉन 1.0 के तहत सरकार ने कुल 1.64 लाख करोड़ रु. से ज्यादा के निवेश वाली 12 सेमीकंडक्टर इकाइयों को मंजूरी दी थी. इनमें एक सिलिकॉन फैब (मैन्युफैक्चरिंग यूनिट), एक सिलिकॉन कार्बाइड फैब, एक इंटीग्रेटेड गैलियम नाइट्राइड माइक्रो एलईडी डिस्प्ले फैब और नौ पैकेजिंग और टेस्टिंग यूनिट शामिल हैं.

तीन कंपनियों-माइक्रॉन, केन्स और सीजी सेमी-ने पहले ही व्यावसायिक उत्पादन शुरू कर दिया है. एक और संयंत्र के इस साल के आखिर तक चालू हो जाने की उम्मीद है. 105 से ज्यादा स्टार्ट-अप कंपनियां स्वदेशी चिप डेवलप करने में लगी हैं. इसके अलावा देश के लगभग 315 विश्वविद्यालय एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन टूल्स के जरिए छात्रों को ट्रेनिंग दे रहे हैं.

शुरू की उस बढ़त के पायदान पर आगे की राह
सेमीकॉन 2.0 का लक्ष्य व्यापक और छह-सूत्री रणनीति के जरिए शुरुआती फायदों को और आगे ले जाना है. नीति का मकसद भारत में ज्यादा फैब प्लांट लाने के अलावा देश के डिजाइन तंत्र को मजबूत करना, उद्योग में इस्तेमाल खास मशीनरी और मटीरियल के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है. नीति में पैकेजिंग और टेस्टिंग की क्षमता बढ़ाना, एडवांस्ड रिसर्च को सपोर्ट करना और कुशल टैलेंट का बड़ा पूल तैयार करना भी शामिल है.

चिप डिजाइन में अब जोर रणनीतिक और कमर्शियली फायदेमंद इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (आइपी) बनाने पर है. सरकार सेमीकंडक्टर प्रोडक्शन के लिए जरूरी मशीनरी, केमिकल, गैस और दूसरे मटीरियल की आरऐंडडी और मैन्युफैक्चरिंग में शामिल कंपनियों को प्रोत्साहन देने की योजना बना रही है, जबकि रिसर्च की कोशिशें एडवांस्ड टेक्नोलॉजी पर केंद्रित होंगी जिसे प्रमुख संस्थानों के साथ मिलकर किया जाएगा.

उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि पहले चरण ने इसे गति दी है लेकिन इसे बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने के लिए लगातार सरकारी मदद की जरूरत होगी. एचएसबीसी ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च के विश्लेषक विशाल गोयल कहते हैं, ‘‘सरकार की विभिन्न प्रोत्साहन योजनाओं की वजह से 12 बड़े प्लांट को मंजूरी में मदद मिली है. लेकिन विश्व की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में इस मद में रकम बहुत कम है. इसे बढ़ाने की जरूरत है. शुरुआत में भारी भरकम पूंजी खर्च होती है. इसकी प्रक्रिया लंबी है. ऐसे में सरकारी समर्थन बहुत जरूरी हो जाता है.’’

वे स्पष्ट करते हैं कि भारत इस दौड़ में कुछ खास फायदों के साथ शामिल हो रहा है. वह पहले से ही सेमीकंडक्टर डिजाइन का एक ग्लोबल हब है. दुनिया के लगभग 20 फीसद चिप डिजाइन इंजीनियर बेंगलूरू, हैदराबाद और नोएडा के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटरों में काम करते हैं. जैसे-जैसे मल्टीनेशनल कंपनियां सप्लाइ चेन दूसरी जगह ले जाने के लिए ‘चाइना+1’ की रणनीति अपना रही हैं, भारत वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग देश के तौर पर उभरा है.

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव और टेलीकम्युनिकेशन सेक्टर भी तेजी से बढ़ रहे हैं. लिहाजा, सेमीकंडक्टरों को बढ़ता हुआ घरेलू बाजार भी मिल जाता है. मसलन, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना में इस साल देश का इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 300 अरब डॉलर (29 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंचने का अनुमान है. खासतौर पर मोबाइल फोन के मामले में घरेलू उत्पादन से ही अब लगभग सारी घरेलू मांग पूरी हो जाती है.

भविष्य की चुनौतियां
फिर भी इन फायदों को एक ऐसे सेमीकंडक्टर उद्योग में बदलना इतना आसान नहीं होगा जो दुनिया भर में होड़ कर सके. एक अकेले फैब्रिकेशन प्लांट के लिए 3-10 अरब डॉलर (28,900-96,400 करोड़ रुपए) के निवेश की जरूरत पड़ सकती है. चिप मैन्युफैक्चरिंग 300 से ज्यादा बहुत ही विशिष्ट सामग्रियों (स्पेशलाइज्ड मटीरियल) और इक्विपमेंट इनपुट पर निर्भर है.

इनमें से ज्यादातर चीजें अभी भी दुनिया भर से मंगवानी पड़ती हैं. वित्तीय बोझ तो है ही, निवेश से रिटर्न मिलने में भी लंबा समय लगता है. इस कारण सरकारी मदद के बावजूद निजी कंपनियां निवेश करने से हिचकिचा सकती हैं.

गोयल का कहना है कि इसीलिए भारत के लिए निकट भविष्य में सबसे बड़ा मौका पैकेजिंग और असेंबली के क्षेत्र में हो सकता है. वे कहते हैं, ‘‘समस्या यह है कि (एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की) आइपी अमेरिका या यूरोप की मूल कंपनियों के पास है.

डिजाइन सॉफ्टवेयर महंगे हैं और कच्चे माल की सप्लाइ चेन में अस्थिरता है. इसलिए भारत के पास वैल्यू चेन के पैकेजिंग और असेंबली वाले हिस्से पर कब्जा करने का सुनहरा मौका है क्योंकि इसमें ज्यादा पूंजी खर्च करने या बहुत टैलेंट और विशेषज्ञता की जरूरत नहीं है.’’

एक और अड़चन प्रतिस्पर्धा की है. एडवांस्ड सेमीकंडक्टर की मैन्युफैक्चरिंग में चीन, ताइवान, अमेरिका और जापान का दबदबा है जबकि वियतनाम और मलेशिया जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश तेजी से क्षमताएं बढ़ा रहे हैं. भारत को ढांचागत बाधाओं को भी दूर करना होगा. इन बाधाओं में अनिश्चित टैक्स व्यवस्था, प्रतिस्पर्धी वेतन पर कुशल श्रमिकों की कमी और निर्बाध बिजली न दे पाना शामिल है जो सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए बेहद जरूरी है.

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