
अभी तक पूर्व मुख्यमंत्रियों ने अपने लिए जो आलीशान महल बनाए, वे जांच के दायरे में हैं. वह चाहे विशाखापत्तनम में जगन मोहन रेड्डी का 450 करोड़ रुपए का रुशिकोंडा कॉम्प्लेक्स हो या अरविंद केजरीवाल का दिल्ली में फ्लैगस्टाफ रोड पर 60 करोड़ रुपए के जीर्णोद्धार से तैयार ‘शीश महल’.
ऐसे में हैरानी क्या कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का ‘बोधि पैवेलियन’ भी नजरों में आ गया. हैदराबाद के एमसीआर एचआरडी इंस्टीट्यूट कैंपस के भीतर बना यह पैवेवियन बंजारा हिल्स स्थित उनके घर के पास कैंप ऑफिस है. मगर रेवंत इस मामले में फ्रंटफुट पर खेल रहे हैं.
विपक्षी भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के “फिजूलखर्ची” के आरोपों का जवाब देने के लिए वे पत्रकारों को यह जगह दिखाने ले गए. उन्होंने वॉशरूम तक उन्हें दिखाए और बताया कि वे बुलेटप्रूफ नहीं हैं. यह बीआरएस के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के 50 करोड़ रुपए के उस प्रगति भवन पर तंज था जहां शौचालय तक किलेनुमा बताए जाते हैं. रेवंत ने केसीआर के बनवाए “महल” में जाने से इनकार करते हुए उसे पिछली सरकार की फिजूलखर्ची की मिसाल बनाना पसंद किया.
धुरंधर की घेराबंदी
आजम के लिए अ-नाम
आजम खान कभी यूपी के सबसे ताकतवर नेताओं में से हुआ करते थे लेकिन उनके लोगों का कहना है कि वे अ या आ अक्षर से नाम शुरू होने वाले लोगों के चक्रव्यूह में फंस गए हैं. उनकी मुश्किलें 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरू हुईं. उनके साथ आए आंजनेय कुमार सिंह (तब रामपुर के डीएम जिन्होंने उनके जौहर ट्रस्ट की “अनियमितताएं” उजागर कीं); और अजयपाल शर्मा (एसपी जिन्होंने उनके और परिजनों के खिलाफ चल रहे मामलों में उन्हें जेल पहुंचाया).
रामपुर के उनके गढ़ पर 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के आकाश सक्सेना ने कब्जा किया. अब मौजूदा डीएम अजय द्विवेदी उनके जौहर विश्वविद्यालय की 38 ‘अवैध’ इमारतें ढहाने पर आमादा है. सचमुच अ नामधारी उन पर भारी पड़ रहे हैं.

लापता लाडला
तेजस्वी यादव कहां हैं. सारा पटना यही जानना चाहता है. 30 जुलाई को होने वाले बांकीपुर उपचुनाव के लिए पार्टी उम्मीदवार के ऐलान के वक्त राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख दिखाए नहीं दिए. हाल में जब पिता लालू प्रसाद को पटना अस्पताल जाना पड़ा, तब भी वे नदारद थे.
विधानसभा के मॉनसून सत्र के पहले दिन भी उनका कहीं पता न था. सत्तारूढ़ जेडी(यू) के एमएलसी नीरज कुमार ने तंज कसते हुए कहा कि नेता विपक्ष शायद “कोई अंतरराष्ट्रीय विवाद सुलटाने के लिए विदेश गए हैं”. राजद भी इस सवाल से आंख चुराती दिख रही है कि तेजस्वी आखिर हैं कहां. इससे अटकलों का बाजार और गर्म हो गया है.

बाहर की दस्तक
मंत्रिमंडल में फेरबदल की फुसफुसाहटों ने कम से कम कुछ केंद्रीय मंत्रियों की पेशानी पर बल डाल दिए हैं. उनमें से एक ने हाल में शीर्ष अफसरों को डिनर पर बुलाया, जहां बातचीत देखते-देखते बिताए वक्त की यादों पर आ गई.
दूसरे ने सार्वजनिक कार्यक्रम टाल दिए और संसदीय जवाबों पर होने वाली ब्रीफिंग का वक्त भी बदल दिया. एक तीसरे मंत्री ने फाइलें घर से दफ्तर में लौटाना शुरू कर दिया है. हमेशा की तरह पता सिर्फ एक शख्स को हैः प्रधानमंत्री. और वे पत्ते दबाए बैठे हैं.
बोर्डिंग की मनाही
तृणमूल कांग्रेस के नंबर दो अभिषेक बनर्जी को कलकत्ता हाइकोर्ट से राहत जरूर मिली लेकिन बोर्डिंग पास से अब भी इनकार कर दिया गया. 20 जुलाई को अदालत ने बंगाल के चुनाव अभियान के दौरान डीजे धमकी वाले मामले में दिया गया ‘बलात कार्रवाई से सुरक्षा’ आदेश 6 अक्तूबर तक बढ़ा दिया (वादियों का आरोप है कि नतीजों के दिन कानों में गूंजने वाली डीजे की आवाजों का जिक्र मतदाताओं को डराने के लिए किया गया था).
मगर हाइकोर्ट ने आंख के इलाज के लिए विदेश जाने की उनकी अर्जी ठुकरा दी और एसएसकेएम अस्पताल के नेत्र विशेषज्ञों से उनकी जांच करने और रिपोर्ट देने को कहा.

विक्रम-1 ने अंतरिक्ष में रचा इतिहास
निजी क्षेत्र की छलांग
अजय सुकुमारन
भारत के पहले प्रायोगिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएलवी-3) के श्रीहरिकोटा से सफल उड़ान भरने के ठीक 46 साल बाद इस स्पेस पोर्ट ने एक और नया इतिहास रचा, जब एक भारतीय निजी कंपनी ने पहला ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया.
हैदराबाद स्थित यूनिकॉर्न स्टार्टअप स्काइरूट एअरोस्पेस के विकसित किए छोटे उपग्रह लॉन्चर विक्रम-1 ने इसी 18 जुलाई को दोपहर 12:05 बजे अंतरिक्ष की ओर उड़ान भरी और स्कोप तथा ग्रह नाम के दो उपग्रहों को कुछ अन्य पेलोड के साथ पृथ्वी की निचली कक्षा (एलईओ) में स्थापित कर दिया.
अमेरिका और चीन के बाद भारत निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया. स्काइरूट के लिए सोने पर सुहागा यह रहा कि उसने अपने पहले ही प्रयास में यह सफलता हासिल कर ली. ईलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स तक को 2008 में फाल्कन-1 को कक्षा में पहुंचाने के लिए चार प्रयास करने पड़े थे.

दो आइआइटी स्नातकों—पवन कुमार चांदना और नागा भरत डाका—और पूर्व इसरो वैज्ञानिकोंकी स्काइरूट के पहले परीक्षण रॉकेट ने 2022 में उड़ान भरी थी. इसरो के मार्गदर्शन से उसने छोटे उपग्रहों को एलईओ में भेजने के लिए तीन ठोस चरणों और एक तरल चरण वाला विक्रम-1 विकसित किया.
अब तक 1,541 करोड़ रुपए की फंडिंग के साथ इस स्टार्टअप का घोषित मिशन ‘अंतरिक्ष तक पहुंच’ को पुनः परिभाषित करना और वैश्विक लॉन्च बाजार की कमी को पूरा करना है. वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, जिसका मूल्य 2024 में 596 अरब डॉलर था, के 2035 तक 1.8 खरब डॉलर से ज्यादा होने का अनुमान है. इस बाजार में भारत की हिस्सेदारी अभी लगभग दो फीसद है, जिसके अगले दशक में आठ फीसद तक पहुंचने की उम्मीद है.
—साथ में प्रसाद निचेनमेटला, आशीष मिश्र, अमिताभ श्रीवास्तव और अर्कमय दत्ता मजूमदार

