प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके तत्कालीन जापानी समकक्ष शिंजो आबे ने करीब एक दशक पहले भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना का शिलान्यास किया था. वह मुंबई-अहमदाबाद हाइ-स्पीड रेल कॉरिडोर अब आखिरकार अपने निर्माण के अंतिम चरण में दाखिल हो चुका है.
इस 508 किमी लंबी परियोजना को 2023 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था और इसमें पहले ही तीन साल की देरी हो चुकी है. वैसे पिछले एक साल में इसके निर्माण कार्य में तेजी आई है. भूमि अधिग्रहण पूरा हो चुका है, सभी वैधानिक मंजूरियां मिल गई हैं. गुजरात में परियोजना का काम काफी आगे बढ़ चुका है.
अधिकांश मार्ग पर सिविल निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है, ट्रैक-बेड का निर्माण जारी है और ओवरहेड विद्युतीकरण का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है. 12 में से आठ स्टेशनों की नींव का निर्माण पूरा हो चुका है, जबकि महाराष्ट्र के बाकी चार स्टेशनों पर काम जारी है.
नदियों पर पुलों, डिपो और मुंबई स्थित भूमिगत बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स स्टेशन का निर्माण तेजी से आकार ले रहा है. वहीं, 21 किमी लंबे भूमिगत खंड में सुरंग निर्माण शुरू हो चुका है. इसमें समुद्र के नीचे बनने वाली भारत की पहली रेल सुरंग शामिल है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव कहते हैं, “परियोजना का पहला खंड अगले साल अगस्त में चालू कर दिया जाएगा. हम हर महीने लगभग 15-16 किमी निर्माण कर रहे हैं. प्रगति बहुत अच्छी है.” जिस पहले खंड की वे बात कर रहे हैं, वह गुजरात में सूरत-बिलमोरा-वापी के बीच का 100 किलोमीटर लंबा मार्ग है.
वैसे, यह उस परियोजना से काफी अलग रूप ले चुकी है जिसका अनावरण सितंबर 2017 में किया गया था. परियोजना के वित्तपोषण में अब भी जापान की भूमिका प्रमुख है. मगर उसके अलावा काफी कुछ बदल चुका है. मसलन, पटरियों-पुलों का निर्माण जापान की शिनकनसेन (बुलेट ट्रेन) की ब्लूप्रिंट के अनुसार भारतीय इंजीनियरिंग कंपनियां कर रही हैं.
अब कॉरिडोर के पहले परिचालन खंड में चलने वाली ट्रेनें भी भारत में ही निर्मित होंगी. सबसे अहम बदलाव सिग्नलिंग प्रणाली में हुआ है जो किसी भी हाइ-स्पीड रेल (एचएसआर) नेटवर्क का सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी तंत्र है. यह प्रणाली अब जापानी के बजाए यूरोपीय होगी.
नतीजतन, 2027 में सेवाएं शुरू होने पर ट्रेनें लगभग 250 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलेंगी जो नवीनतम बुलेट ट्रेनों की 300 किमी प्रति घंटे से भी ज्यादा की रफ्तार के मुकाबले कम होगी. इसके अलावा, इन ट्रेनों का निर्माण शिनकनसेन ट्रेनसेटों में अमूमन इस्तेमाल होने वाले हल्के एल्युमिनियम के बजाए इस्पात (स्टील) से किया जाएगा.
इस परियोजना के वित्तपोषण के लिए जापान ने ऐसी शर्तों पर कर्ज उपलब्ध कराया, जिसकी बराबरी बहुत कम देश कर सकते थे. उसने लगभग 79,000 करोड़ रुपए का रियायती कर्ज दिया, जो परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत 98,000 करोड़ रुपए का 81 फीसद था.
इस कर्ज पर ब्याज दर मात्र 0.1 फीसद रखी गई, जिसकी अदायगी 50 वर्षों में की जानी थी. 15 वर्ष का ग्रेस पीरियड भी दिया गया. मतलब यह कि भारत को अगले डेढ़ दशक तक कर्ज की किस्तें चुकानी शुरू नहीं करनी हैं.
ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि जब 14 सितंबर 2017 को अहमदाबाद में भारत और जापान के प्रधानमंत्रियों ने परियोजना का शिलान्यास किया, तो पीएम नरेंद्र मोदी ने जापान के प्रति आभार जताया. उन्होंने कहा, “इस बुलेट ट्रेन का पूरा श्रेय मेरे प्रिय मित्र शिंजो आबे को जाता है. यह एक प्रकार से जापान की भारत को बहुत बड़ी सौगात है...एक प्रकार से मुफ्त में यह पूरा प्रोजेक्ट बनता चला जा रहा है.”
जापान की वह उदारता एक शर्त के साथ आई थी. परियोजना के मूलभूत तंत्र यानी ट्रेनों, सिग्नलिंग प्रणाली से लेकर विद्युत उपकरणों तक की खरीद जापानी कंपनियों या उनके नेतृत्व वाले कंसोर्शियम से ही की जानी थी. इससे भारत के पास सीमित विकल्प रह गए.
जल्द ही यह साफ हो गया कि सीमित जापानी विक्रेताओं से प्राप्त बोलियां अंतरराष्ट्रीय विकल्पों की तुलना में कहीं ज्यादा महंगी थीं. परियोजना की लागत बढ़ती गई और निर्माण में देरी होती गई. तब भारत को एहसास हुआ कि उसे मूल खरीद व्यवस्था के कुछ हिस्सों से धीरे-धीरे खुद को अलग करना होगा.
पहली कामयाबी
बसे पहले सिविल निर्माण कार्य जापान की विशेष आपूर्ति शर्त से बाहर निकला. इसके लिए लंबी बातचीत करनी पड़ी, जिसे अधिकारियों ने “रेल कूटनीति” नाम दिया. भारतीय रेल के पूर्व महाप्रबंधक और परियोजना के शुरुआती चरण की अगुआई करने वाली मुकुल सरन माथुर बताते हैं, “हमें जापान के साथ कड़ा मोलभाव करना पड़ा.
आखिरकार वे इस पर सहमत हुए, मगर इस शर्त के साथ कि निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर जापान की सख्त निगरानी रहेगी क्योंकि भारत ने इससे पहले इस स्तर की कोई परियोजना नहीं बनाई थी.” माथुर के मुताबिक, अगर सिविल निर्माण का काम भी जापानी कंपनियों को दिया जाता तो वह अनावश्यक रूप से महंगा साबित होता.
वे कहते हैं, “इसके अलावा, अगर हम सिर्फ इस तकनीक के उपभोक्ता बने रहें और स्वयं इसका निर्माण न करें, तो हमारी इंजीनियरिंग क्षमता कैसे विकसित होगी?” इस छूट के बाद अफकॉन्स और एलऐंडटी सरीखी भारतीय कंपनियों के लिए परियोजना के बड़े हिस्से के सिविल निर्माण की जिम्मेदारी संभालने का रास्ता खुल गया.
मगर एचएसआर नेटवर्क के निर्माण में पटरियां, पुल और स्टेशन बनाना केवल एक हिस्सा था. इसके दो सबसे अहम घटक ट्रेन और सिग्नलिंग प्रणाली अभी बाकी थे. यहीं पर कहीं बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई.
दूसरी बाधाएं
दरअसल, मुंबई-अहमदाबाद एचएसआर कॉरिडोर को जापान की शिनकनसेन तकनीक के अनुरूप डिजाइन किया गया था. ऐसे में ई-5 शिनकनसेन ट्रेनसेट उपलब्ध कराने में केवल जापान की दिग्गज कंपनियां कावासाकी और हिताची ही सक्षम थीं.
रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, “व्यावहारिक रूप से यह हमारे लिए सिंगल-टेंडर जैसी स्थिति बन गई थी, जो आदर्श नहीं मानी जाती. यह द्विपक्षीय समझौता था, इसलिए हमने सीमित संख्या में विक्रेताओं के साथ आगे बढ़ने पर सहमति भी दे दी. मगर यह जानते हुए कि हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, उन्होंने बेहद ऊंची कीमतें बताईं.”
अधिकारियों के मुताबिक, जापानी कंपनियों की कीमत के हिसाब से प्रति कोच लागत लगभग 40–60 करोड़ रुपए बैठ रही थी. ऐसे में एक पूरे ट्रेनसेट की कीमत लगभग 1,000 करोड़ रुपए तक पहुंच रही थी. वह वंदे भारत ट्रेन के एक रेक की लागत से कई गुना ज्यादा थी.
वंदे भारत परियोजना के प्रमुख वास्तुकारों में शामिल रहे और रेल मोबिलिटी विशेषज्ञ शुभ्रांशु कहते हैं, “जब 180 किमी प्रति घंटे की गति से चलने वाली वंदे भारत ट्रेन की लागत 100–120 करोड़ रुपए है, ऐसे में 1,000 करोड़ रुपए की बुलेट ट्रेन भारत जैसे देश में उचित नहीं ठहराई जा सकती थी. अगर इस परियोजना को असल में भारत की प्रगति का प्रतीक बनना है, तो ट्रेनों का निर्माण देश में ही होना चाहिए.”
इस बीच, पहले भूमि अधिग्रहण और बाद में खरीद प्रक्रिया में हुई देरी ने परियोजना की लागत को भी लगातार बढ़ाना शुरू कर दिया.पहले ही संशोधित होकर 1.08 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी परियोजना की अनुमानित लागत 1.6 लाख करोड़ रुपए की ओर बढ़ने लगी.
वहीं, कर्ज का पुनर्भुगतान जापानी येन में किया जाना है, इसलिए एक्सचेंज रेट में उतार-चढ़ाव ने भी भारत की दीर्घकालिक देनदारी बढ़ा दी. नतीजतन, परियोजना की प्रभावी लागत लगभग दो लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई है.
सबसे सतर्क आकलनों के हिसाब से भी देखें तो पूरे कॉरिडोर का निर्माण 2029 के आसपास ही पूरा हो सकेगा. भारत ने पुरानी पड़ चुकी ई-5 शिनकनसेन ट्रेनसेट खरीदने के बजाए जापान की अगली पीढ़ी की ई-10 शिनकनसेन ट्रेनों का इंतजार करने का प्रस्ताव रखा. मगर ई-10 अभी विकास के चरण में है और इसके 2030 तक निर्यात के लिए उपलब्ध होने की संभावना नहीं है. इसलिए यह विकल्प व्यावहारिक नहीं माना गया.
सिग्नलिंग प्रणाली उससे भी बड़ी चुनौती साबित हुई. जापान का एचएसआर नेटवर्क अपने स्वामित्व वाली डिजिटल सिग्नलिंग–ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल (डीएस-एटीसी) प्रणाली का इस्तेमाल करता है. वहीं, दुनिया के ज्यादातर देशों ने यूरोपीय ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ईटीसीएस) को मानक प्रणाली के रूप में अपनाया है. ईटीसीएस ही भारत की स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली ‘कवच’ का भी आधार है.
जापान के साथ लंबे समय तक चली कूटनीतिक वार्ताओं के बाद भारत ने डीएस-एटीसी की जगह ईटीसीएस लेवल-2 सिग्नलिंग प्रणाली अपनाने का फैसला किया. मई 2025 में बहुराष्ट्रीय जर्मन कंपनी सीमेंस को 4,100 करोड़ रुपए का सिग्नलिंग अनुबंध मिला.
सीमेंस इंडिया के मोबिलिटी प्रमुख तिलक राज सेठ कहते हैं, “भारत कई एचएसआर कॉरिडोर विकसित कर रहा है. ऐसे में वह ऐसी तकनीक चुने, जो उसे मुख्य प्रौद्योगिकी के चयन में अधिकतम लचीलापन प्रदान करे.”
इस साल ट्रेनों के मुद्दे पर भी हल निकल आया. फरवरी में रक्षा क्षेत्र के पीएसयू भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएल) और हैदराबाद के मेधा सर्वो ड्राइव्ज की नई साझेदारी को एचएसआर कॉरिडोर के लिए 16 ट्रेनसेट बनाने का अनुबंध मिला. सिंगल-टेंडर नॉमिनेशन के आधार पर दिए गए इस अनुबंध में प्रति ट्रेनसेट लगभग 250 करोड़ रुपए की कीमत कोट की गई है.
इसके तहत बीईएमएल कोचों का निर्माण करेगी, फाइनल असेंबली करेगी और उनके इंटीरियर को तैयार करेगी. वहीं, मेधा सर्वो ड्राइव्ज प्रोपल्शन, ट्रैक्शन और विद्युत प्रणालियां उपलब्ध कराएगी.
यह आदेश 2024 में दिए गए उस अनुबंध का विस्तार है, जिसके तहत 886.87 करोड़ रुपए की लागत से बी28 नाम के दो प्रोटोटाइप ट्रेनसेट विकसित करने की जिम्मेदारी बीईएमएल को सौंपी गई थी. 280 किमी प्रति घंटे की अधिकतम गति के लिए डिजाइन इन प्रोटोटाइप के 2027 की शुरुआत तक तैयार होने की उम्मीद है.
आगे की राह
अब जबकि प्रमुख तकनीकी विकल्पों पर फैसला हो चुका है, नेशनल हाइ-स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एनएचएसआरसीएल) इस साल के केंद्रीय बजट में घोषित सात एचएसआर कॉरिडोर पर केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले का मार्ग प्रशस्त कर रहा है. इनमें दिल्ली-वाराणसी और चेन्नै-बेंगलूरू मार्ग शामिल हैं. इनकी अनुमानित लागत 350 करोड़ रुपए प्रति किमी है.
एनएचएसआरसीएल के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, “किसी भी एचएसआर नेटवर्क की यूएसपी यह है कि आज जिन लंबी दूरी की यात्राओं के लिए पहले से योजना बनानी पड़ती है, उन्हें रोजाना की सामान्य यात्रा में बदल सकता है. इसका अर्थ यह भी है कि परियोजना को केवल किराए से होने वाली आय पर निर्भर रहने के बजाए, कमर्शियल डेवलपमेंट सरीखे गैर-किराया स्रोतों से होने वाली आय पर भी अधिकाधिक निर्भर होना पड़ेगा.”
परियोजना से जुड़ा एक अन्य अनसुलझा मुद्दा परिचालन का है. अभी ऑपरेशंस ऐंड मेंटेनेंस ठेकेदार की नियुक्ति को लेकर चर्चा चल रही है. इस दौड़ में दिल्ली मेट्रो जैसी संस्थाओं के नाम सामने आ रहे हैं. जापानी पक्ष को भी अनौपचारिक रूप से भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी कर इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया गया है.
इसी बीच, एनएचएसआरसीएल ने दुनिया की प्रमुख रोलिंग स्टॉक कंपनियों को बी35 के विकास के लिए तकनीकी क्षमताएं पेश करने का आमंत्रण दिया है. बी35 एक स्वदेशी बुलेट ट्रेन होगी जिसे 350 किमी प्रति घंटे की अधिकतम तथा 320 किमी प्रति घंटे की परिचालन गति के लिए डिजाइन किया जा रहा है. भविष्य के सभी एचएसआर कॉरिडोरों के लिए इसे मानक प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित करने की योजना है.
इस पूरी परियोजना में जापान की भूमिका क्या होगी? वैष्णव कहते हैं, “जापानी पक्ष ने संकेत दिया है कि ई-10 शिनकनसेन अभी विकास के चरण में है. इसे भारत और जापान में एक साथ शुरू किया जाएगा. इसकी समय-सीमा तथा अनुबंध से जुड़ी अन्य शर्तों पर अभी चर्चा चल रही है.” इस बदली हुई स्थिति की झलक जुलाई की शुरुआत में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की नई दिल्ली यात्रा के दौरान भी दिखी.
उसमें कहा गया, “जापान 2027 तक प्राथमिक खंडों पर वाणिज्यिक परिचालन शुरू करने के भारत के लक्ष्य को पूरी तरह समझता है और इसके लिए जरूरी सहयोग देने के अपने संकल्प पर कायम है. दोनों प्रधानमंत्रियों ने ई-10 शिनकनसेन को शुरू करने के लक्ष्य को स्वीकार किया. उन्होंने भविष्य के एचएसआर कॉरिडोरों में सहयोग के संभावित तरीकों पर विचार करने की भी इच्छा व्यक्त की.” इस संयुक्त बयान में सिग्नलिंग प्रणाली का उल्लेख नहीं था.
इंडिया टुडे के भेजे सवालों का जापानी दूतावास ने कोई जवाब नहीं दिया. मगर मई में मुंबई-अहमदाबाद परियोजना में जापान के प्रमुख तकनीकी सलाहकार जेआर ईस्ट के वित्तीय नतीजों की घोषणा के दौरान कंपनी की उपाध्यक्ष अत्सुको इतोह ने दोहराया कि अगर जापानी बुलेट ट्रेनें यूरोपीय सिग्नलिंग प्रणाली के साथ संचालित की जाती हैं तो उनसे जुड़े जापानी सुरक्षा मानकों की गारंटी नहीं दी जा सकती. उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर भारत के साथ बातचीत काफी कठिन रही है.
इन मतभेदों का समाधान हो या न हो, भारत एचएसआर के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य में कोई भी बाधा नहीं आने देना चाहता. मोदी सरकार के लिए यह एक ऐसा सपना है, जिसे हर हाल में साकार करना उसकी प्राथमिकता है.
केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, ‘‘मुंबई-अहमदाबाद हाइ-स्पीड रेल कॉरिडोर का पहला खंड अगस्त 2027 में चालू कर दिया जाएगा. हम अब हर महीने 15-16 किमी निर्माण कर ले रहे हैं. प्रगति बहुत अच्छी है.’’

