- इंदिरा जयसिंह
संविधान और हमारे आपराधिक कानून हर व्यक्ति को बराबरी और सम्मान का वादा करते हैं, बात चाहे दो लोगों के बीच रिश्तों की हो या फिर सरकार के साथ कोई मसला हो. मगर कानून होने का कतई यह मतलब नहीं कि हम रोजमर्रा के रिश्तों में उसे मान लेते हैं. हम सभी को फैसले लेने में निजी आजादी और निजता का अधिकार है, फिर चाहे रिश्ता कितना ही करीबी क्यों न हो. फिर भी इसका मतलब यह नहीं कि हर महिला समझती है कि उसकी सहमति के बिना कोई उससे यौन संबंध नहीं बना सकता.
इंडिया टुडे ग्रुप के सहमति सर्वे के नतीजों से पता चलता है कि महिलाएं असल में इच्छुक न होते हुए भी यौन संबंध बनाने की मांग के आगे अक्सर झुक जाती हैं. इसका सबसे अहम कारण अंतरंग साथी का भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करना होता है. दूसरी वजह है 'गैसलाइटिंग' यानी मन में यह बात बैठ जाना कि अगर कोई महिला अपने साथी को मना करती है, तो उसे असामान्य समझा जाएगा या यह माना जाएगा कि उसमें 'औरतपना' नहीं है.
बलात्कार की परिभाषा के दो अलग-अलग पहलू हैं: एक उसकी सहमति के बिना, और दूसरा उसकी इच्छा के विरुद्ध. जब कोई महिला मजबूर हो जाती है, तो उसकी इच्छा के विरुद्ध किया गया सेक्स रेप ही कहलाता है.
इससे वैवाहिक रेप का मसला सामने आता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पति शादी के असल मायने को नहीं समझता. शादी प्यार, देखभाल, एक-दूसरे के साथ का बंधन होता है जिसमें सेक्स पारस्परिक संतुष्टि का जरिया होता है. जब यह पत्नी की इच्छा के बिना उस पर हक जताने का तरीका बन जाता है, तब वह रेप है. मगर कानून इसे अपराध नहीं मानता. यह रेप की साफ मिसाल है: महिला की सहमति के बिना और उसकी इच्छा के विरुद्ध.
हमारे पास कभी भी इसके मजबूत आंकड़े नहीं होंगे क्योंकि इसकी कोई एफआइआर नहीं कराई जाती. महिलाएं पहले आइपीसी की धारा 377 के तहत शिकायतें दर्ज कराती थीं, जिससे वैवाहिक यौन हिंसा के स्तर का कुछ संकेत मिलता था. सुप्रीम कोर्ट ने नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) केस में आपसी सहमति से बनाए गए अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया मगर बिना सहमति के गुदा और मुख मैथुन अपराध बने रहे. आइपीसी की जगह लेने वाली बीएनएस में धारा 377 को बरकरार नहीं रखा गया है. इसके नतीजतन विवाह के भीतर बिना सहमति के होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ महिलाओं के पास कोई कानूनी उपाय नहीं बचा है.
एक और निष्कर्ष इस बारे में है कि स्त्रियां यौन उत्पीड़न पर कैसी प्रतिक्रिया देती हैं. यहां भी वे लोकलाज या नौकरी जाने के डर से शिकायत करने से कतराती हैं.
सबसे बड़ी मदद खुद की मदद है: सही तरीका यह है कि आगे बढ़ते पुरुष को वहीं रोक दिया जाए और जहां संभव हो, तत्काल उसका विरोध किया जाए. अक्सर, ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद न रखने वाला उत्पीड़क हैरान रह जाता है और उसे रोका जा सकता है.
जहां यह संभव न हो, उनका रियल टाइम डॉक्युमेंटेशन जरूरी है ताकि वैसी घटनाएं दोबारा न हों. मगर ऐसा होता नहीं दिखता जिससे जाहिर है कि कानून पर भरोसा कम है. कार्यस्थल पर स्टाफ को जागरूक करने के बारे में पूछने पर कई महिलाओं ने कहा कि यह सिर्फ कानूनी जरूरत पूरी करने की औपचारिकता है, न कि बराबरी वाला वर्कप्लेस बनाने की सही कोशिश.
हालात निराशाजनक दिखते हैं. मगर अच्छी बात: लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि इसका एकमात्र समाधान 10 से 14 साल के बच्चों को सेक्स एजुकेशन देना है. स्कूलों में और माता-पिता के साथ सेक्स पर खुलकर बातचीत ही महिला सुरक्षा का एकमात्र समाधान लगता है. सख्त सजाओं के बावजूद देश महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं बन पाया है. समाधान कानून के दायरे में ही खोजना होगा. यह बंदूक की नली से नहीं निकलेगा.

