वाई युद्ध अब वह नहीं रहा जो हुआ करता था. कई परतों वाला वायु रक्षा नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों से लैस लड़ाकू विमान, जमीनी, हवाई और लड़ाकू विमानों में लगे रडारों के बीच सुचारु नेटवर्क बनाने, और साथ ही कम खर्चीले लेकिन उथल-पुथल मचा देने वाले मानवरहित हवाई वाहनों (यूएवी) यानी ड्रोन ने लड़ाई की शक्ल ही बदल दी है.
भविष्य के युद्ध इन सभी के बीच ज्यादा सहज तालमेल पर निर्भर होंगे, और यह सब स्टेल्थ यानी छिपकर हमला करने और डेटा फ्यूजन यानी बहुत सारे स्रोतों से आ रही जानकारियों में तालमेल बिठाने की क्षमता के साथ-साथ दुश्मन के ऐसे ही नेटवर्क को मात देने की काबिलियत के जरिए किया जाएगा.
इसी लिहाज से छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान की परिकल्पना की जा रही है. ये अकेले और अलग-थलग विमान कम और युद्ध के आपस में जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र के कमान नोड ज्यादा होंगे.
इन विमानों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) से चलने वाली युद्धक प्रणालियां, मानवयुक्त और मानवरहित टीमों का निर्माण (ड्रोन के साथ जोड़ी बनाना), लंबी दूरी की सटीक आक्रमण क्षमताएं और उन्नत प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी के होने की उम्मीद है. छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के दो कार्यक्रमों ने दुनिया भर का ध्यान खींचा है: अमेरिका के एफ-47, जो उसके नेक्स्ट जेनरेशन एअर डॉमिनेंस (एनजीएडी) कार्यक्रम के तहत बनाए जा रहे हैं, और चीन के जे-36 और जे-50 प्रोजेक्ट.
अब भारत के सामने छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के कार्यक्रमों से जुड़ने का मौका है. केंद्रीय रक्षा मंत्रालय मार्च 2026 में संसद को अपने इस इरादे के बारे में बता चुका है. चुनाव छठी पीढ़ी के दो अन्य प्रोजेक्ट के बीच है—फ्रांस, जर्मनी और स्पेन (हालांकि फ्रांस ने हाल में इस प्रोजक्ट से अपने हाथ पीछे खींच लिए) की अगुआई में चल रहा फ्यूचर कॉम्बैट एअर सिस्टम (एफसीएएस), और ब्रिटेन, इटली तथा जापान का ग्लोबल कॉम्बैट एअर प्रोग्राम (जीसीएपी).
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 30 अप्रैल को कहा था, ''हमने सहयोगी लोकतंत्रों के बीच चल रही दोनों साझेदारियों से संपर्क कायम करके छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में शामिल होने की दिलचस्पी जाहिर की है. जवाब का इंतजार है.’’
भारतीय वायु सेना के पूर्व उपप्रमुख एअर मार्शल रघुनाथ नांबियार का मानना है कि छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में भारत का हिस्सा लेना बदलावकारी होगा. इससे भारत को एआइ, इंजन टेक्नोलॉजी और नेटवर्क से जुड़े युद्ध की अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी तक पहुंच मिलेगी, साथ ही दुश्मनों के खिलाफ प्रतिरोध क्षमता में इजाफा होगा.
यूरोप उनके विकास में होने वाला खर्च बांट सकेगा और उसे तय बाजार मिलेगा. नांबियार कहते हैं, ''हमें सभी विशिष्ट टेक्नोलॉजी से पूरी तरह जुड़ना होगा और अपने फायदे के लिए उन्हें अपनाना होगा. यही हमारी चुनौती होगी और हमें कुछ हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का इकलौता सप्लायर बनना होगा.’’
कुछ जानकारों का मानना है कि इस तजुर्बे से टेक्नोलॉजी के विकास की रक्रतार तेज होगी और पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एअरक्राफ्ट (एएमसीए) या उन्नत मध्यम युद्धक विमान परियोजना से आगे के लंबे वक्त के सैन्य विमानन लक्ष्यों को पूरा करने में मदद मिल सकेगी. एएमसीए अभी प्रोटोटाइप या शुरुआती प्रारूप के चरण में है और समय सीमा के अंदर पूरा होता है तो 2035 में तैनाती हो सकती है.
दूसरी तरफ चीन ने पहले ही दो स्टेल्थ लड़ाकू विमान—जे-20 और जे-35—तैनात कर दिए हैं, जबकि पाकिस्तान को भी जल्द ही जे-35 विमान मिलने की संभावना बताई जाती है. विशेषज्ञों को लगता है कि लड़ाकू विमानों की टेक्नोलॉजी तकरीबन हर दशक में उन्नत होती रहती है, इसलिए भारत को ताजातरीन सुधारों की जानकारी रखनी चाहिए.
जीसीएपी और एफसीएएस का लक्ष्य क्रमश: 2035 और 2024 तक छठी पीढ़ी के उड़ान योग्य लड़ाकू विमान हासिल करना है. हालांकि एफसीएएस प्रोजेक्ट को अपने तीन यूरोपीय साझेदारों के बीच औद्योगिक असहमतियों के चलते देरी से जूझना पड़ रहा है.
एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस की दसो एविएशन और प्रोजेक्ट में जर्मनी तथा स्पेन का प्रतिनिधित्व कर रही एअरबस के बीच असहमतियों के कारण परियोजना ही खटाई में पड़ गई थी. अलबत्ता जर्मनी ने कहा है कि फ्रांस के साथ सहयोग टूटने के बाद एफसीएएस के लिए नए साझेदार खोजे जाएंगे.
मजबूत रक्षा साझेदारी की पृष्ठभूमि में फ्रांस ने छठी पीढ़ी के विमानों की भावी परियोजना में भारत के साथ भागीदारी के इरादे का संकेत भी दिया है. उधर, जीसीएपी प्रोजेक्ट सही राह पर है और रक्षा क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां बीएई सिस्टम्स (ब्रिटेन), लिओनार्दो (इटली) और मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज (जापान) उसे आगे बढ़ा रही हैं.
इसका खास डिजाइन और विकास का चरण 2025 से 2027 के बीच है. इस प्रोजेक्ट से जुड़ने के लिए ये कंपनियां भारत को लुभा रही हैं. इन रक्षा कंपनियों ने विमान के विकास में तेजी लाने के लिए 2025 में नया संयुक्त उद्यम एजविंग स्थापित किया.
महंगा सौदा
जानकारों का कहना है कि जीसीएपी से पूरी तरह जुड़ना बहुत खर्चीला पड़ेगा. कार्यक्रम में 10-15 फीसद हिस्सेदारी हासिल करने के लिए भारत को करीब 6.5-10 अरब डॉलर (62,500-96,150 करोड़ रुपए) की अनुमानित रकम का वादा करना पड़ेगा.
इस वित्तीय बोझ के साथ एक धर्मसंकट जुड़ा है: इससे भारत के बेशकीमती संसाधनों को एएमसीए प्रोजेक्ट से हटाकर दूसरी तरफ झोंकना होगा, जबकि यह भारत की हवाई ताकत में सबसे अहम है.
एक सैन्य तबके के मुताबिक, भारत को पूर्ण भागीदारी के बजाए फिलहाल 'पर्यवेक्षक के दर्जे’ की व्यवस्था अपनानी चाहिए. इससे वह टेक्नोलॉजी की प्रगति पर नजर रख पाएगा और उसे विदेशी सैन्य-औद्योगिक समूह पर समय से पहले निर्भर भी नहीं होना पड़ेगा.
देश को छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम से जुड़ना चाहिए या नहीं, इस सवाल से जूझते हुए भारत के सैन्य योजनाकार तीन बातों की जांच-पड़ताल कर रहे हैं: टेक्नोलॉजी तक पहुंच, औद्योगिक कामों और रोजगार सृजन में हिस्सेदारी, और वित्तीय प्रतिबद्धताएं. तीनों के निहितार्थ भारत की भावी हवाई ताकत और रणनीतिक स्वायत्तता पर असर डालेंगे.
छठी पीढ़ी की विमान क्षमताएं
छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को कम कीमत के ड्रोन, उन्नत हवाई रक्षा और स्टेल्थ प्लेटफॉर्म वाले हवाई रणक्षेत्र में लंबी दूरी की कार्रवाइयों के लिए बनाए गए दो इंजनों के स्टेल्थ विमानों के रूप में डिजाइन किया जा रहा है. इनमें लो-ऑब्जर्वेबल शेपिंग, रडार-एब्जॉर्बेंट सामग्रियां, इन्फ्रारेड सिग्नेचर सप्रेशन और विमान के भीतर ही हथियार रखने की व्यवस्था का मेल होगा. ये सब रडार और थर्मल पहचान को कम से कम करने के लिए हैं.
इस लड़ाकू विमान में एडैप्टिव-साइकल इंजनों (सबसोनिक, ट्रांससोनिक और सुपरसोनिक रक्रतारों के लिए) का इस्तेमाल होगा. उनमें हरेक 40,000 पाउंड से ज्यादा का थ्रस्ट (या प्रोपल्शन) पैदा करता है, जिससे माक 2 सुपरक्रूज गति (सुपरसोनिक उड़ान को बनाए रखने की क्षमता) मिल पाती है.
छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान फ्लाइंग सेंसर फ्यूजन हब की तरह काम करेंगे. वास्तविक समय पर रणक्षेत्र की 360 डिग्री की तस्वीर मुहैया करने के लिए इनमें उन्न्त एईएसए (एक्टिव इलेक्ट्रॉनिक स्कैन्ड ऐरे) रडार, ईओ/आइआर (इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/ इन्फ्रारेड) प्रणालियां, पैसिव सेंसर ईडब्ल्यू सुइट जोड़े जाएंगे.
एआइ से खतरों का पहले से अनुमान लगाकर विश्लेषण करने, स्वायत्त ढंग से फैसले लेने, तेजी से लक्ष्य की प्राथमिकताएं तय करने और स्वतंत्र किल-चेन (यानी अर्ली वार्निंग राडार, एयरबोर्न अर्ली वाॄनग एअरक्राफ्ट, ईडब्ल्यू प्रणालियों और बियॉन्ड विजुअल रेंज या बीवीआर हथियारों का इस्तेमाल करके दुश्मन के विमानों का पता लगाने, उन पर नजर रखने और उन्हें उलझाने) बनाने में सहायता मिलेगी.
एक मूल अवधारणा मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग (यानी मानवयुक्त और मानवरहित ड्रोन प्रणालियों की टीम बनाना) है. यह लड़ाकू विमान 'विंगमैन’ ड्रोनों के झुंड को नियंत्रित करने वाले हवाई कमान नोड की तरह काम करेगा. हवाई युद्ध में 'विंगमैन’ वह साथी विमान होता है जो अगुआ विमान के बिल्कुल पीछे या बगल में उड़ता है, और वे एक दूसरे की मदद करते हैं.
ये मानवरहित प्रणालियां टोह लेंगी, हमले करेंगी, झांसा देने और बेअसर करने के अभियानों को अंजाम देंगी. जमीन से अलग-अलग छोड़े गए ये ड्रोन एआइ और सुरक्षित डेटा लिंक्स की ताकत से चलेंगे और आग्नेय शक्ति को बढ़ाएंगे.
उन्नत हथियारों के लिहाज से विमान अगली पीढ़ी की बीवीआर मिसाइलों और हाइपरसोनिक (माक 5 की गति यानी मोटे तौर पर 6,100 किमी प्रति घंटा) हमलावर प्रणालियों को ले जा पाएगी.
इस तरह छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान हवा में स्थित कॉम्बैट नेटवर्क होंगे, यानी 'प्रणालियों की (मिली-जुली) प्रणाली’, जो छठी पीढ़ी के स्टेल्थ लड़ाकू विमान, मानवरहित विंगमैन ड्रोन, उन्नत सेंसर और नेटवर्क के जरिए डेटा साझा करने की क्षमताओं से मिलकर बनी होगी. उसमें तेजी से सुधार भी किया जा सकेगा.
भारत के जीसीएपी या एफसीएएस प्रोजेक्ट में से किसी एक को चुनने के मामले में वायु सेना के पूर्व डायरेक्टर जनरल (इंस्पेक्शन और एअरोस्पेस सेफ्टी) एयर मार्शल मकरंद बी. रानाडे (सेवानिवृत्त) कहते हैं, ''इन साझेदारियों के भू-राजनैतिक फायदे हैं.
उनसे हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की सैन्य गतिविधियों के मुकाबले जवाबी संतुलन कायम करने, सुरक्षा सहयोग को मजबूत बनाने और आपसी संचालन क्षमता बढ़ाने में साझेदार देशों की मदद मिल सकती है.’’
एशिया-प्रशांत लीडरशिप नेटवर्क के सीनियर रिसर्च एडवाइजर फ्रैंक ओ’डोनेल अलबत्ता आगाह करते हैं, ''ये (जीसीएपी और एफसीएएस) लंबे वक्त के टे्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए भले उपयोगी हों लेकिन कोई भी अभी प्रमाणित प्लेटफॉर्म नहीं हैं.’’
उनका कहना है कि भारत का ध्यान प्रमाणित प्लेटफॉर्म शामिल करने की तत्काल जरूरत से भटकना नहीं चाहिए. फरवरी में रक्षा खरीद परिषद से मंजूर 114 राफेल 'विशेष प्राथमिकता’ होनी चाहिए.
ऐसे में भारत के लिए छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान की तलाश का सही रास्ता यही है कि दोनों में वह प्रोजेक्ट चुने जो उसके स्वदेशी एएमसीए कार्यक्रम और दूसरी रक्षा परियोजनाओं की जगह लेने के बजाय उनमें इजाफा कर सके.

