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कितनी धुंधली है यह स्क्रीन!

मूल्यांकन को आधुनिक बनाने के मकसद से डिजाइन किया गया केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) का ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम गलत उत्तर शीट और अनाप-शनाप अंकों को लेकर विवादों में घिर गया है

ओएसएम की 'गड़बड़ियों' के खिलाफ दिल्ली में 28 मई को सीबीएसई दफ्तर के बाहर एनएसयूआइ का प्रदर्शन
अपडेटेड 15 जून , 2026

आखिर केंद्र सरकार ने दो जून को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्त को तुरंत प्रभाव से हटा दिया. लिहाजा बोर्ड के नए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम का विवाद अब सिर्फ नतीजों को लेकर की गई शिकायत का मसला नहीं रह गया, बल्कि प्रशासनिक संकट बन चुका है.

कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के 2001 बैच के आइएएस अधिकारी लोखंडे प्रशांत सीताराम को नया चेयरमैन और भारतीय सूचना सेवा के वरुण भारद्वाज को सचिव नियुक्त किया. गुप्त को उनके मूल काडर में प्रशासनिक आधार पर वापस भेज दिया गया है और दिसंबर 2030 तक किसी भी दूसरे केंद्रीय पद पर नियुक्ति से रोक दिया गया है.

इससे वे इस पूरी गड़बड़ी के लिए सबसे बड़े प्रशासनिक शिकार बन गए हैं, भले 28 मई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसकी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की हो. कैबिनेट सचिवालय ने अब क्षमता निर्माण आयोग की प्रमुख एस. राधा चौहान की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है, जो ओएसएम सिस्टम की खरीद की जांच करेगी और एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी.

फटाफट का फंडा
उधर, जो छात्र अपने अंकों से संतुष्ट नहीं, वे पुनर्मूल्यांकन के लिए जुट गए. इसके लिए दो से छह जून तक विंडो खोली गई थी. दूसरी ओर, मूल्यांकन के ज्यादा तेज और पारदर्शी सिस्टम के तौर पर पेश किए गए ओएसएम को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है.

ओएसएम का मकसद आधुनिकीकरण की दिशा में बढ़ाया गया कदम था. छात्र सवालों के जवाब तो कलम से ही कागज पर लिखते हैं लेकिन मूल्यांकन का तरीका बदल दिया गया. उत्तर पुस्तिका को क्षेत्रीय कार्यालयों में स्कैन किया गया, एक पोर्टल पर अपलोड किया गया, और फिर परीक्षकों ने स्क्रीन पर हर जवाब का मूल्यांकन किया और अंक दिए, जबकि कुल अंकों की गणना सिस्टम में अपने आप हुई.

सीबीएसई ने फरवरी में उसे लागू करने का ऐलान किया तो 10 फायदे गिनाए गए और इस सिस्टम को ''पर्यावरण के लिहाज से टिकाऊ डिजिटल मूल्यांकन'' प्रक्रिया बताया गया था. बिट्स पिलानी के ग्रुप वाइस-चांसलर प्रोफेसर वी. रामगोपाल राव कहते हैं, ''आइडिया तो सही है और वैश्विक रुझानों के अनुरूप है पर समस्या अमल में है.''

शिक्षकों ने परामर्श बैठकों के दौरान इस सिस्टम की खामियों की ओर पहले ही ध्यान दिलाया था. जैसे मॉडरेशन की कमी, नतीजों में गिरावट, अप्रशिक्षित मूल्यांकनकर्ता और कमजोर डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर वगैरह. उनकी ये चेतावनियां बिल्कुल सही साबित हुईं. जून 2025 में हुई सीबीएसई की गवर्निंग बॉडी की बैठक में साफ-साफ सुझाव दिया गया था कि ओएसएम को तभी लागू किया जाए, जब कुछ क्षेत्रों में कुछ विषयों में उसका पायलट प्रोजेक्ट सफल रहे. लेकिन उस सलाह को अनदेखा कर दिया गया.

उसके बजाय, सीबीएसई ने जनवरी में दिल्ली के सिर्फ पांच स्कूलों के साथ तीन दिन का ड्राइ रन (अभ्यास) किया. यहां तक कि ड्राइ रन में शामिल लोगों ने पहले ही दिन दर्जनों कमियां दर्ज कराई थीं. तीसरे दिन दूसरी रिपोर्ट में कम से कम 36 चिंताजनक खामियों का जिक्र था.

गाजियाबाद में श्री राम यूनिवर्सल स्कूल की डायरेक्टर और दिल्ली के जीके-2 में के.आर. मंगलम वर्ल्ड स्कूल की डायरेक्टर-प्रिंसिपल ज्योति गुप्ता का कहना है कि तरीका ही गलत था. उनकी राय में, ''पहले एक या अधिक इलाकों में पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाता, और फिर उसे पूरे देश में लागू किया जाता.'' वे आगे बताती हैं कि ज्यादातर मूल्यांकनकर्ताओं को मूल्यांकन के पहले दिन ही केंद्रों पर ट्रेनिंग दी गई थी.

नतीजे जैसे ही 13 मई को घोषित हुए, फौरन गड़बड़ियां सामने आने लगीं. जिन छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन कॉपी मांगी, उनके पन्ने पढ़ने लायक नहीं थे, शीटें गायब थीं, अंकों के जोड़ गलत थे. और बहुतों को ऐसी उत्तर पुस्तिकाएं मिलीं, जो उनकी थीं ही नहीं. उनमें दिल्ली के छात्र वेदांत श्रीवास्तव भी थे; उन्हें दूसरे विषयों में 80 और 90 की लपेट में अंक मिले थे, लेकिन भौतिक शास्त्र में अंक अजीब ढंग से बेहद कम थे.

शिकायत दर्ज करने का कोई साफ जरिया न मिला, तो उन्होंने अपनी शिकायत सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी. उन्हें लोगों का भारी समर्थन भी मिला तो कुछ जलालत भी झेलनी पड़ी. बाद में सीबीएसई ने उनकी उत्तर पुस्तिका की समीक्षा की और भौतिक शास्त्र में उनके अंकों को संशोधित करके 74 कर दिया. लेकिन वेदांत अब भी संतुष्ट नहीं. वे पुनर्मूल्यांकन का इंतजार कर रहे हैं. उनका मामला पहला स्पष्ट सबूत बन गया कि छात्रों को किसी और की उत्तर पुस्तिका पर अंक दिए जाने की शिकायतें बिल्कुल सही हैं.

मई के आखिर तक लगभग 2,94,000 छात्रों ने 8,56,000 उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन की हुई कॉपी मांगी. यह संख्या पिछले साल के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा थी. बोर्ड ने आखिरकार स्वीकार किया कि लगभग 20 मामलों में उत्तर पुस्तिकाओं की अदला-बदली हो गई थी. बोर्ड ने बताया कि कुल 98 लाख उत्तर पुस्तिकाओं में करीब 68,000 उत्तर पुस्तिकाओं को दोबारा स्कैन करना पड़ा, और 13,000 से ज्यादा उत्तर पुस्तिकाएं ऐसी थीं जिन्हें दोबारा स्कैन करने के बाद भी पढ़ा नहीं जा सका, इसलिए उनका मूल्यांकन परीक्षकों से कराना पड़ा. जब पुनर्मूल्यांकन के लिए पोर्टल खोला गया, तो वह बार-बार क्रैश होता रहा.

निविदा का गड़बड़झाला

हालांकि फरवरी में सीबीएसई ने यह नहीं बताया कि ओएसएम को हड़बड़ी में अमल में लाने की वजह क्या थी. इसका ठेका तो महज 66 दिन पहले ही पांच दिसंबर 2025 को हैदराबाद की कंपनी कोएम्प्ट एडुटेक को दिया गया था. वह भी बेहतर टेक्नोलॉजी देखकर नहीं, बल्कि कीमत के आधार पर. कंपनी ने हर बुकलेट के लिए लगभग 25.75 रुपए की कीमत बताई थी, जबकि टेक्नोलॉजी के मामले में अव्वल दूसरी बोली लगाने वाली टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने 65 रुपए की कीमत बताई थी.

कोएम्प्ट का अतीत भी सवालों के घेरे में है. इस कंपनी का नाम पहले ग्लोबरेना टेक्नोलॉजीज था, जो 2019 में तेलंगाना इंटरमीडिएट परीक्षा के नतीजों में हुई भारी घपलों-घोटालों के लिए जिम्मेदार थी. उस वक्त 9,74,000 छात्रों में से 3,80,000 से ज्यादा फेल हो गए थे और 20 से ज्यादा छात्रों ने खुदकुशी कर ली थी. सीबीएसई के अधिकारियों ने बचाव में कहा कि यह कंपनी तेलंगाना, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में डिजिटल मूल्यांकन का काम करती है, उसे कभी भी ब्लैकलिस्ट नहीं किया गया, और उसने सबसे कम कीमत पर बोली लगाई.

आखिरकार 17 साल के एक छात्र ने इस बचाव को ही सवाल में बदल दिया. खामियाजा झेल रहे 17 लाख छात्रों में से एक, झारखंड के 12वीं के छात्र सार्थक सिद्धांत ने पब्लिक प्रोक्योरमेंट पोर्टल से सीबीएसई के टेंडर से जुड़े रिकॉर्ड खंगाले और पता लगाया कि तीन अलग-अलग चरणों में टेंडर की शर्तें बदली गईं. अपने एक विस्तृत ब्लॉग में उसने आरोप लगाया कि बोर्ड ने पात्रता और तकनीकी मानदंडों को बार-बार उस समय तक बदला, जब तक कि कोएम्प्ट उन मानदंडों को पूरा करने लायक न बन गई. सार्थक दो जून को एक संसदीय प्रवर समिति के बुलावे पर पेश हुए और अपनी जांच के नतीजे सौंपे. यह किसी नाबालिग छात्र के लिए असाधारण अवसर था.

कैसे होती है ऑन-स्क्रीन मार्किंग
इस डिजिटल मूल्यांकन पद्घति में उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन किया जाता है और एक सुरक्षित ऑनलाइन पोर्टल में अपलोड किया जाता है, जहां परीक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर उसे जांचते और अंक देते हैं. कुल अंकों की गणना सिस्टम खुद कर लेता है

छात्र कलम से कॉपी में उत्तर लिखते हैं

उत्तर पुस्तिका सीबीएसई के क्षेत्रीय कार्यालय में पहुंचती है

नॉन-डिस्ट्रक्टिव बुक या लैंप स्कैनर के जरिए उन्हें स्कैन किया जाता है

स्कैन की गुणवत्ता की जांच होती है, अगर कॉपी धुंधली है या साफ पढ़ने में नहीं आती तो मूल्यांकनकर्ता उसे खारिज कर देता है (देखें नं. 5)

स्कैन की गई इमेज मूल्यांकन पोर्टल पर अपलोड की जाती है

परीक्षक स्क्रीन पर उत्तरों को जांचते हैं और अंक देते हैं. कुल अंक सिस्टम खुद जोड़ लेता है और उसके आधार पर रिजल्ट तैयार होता है

जिम्मेदारी किसकी

सीबीएसई और कोएम्प्ट ने आरोपों से इनकार किया. अब सवाल यह है कि क्या टेंडर में किए गए बदलाव किसी खास बोली लगाने वाले को फायदा पहुंचाने की कोशिशें थीं, या फिर प्रक्रिया के दौरान किए गए सामान्य बदलाव थे. यह तो चौहान समिति की जांच ही बताएगी.

राव कहते हैं, ''मूल्यांकन में करीब से जुड़े लोग प्रशासकों या टेक्नोलॉजी वेंडरों की तुलना में समस्याओं को कहीं पहले पकड़ लेते हैं.'' फिर भी उस फीडबैक से बदलाव शायद ही कभी किया जाता है. नोएडा के कैंब्रिज स्कूल की प्रिंसिपल सुरभि भार्गव कहती हैं, ''परीक्षकों को सिर्फ सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग नहीं दी जानी चाहिए. उनके फीडबैक के आधार पर सिस्टम में बदलाव करना चाहिए.''

टेक्नोलॉजी वालों की जिम्मेदारी है कि प्लेटफार्म भरोसेमंद और सुरक्षित हो. बोर्ड की जिम्मेदारी है कि वह निगरानी और शिकायतों का निबटारा करे. नीति बनाने वालों की जिम्मेदारी है कि किसी सिस्टम को लॉन्च करने से पहले वे जरूरी सुरक्षा उपाय करें. 

अब जांच से ही पता चलेगा कि ओएसएम का पूरा मामला महज हड़बड़ी में हुई लापरवाही का नतीजा था या फिर उससे कुछ बड़ा? पर कई छात्रों के लिए तो फैसला पहले ही आ चुका है: मूल्यांकन ज्यादा भरोसेमंद बनाने को लाए गए सिस्टम ने उन्हें सही रिजल्ट पाने की लड़ाई में लगा दिया.

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