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ग्रोथ की लहरों पर सवार

टैक्स कटौती, जीएसटी में राहत और ब्याज दरें घटने से खपत बढ़ी और ग्रोथ ऊपर चढ़ी. ऐसे में अर्थव्यवस्था को लेकर जन भावना उम्मीदों से भरी. महंगाई दर भी कम है यानी गोल्डीलॉक मोमेंट (ग्रोथ ज्यादा, महंगाई कम) बना हुआ है. लेकिन रोजगार के मोर्चे पर अब भी काले बादल मंडरा रहे.

Mood of the Nation poll : economy
दिल्ली के नेक्सस सेलेक्ट सिटीवॉक मॉल में ग्राहकों की भीड़
अपडेटेड 17 फ़रवरी , 2026

नए साल के आगाज के साथ ही भारत वृद्धि या ग्रोथ की राह पर मजबूती से आगे बढ़ता लग रहा है. 2025 में कई वजहों—महंगाई में नरमी, माल और सेवा कर (जीएसटी) में कमी और प्रत्यक्ष करों में कटौती—ने खपत को बढ़ावा दिया है. लिहाजा, मौजूदा वित्त वर्ष 26 की दूसरी तिमाही में 8.2 फीसद की ग्रोथ दर्ज की गई. यह न केवल पहली तिमाही में दर्ज 7.2 फीसद की वृद्धि दर से ज्यादा है, बल्कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) समेत कई एजेंसियों की उम्मीदों से भी ज्यादा है.

हालांकि, यह सवाल बना हुआ है कि क्या ये आंकड़े वाकई अर्थव्यवस्था की पूरी असलियत बताते हैं, फिर भी उम्मीद की वजह है. केंद्र सरकार अब वित्त वर्ष 26 के लिए 7.4 फीसद की ग्रोथ का अनुमान लगा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि दूसरी तिमाही में बनी विकास की रफ्तार—अगर कोई अनहोनी न हो तो—आगे भी बनी रहेगी. चौंकाने वाली घटनाएं, खासकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासन में अमेरिकी नीति में बदलाव, मजबूत ग्रोथ और कम महंगाई के इस 'गोल्डीलॉक मूमेंट’ का जायका बिगाड़ सकती हैं.

इंडिया टुडे का नवीनतम देश का मिज़ाज सर्वेक्षण इस आशावाद को दिखाता है. मोदी सरकार के अर्थव्यवस्था को संभालने के बारे में पूछे जाने पर 48.8 फीसद उत्तरदाताओं ने इसे 'अच्छा’ या 'शानदार’ बताया, जो अगस्त 2025 से थोड़ा ज्यादा है. इसे 'खराब’ या 'बहुत खराब’ बताने वालों की संख्या 30.2 फीसद से घटकर 28.6 फीसद रह गई. यह बदलाव आगामी छह महीनों की उम्मीदों में भी दिखता है, जिसमें 35.8 फीसद लोग आर्थिक सुधार की आस देख रहे हैं, जो पहले के 33.1 फीसद से ज्यादा है.

वृद्धि पर अपनी कमान
ताजा देश का मिज़ाज सर्वे में 53.5 फीसद लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिवंगत पीएम मनमोहन सिंह की तुलना में अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से संभाला है, यह आंकड़ा अगस्त 2025 के 44.6 फीसद से ज्यादा है. लगभग 35 फीसद लोगों ने 2014 से अपनी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति में सुधार की बात कही है, जो पहले के 33.1 फीसद से थोड़ा ज्यादा है. फिर भी, 31.6 फीसद लोग—हालांकि यह अगस्त 2025 के 33.7 फीसद से कम है—कहते हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति खराब हुई है, जिससे ग्रोथ को और ज्यादा समावेशी बनाने की जरूरत जाहिर होती है.

2025 में दो प्रमुख कदम उठाए गए जिनका मकसद लोगों के हाथों में ज्यादा पैसा पहुंचाना था. प्रत्यक्ष कर के स्लैब में बदलाव का मतलब था कि 12 लाख रुपए तक कमाने वालों (वेतनभोगी करदाताओं के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद 12.75 लाख रुपए) को कोई आयकर नहीं देना पड़ा, जिससे करीब 3.2 करोड़ करदाताओं को फायदा हुआ. सितंबर के आखिर में जीएसटी में बदलाव से 90 फीसद जरूरी सामान पर टैक्स घट गया. इन कदमों को रिजर्व बैंक के कदमों से भी मजबूती मिली, जिसने 2025 में ब्याज दरों में 125 आधार अंक की कटौती की—जो 2019 के बाद से सबसे बड़ी मौद्रिक नरमी थी.

सर्वे से पता चलता है कि ग्रोथ के फायदे लोगों तक पहुंचने के बारे में सोच में थोड़ा बदलाव आया है. लगभग 28 फीसद लोगों का कहना है कि फायदे आम आदमी तक बड़े पैमाने पर पहुंच रहे हैं, यह आंकड़ा पिछले सर्वे में 26.3 फीसद था. अन्य 19.5 फीसद को लगता है कि मध्य वर्ग को ही मुख्य रूप से फायदा हुआ है. फिर भी, 39.6 फीसद का मानना है कि सरकारी नीतियों से सिर्फ अमीरों को लाभ होता है, हालांकि यह राय पहले के 42.5 फीसद से कम है.

एक बड़े हिस्से (53 फीसद) को अभी भी लगता है कि केंद्र की आर्थिक नीतियों से बड़े कारोबारों को फायदा होता है. अलबत्ता यह पहले के 55.8 फीसद से कम है, लेकिन अगस्त 2022 से हर देश का मिज़ाज सर्वे में यह आंकड़ा 50 फीसद से ऊपर रहा है. बड़े कारोबारियों और सरकार के बीच कथित साठगांठ को लेकर कांग्रेस के बार-बार के हमलों से यह धारणा और मजबूत हुई है.

2025 में ज्यादातर वक्त महंगाई रिजर्व बैंक के लक्षित दायरे (2-4 फीसद) के निचले सिरे के करीब ही रही, क्योंकि खाने-पीने की चीजों के दाम नरम पड़ गए. फिर भी, बढ़ते घरेलू खर्चों को लेकर चिंताएं बरकरार हैं—63.2 फीसद लोगों का कहना है कि मौजूदा खर्चों को मैनेज करना मुश्किल है, यह पिछले सर्वे के 60.6 फीसद से ज्यादा है.

अन्य 27.9 फीसद लोगों का मानना है कि खर्च बढ़े हैं लेकिन मैनेज किए जा सकते हैं. 48.9 फीसद उत्तरदाताओं का कहना है कि जीएसटी घटने से उनके उपभोग व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है, जबकि सिर्फ 22.6 फीसद लोगों ने कहा कि वे ज्यादा खर्च कर रहे हैं. इससे संकेत मिलता है कि खरीदारी का तरीका बदलने से पहले कीमतों में टिकाऊ गिरावट का इंतजार कर रहे हैं उपभोक्ता.

रोजगार की चुनौती
सर्वेक्षण में नौकरियों को लेकर लगातार चिंता की बात सामने आई है. तीसरा कार्यकाल हासिल करने के बाद, मोदी सरकार ने जुलाई 2024 में पांच योजनाओं का एक प्रधानमंत्री पैकेज घोषित किया, जिसका मकसद पांच साल में 4.1 करोड़ युवाओं के लिए रोजगार, कौशल और अवसर पैदा करना था और इसके लिए केंद्र ने 2 लाख करोड़ रुपए का बजट रखा था. यह योजना पूरी गंभीरता के साथ बनाई गई थी, लेकिन अमल धीमा रहा है.

कुल 64.8 फीसद उत्तरदाता अभी भी बेरोजगारी की स्थिति को 'गंभीर’ या 'बहुत गंभीर’ मानते हैं. हालांकि यह पहले के 71.5 फीसद से कम है. लगभग 53 फीसद लोगों का कहना है कि सरकारी उपायों से 'कई’ या 'कुछ’ नौकरियां पैदा हुई हैं, जबकि 41.1 फीसद उन्हें मददगार नहीं मानते हैं, इससे जाहिर है कि इन पर मजबूती से अमल की जरूरत है. इस बीच, सरकारी नौकरियों का आकर्षण बना हुआ है, 42.2 फीसद लोग उन्हें पसंद करते हैं, हालांकि यह आंकड़ा पिछले सर्वे के 48.5 फीसद से कम है. 

भारत में बिजनेस शुरू करना और चलाना मुश्किल काम है, ऐसा 52.5 फीसद लोगों का कहना है, जो पिछले आंकड़े 53.5 फीसद से थोड़ा कम है. लगभग 29.7 फीसद लोगों का कहना है कि मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसी पहलकदमियों ने उनकी जिंदगी पर 'काफी’ असर डाला है, जबकि 26.5 फीसद लोगों को 'कोई वास्तविक असर’ नजर नहीं आया, 11.6 फीसद लोगों का कहना है कि उनकी स्थिति 'और खराब’ हो गई है.

दिल्ली के आइकिया स्टोर में मौजूद कस्टमर

करीब 45.7 फीसद लोगों का मानना है कि सरकार ने छोटे बिजनेस और स्टार्ट-अप को काफी सहारा दिया है, जो पिछले सर्वे के 41.5 फीसद से ज्यादा है. लेकिन 44 फीसद लोग ऐसा नहीं सोचते. रिजर्व बैंक के ब्याज दरों में भारी कटौती करने के बावजूद, 42 फीसद लोग कर्ज को अभी भी 'महंगा’ मानते हैं, और 51.8 फीसद लोग नौकरशाही को आर्थिक वृद्धि में अड़चन मानते हैं, जो अगस्त 2025 के 48.3 फीसद से ज्यादा है.

आर्थिक चिंताएं खेती से जुड़े लोगों तक पसरी हुई हैं. बहुत बड़ी संख्या (85.6 फीसद) चाहती है कि सरकार कृषि उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी दे.

हाल की तिमाहियों से संकेत मिलता है कि भारत ने कुछ प्रगति की है, लेकिन इसे बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा. फरवरी में जीडीपी में संशोधन होना है, जिसमें आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया जाएगा, जिससे ज्यादा—या बेहतर—आंकड़े मिल सकते हैं. दिलचस्प यह है कि 58.4 फीसद उत्तरदाताओं को आधिकारिक आर्थिक डेटा 'बहुत’ या 'कुछ हद तक’ विश्वसनीय लगते हैं. किसी भी स्थिति में, सरकार का काम तय है: वृद्धि को बनाए रखने के लिए सुधारों को आगे बढ़ाना.

56 फीसद ऊंची आय वाले लोगों का मानना है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां बड़े कारोबारों की पैरोकार हैं जबकि निम्न आय वर्ग के 50 फीसद लोग इस तरह की राय रखते हैं

42 फीसद पूर्वोत्तर के प्रतिभागियों की राय में मोदी सरकार ने बड़े पैमाने पर नौकरियां सृजित कीं जबकि पूर्व के 45 फीसद और उत्तर के 43 फीसद का मानना था कि ऐसा नहीं हुआ.

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