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बड़े बाजार पर सबसे बड़ा दांव

दो दशकों की बातचीत के बाद भारत और यूरोपीय संघ ने अपना अब तक का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता किया है. इससे दोनों तरफ बाजार पहुंच, गतिशीलता और सप्लाई चेन में आएगा बदलाव

27 जनवरी को PM मोदी दिल्ली में EU अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा EC अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेएन के साथ.
अपडेटेड 12 फ़रवरी , 2026

भारत ने दुनिया की बदलती व्यापार व्यवस्था में अब तक का सबसे बड़ा दांव खेला है. लगभग दो दशकों की बातचीत के बाद भारत और यूरोपीय संघ—जो एक-दूसरे के सबसे बड़े कारोबारी साझेदार हैं—ने 27 जनवरी को एक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर अपनी वार्ता को ठोस अंजाम पर पहुंचा दिया. दोनों के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा समझौता है. इसका समय बहुत कुछ कहता है: यह ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध तनावपूर्ण हैं और दोतरफा बातचीत में कोई जल्दी दिख ही नहीं रही.

2024-25 में 27 देशों वाले यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ भारत का वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार 11.5 लाख करोड़ रुपए था, जिसमें 6.4 लाख करोड़ रुपए का निर्यात और 5.1 लाख करोड़ रुपए का आयात शामिल था. 2024 में सेवाओं का व्यापार 7.2 लाख करोड़ रुपए था. भारत और ईयू मिलकर दुनिया के जीडीपी का 25 फीसद और व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा हैं. केंद्र सरकार ने दावा किया कि एक-दूसरे की पूरक दो अर्थव्यवस्थाओं के जुड़ने से व्यापार और निवेश के अभूतपूर्व अवसर पैदा होंगे.

यह संयुक्त घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेएन ने नई दिल्ली में 16वें भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान की. केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि 16 दौर की बातचीत के बाद हुआ यह समझौता ''मानवता के एक-तिहाई हिस्से की साझा समृद्धि के लिए गहरी साझेदारी का एक करार है.''

करार का आकार

भारत-ईयू व्यापार समझौते में सामान और सेवाएं, व्यापार उपाय, उद्गम स्थल के नियम, सीमा शुल्क और व्यापार सुविधा जैसे पारंपरिक क्षेत्र तो शामिल हैं ही, छोटे-मझोले उद्यम और डिजिटल कारोबार समेत नए क्षेत्रों को भी इसके दायरे में लिया गया है. इस समझौते से मूल्य के हिसाब से ईयू को होने वाले भारत के 99 फीसदी से ज्यादा निर्यात को बाजार पहुंच मिलेगी. सामान के अलावा, सेवाओं में हाइ-वैल्यू के वादे किए गए हैं. इसके लिए व्यापक गतिशील ढांचा होगा जो कुशल भारतीय पेशेवरों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाएगा.

इसे 'सभी सौदों की जननी' बताते हुए वॉन डेर लेएन ने कहा, ''हमने दो अरब लोगों का एक मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाया है, जिसमें दोनों पक्षों को आर्थिक रूप से फायदा होगा.'' इस सौदे से 2032 तक भारत में ईयू के सामान का निर्यात दोगुना हो जाने की उम्मीद है क्योंकि भारत आने वाले ईयू के सामान निर्यात के 96.6 फीसदी मूल्य पर टैरिफ खत्म या कम हो जाएंगे.

उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर, टैरिफ में कटौती से यूरोपीय उत्पादों पर शुल्क में प्रति वर्ष लगभग 4 अरब यूरो (50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा) की बचत होगी. व्यापार नीति विशेषज्ञ विश्वजीत धर कहते हैं, ''आज मौजूद नीतिगत अनिश्चितताओं के कारण भारत और ईयू दोनों अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं.'' ईयू का भारत के साथ व्यापार घाटा है.

इससे कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते-चप्पल, समुद्री उत्पाद, रत्न-आभूषण, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान और ऑटोमोबाइल सरीखे भारत के श्रम बहुल उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि लगभग 33 अरब डॉलर (3 लाख करोड़ रुपए) के निर्यात पर टैरिफ शून्य कर दिया गया है (देखें: भारत को क्या फायदा). केंद्र सरकार ने कहा कि कोटा-आधारित ऑटो उदारीकरण पैकेज से ईयू के ऑटो निर्माताओं को न केवल भारत में महंगे सेग्मेंट में अपने मॉडल लाने की सुविधा मिलेगी, बल्कि भविष्य में मेक इन इंडिया और भारत से निर्यात की संभावनाओं की राह भी खुलेगी.

यह समझौता भारतीय किसानों और कृषि उद्यमों के लिए भी बराबरी के अवसर पैदा कर सकता है. इसके अलावा, ईयू के 144 सब-सेक्टरों तक भारत को पहुंच मिलेगी. इन सेक्टर्स में आइटी और आइटी से जुड़ी सेवाएं और प्रोफेशनल सेवाएं शामिल हैं. लिहाजा, भारतीय सेवा प्रदाताओं को प्रोत्साहन मिलेगा और वे यूरोपीय ग्राहकों को विश्व स्तरीय सेवाएं दे पाएंगे.

शर्तें भी लागू

विशेषज्ञों का कहना है कि ईयू की शुल्क से इतर वाली बाधाओं से भारत के लिए यह समझौता मुश्किलें भी खड़ी कर सकता है. धर कहते हैं, ''99 फीसदी टैरिफ हटाने का लाभ कोई मुफ्त में नहीं मिलने वाला, इसमें शर्तें होंगी.'' मसलन, ईयू के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म से भारतीय कंपनियों की उत्पादन लागत में बढ़ोतरी हो सकती है, क्योंकि इसके तहत स्टील, सीमेंट और फर्टिलाइजर जैसी वस्तुओं के उत्पादन के दौरान निकलने वाले कार्बन पर टैक्स लगता है.

श्रम मानक भी अड़चन बन सकते हैं. धर कहते हैं, ''भारत ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के दो बड़े श्रम कानूनों को मंजूरी नहीं दी है. हमारी लचीली श्रम संहिता शायद ईयू के हिस्सेदारों को पसंद न आए.'' साथ ही यह भी कि सरकार और कारोबारों को इस करार के तहत ईयू से आने वाले सामान और सेवाओं के लिए तैयार रहना चाहिए.

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