भारत सरकार ने जब 2021 में नैनो यूरिया लॉन्च किया तो उस वक्त से सरकार ने लगातार यह बात दोहराई कि बहुत जल्दी देश यूरिया के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल कर लेगा. मगर इस सीजन में यूरिया खपत के आंकड़ों से पता चलता है कि आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अभी काफी दूर है. देश को अपनी यूरिया जरूरतों को पूरा करने के लिए अब भी आयात पर निर्भर रहना पड़ रहा है.
दरअसल, देश के कृषि क्षेत्र में खाद के लिहाज से सबसे ज्यादा यूरिया का ही इस्तेमाल होता है. भारत में यूरिया की सालाना खपत तकरीबन 350 लाख टन है. केंद्र सरकार ने छह साल पहले यूरिया आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए कोशिशें शुरू कीं तो उस वक्त करीब 100 लाख टन यूरिया का आयात होता था.
सरकार ने आत्मनिर्भर भारत मिशन के तहत काम शुरू किया. एक ओर नए यूरिया कारखाने लगाए गए, वहीं बंद बड़े यूरिया कारखानों को फिर शुरू किया गया. नैनो यूरिया लॉन्च करके भी यूरिया के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की कोशिश की गई.
ऐसे में सरकार की योजना के मुताबिक, यूरिया का आयात 2025 के अंत तक बंद हो जाना चाहिए था. मगर ऐसा नहीं हुआ. यूरिया उत्पादन, खपत और आयात से जुड़े हाल के आंकड़े अलग ही कहानी कहते हैं. अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच घरेलू यूरिया उत्पादन में करीब चार फीसद की कमी आई, जबकि आयात में 120 फीसद की वृद्धि हुई.
आखिर घरेलू उत्पादन कम क्यों हुआ? केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ''हाल के वर्षों में शुरू यूरिया प्लांट्स में ज्यादातर अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे. कुछ प्लांट पिछले साल कई दिनों तक बंद रहे. उन्होंने मंत्रालय को इसकी वजह तकनीकी बताई है. गैस की सप्लाइ भी एक समस्या है. ऐसे में हमने उत्पादन में वृद्धि का जो प्रोजेक्शन उनकी क्षमताओं के हिसाब से लगाया था, वह पूरी तरह बेपटरी हो गई है. इस वजह से हमारी आयात निर्भरता खत्म नहीं हो पा रही.''
केंद्र सरकार को नैनो यूरिया का उपयोग बढ़ने की भी उम्मीद थी. मगर किसानों ने इसे अपेक्षा के अनुरूप नहीं अपनाया. उक्त अधिकारी कहते हैं, ''सभी कंपनियों को मिला दें तो हमारी उत्पादन क्षमता 20 करोड़ बोतल से ज्यादा की है मगर इसके मुकाबले खपत काफी कम है. ऐसे में कंपनियां भी अपनी क्षमता से काफी कम उत्पादन कर रही हैं.''
अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच घरेलू यूरिया उत्पादन करीब 197 लाख टन रहा. यह 2024 में इसी अवधि के मुकाबले करीब चार फीसद कम है. 2024 में अप्रैल से नवंबर के दौरान भारत ने करीब 32 लाख टन यूरिया का आयात किया. 2025 में इसी अवधि में यह आयात करीब 120 फीसद बढ़कर लगभग 72 लाख टन पहुंच गया. उर्वरक मंत्रालय के अधिकारी बताते हैं कि चालू वित्त वर्ष में अगर यूरिया आयात बढ़कर एक करोड़ टन के पार पहुंच जाए तो कोई हैरानी नहीं. 2024-25 में कुल यूरिया आयात करीब 58 लाख टन था. 2025-26 के सिर्फ सात महीने में आयात का यह आंकड़ा पार हो गया.
एक प्रमुख उर्वरक कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''2025 में मॉनसून बहुत अच्छा रहा. इससे खरीफ सीजन में यूरिया की मांग बढ़ी और खपत चार लाख टन से ज्यादा बढ़ गई. यूरिया का स्टॉक बढ़ाना पड़ा. रबी सीजन में खाद की किल्लत न हो, सो हमने स्टॉक बढ़ाया और हमें यूरिया का भी आयात करना पड़ा. सरकार ने उर्वरक कंपनियों के साथ मिलकर रबी सीजन के लिए करीब 49 लाख टन के बफर स्टॉक को अक्तूबर अंत तक करीब 69 लाख टन कर दिया. 2025 के दिसंबर में जितने उर्वरकों की बिक्री हुई, उतना इसके पहले के दिसंबर में नहीं हुई थी.''
ऐसे में, आत्मनिर्भरता के लिए आगे की राह क्या है? देश के एक प्रमुख उर्वरक कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''इसके लिए तीन काम करने होंगे. पहला यह कि यूरिया प्रोडक्शन प्लांट्स का आधुनिकीकरण करना होगा ताकि कोई गंभीर तकनीकी खामी न आए और ये पूरी क्षमता के साथ काम करें. दूसरा, इन प्लांट्स में गैस की आपूर्ति बाधित न हो. तीसरा, नैनो यूरिया के प्रति किसानों का रुझान बढ़ाने के लिए सघन जागरूकता अभियान चलाना होगा.''

