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सियासी सूरमा की विदाई

तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद अजित पवार महाराष्ट्र में सबसे लंबे समय से सेवारत उपमुख्यमंत्री थे, मगर उनकी असामयिक मौत ने सियासी तबके को सकते में डाल दिया

अजित पवार (फाइल फोटो)
अपडेटेड 16 फ़रवरी , 2026

महाराष्ट्र के सबसे लंबे समय से सेवारत उपमुख्यमंत्री थे वे. और मुंबई में राज्य के प्रशासनिक मुख्यालय की छठी मंजिल पर स्थित मुख्यमंत्री के दफ्तर तक लंबी छलांग लगाने की बाट जोह रहे थे. मगर 28 जनवरी की सुबह महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री अजित पवार की 66 वर्ष की उम्र में पुणे के बारामती में विमान हादसे में मौत हो गई और हर कोई सन्न रह गया.

वे जिला परिषद के चुनाव में प्रचार करने के लिए मुंबई से बारामती जा रहे थे. उनका यह अंत अप्रत्याशित था, वह भी ऐसे वक्त जब उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और उनके चाचा शरद पवार की अगुआई वाली उनकी प्रतिद्वंद्वी एनसीपी (शरदचंद्र पवार) विलय के लिए करीब आते बताए जा रहे थे.

शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव पवार और आशाताई के घर 22 जुलाई, 1959 को जन्मे अजित बारामती तालुके के काठेवाड़ी गांव में पले-बढ़े. उन्होंने 1980 के दशक तक परिवार के खेत और मुर्गीपालन का कारोबार संभाला. उन्होंने 1980-90 के दशकों में महाराष्ट्र में बड़ी ताकत रही शेतकरी संगठन के लिए काम किया, जिसकी अगुआई उदारवादी किसान नेता शरद जोशी करते थे. अजित ने साल 1985 में उस वक्त के मंत्री डॉ. पद्मसिंह पाटील की सौतेली बहन सुनेत्रा से शादी की.

चुनावी राजनीति में अजित का प्रवेश परिवार की अंदरूनी टूट के कारण हुआ. 1991 के लोकसभा चुनाव में बारामती की सीट खाली थी. शरद पवार के बड़े भाई दिनकरराव, जो अपने भाई के मार्गदर्शक थे और निर्वाचन क्षेत्र प्रबंधक थे, चुनाव लड़ना चाहते थे, मगर छींका टूटकर 32 वर्षीय पवार की झोली में गिरा. अलबत्ता दिल्ली में उनका कार्यकाल छोटा रहा. उन्हें अपनी सीट शरद पवार के लिए खाली करनी पड़ी, और उन्हें बारामती विधानसभा क्षेत्र से चुना गया, जिसकी नुमाइंदगी वे अपनी मृत्यु तक करते रहे. अजित को उनके चाचा के सियासी वारिस के तौर पर देखा जाता था, जब तक कि उनकी चचेरी बहन सुप्रिया सुले राजनीति में नहीं आईं.

जब 2010 में कांग्रेस ने आदर्श हाउसिंग सोसाइटी विवाद के बाद मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण से पृथ्वीराज चव्हाण के लिए कुर्सी खाली करने को कहा गया, तो अजित ने ऊंचा दांव खेला. अपनी ताकत का प्रदर्शन कर उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि छगन भुजबल की जगह उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया जाए. मगर 2010 से 2014 तक उपमुख्यमंत्री पद पर उनका कार्यकाल अनियमितताओं के आरोपों से घिरा रहा.

अब अजित के निधन से एनसीपी में शून्य पैदा हो गया है. उत्तराधिकार की कोई निर्विवाद कतार नहीं होने से मामला और पेचीदा हो जाएगा. भाजपा के एक नेता कहते हैं कि बड़े पवार ज्यादा सक्रिय हो सकते हैं. वहीं, एक विश्लेषक ने कहा कि एनसीपी के दोनों धड़ों के विलय में तेजी आ सकती है, और वह केंद्र में एनडीए में शामिल हो सकती है. उन्होंने कहा, ''कुछ नेता भाजपा या कांग्रेस में जा सकते हैं. मगर ज्यादातर बीच का रास्ता अपनाएंगे और एनसीपी (एससीपी) के साथ जाएंगे क्योंकि इससे उन्हें अपनी स्वतंत्रता बनाए रखते हुए सत्ता में बने रहने में मदद मिलेगी.'' 

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