प्रयागराज के माघ मेले से 28 जनवरी को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का बिना स्नान किए लौट जाना केवल एक धार्मिक घटना नहीं रही. यह मामला आस्था, प्रशासनिक प्रोटोकॉल, सुप्रीम कोर्ट में लंबित विवाद और उत्तर प्रदेश की सियासत के जटिल संगम में बदल गया. 11 दिन के अनशन के बाद मेला परिसर छोड़ते हुए शंकराचार्य ने दावा किया कि इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. इस दावे ने प्रशासन को कठघरे में ला दिया, वहीं सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए असहज सवाल खड़े कर दिए.
विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन हुई, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पालकी और बड़ी संख्या में शिष्यों के साथ संगम स्नान के लिए निकले. संगम नोज पर भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस और मेला प्रशासन ने कथित सुरक्षा कारणों से उन्हें सीमित संख्या में पैदल जाकर स्नान करने की पेशकश की. लेकिन बात नहीं बनी.
संगम नोज वॉच टावर के पास हंगामा हुआ, शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की नौबत आई और आखिरकार शंकराचार्य को बैरंग लौटना पड़ा. इसके बाद सेक्टर-4, त्रिवेणी रोड स्थित अपने शिविर में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अनशन पर बैठ गए. उनका आरोप था कि उन्हें जान-बूझकर रोका गया, जबकि अन्य संतों को प्रोटोकॉल मिला. प्रयागराज मंडल की कमिशनर सौम्या अग्रवाल बताती हैं, ''शंकराचार्य की ओर से स्नान की औपचारिक सूचना नहीं दी गई थी. उन्हें स्नान से नहीं रोका गया, केवल जुलूस की अनुमति नहीं दी गई थी.''
इसी बीच 19 जनवरी को मेला अथॉरिटी का एक नोटिस सामने आया, जिसने विवाद को और संवेदनशील बना दिया. नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक सिविल अपील का हवाला देते हुए पूछा गया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद किस आधार पर खुद को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य बता रहे हैं. नोटिस में कहा गया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अंतिम आदेश नहीं देता, किसी भी धर्माचार्य को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य नहीं माना जा सकता.
मेला परिसर में लगाए गए बोर्ड को भी कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताया गया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के कम्युनिकेशन इंचार्ज संजय पांडे का कहना है कि शंकराचार्य की परंपरा 2,500 साल से ज्यादा पुरानी है, जिसके तहत उत्तराधिकार गुरु तय करता है, न कि अदालत या सरकार. नोटिस के समय पर भी सवाल उठाए गए कि एक महीने से कैंप चल रहा था, लेकिन प्रशासन अचानक इसी मुद्दे पर क्यों जागा.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का व्यक्तित्व और इतिहास इस विवाद को और गहरा बनाता है. सितंबर 2022 में उनके गुरु, द्वारका शारदा और ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उन्हें ज्योतिषपीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया. तभी से यह पद कानूनी और वैचारिक विवादों में है. 1969 में उत्तर प्रदेश के ही प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में जन्मे उमाशंकर उपाध्याय आगे चलकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बने.
गुजरात और काशी में शिक्षा, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की पढ़ाई, और छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका ने उन्हें एक जुझारू संत के रूप में गढ़ा. वे 1990 के दशक में छात्रसंघ अध्यक्ष रहे और संस्कृत संवर्धन के लिए संगठन भी बनाया. वर्ष 2000 में ब्रह्मचारी और 2003 में संन्यास दीक्षा के बाद उन्होंने राम मंदिर, रामसेतु, अविरल गंगा और गोरक्षा जैसे मुद्दों पर आंदोलनों की कमान संभाली.
विवाद उनके जीवन का स्थायी हिस्सा रहे हैं. काशी विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण के दौरान मंदिरों के ध्वस्तीकरण का विरोध, 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने के लिए लंबा अनशन, ज्ञानवापी परिसर में पूजा के ऐलान पर 108 घंटे की भूख हड़ताल, राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में शामिल न होना और अधूरे मंदिर पर सवाल उठाना, ये सभी घटनाएं उनकी छवि को मुखर और टकराव प्रिय संत के रूप में स्थापित करती हैं.
राजनैतिक बयानबाजी ने उन्हें और विवादों में घेरा. वाराणसी में पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ उम्मीदवार उतारने की कोशिश, 2024 के लोकसभा चुनाव में गऊ गठबंधन के तहत उम्मीदवार खड़ा करना, महाराष्ट्र की राजनीति पर टिप्पणी, 'भगवा टेरर' शब्द की आलोचना और योगी सरकार पर तीखे बयान, इन सबके चलते उन्हें भाजपा विरोधी संत के रूप में भी देखा जाने लगा.
जनवरी की 25 तारीख को देर शाम संगमनगरी पहुंचे केशव मौर्य ने शंकराचार्य से अपना अनशन और विरोध समाप्त करने का आग्रह किया था. लेकिन बात नहीं बनी. इसी बीच राष्ट्रीय परशुराम परिषद के संस्थापक और भाजपा नेता सुनील भराला ने प्रयागराज पहुंचकर संत के साथ दुर्व्यवहार की कड़ी आलोचना कर अपनी ही सरकार को निशाने पर ले लिया. बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के शंकराचार्य से दुर्व्यवहार के विरोध में इस्तीफे ने इस पूरे मसले पर ब्राह्मण राजनीति को गरमा दिया है.
लखनऊ के वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषक और शिया कॉलेज के शिक्षक अमित राय कहते हैं, ''यह विवाद भाजपा के भीतर भी द्वंद्व पैदा करता है. एक धड़ा इसे सुरक्षा और कानून का सवाल मानता है, जबकि दूसरा मानता है कि शंकराचार्य जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के साथ सख्ती ने गलत संदेश दिया है.'' विपक्ष ने सरकार पर आस्था के अपमान का आरोप लगाया है.
सपा अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं, ''भाजपा के दंभ ने अनादिकाल से चली आ रही सनातनी परंपरा को तोड़ दिया है...संपूर्ण विश्व का सनातन समाज इससे आहत ही नहीं बल्कि अनिश्चित भय से आशंकित है.'' वहीं भाजपा ने इस पूरे मसले पर चुप्पी साधकर समय के साथ मुद्दे को महत्वहीन होते जाने की रणनीति ही अख्तियार की है. 28 जनवरी को शंकराचार्य का माघ मेला छोड़ना फिलहाल एक अध्याय का अंत जरूर है, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ है.
शंकराचार्य पर उठे सवाल
> आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने उत्तराखंड के जोशीमठ में ज्योतिर्मठ या ज्योतिषपीठ समेत चार दिशाओं में चार मठ स्थापित किए. 18वीं सदी में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी रामकृष्ण तीर्थ बने.
> 1953 में तत्कालीन शंकराचार्य ब्रह्मानंद के निधन के बाद हरिहरानंद सरस्वती ने शंकराचार्य बनने से मना कर दिया. इसके बाद स्वामी कृष्णबोध आश्रम को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया गया. अब एक ही मठ के दो गुट समानांतर गद्दी पर दावा करने लगे.
> 1973 में कृष्णबोध आश्रम के निधन के बाद स्वरूपानंद सरस्वती इस पीठ के शंकराचार्य घोषित कर दिए गए. दूसरे गुट के स्वामी शांतानंद सरस्वती ने 1980 में पद छोड़ स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी बना दिया.
> मामला कोर्ट पहुंचा जब स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती ने 1989 में स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को शंकराचार्य के रूप में नामित किया.
> दूसरे पक्ष से स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के विरोध के बावजूद 15 नवंबर, 1989 को वासुदेवानंद का अभिषेक कर दिया गया.
> सिविल कोर्ट ने 5 मई, 2015 को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ज्योतिषपीठ का वास्तविक दावेदार मानते हुए स्वामी वासुदेवानंद को शंकराचार्य की पदवी धारण करने से रोक दिया. वासुदेवानंद ने हाइकोर्ट में फैसले को चुनौती दी.
> इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 2017 के आदेश में दोनों को इस पीठ का शंकराचार्य मानने से इनकार कर तीन महीने में नए शंकराचार्य की नियुक्ति का आदेश दिया.
> वासुदेवानंद ने हाइकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में आदेश दिया कि अंतिम आदेश आने तक स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती शंकराचार्य के पद पर बने रहेंगे. 2022 में स्वरूपानंद का निधन हो गया.
> उनकी वसीयत के आधार पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नया शंकराचार्य घोषित कर दिया गया. लेकिन संन्यासी अखाड़ों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया.
> स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य होने का दावा करने वाले स्वामी गोविंदानंद सरस्वती इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे. कोर्ट ने 16 सितंबर, 2022 को नए शंकराचार्य के रूप में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अभिषेक पर रोक लगा दी. हालांकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा है कि कोर्ट के ऑर्डर से पहले ही उनका अभिषेक हो चुका था.

