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प्रधान संपादक की कलम से

इस गणतंत्र दिवस विशेषांक में हम ऐसी ही 20 संस्थाओं को सामने ला रहे हैं. उनके साथ हैं वे लोग, जिन्होंने अपनी सोच को असल जिंदगी की कठोर प्रयोगशाला में आजमाकर साबित किया है.

4 फरवरी 2026 अंक
4 फरवरी 2026 अंक
अपडेटेड 3 फ़रवरी , 2026

—अरुण पुरी

थार के रेगिस्तान के किनारे बसे गांवों की बुजुर्ग महिलाएं, जिनका ऊर्जा से रिश्ता अब तक सूखी टहनियों और गोबर के उपलों तक सीमित था, आज सोलर चैंपियन बन रही हैं. सौराष्ट्र के सूखे इलाके में दर्जनों नई झीलें आकार ले रही हैं. भारत के सबसे बेतरतीब ढंग से फैलते हाइपर शहरों में से एक गुरुग्राम के बीचोबीच शून्य से निकलकर अरावली की एक हरी-भरी जंगल पट्टी खड़ी हो गई है.

प्रायद्वीपीय भारत के चुनौती भरे लैंडस्केप में एक  दंपती टिकाऊ इको-सिस्टम को फलने-फूलने में मदद कर रहा है. उनका नाम आते ही हजारों आदिवासी किसानों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. बेंगलूरू की एक गैर-लाभकारी संस्था, जो खुद को जनाग्रह यानी 'जन की इच्छा" कहती है, उसने शहरी समाधान के केंद्र में नागरिकों को भागीदारी के लिए प्रेरित किया है. भारत की सिलिकॉन सिटी में ट्रैफिक की अराजकता जैसी तात्कालिक समस्याओं को सामूहिक निगरानी और जिम्मेदारी के दायरे में लाया गया है. ये सभी किरदार अलग-अलग दुनिया से आते हैं.

काम के मैदान भी अलग हैं. लेकिन एक बात सबमें साझा है. ये वे असाधारण लोग और संस्थाएं हैं, जो सबसे कठिन मोर्चे पर, यानी ऐन जमीन पर आखिरी कतार के आदमी के बीच बदलाव का काम कर रहे हैं. वह भी चुपचाप. बिना सुर्खियों और हैशटैग की चमक के. जबकि उनका काम वैश्विक स्तर के बेहतरीन मानकों से तुलना के काबिल है.

स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, न्याय, शहरी शासन और खेती-किसानी जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में इन पहलकदमियों ने ऐसी संस्थाएं और आंदोलन खड़े किए हैं, जहां नारेबाजी से ज्यादा सख्ती, विकल्पों से ज्यादा नतीजों और निर्भरता से ज्यादा सम्मान को अहमियत दी गई है. ये कोशिशें अब सिर्फ अच्छे काम की मिसाल नहीं रहीं. ये ऐसी ताकत बन चुकी हैं जो सामूहिक भलाई कर रही हैं और भरोसा भी पैदा कर रही हैं.

इस गणतंत्र दिवस विशेषांक में हम ऐसी ही 20 संस्थाओं को सामने ला रहे हैं. उनके साथ हैं वे लोग, जिन्होंने अपनी सोच को असल जिंदगी की कठोर प्रयोगशाला में आजमाकर साबित किया है. कुछ नाम पहले से जाने-पहचाने हैं क्योंकि उनके काम का असर सार्वभौमिक रहा है. जैसे कार्डिएक सर्जन देवी प्रसाद शेट्टी. नारायण हेल्थ के जरिए सस्ती और सुलभ हेल्थकेयर उनका खुद तय किया हुआ मिशन है.

उनकी सीधी सोच है कि अगर आधुनिक चिकित्सा आम आदमी तक नहीं पहुंची तो सारी तरक्की बेकार है. अरविंद आइ हॉस्पिटल ने इसी सोच को आंखों के इलाज के क्षेत्र में आगे बढ़ाया. मदुरै से शुरू हुई यह पहल पिछले पचास साल से 'बेवजह होने वाले अंधेपन’ के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है और इसी वजह से इसकी पहचान बनी है. देश में बीमारियों का बोझ घटाने में इंडिया हेल्थ फंड की अहम भूमिका है.

इसे इससे भी ताकत मिलती है कि इसके पीछे टाटा ट्रस्ट्स जैसी बड़ी संस्था खड़ी है. लेकिन इस सूची में वे लोग भी हैं, जो अपनी पहचान खुद गढ़ रहे हैं. जैसे पुणे के पूर्व आइटी प्रोफेशनल प्रसाद भिडे. अपनी मां के बुढ़ापे के दौरान एल्डर केयर में मौजूद खालीपन से उनका सामना हुआ और वहीं से आजी केयर का विचार जन्मा. यह पहल बुजुर्गों के लिए असिस्टेड लिविंग को संवेदनशीलता और उद्यमशीलता के साथ जोड़ती है.

हमने पहचान के पैमाने को हर क्षेत्र में अलग-अलग स्तर पर देखा है. सफलता को मान्यता दी है. साथ ही उन पहलकदमियों पर भी रोशनी डाली है, जिनकी शोहरत अपने सीमित दायरे तक ही है; भले ही उनका असर लाखों लोगों पर क्यों न पड़ता हो, बड़े परिदृश्य में वे अब भी अपने आप में दुनिया हैं. मसलन, राजस्थान के तिलोनिया में संजीत बंकर रॉय का बेयरफुट कॉलेज. इसने अनगिनत ग्रामीण जिंदगियों को बदला है और 'सोलर दीदियां’ तैयार की हैं.

लेकिन इसकी परिवर्तनकारी क्षमता इससे कहीं आगे जाती है. ढोलकिया फाउंडेशन की मिशन 100 सरोवर पहल अब तक 75 तालाब बना चुकी है. उद्योगपति सावजीभाई ढोलकिया का सपना इसे आगे बढ़ाकर पूरे नदी तंत्र को फिर से जिंदा करने का है. और सच यह है कि आज भारत को ऐसे विचारों की सख्त जरूरत है. हमारी चुनी कई संस्थाएं विकास के उस जटिल कैनवस पर काम कर रही हैं, जहां आजीविका और पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हैं.

पुणे का 1967 में शुरू हुआ बायफ डेवलपमेंट रिसर्च फाउंडेशन, खाद्य सुरक्षा और जलवायु लचीलापन, इन दो स्वाभाविक साझेदारों को साथ लाता है. अरण्य एग्रीकल्चर आल्टरनेटिव्ज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. 1987 में नरसन्ना और पद्मा कोप्पुला दंपती की इस पहल का असर आंध्र और तेलंगाना के आदिवासियों तक सीमित नहीं रहा.

दुनिया भर के लोग इससे सीख रहे हैं कि पर्माकल्चर सूखे इलाकों को कैसे बदल सकता है. एक अलग तरह की बंजर जमीन पर काम किया पर्यावरणविद विजय धस्माना ने. गुरुग्राम के बीचोबीच पड़ी एक वीरान खदान आज जैव विविधता पार्क बन चुकी है. स्थानीय पेड़ों से फिर हरी हुई यह जगह अब पक्षियों और जानवरों का घर है.

इनमें से कई संस्थाएं भारत के सबसे मुश्किल हालात में काम कर रही हैं. दूरदराज के गांवों में, नाजुक इको-सिस्टम के बीच और हाशिए पर खड़े समुदायों के साथ. कुछ ऐसे इलाकों में उतरी हैं, जिन्हें दशकों की नीति के बावजूद खाली छोड़ दिया गया. जैसे प्रथम, जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के नए मानक तय कर रही है. कुछ वहां काम कर रही हैं, जहां कई बार न्याय व्यवस्था भी साथ नहीं दे पाती.

मिसाल के तौर पर मजलिस लीगल सेंटर, जो घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को कानूनी और दूसरे जरूरी सहारे देती है. कुछ संस्थाएं सरकारी सिस्टम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं. जैसे अक्षय पात्र फाउंडेशन, जो आज कई राज्यों में 23.5 लाख बच्चों को मुफ्त मिड-डे मील उपलब्ध करा रही है. इन्हीं के बीच कुछ ऐसे छुपे हुए रत्न भी हैं, जिन पर कम नजर जाती है. जैसे इको-टूरिज्म ऐंड कंजर्वेशन सोसाइटी ऑफ सिक्किम जो टिकाऊ टूरिज्म और जल प्रबंधन के जरिए ग्रामीण इलाकों को फिर से जिंदा कर रही है.

या फिर राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र जो भारतीय घोड़ों की दुर्लभ नस्लों को बचाने की कोशिश में जुटा है. यह अंक ऐसी ही संस्थाओं का एक खास संग्रह है. लंबी सूची में से सोच-समझकर कुछ उपक्रमों को चुना गया ताकि अलग-अलग क्षेत्र सामने आ सकें. हम इन्हें भारत के रत्न कह रहे हैं. ऐसे रत्न, जिन्हें प्रेरणा और पसीने से तराशा गया है. इनके मॉडलों को दोहराया जा सकता है. ये अर्थपूर्ण क्रांतियां हैं, जो गणराज्य को मजबूत बना रही हैं. इन्हें तालियों या पहचान का इंतजार नहीं. इन्हें बस अपनाए जाने की जरूरत है.

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