
भारतीय जनता पार्टी ने 20 जनवरी को नितिन नबीन को औपचारिक रूप से अपना नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया, जिसकी तलाश 13 महीने से चल रही थी. चयन एक मायने में खास है क्योंकि महज 45 वर्ष की आयु में दुनिया के सबसे बड़े राजनैतिक संगठन मानी जाने वाली पार्टी की कमान संभालने वाले सबसे युवा मुखिया हैं.
पार्टी संसदीय बोर्ड ने उन्हें दिसंबर के मध्य में कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया था. बिहार के बांकीपुर निर्वाचन क्षेत्र से पांच बार के विधायक और नीतीश कुमार की कैबिनेट में शामिल रहे नबीन अब राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आ गए हैं. चुनाव प्रक्रिया महज औपचारिकता थी; नामांकन-पत्रों के सभी 37 सेट में सिर्फ एक ही नाम था.
20 जनवरी को अपने कार्यकाल के छह साल पूरे करने वाले, नबीन के पूर्ववर्ती जे.पी. नड्डा ने एक समारोह में उन्हें पदभार सौंपा. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ी विनम्रता से नवीन को अपना नया 'बॉस' बताया, जो ''युवा ऊर्जा और व्यापक अनुभव वाले मिलेनियल नेता'' हैं.
प्रधानमंत्री ने कहा, ''जब पार्टी के मामलों की बात आती है तो माननीय नितिन नबीन जी...मैं एक कार्यकर्ता हूं, और आप मेरे बॉस.'' संदेश खासकर वरिष्ठ नेताओं के लिए दो-टूक था कि उन्हें युवा नबीन के शीर्ष पद संभालने को लेकर कोई भी नाराजगी छोड़ देनी चाहिए. यह पीढ़ीगत परिवर्तन की प्रक्रिया है, भले सत्ता की चाभी मोदी-शाह की जोड़ी के पास ही है.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, नए अध्यक्ष का चयन मोदी ने लंबी प्रक्रिया के बाद किया है, जिसके बारे में सिर्फ प्रमुख लोगों को ही जानकारी है. 100 उम्मीदवारों की सूची को नेतृत्व क्षमता/वैचारिक आधारों के आकलन के बाद 41 तक सीमित कर दिया गया. कई तरह की कसौटियों पर परखने के बाद नबीन का नाम शीर्ष पर उभरा, जिसमें गोपनीय जानकारियां भी थीं. 12 दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पोर्ट ब्लेयर में एक कार्यक्रम के दौरान आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत से मुलाकात की, और उन्हें पार्टी की तरफ से चयन के बारे में जानकारी दी.
पद के साथ अग्निपरीक्षा
नबीन के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद बड़ी उपलब्धि के साथ अग्निपरीक्षा भी है. उन्हें एक ऐसी पार्टी विरासत में मिली है, जो चुनाव जीतने की मशीन बन चुकी है लेकिन संगठन के भीतर, कार्यकर्ताओं के बीच और मतदाता आधार में एक तरह की असहजता नजर आ रही है.
वे पहले ऐसे अध्यक्ष होंगे जिनका करिअर भाजपा तक ही सीमित रहा है और उन्होंने संघ के किसी भी गैर-राजनैतिक सहयोगी संगठन के साथ सीधे तौर पर काम नहीं किया है. नबीन ने राष्ट्रीय स्तर पर केवल दो भूमिकाएं ही निभाई हैं. वे पार्टी की युवा शाखा भारतीय जनता युवा मोर्चा के महासचिव रहे हैं और 2023 में सिक्कम के चुनाव प्रभारी और छत्तीसगढ़ के सह-प्रभारी बनाए गए थे.
उनकी पहली और सबसे अहम चुनौती है निरंतरता को बनाए रखना और नेतृत्व परिवर्तन के संक्रमण काल में व्यवस्था में कोई उथल-पुथल न होने देना. हालांकि, यह आसान न होगा. अगले कुछ महीनों में कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होंगे क्योंकि एक तरफ पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य हैं, जहां भाजपा की स्थिति कमजोर है. और फिर असम और पुदुच्चेरि में सत्ता-विरोधी लहर नतीजे तय कर सकती है.
इसके बनिस्बत भाजपा के आंतरिक विरोधाभास से निबटना आसान दिख सकता है. एक तो राष्ट्रीय ढांचा अत्यधिक केंद्रीकृत है—मोदी और शाह ने पार्टी संस्कृति को चुस्ती-फुर्ती और वफादारी के इर्दगिर्द इस तरह ढाला है जिसमें फैसले ऊपर से नीचे उतरते हैं. नबीन को प्रभावी नेतृत्व के लिए यह दिखाना होगा कि सत्ता और स्वायत्तता साथ-साथ चल सकते हैं.
उन्हें नियुक्तियों, चुनाव प्रचार से जुड़ी रणनीति तय करने और राज्य स्तरीय वार्ताओं में स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए जगह बनानी होगी. साथ ही मोदी की विरासत और संघ के व्यापक प्रभाव से जुड़ी अदृश्य सीमाओं का सम्मान भी करना होगा. उन्हें सम्मान और दृढ़ता के बीच नाजुक संतुलन को साधना होगा. अतीत में शाह और नड्डा ने सावधानीपूर्वक संकेतों को समझा और अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल भी किया.
नबीन के सामने अगली चुनौती पार्टी के पुराने और नए नेताओं के व्यापक गठजोड़ को संभालना होगा. उनमें राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे सरीखे नेता हैं, जिन्होंने वाजपेयी-आडवाणी युग में राजनीति में कदम रखा. योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस, हेमंत बिस्व सरमा, धर्मेंद्र प्रधान जैसे नेता भी हैं, जो मोदी के डिजिटल इंडिया वाले राजनैतिक दौर में आगे बढ़े हैं.
नबीन को पीढ़ीगत अंतर भी समझना होगा. वे उम्र के लिहाज से अधिकांश केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों (औसत आयु: 58.7 वर्ष) और राज्य इकाई प्रमुखों (औसत आयु: 54 वर्ष) से छोटे हैं. वरिष्ठ नेताओं की अपनी वफादार टोली और जनाधार होता है. महत्वाकांक्षाओं को संभालने, गुटबाजी न होने देने और एकजुटता बनाए रखने के लिए सिर्फ संगठनात्मक सत्ता ही नहीं, बल्कि होशियारी की भी दरकार होगी.
पार्टी के एक शीर्ष नेता तर्क देते हैं कि भाजपा की ताकत हमेशा से ही नेताओं को जोड़ने में रही है. नबीन के लिए समकालीन नेताओं की अपेक्षाओं के साथ संतुलन बनाना आसान काम न होगा क्योंकि अब वे भी राष्ट्रीय टीम या राज्य इकाइयों और सरकार में बड़ी भूमिकाओं की उम्मीद करेंगे.
काडर और अति भरोसा
यह विचित्र है लेकिन सत्ता में एक दशक के बाद भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अति-आत्मविश्वास है. पार्टी कार्यकर्ता भाजपा की असली ताकत हैं लेकिन अब उनमें उकताहट झलकने लगी है. बूथ स्तरीय कार्यकर्ता कभी जोश के साथ जुटे रहते थे लेकिन अब पुरस्कार, पहचान और मान्यता की उम्मीद रखते हैं. नबीन की चुनौती कार्यकताओं में घटते जोश को फिर से जगाने की होगी. पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अपने पहले भाषण में उन्होंने इसी बात पर जोर दिया.
हर तरफ नजर आ रहा भाजपा का दबदबा भी उसकी कुछ कमजोरियों को छुपाता है. हिंदी भाषी क्षेत्रों में वह अब भी मजबूत है लेकिन दक्षिण में पैठ बनाने या पूर्वी राज्यों के कुछ हिस्सों में पकड़ मजबूत करने में सफल नहीं हो पाई है. नबीन का बिहार से होना उत्तर और पूर्व में कुछ कर सकता है लेकिन तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के अलावा पंजाब में भाजपा की संगठनात्मक क्षमता के विस्तार के लिए हिंदुत्व और मोदी के करिश्मे से परे नवाचार की जरूरत होगी.

गठबंधन की राजनीति भी केंद्र में लौट चुकी है. कभी अकेले शासन की इच्छा रखने वाली भाजपा अब साझेदारी में राज करना सीख रही है. बिहार में नीतीश कुमार से लेकर आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू तक, सहयोगियों ने स्थिति मजबूत कर ली है. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि नबीन को सामंजस्य बैठाने की कला में महारत हासिल करनी होगी, दृढ़ता और लचीलापन, विनय और सम्मान के बीच संतुलन बनाना होगा.
वे अपने सहयोगियों, यहां तक कि अपने राज्य बिहार के साथी नेताओं की तुलना में भी युवा और कम अनुभवी हैं. ऐसे में वे अगर कड़ा या असंवेदनशील रवैया दिखाते हैं तो एनडीए में अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, खासकर ऐसे समय जब विपक्षी गठबंधन फिर संगठित हो रहे हैं. बिहार में नबीन के साथियों ने इंडिया टुडे को बताया कि उन्होंने हमेशा पार्टी के हितों को ऊपर रखा है.
भविष्य पर नजर
सरकार और संगठन के बीच संबंध भी उतना ही महत्वपूर्ण है. मोदी के नेतृत्व में सरकार ने अक्सर भाजपा की संगठनात्मक आवाज को दबाकर रखा. 2024 के आम चुनाव के बाद संघ भी अधिक सशक्त प्रतिक्रिया तंत्र को लेकर मुखर होता जा रहा है (जिसे पार्टी के भीतर मोदी-बाद के युग के लिए तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है).
नबीन के कार्यकाल का मूल्यांकन इससे भी किया जाएगा कि वे वैचारिक आधार के साथ समीकरणों को कैसे संतुलित करते हैं, और इस भावना को कैसे बहाल करते हैं कि भाजपा सिर्फ शासन का माध्यम नहीं है, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक शक्ति है. संघ नेतृत्व इस पर बारीकी से नजर रखेगा. 'स्वदेशी अर्थशास्त्र' से लेकर 'सभ्यतागत आत्मविश्वास' तक, जमीनी स्तर पर उनके लोकाचार से पुन: जुड़ने की नबीन की क्षमता ही यह परिभाषित करेगी कि बतौर अध्यक्ष उनका कार्यकाल कैसा है.
इन सबके पीछे एक अनकहा सवाल छिपा है जो दिल्ली के सियासी गलियारों में अक्सर सुर्खियों में रहता है—मोदी के बाद कौन? प्रधानमंत्री अब भी भाजपा के सबसे बड़े वोट खींचने वाले नेता हैं लेकिन पार्टी जानती है कि नेतृत्व परिवर्तन अपरिहार्य है. नवीन का सबसे बड़ा योगदान यह होगा कि वे पीढ़ीगत परिवर्तन की राह सुगम बनाएं और मौजूदा ढांचे को खतरे में डाले बिना अगली पीढ़ी के राष्ट्रीय नेताओं को तैयार करने में भूमिका निभाएं.
नबीन को दुनिया की सबसे सशक्त राजनैतिक मशीन मिली है—जो भरपूर पैसे वाली, अनुशासित और विचारों में दृढ़ है लेकिन दबदबा बनाए रखने के लिए विकसित होना होगा. अध्यक्ष पद का इससे उतना लेना-देना नहीं कि नबीन पार्टी को अगले चुनाव तक कैसे ले जाते हैं बल्कि इस बारे में ज्यादा है कि वे अगली पीढ़ी को कैसे तैयार कर रहे हैं. कभी सबसे अलग पार्टी होने पर गर्व करने वाली भाजपा अब बदलाव के दौर में है.
कई मायनों में पूरे नए संदर्भ
नए भाजपा अध्यक्ष का रिकॉर्ड जांचा-परखा है और वे पार्टी के सबसे अहम वक्त में कमान संभावले वाले के रूप में साबित हो सकते हैं
पहले पहल वाला पहलू नितिन नबीन के साथ कई मामलों में जुड़ा है. वे 45 साल की उम्र में भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त हुए हैं (असल में उनका जन्म ही पार्टी के अप्रैल 1980 में गठन के बाद हुआ). वे सक्रिय राजनीति में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद के दौर में उतरे, जब भाजपा में मोदी का कद बढ़ना शुरू हुआ. इसके अलावा वे पार्टी की अगुआई करने वाले बिहार से भी पहले शख्स हैं.
बिहार में नबीन पटना पश्चिम से 26 साल की उम्र में विधायक बने और परिसीमन के बाद उसी बांकीपुर सीट से लगातार चार बार चुनाव जीतते रहे.
भाजपा अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का होता है, इसलिए नबीन जनवरी 2029 में लोकसभा चुनावों के कुछेक महीने पहले ही मौजूदा कार्यकाल पूरा करेंगे. लेकिन अगले तीन साल भाजपा के लिए यकीनन बेहद अहम होंगे. वजह यह कि आगे कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिनमें कुछ में तो जीत पार्टी की महत्वाकांक्षाओं के लिए बेहद जरूरी है. नबीन को बड़े जूते में पांव रखना है, उनके पूर्ववर्ती जे.पी. नड्डा ने अपने कार्यकाल में 30 विधानसभा चुनावों में जीत दिलाने में अगुआई की है. और फिर, बेशक, यह भी संभावना है कि वे शायद शीर्ष पर नेतृत्व परिवर्तन की भी अगुआई करें.
आगे हैं चुनौतियां
> अप्रैल-मई में चार अहम राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. उनमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भाजपा परंपरा से कमजोर है.
> भाजपा अभी भी भारी शीर्ष वाली पार्टी है. नबीन को मोदी-शाह जोड़ी और संघ की उम्मीदों को साधने में फैसले करने की फितरत दिखानी होगी.
> नबीन को पुराने और नए नेताओं की महत्वाकांक्षाओं में संतुलन साधना होगा. ऊपरी पांत में सबसे युवा होना शायद काम न आए.
> दशक भर की सत्ता से बढ़ा अति आत्मविश्वास, काडर में उत्साह नहीं.

