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बना गांवों में बदलाव का जरिया

साठ के दशक के उत्तरार्ध से बायफ ने ग्रामीण लोगों के बीच, खासकर डेयरी और महिला सशक्तीकरण में जो काम किया है उसने हजारों लोगों की गरीबी दूर करने में मदद की.

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सुमन मोरे (सफेद कैप में) साथिनों के बीच अपने सोलर ड्रायर के साथ
अपडेटेड 9 फ़रवरी , 2026

पुणे से करीब 30 किमी दूर उरुली कंचन गांव पहली बार 1946 में चर्चा में आया, जब महात्मा गांधी यहां प्राकृतिक चिकित्सा आश्रम शुरू करने आए थे. उन्होंने इसका कामकाज देखने के लिए 20 वर्षीय मणिभाई देसाई को चुना. देसाई बाद में कई ग्रामीण पहलकदमियों से जुड़े, जैसे 1960 के दशक में भारत की पहली सहकारी लिफ्ट सिंचाई योजना और चीनी सहकारिता. फिर उन्होंने 1967 में बीएआइएफ (भारतीय एग्रो इंडस्ट्रीज फाउंडेशन या बायफ) शुरू किया.

1970 में बायफ ने डेयरी किसानों के लिए कृत्रिम गर्भाधान (एआइ) सेवाओं को घर-घर पहुंचाने की शुरुआत की. बायफ डेवलपमेंट रिसर्च फाउंडेशन के मौजूदा अध्यक्ष और मैनेजिंग ट्रस्टी भरत काकडे ने भारत की 'श्वेत क्रांति’ में इसकी भूमिका बताते हुए कहा, ''इससे दूध की पैदावार बढ़ाने में मदद मिली, जो उस समय प्रति जानवर दो लीटर था...अगर मवेशियों की नस्लों में सुधार नहीं होता तो भारत में दूध की पैदावार नहीं बढ़ पाती.’’

बायफ ने कृत्रिम गर्भाधान प्रक्रियाओं और जानवरों के स्वास्थ्य की देखभाल में मदद के लिए टेक्नीशियनों का एक समूह बनाया है. इस मॉडल को राज्य सरकारों और डेयरियों ने अपनाया है और इसके तहत कई तरह के चारे विकसित किए गए हैं. बायफ एक ऐसे समूह का भी हिस्सा है जिसने गायों और भैंसों के लिए स्निप (सिंगल न्यूक्लियोटाइड पॉलीमॉर्फिज्म) चिप विकसित की हैं, ये डीएनए मार्कर हैं जो उम्दा किस्म के जानवरों की पहचान में मदद करते हैं. कुछ जगहों पर बायफ के केंद्रों में अब अनोखे 'मिल्क एटीएम’ भी हैं जिनमें अच्छी क्वालिटी का होमोजेनाइज्ड दूध मिलता है.

बायफ ने 1982 में महाराष्ट्र और गुजरात के आदिवासी इलाकों में परिवारों की आय बढ़ाने में मदद के लिए 'वाडी’ कार्यक्रम शुरू किया. वाडी में खेती, बागवानी और वानिकी का काम शामिल है. इसमें गांव के तालाबों को फिर से जलयुक्त करना और नर्सरियों का विकास शामिल है. काकडे के मुताबिक, सर्वे से पता चला कि इससे गुजरात के आदिवासी जिलों में हरियाली बढ़ाने और गरीबी घटाने में मदद मिली है. अब इसे महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में भी लागू किया जा रहा है.

बायफ ने उद्यमिता बढ़ाने और आजीविका के लिए कई स्वयं सहायता समूह भी शुरू किए हैं. इनमें से कुछ की मौजूदगी अब राष्ट्रीय स्तर पर है. प्रशिक्षण और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की मुखिया लता शर्मा बताती हैं कि अकेले उरुली कंचन के आस-पास उनके 132 स्वयं सहायता समूह हैं जिनमें 2,000 महिला सदस्य हैं.

संकल्प इन समूहों की 70 महिलाओं का एक फेडरेशन है, जो इन समूहों के बनाए उत्पाद बेचता है. इससे उरुली कंचन की सुमन शंकर मोरे जैसी महिलाओं को अतिरिक्त कमाई करने में मदद मिली है. उनके पास डिहाइड्रेटेड प्याज और नींबू जैसे उत्पाद बनाने के लिए एक सोलर कंडक्शन ड्रायर है, और ये उत्पाद संकल्प के आउटलेट पर बिकते हैं.

काकडे कहते हैं कि बायफ जलवायु परिवर्तन के अनुकूल खेती पर भी काम कर रहा है, खासकर पानी के सक्षम इस्तेमाल के साथ-साथ मिट्टी और जमीन के व्यापक प्रबंधन पर. उरुली कंचन में बायफ रूरल इनोवेशन सेंटर (ब्रिक) का 65 एकड़ का परिसर है जहां कई तरह के इनोवेशन हैं, इनमें एक कृषि-सौर बिजली परियोजना भी शामिल है, जहां मिर्च, बीन्स और केले जैसी फसलें उगाई जाती हैं और सौर बिजली भी पैदा की जाती है. अब क्रलोटिंग पैनल, पवन चन्न्कियां और एक हाइड्रोजन प्लांट की भी योजना है.

आखिर क्यों है यह एक रत्न
●बायफ ने कृत्रिम गर्भाधान सेवा किसानों को आस-पास मुहैया की, जिसने श्वेत क्रांति में अहम भूमिका निभाई.
●बायफ का कामकाज अब स्वयं सहायता समूह से लेकर जलवायु अनुकूल खेती और आदिवासी क्षेत्रों में वाडी कार्यक्रम तक फैला है.
●बायफ की पहल से 17 राज्यों के 39 लाख परिवारों को लाभ हुआ.

लाभार्थी की राय
डेयरी फार्मर गणेश धमाल ने कहा कि बायफ अपने एआइ प्रोग्राम के तहत अच्छी किस्म का सीमेन उपलब् ध कराता है. इससे पैदा छह होल्स्टीन फ्रीजियन गाएं मेरे पास हैं और वे औसतन 25 लीटर दूध रोज देती हैं. उनमें बीमारियों से लडऩे की क्षमता भी बेहतर है.

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