प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना (पीएमआइएस) के आगाज के वक्त सरकार की नजर में शायद कोटा के इक्कीस वर्षीय नितिन राठौर जैसे छात्र रहे होंगे. करियर पॉइंट यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक नितिन नौकरी की ख्वाहिश वाले अपने कारोबारी परिवार में पहले नौजवान हैं.
बीते कुछ महीनों से वे एक भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी के मानव संसाधन विभाग में काम कर रहे हैं. एक साल की इंटर्नशिप को सुरक्षित करियर की ओर कदम मानते हुए वे कहते हैं, ''मैं इसमें अपना 100 फीसद दे रहा हूं, ताकि वे प्री-प्लेसमेंट ऑफर दें.''
वैसे, राठौर के लिए कॉर्पोरेट संस्कृति में ढलना इतना आसान भी नहीं था. उन्हें पहला सबक तो समय की पाबंदी का मिला. दो महीने तक बार-बार देर से पहुंचने और लिहाजा वेतन में कटौती के बाद अब वे सुबह ठीक 8:20 बजे डेस्क पर मौजूद रहते हैं. वे जवाबदेही के साथ-साथ बतौर टीम काम करना भी सीख रहे हैं.
मगर इसमें ऐसी अलग बात क्या है? नितिन दरअसल उन चंद अभ्यर्थियों में हैं जिन्होंने महत्वाकांक्षी पीएमआइएस पहल के तहत बतौर इंटर्न करियर शुरू किया. साल 2024 के आम चुनावों के ऐन पहले फरवरी, 2024 बजट में पीएमआइएस का ऐलान किया गया और इसका उद्देश्य शीर्ष 500 कंपनियों में पांच साल के दौरान औसतन एक करोड़ या एक साल में इंटर्नशिप के 20 लाख अवसर प्रदान करना है. यह योजना कम आय वाले परिवारों के 21-24 वर्ष के युवाओं, खासकर एनईईटी (नॉट इन एजुकेशन, एम्प्लायमेंट या ट्रेनिंग) श्रेणी वालों को ध्यान में रखकर बनाई गई. योजना के तहत, प्रत्येक प्रशिक्षु को प्रति माह 5,000 रुपए मिलते हैं.
केंद्र सरकार इसमें 4,500 रुपए का योगदान देती है तो बाकी 500 रुपए कंपनियां अपने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड से देती हैं. इसके अलावा उन्हें 6,000 रुपए का एकमुश्त भत्ता मिलता है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसी फरवरी में राज्यसभा में कहा था, ''इसका मकसद नौकरी प्रदान करना नहीं, बल्कि इंटर्नशिप के जरिए अनुभव दिलाना है और बाजार की जरूरतों के मुताबिक युवाओं को पारंगत करना है.''
साल में 20 लाख इंटर्नशिप को पूरा करने की बजाए, पीएमआइएस की नोडल अथॉरिटी कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) ने पहले पायलट चरण शुरू किया. बाद में, यह सावधानी उचित नजर आई. अक्तूबर 2024 में लॉन्च इस योजना के पायलट चरण में 1,25,000 इंटर्न को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था. मगर, इसमें भागीदारी न केवल पीछे रही, बल्कि उम्मीदों से काफी कम रही.
एमसीए इतनी कम भागीदारी का अनुमान नहीं लगा पाया था. यह बात तब साफ हो गई जब उन्होंने वित्त वर्ष 2026 के लिए अपने बजटीय अनुमानों में पीएमआइएस को 15 लाख इंटर्नशिप तक बढ़ाने की मांग की और 10,831 करोड़ रुपए का प्रावधान इसके लिए मंजूर भी हो गया. यह धन वित्त वर्ष 2025 में आवंटित 2,000 करोड़ रुपए से पांच गुना था. पायलट प्रोजेक्ट के लिए आवंटित 840 करोड़ रुपए को घटाकर 380 करोड़ रुपए कर दिया गया और उनमें से अब तक सिर्फ 73.72 करोड़ रुपए खर्च हो पाए हैं.
पहले चरण के निराशाजनक नतीजों की वजह से सरकार को इस साल जनवरी में दूसरा चरण शुरू करना पड़ा, मगर उसमें भी भागीदारी में कोई सुधार नहीं दिखा. नतीजतन, इसको लेकर कोई स्पष्टता नहीं है कि इस योजना को औपचारिक रूप से कब शुरू किया जाएगा. एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ''इस पायलट चरण के नतीजों के मूल्यांकन के बाद ही हम तय करेंगे कि एक और पायलट शुरू करेंगे या योजना लॉन्च करेंगे. फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है कि इस पायलट से हमने बहुत कुछ सीखा है और इससे मुख्य योजना को शुरू करते समय उसे और बेहतर ढंग से तैयार करने में हमें मदद मिलेगी.''
इन दो दौर के बीच, उत्साहजनक पहलू यह है कि उद्योग जगत की प्रतिक्रिया अच्छी है. कंपनियों को साथ लाने के लिए एमसीए ने फिक्की और सीआइआइ सरीखे उद्योग संघों के साथ मिलकर काम किया. बदले में, उन्होंने अपनी सदस्य कंपनियों के साथ कार्यान्वयन, सवालों के समाधान और डेटा जुटाने का काम संभाला. टाटा स्टील, मारुति, ओएनजीसी, रिलायंस, आयशर मोटर्स सरीखी प्रमुख कंपनियां इससे जुड़ीं.
पहले चरण में, 280 कंपनियों ने 1,27,000 अवसर जारी किए जो 1,25,000 की जरूरत से 2,000 अधिक थे. इन रिक्तियों के लिए पीएमआइएस पोर्टल पर पंजीकृत 1,81,000 उम्मीदवारों से 6,21,000 आवेदन मिले. मगर आखिरकार कंपनियों के केवल 82,000 इंटर्नशिप ऑफर पेश हुए, यानी एक-तिहाई अवसर खाली रह गए.
उससे भी खराब स्थिति यह कि केवल 28,000 यानी 34 फीसद अभ्यर्थियों ने ऑफर को स्वीकार किया. आखिर में, केवल 8,700 यानी एक-तिहाई ही इंटर्नशिप में शामिल हुए और उनमें से भी 4,565 यानी करीब आधे लोग बीच में भी उसे छोड़कर चले गए.
दूसरे चरण में भी वैसा ही रुझान नजर आया. प्रतिभागी कंपनियां बढ़कर 327 हो गईं, मगर नए और पुराने 1,18,000 इंटर्नशिप अवसर ही मिले जो कि पिछले चरण से कम थे. कंपनियों ने 83,000 इंटर्नशिप ऑफर दिए, जिनमें 24,600 स्वीकार किए गए.
उसमें आखिरकार केवल 7,300 अभ्यर्थी शामिल हुए. इनमें से भी 2,053 ने इंटर्नशिप पूरी किए बिना ही छोड़ दिया. नवंबर तक, योजना के दोनों चरणों को मिलाकर केवल 95 इंटर्न को 17 कंपनियों में पूर्णकालिक नौकरियां मिल पाई हैं.
क्यों रही योजना बेअसर
एमसीए की ओर से उम्मीदवारों पर कराए गए एक फीडबैक सर्वे में कारण सामने आए. पहले चरण के अभ्यर्थियों पर एक अहम एफएमसीजी कंपनी की ओर से की गई पड़ताल में भी वही वजहें दोहराई गई हैं. एमसीए के सर्वे में पाया गया कि कार्यस्थल बहुत दूर होने, अन्य कौशल कार्यक्रमों की तुलना में अधिक लंबी इंटर्नशिप अवधि और मनपसंद काम नहीं मिलने से अभ्यर्थी हतोत्साहित हो रहे थे.
एफएमसीजी कंपनी के सर्वे में भी यही तस्वीर उभरी: 32 फीसद ने कहा कि वे पूर्णकालिक नौकरी की तलाश में थे, 22 फीसद को सेल्स प्रोफाइल पसंद नहीं थी और वे ऑफिस जॉब चाहते थे, 18 फीसद को लोकेशन बहुत दूर लगा, 15 फीसद उच्च शिक्षा हासिल कर रहे थे, और 13 फीसद ने कहा कि एक साल की इंटर्नशिप अवधि बहुत लंबी है और वे इसे केवल एक-दो महीने ही कर सकते हैं. यही वे अहम कारण हैं जिनकी वजह से पीएमआइएस शुरू से ही रफ्तार नहीं पकड़ पाई.
लोकेशन: यह सबसे बड़ा मसला बनकर उभरा. अभ्यर्थियों को अपने निवास स्थान से 5-10 किमी के दायरे में ही कार्यस्थल पसंद था. जस्टजॉब्स नेटवर्क नामक रिसर्च फर्म की रिसर्च लीड ईशा गुप्ता कहती हैं कि खासकर महिलाएं अपने गांवों से दूर स्थित शहरों में स्थानांतरित होने में कई तरह की मुश्किलों का सामना करती हैं.
कम वजीफा: विशेषज्ञों का मानना है कि प्रति माह 5,000 रुपए का शुरुआती इंटर्नशिप वजीफा बेहद कम है और युवाओं को लुभाने लायक नहीं. अपने घर-गांव में वे छोटे-मोटे काम या मनरेगा के जरिए इससे अधिक कमा लेते हैं. गुप्ता कहती हैं कि उनके पारिवारिक हालात को देखते हुए इन युवाओं से परिजनों को उम्मीद रहती है कि वे पहले ही दिन से कमाएं और घर पैसा भेजें. वे कहती हैं, ''इन युवाओं की प्राथमिकता आज की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना है. उनके पास यह सुविधा या आगे की दृष्टि नहीं होती कि वे इंटर्नशिप को बेहतर अवसरों की राह के तौर पर देखें.''
स्थायी बनाम अस्थायी, प्राइवेट बनाम सरकारी नौकरी: विभिन्न क्षेत्रों में हजारों अभ्यर्थियों के साथ काम करने के अपने अनुभव के आधार पर सीआइईएल एचआर के एमडी और सीईओ, आदित्य नारायण मिश्र कहते हैं कि कई ग्रेजुएट ''अस्थायी नौकरी प्रस्तावों को बैकअप की तरह देखते हैं, जब तक कि उन्हें कोई स्थायी भूमिका न मिल जाए.'' इसकी वजह संभवत: यह है कि अधिकतर लक्षित अभ्यर्थी वंचित पृष्ठभूमि के होते हैं और वे अस्थायी इंटर्नशिप की बजाए पूर्णकालिक नौकरी चाहते हैं. असल में, वे सरकारी नौकरी चाहते हैं जिसे वे अधिक सुरक्षित मानते हैं.
इस वजह से पीएसयू में इंटर्नशिप को अधिक अभ्यर्थी पसंद करते हैं. ओएनजीसी ने पहले पायलट चरण में 6,000 इंटर्नशिप पद और दूसरे में 4,200 पद निकाले. वहीं, विविध क्षेत्रों में काम करने वाले एक समूह के सीएचआरओ अपनी एकदम अलग अनुभव पर खेद जताते हैं: ''हमने 259 नियुक्तियों के लक्ष्य के लिए 269 ऑफर जारी किए, मगर केवल 32 उम्मीदवार शामिल हुए. आज उनमें सिर्फ नौ बचे हैं. सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू को ध्यान में नहीं रखा गया, इसी वजह से भागीदारी इतनी कम रही.''
पात्रता के सीमित मानदंड: पीएमआइएस के लिए सिर्फ 21-24 साल के वे युवा आवेदन कर सकते हैं जिन्होंने हाइस्कूल उत्तीर्ण किया हो और जिनके पास आइटीआइ प्रमाणपत्र, पॉलिटेक्निक डिप्लोमा या स्नातक डिग्री (बीए, बीएससी, बीकॉम, बीसीए, बीबीए, बीफार्मा आदि) हो. इसके साथ ही, वे बेरोजगार हों, फुल-टाइम पढ़ाई नहीं कर रहे हों, और उनके परिवार की सालाना आय आठ लाख रुपए से कम हो. इन शर्तों को बहुत कम लोग पूरा कर पाते हैं और इससे आवेदकों की संख्या घट जाती है.
योजना का दोहराव: कुछ विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठाते हैं कि जब पहले से ही नेशनल अप्रेंटिसशिप प्रमोशन स्कीम (एनएपीएस), नेशनल अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग स्कीम (एनएटीएस) और ड्यूल सिस्टम ऑफ ट्रेनिंग (डीएसटी) सरीखे इसी तरह के व्यावसायिक प्रशिक्षण या कौशल विकास की योजनाएं मौजूद हैं तो समानांतर ढांचा खड़ा करने की क्या जरूरत है? जस्टजॉब्स नेटवर्क की गुप्ता सवाल करती हैं, ''युवाओं को नौकरी के अवसरों के लिए तैयार करने के लिए उनके कौशल-विकास की एक जैसी इतनी सारी योजनाएं क्यों हैं?
एनएपीएस, एनएटीएस और डीएसटी अलग-अलग युवाओं के समूह पर भले केंद्रित हों, मगर सभी का मकसद व्यावहारिक प्रशिक्षण के जरिए रोजगार पाने की संभावना बढ़ाना है.'' इसके बचाव में सरकार का तर्क है कि एनएपीएस और एनएटीएस सरीखी कुछ योजनाएं कुछ कंपनियों के लिए नियमानुसार अनिवार्य हैं जबकि पीएमआइएस स्वैच्छिक योजना है और उनसे अधिक व्यापक है.
असंतुलित अपेक्षाएं: प्रक्रिया के दौरान मार्गदर्शन के लिए किसी तीसरे पक्ष के सहयोगी या एजेंट के नहीं होने की वजह से उम्मीदवार अक्सर नौकरी की अपेक्षाओं को सही से नहीं समझ पाते. टीमलीज डिग्री अप्रेंटिसशिप के सीईओ निपुण शर्मा कहते हैं, ''हमने देखा है कि अभ्यर्थी किसी भूमिका के लिए आवेदन कर देते हैं और उन्हें बाद में समझ आता है कि उसके लिए तो कहीं और जाना होगा.'' उन्हें यह भी नहीं पता होता कि कॉर्पोरेट नौकरी से क्या अपेक्षाएं होंगी. मसलन, असेंबली-लाइन की भूमिका में दिन में आठ घंटे तक खड़े होकर काम करना पड़ सकता है.
डीसीएम श्रीराम फाउंडेशन की प्रेसिडेंट अमन पन्नू जागरूकता और संवेदनशीलता की भूमिका पर जोर देते हुए कहती हैं, ''किसी भी सकारात्मक सामाजिक बदलाव के लिए सामूहिक चेतना का निर्माण जरूरी है. अगर किसी योजना को जमीनी स्तर पर असरदार बनाना है तो सोच में बदलाव को मजबूत करना जरूरी होता है.'' वे बताती हैं कि उत्तर प्रदेश के हरदोई और लखीमपुर में उनकी संस्था के चल रहे सीएसआर कौशल-विकास परियोजनाओं में लोगों के जुड़े रहने की दर 85 फीसद इसलिए है कि उनकी कार्यान्वयन एजेंसी जमीनी स्तर पर युवाओं को संगठित करती है, उनके माता-पिता को शामिल करती है, उनकी सहमति लेती है और उम्मीदवार की कमाई की संभावित वृद्धि पहले की समझा देती है.
अनुपालन का बोझ: इस योजना में भाग लेने वाली कंपनियों के सामने अपनी ही कई चुनौतियां हैं. इनकी शुरुआत उनके संगठन के भीतर एक पीएमआइएस सेल बनाने से होती है. वे पूरे कार्यान्वयन की मूल आधार प्रणाली पीएमआइएस डिजिटल पोर्टल से भी संतुष्ट नहीं हैं. यह पोर्टल केवल निर्धारित अवधि में ही खुलता है और कंपनियों को उसी समय में इंटर्नशिप पदों को पोस्ट करना होता है. इससे एचआर टीमों पर अनावश्यक बोझ पड़ता है. कंपनियों को डैशबोर्ड पर इंटर्नशिप अवसर अपलोड करने होते हैं और उम्मीदवारों को पोर्टल पर पंजीकरण करके अपनी पात्रता तथा पसंद के अनुसार इंटर्नशिप के लिए आवेदन करना होता है. उसके बाद कंपनियां शॉर्टलिस्ट करके इंटर्नशिप ऑफर जारी करती हैं. उसे उम्मीदवारों को दो हफ्तों के भीतर स्वीकार या अस्वीकार करना होता है.
हर संगठन को हर आवेदक के लिए अलग-अलग मूल्यांकन फॉर्म भरना पड़ता है. इससे उनकी परेशानियां बढ़ जाती हैं. एक एचआर प्रमुख का कहना है, ''हमें 2,500 आवेदकों का ब्यौरा भरना पड़ा.'' सरकार ने एससी-एसटी कोटा भी लागू करने का सुझाव दिया है, जो कंपनियों का बोझ बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है.
नया आगाज
दरअसल, कम भागीदारी कंपनियों के लिए अभी भी सिरदर्द बनी हुई है, भले ही उन्होंने खासकर एनईईटी युवाओं के लिए पद तैयार किए हों. 15 सितंबर को दिल्ली में एमसीए की ओर से आयोजित एक बैठक में उद्योग के नुमाइंदों ने यह मुद्दा उठाया. कई कंपनियों ने सुझाव दिया है कि केवल ऑनलाइन पोर्टल पर निर्भर रहने की बजाए उन्हें पीएमआइएस इंटर्न को सीधे कैंपस से नियुक्त करने की अनुमति दी जाए. उनका तर्क है कि आमने-सामने की बातचीत भागीदारी में सुधार ला सकती है.
एमसीए भी कुछ सुधारों पर विचार कर रहा है, मसलन पोर्टल को पूरे साल खुला रखना, इंटरफेस में सुधार, मोबाइल ऐप लॉन्च करना और लोकेशन-आधारित विकल्पों के लिए जियो-टैगिंग जोड़ना. एमसीए शीर्ष 500 के बाहर की कंपनियों को भी शामिल करने पर विचार कर रहा है.
इस पहल की संभावनाओं और उसके इरादों से इनकार नहीं किया जा सकता. मगर कमजोर शुरुआत ने कई ढांचागत खामियों को उजागर कर दिया है. जब तक इन्हें दुरुस्त नहीं किया जाता, पीएमआइएस ऐसी सरकारी योजना बनकर रह जाएगी जिसके पास भारी-भरकम बजट तो होगा मगर वह जमीनी स्तर पर सार्थक असर पैदा करने में नाकाम रहेगी.
योजना
केंद्रीय बजट 2024-25 में घोषित, पीएमआइएस का मकसद शीर्ष 500 कंपनियों में एक करोड़ युवाओं को उद्योग में एक साल का अनुभव दिलाना है ताकि उनकी रोजगार की संभावनाएं बढ़ सकें.
योग्यता
केवल 21-24 साल के युवा, जो न फुल-टाइम पढ़ रहे हों, न फुल-टाइम रोजगार में हों और जिनके परिवार में कोई सरकारी नौकरी में न हो या सालाना आठ लाख रुपए से ज्यादा आय नहीं हो
कौन योग्य नहीं
आला संस्थानों (आइआइटी, आइआइएम, एनएलयू, आइआइआइटी वगैरह) के ग्रेजुएट, प्रोफेशनल या ऊंची डिग्री वाले (सीए, सीएमए, सीएस, एमबीबीएस, एमबीए, स्नातकोत्तर वगैरह), केंद्र या राज्य सरकार के किसी अप्रेंटिशिप, स्किल या ट्रेनिंग योजना में पंजीकृत लोग
कितना पैसा मिलेगा
सरकार से महीने का 4,500 रु. भत्ता, कंपनी की ओर से कम से कम 500 रु. का अतिरिक्त भत्ता, सरकार की ओर से 6,000 रु. का एकमुश्त भत्ता, पीएम जीवन ज्योति बीमा योजना और पीएम सुरक्षा बीमा योजना के तहत बीमा, इंटर्नशिप सर्टिफिकेट
क्या है खामियां?
> अभ्यर्थी को जानकारी, जागरूकता, दिशा-निर्देश का अभाव. कोई थर्ड पार्टी सलाह देने के लिए नहीं. लिहाजा, अभ्यर्थियों को नहीं मालूम कि उन्हें दूसरी जगह भेजा जा सकता है या फर्म में आठ घंटे खड़े रहकर काम करना पड़ सकता है
> महिलाओं के लिए दूसरी जगह जाना अमूमन मुश्किल होता है
> अभ्यर्थियों को स्थायी, आम तौर पर सरकारी नौकरी की चाहत होती है, जिसमें अधिक सुरक्षा हो
> 5,000 रुपए स्टाइपेंड बेहद कम, अभ्यर्थी इससे ज्यादा तो घर से ही कोई छोटा-मोटा या मनरेगा में काम करके कमा सकते हैं
> योग्यता की शर्त भी कड़ी, जिससे दायरा बेहद सीमित हो जाता है. इसके अलावा लंबे समय तक इनसे काम लिया जाता है.
> कई अभ्यर्थियों की शिकायत है कि उनके साथ कर्मचारी का व्यवहार भी अच्छा नहीं होता है.
कैसे करें दुरुस्त
> ग्राम पंचायतों के माध्यम से लोकल एडवोकेसी प्रोग्राम की गति बढ़ाएं ताकि इस योजना को जमीनी स्तर पर अपनाया और स्वीकारा जा सके
> इंटर्न की अपेक्षाओं में तालमेल और नौकरी के लिए आवेदन करते समय उनका मार्गदर्शन करने के लिए थर्ड पार्टी एजेंटों को शामिल करें
> खास काम के वास्ते दूसरे शहर जाने वाले युवाओं के लिए मासिक स्टाइपेंड 5,000 रुपए बढ़ाएं. कंपनियां गुजर-बसर करने लायक पैसा उपलब्ध कराने के लिए उचित राशि के भुगतान पर विचार करें तो बेहतर होगा
> आयु के मामले में अधिक लचीला रुख अपनाकर निक्वन सीमा को 21 से घटाकर 18 वर्ष किया जा सकता है और ऊपरी आयु सीमा की योग्यता को खत्म किया जा सकता है
> पोर्टल को लंबी अवधि के लिए या लगातार भी खुला रखा जा सकता है ताकि कंपनियां जब चाहें आवेदन कर सकें और एचआर टीमों पर दबाव न पड़े
> इंटर्नशिप अवधि को लचीला बनाएं. मसलन, रिटेल में इंटर्नशिप के लिए पूरे एक साल की आवश्यकता नहीं है; 3-6 महीने ही पर्याप्त हो सकते हैं. दूसरी ओर, मैन्युफैक्चरिंग इंटर्नशिप 12 महीने की हो सकती है

