
- गजेंद्र सिंह भाटी
यूरोप के दो-तिहाई/60 लाख यहूदियों को 'शोआ’ (1939-45) में हिटलर ने नहीं मारा था. उन्हें उस घृणा ने मारा था जो 3,000 से ज्यादा वर्षों से उनके विरुद्ध विश्व में व्यापी. उन्हें झूठ कलंकित किया गया कि यहूदियों ने ईसा मसीह को मारा और उसके बाद उनका उत्पीड़न होता चला गया. संसार भर में उन्हें भगाया गया. विस्थापित किया गया. उनकी हत्या इस घृणा ने की थी.
सीबीएस 60 मिनट्स की प्रोड्यूसर मैरी मेप्स के संदिग्ध जर्नलिज्म पर बेस्ड ट्रूथ (2015) से डायरेक्शन में उतरने वाले जेम्स वेंडरबिल्ट ने अपनी नई फिल्म नूरेंबर्ग में उसी घृणा को कटघरे में खड़ा किया है. यह एक नायाब मानवीय फिल्म है जिसे आज हर किसी को देखना चाहिए. यह हिस्ट्री ही नहीं है, कहें तो उससे कहीं ज्यादा यह वर्तमान और भविष्य की कहानी भी है.
कहानी 7 मई, 1945 में खुलती है. हिटलर मर चुका है. 7 करोड़ लोग मारे जा चुके हैं. हिटलर के बाद दूसरे नंबर का अधिकारी हरमन गोरिंग (रसेल क्रो) ऑस्ट्रिया में पकड़ा जाता है. गोरिंग को मारने के बजाय उसका ट्रायल करना चाहते हैं अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जैक्सन. केस मजबूत करने को भेजे जाते हैं सैन्य मनोचिकित्सक डॉ. डगलस केली (रामी मलेक). वे इन नाजी बंदियों के मस्तिष्क के प्रति आकृष्ट हैं. कि ये शैतान कैसे बने?

आम इंसानों से इनमें वह क्या अलग है कि ये ऐसी नृशंसताएं कर गए? ऐसी नृशंसताएं कि पहले जेम्स मॉल की डॉक्युमेंट्री द लास्ट डेज (1998) में और फिर नूरेंबर्ग में नाजी शिविरों की वीभत्स फुटेज देखने वालों की आंखें फटी रह गईं. सेना के बड़े अफसर भी कांप गए. डॉ. केली मानते हैं कि इन 'शैतानों’ के मस्तिष्क को समझ लिया तो समाज में इनका निर्माण रोका जा सकेगा. डॉ. केली और गोरिंग के बीच संवाद होता है. गोरिंग कह देता है कि ''मैं बचकर निकल जाऊंगा’’, और अंत में दूसरे अर्थों में होता भी ऐसा ही है.
यह फिल्म उन अमेरिकी विद्यार्थियों और एक्टिविस्टों को अवश्य ही देखनी चाहिए जो वैंडी सैक्स की डॉक्युमेंट्री ऑक्टोबर 8: द फाइट फॉर द सोल ऑफ अमेरिका में इज्राएल की आलोचना में हद पार कर जाते हैं और आते-जाते आम यहूदी लोगों के सामने हाथ उठाकर 'हाइल हिटलर!’ करते हैं. हिटलर की प्रशंसा करते हैं. कहते हैं कि यहूदी नरसंहार उचित ही हुआ. यह करते हुए वे सब हिटलर ही हो जाते हैं.
नूरेंबर्ग में नाजी वहशियों के मस्तिष्क को पढ़ने के बाद निष्कर्ष में डॉ. केली एक रेडियो शो पर बोलते हैं—''पहले मुझे लगा कि इन शैतानों में कुछ खास होगा. लेकिन अंत में मैंने पाया कि उनमें कुछ भी भिन्न न था. बाकी इंसानों जैसे ही इंसान थे. मैं मानता हूं नाजी हर देश में हैं.’’ इस पर रेडियो शो का सकपकाया होस्ट कहता है, ''नाजी अमेरिका में तो नहीं हैं.’’ केली उसका खंडन करते हैं. उनका इशारा हम सबकी तरफ होता है.
उस इज्राएल की तरफ जिसने 7 अक्तूबर को हमास के किए आतंकी हमले की असमानुपातिक प्रतिक्रिया में 60,000 से ज्यादा फलस्तीनी मार दिए. उन सबकी तरफ जो विश्व के हर यहूदी को इसके लिए निशाना बना रहे हैं. हम सबकी तरफ जिनका मॉरल कंपास वर्तमान युद्धों में हिला है. नूरेंबर्ग के बाद इस विषय पर बनी महानतम फिल्मों में से एक द बॉय इन द स्ट्राइप्ड पजामाज (2008) भी देखें जिसके शीतल छींटे सकल संसार का अंतर्मन पवित्र करते हैं. वहशी को भी मनुष्य बना जाते हैं.
सिने-सुझाव -
द रिवर 1951
बंगाल में द रिवर की शूटिंग से पहले इसके निर्देशक ज्यां रेनुआं उनके साथ चल रहे सत्यजीत रे को समझा रहे थे: ''एक फिल्म में आपको बहुत-सी चीजें दिखाने की जरूरत नहीं लेकिन उपयुक्त चीजें दिखाने के लिए आपको बेहद चौकन्ना रहना होता है.’’ तमाम लोकेशन तलाशने के बाद उन्होंने केले की बगिया और उससे सटा ताल खोजा-दिखाया, अमेरिकी दर्शकों के सामने जैसे बंगाल खड़ा हो गया.
रुमेर गॉडेन के इसी नाम के उपन्यास पर बनी यह फिल्म गंगा के किनारे जूट मिल चलाने वाले एक विदेशी की बेटी हैरियट की कहानी है. इसमें मजदूर, उनका सकल समाज, बंगाल की संस्कृति-उसका संगीत, दीवाली और राधा-कृष्ण के रूपक किस्से में नितांत प्रामाणिक यथार्थ के साथ गुंथते-बिंधते हैं. मार्टिन स्कोरसीजी, वेस एंडरसन सरीखे फिल्मकारों के अलावा प्रख्यात समीक्षक लॉरा मलवी के मानस पर भी इस फिल्म ने गहरा असर डाला है.
कहां देखें: यूट्यूब
फ्रैंकनस्टाइन 2025
गिलेरमो देल तोरो की द शेप ऑफ वाटर (2017) की याद है आपको? एक कृत्रिम उभयचर प्राणी और एक सफाईकर्मी एलाइसा की प्रेमकथा! विज्ञान, कल्पना और मनुष्यता को इस बार उन्होंने विहंगम स्तर पर मिलाया है ब्रिटिश उपन्यासकार मैरी शेली के नॉवेल फ्रैंकनस्टाइन; ऑर द मॉडर्न प्रॉमेथियस (1918) की जमीन पर. वे कह चुके हैं कि निर्देशन के बारे में समझ विकसित होने के समय से ही इसे बनाना उनका सपना रहा है. क्लोजअप का लोभ किए बगैर वे लाँग और मिड शॉट में पूरी कथा कह जाते हैं.
कहां देखें: नेटफ्लिक्स
साइको 1960
महान फिल्मकार एल्फ्रेड हिचकॉक की फिल्मोग्राफी के आखिरी दौर की फिल्मों में होने के बावजूद उनका नाम आने पर सबसे पहले साइको ही जेहन में उभरती है. इस थ्रिलर का किस्सा अब जग विख्यात हो जाने के बावजूद नॉर्मन बेट्स (एंथनी पारकिंस) के मोटेल में शीशे के पीछे कत्ल और उसके तहखाने में कुर्सी पर जड़े कंकाल का दृश्य उभरते ही देह ठंडी पड़ जाती है.
कहां देखें: यूट्यूब

