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प्रधान संपादक की कलम से

नया करने की चाह लिए आधुनिक किसान टेक्नोलॉजी को हाथोहाथ ले रहे हैं. रोपाई से लेकर कटाई तक डेटा के आधार पर फैसले लेकर दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन रहे.

10 दिसंबर 2025 अंक
10 दिसंबर 2025 अंक
अपडेटेड 17 दिसंबर , 2025

- अरुण पुरी

हमें पेट भरने के लिए क्या चाहिए? दो रोटी. दशकों से हम देखते आए हैं कि 'रोटी' का होना ही भरे हुए पेट का सूचक है. लेकिन बीते कुछ वर्षों में डॉक्टरों और पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञों ने नीति-निर्माताओं के सामने यह सवाल रखा है कि क्या पेट भरना ही पर्याप्त है? कस्बाई और ग्रामीण इलाकों तक टाइप-2 डायबिटीज, दिल, गुर्दे और किडनी से जुड़ी बीमारियों, मोटापे और पीसीओडी की पहुंच ने हमें बताया है कि महज पेट भरना नहीं, सही भोजन से पेट भरना आवश्यक है.

यह बदलाव हमारी थाली को नया रूप दे रहा है. पहले जहां लोग अधिक कैलोरी वाले भोजन पर निर्भर थे, अब ध्यान पौष्टिक और संतुलित खाने पर जा रहा है. इसके चलते वे मौसमी फल, जो कभी दुर्लभ समझे जाते थे, अब पूरे साल मोहल्लों की दुकानों और ठेलों पर आसानी से मिल जाते हैं. भारत में उगाए जा रहे विदेशी ड्रैगनफ्रूट और कीवी हमारे खाने में नई ताजगी और रंग भर रहे हैं. परवल, लौकी, टिंडा और करेला जैसी देसी सब्जियां फिर से पसंदीदा बनती जा रही हैं. और चाय की प्याली में भी अब रिफाइंड शुगर की जगह धीरे-धीरे ऑर्गेनिक गुड़ अपनी मिठास घोल रहा है.

बदलती थाली के साथ कृषि का नक्शा बदलना लाजिमी है. आज भारत का हॉर्टिकल्चर इकोसिस्टम किसानों और कृषि कारोबारियों की भागीदारी के साथ अपने पांव पसार रहा है. अभावों में पले-बढ़े हरदोई (उत्तर प्रदेश) के किसान राजकुमार मौर्य की कहानी इस बात की तस्दीक करती है. वे आलू, धान जैसी परंपरागत फसलों से अपने परिवार का पेट नहीं पाल पा रहे थे.

लगभग दो दशक पहले उन्होंने एक बड़ा प्रयोग करते हुए अपनी खेती की जमीन में बांस की बल्लियां गाड़ कद्दू और परवल जैसी सब्जियां उगाना शुरू किया. आज की तारीख में वे अपने क्षेत्र में मल्टीलेयर खेती के अगुआ हैं, जिसमें वे एक ही जमीन के टुकड़े पर अलग-अलग परतों में कई सब्जियां उगाकर 10 लाख रुपए प्रति वर्ष तक की कमाई कर रहे हैं. ऐसी ही कहानियों का घर भारत आज आम, केला, अमरूद, पपीता, अनार और आंवला जैसे कई फलों के उत्पादन में दुनिया में अग्रणी है और फलों व सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन चुका है.

एक दशक पहले के मुकाबले, आज खाद्य सुरक्षा मानकों और जीआइ टैगिंग के बेहतर कम्प्लायंस की वजह से प्रीमियम मार्केट तक ज्यादा पहुंच के साथ एक्सपोर्ट मजबूत हुआ है. 2016 में लॉन्च हुए ई-नैम (इलेक्ट्रॉनिक-नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट) से मिलने वाली सुविधाओं के तहत अब किसान देश और दुनिया के कृषि मार्केट से जुड़कर अपनी फसल से ज्यादा से ज्यादा दाम कमा सकते हैं. बेहतर कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं के चलते अब उन्हें पहले के मुकाबले कम नुक्सान झेलना पड़ता है.

मसलन, फतेहाबाद (हरियाणा) से आने वाले आधुनिक किसान आनंदवीर गिलनखेड़ा ने किन्नू, अनार और अमरुद की बागवानी में ऐसी व्यवस्था बनाई है कि अगर किसी एक फल में किसी सीजन अपेक्षित पैदावार नहीं मिलती है, तो भी आमदनी होती रहती है. वे बताते हैं, ''किन्नू में साल में एक बार फल आते हैं, वहीं अमरुद में तीन बार. अगर किसी साल किन्नू की उपज अच्छी न हो, तो अमरुद की वजह से घाटा नहीं होता.'' 

केंद्र सरकार ने साल 2014-15 में मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (एमआइडीएच) के जरिए इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया. इसके अंतर्गत किसानों को जागरूक कर, बीज को बेहतर करने और माइक्रो इरिगेशन जैसी तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया. इसकी जीती-जागती मिसाल सीकर जिले की संतोष देवी खेदड़ हैं जिन्होंने राजस्थान के गर्म मौसम में पिछले नौ बरस से सेब की खेती कर सभी को हैरत में डाल दिया है. इसी जिले की, उनकी हमनाम संतोष पचार ने तो खेती में ऐसा नवाचार किया कि आज उन्हें अपने नाम से गाजर की एक किस्म का पेटेंट प्राप्त है. महज आठवीं तक पढ़ीं पचार ने एक दिन गाजर के बीज में ताजा शहद और घी मिला दिए. नतीजा, मीठी और चमकदार गाजर जो मंडी में पहुंचते ही बिक जाती हैं. वे कहती हैं, ''आड़ी-टेढ़ी गाजरों के दाम नहीं मिलते थे. तभी मैंने ठान लिया कि कुछ नया करना होगा.''

नया करने की चाह लिए आधुनिक किसान टेक्नोलॉजी को हाथोहाथ ले रहे हैं. रोपाई से लेकर कटाई तक डेटा के आधार पर फैसले लेकर दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन रहे. सैटेलाइट मॉनिटरिंग से फसल की सेहत की 'रियल टाइम' जानकारी, मौसम से जुड़ी जानकारी, डिजिटल क्रॉप मैपिंग, खेत के बीते वर्षों के इतिहास की समीक्षा कर कस्टमाइज्ड सलाह का किसान इस्तेमाल करना सीख रहे हैं. बरेली (उत्तर प्रदेश) के एक गांव में शराब बनाने के लिए मुफीद अंगूर उगा रहे अनिल साहनी ने 2005 में ही अपने खेतों में 'वेदर स्टेशन' बना लिया था. खेतों में लगे कुल 22 सेंसर्स की मदद से वे लगातार अपनी फसलों के साथ प्रयोग करने में सफल रहे. वहीं गिलनखेड़ा कहते हैं, ''मैं दुनिया में कहीं भी रहूं, एक ऐप के जरिए मुझे अपने खेत की मिट्टी का हाल पता चल जाता है.'' 

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के मुताबिक, 2014 से 2024 के बीच भारत ने 819 हॉर्टिकल्चर फसलों की खेती की है. इसमें फलों की 123 और सब्जियों की 429 किस्मों के अलावा मसाले, फूल, सजावटी पौधे, और औषधीय पौधे शामिल हैं. आने वाले पन्नों में ऐसे हजारों किसानों में से कुछ की चुनिंदा कहानियां हैं जिन्होंने इन आंकड़ों को जीवंत रूप दिया है. इंडिया टुडे हिंदी के रिपोर्टर आशीष मिश्र, आनंद चौधरी, हिमांशु शेखर, पुष्यमित्र, मनीष दीक्षित और आनंद दत्त ने हिंदी पट्टी के राज्यों में घूमकर इनके खेतों का दौरा किया और प्रोत्साहित कर देने वाली इनकी कहानियों को जुटाया है. 

इन प्रयोगधर्मी किसानों में कुछ अभावों में पले तो कुछ मल्टीनेशनल कंपनियों की नौकरियां छोड़कर अपने गांव लौटे. कुछ ने फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाकर सैकड़ों रोजगार दिए तो अन्य ने हजारों किसानों को प्रशिक्षित किया. न सिर्फ खुद फसल से सफल हुए, बल्कि कृषि की तस्वीर बदलते हुए आम भारतीयों की थाली में रंग भर दिया.

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