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व्याकरण से आगे शब्दों के भीतर

सुरेश पंत कई भाषाओं के ज्ञाता हैं. इससे पहले दो भागों में आई उनकी कृति शब्दों के साथ-साथ पाठकों के बीच काफी सराही जा चुकी है. साधो! शब्द विचारो इसी शृंखला की स्वाभाविक कड़ी कही जा सकती है.

साधो! शब्द विचोरो पुस्तक का कवर
साधो! शब्द विचोरो पुस्तक का कवर
अपडेटेड 31 जुलाई , 2026

हिंदी भाषा के समकालीन परिदृश्य में व्याकरणिक शुद्धता, वर्तनी और शब्दों की गहरी समझ में एक तरह का भटकाव देखने को मिलता है. ऐसे में सुरेश पंत की यह कृति साधो! शब्द विचारो हिंदी की भाषाई विरासत और सांस्कृतिक चेतना को संरक्षित करते हुए व्याकरण एवं शब्द प्रयोग की व्यावहारिक समस्याओं में मार्गदर्शक का कार्य करती है.

यह मार्गदर्शन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज एक ही बात को बहुत देर तक, बहुत अलग-अलग शब्दों में कहने का दौर है. दिलचस्प बात यह है कि  इसके बावजूद कहने वाले को विश्वास नहीं रहता कि उसकी कही बात सही है.

जब हर किसी के पास कहने को बहुत कुछ होता है तब यह मान लिया जाता है कि उसके पास कुछ नहीं है या सटीक शप्दों के साथ तर्कों की कमी है. ऐसे में यह कृति अपने पाठकों से शब्दों पर विचार करने लिए का आह्वान करती है और शप्दों को शुष्क नियमों की संहिता से बाहर निकाल जीवंत सामाजिक व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करती है.

पुस्तक का शीर्षक कबीर के पद, साधो! शब्द साधना कीजै, जो ही शब्दते प्रगट भये सब सोई शब्द गहि लीजै से उद्धृत है. कबीर का 'साधो’ संबोधन आत्मीय भाव लिए है. कभी उपदेशात्मक दूरी नहीं बनाता.

सदैव पाठक को संवाद में उतार लेता है. लेखक ने इसी शैली को अपनाया है. शब्दों और व्याकरण चर्चा को कक्षाई व्याख्यान से निकालकर आत्मीय संवाद में बदल दिया है. यहां 'शब्द विचारो’ में 'विचार’ क्रिया के रूप में आता है यानी शब्दों पर मनन करो, उन्हें जिओ. केवल रटो मत. पूरी किताब इसी अनुशासन और प्रेम की भावना से बंधी है.

सुरेश पंत कई भाषाओं के ज्ञाता हैं. इससे पहले दो भागों में आई उनकी कृति शब्दों के साथ-साथ पाठकों के बीच काफी सराही जा चुकी है. साधो! शब्द विचारो इसी शृंखला की स्वाभाविक कड़ी कही जा सकती है. हालांकि एक अंतर है, पिछली किताबों में व्याकरण कम, शब्द-प्रयोग अधिक था; यहां व्याकरण के व्यावहारिक पक्ष को भी जगह मिली है, यह दिखाने के लिए कि नियम व्यवहार से जन्मते हैं, आदेश से नहीं.

पुस्तक के करीब 105 अध्याय शब्दों, एक से लगने वाले शब्दों, एक ही अर्थ में प्रयोग होने वाले शब्दों या रोजमर्रा में बरते जाने वाले युग्मों पर केंद्रित हैं. जैसे वर्तमान में बहुचर्चित 'भक्त’ शब्द के मानी वही हैं जो 'अंधभक्त’ के हैं? क्या 'भक्त’ और 'चमचा’ एक ही होता है? या 'खेद’ और 'दुख’ क्यों जताया जाता है और 'शोक’ क्यों मनाया जाता है?

पुस्तक का हर अध्याय शब्दों के अनुरूप अपना ढांचा तय करता है. फिर व्युत्पत्ति से होकर समकालीन प्रयोग तक की यात्रा करता है. बीच में उदाहरण-वाक्य भी आते हैं और अंत में स्पष्ट भेद भी. जैसे दिल और मन अध्याय में सुरेश पंत बताते हैं कि दिल भौतिक अंग हृदय का पर्याय है जबकि मन रूपाकार विहीन है.

दिल दिया जाता है, मन नहीं. हालांकि वे रहीम का दोहा उद्धृत करना नहीं भूलते जहां अपवादस्वरूप राधा-कृष्ण प्रसंग में मन के लेन-देन की बात है. इसी तरह छह, छ: अध्याय में बताया गया कि कैसे मध्यकाल में फारसी प्रभावित पढ़े-लिखे वर्ग ने संस्कृतनिष्ठता जताने के लोभ में विसर्ग जोड़कर 'छ:’ को गलत ढंग से 'शुद्ध’ बना डाला. इसके लिए वे आचार्य किशोरीदास वाजपेयी की स्थापना को विचारणीय मानते हैं.

आभार और धन्यवाद में वे भार, वाद और धन्य जैसे मूल घटकों की व्युत्पत्ति खोलकर समझाते हैं तो विमोचन और लोकार्पण  में वे मुच् धातु और लोक-अर्पण के भेद से बताते हैं कि कोई किताब कब विमोचित होती है और कब लोकार्पित.

शब्द को केवल शब्दकोशीय अर्थ तक सीमित न रख उसके सामाजिक जीवन, संदर्भ, भावनात्मक रंग तक ले जाना किताब की शक्ति है. भूमिका में भी कहा गया कि यह पुस्तक 'सिद्धांत और नियम’ के भेद को केंद्र में रखती है.

डिजिटल और मीडिया-प्रधान समय में जहां वर्तनी की गलती आम बात हो चुकी है, यह पुस्तक नुक़्तों, वर्तनी और वाक्य-रचना की भूलों को गंभीरता से पकड़ती है पर बोझिल हुए बिना. भाषा को व्यक्ति की न निजी संपत्ति मानना, न उसे मनमाने प्रयोग की खुली छूट देना—इन दो अतियों के बीच का संतुलित मार्ग ही इस कृति को समय की मांग बनाता है.

साधो! शब्द विचारो हिंदी के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, पत्रकारों और भाषा प्रेमियों के लिए एक अनिवार्य पुस्तक है.


पुस्तक का नाम: साधो! शब्द विचारो
लेखक: सुरेश पंत
प्रकाशन: पेंगुइन स्वदेश 
कीमत: 399 रुपए 

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