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अतीत पर किसका अधिकार?

यह परियोजना 10+2 से लेकर डॉक्टोरेट स्तर तक चलती है. ऐसे में इतिहास-लेखन की परियोजनाएं सामाजिक-सांस्कृतिक और अंतत: चुनावी स्वर ग्रहण कर लेती हैं.

'हू ओन्स द पास्ट' पुस्तक का कवर
'हू ओन्स द पास्ट' पुस्तक का कवर
अपडेटेड 17 जुलाई , 2026

- रमाशंकर सिंह

व्यक्तियों विचारों और विश्वासों के बीच वर्चस्व की लड़ाई वास्तविक मैदानों में ही नहीं लड़ी जाती बल्कि वह इतिहास-लेखन के क्षेत्र में भी खिंची चली आती है. यह एक ऐसा इलाका है जहां अतीत की समझ बहुत ही परिवर्तनशील है. यह भी देखा जाता है कि समय, देश और राजनीतिक वातावरण के बदलते ही अतीत की समझ और उस पर होने वाली चर्चा भी बदल जाती है.

चूंकि इतिहास-लेखन से अतीत का बोध आने वाली पीढ़ियों में स्थानांतरित किया जाता है, उसे विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में रूप दिया जाता है इसलिए इतिहास-लेखन एक नाजुक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है. शान कश्यप की किताब हू ओन्स द पास्ट: हाऊ हिस्टोरियंस (री)रोट इंडियाज पास्ट ऐंड प्रेजेंट, 1870-2020 इसी कहानी को बयान करती है.

समीक्ष्य पुस्तक में परिचय को छोड़कर दस अध्याय हैं जो एक विषय के रूप में इतिहास पढ़ाए जाने और उसके लिखे जाने के वैचारिक आधारों की पड़ताल करते हैं. परिचय में लेखक ने 'टेक्स्टबुक नेशन’ की अवधारणा पेश की है कि किस प्रकार कोई देश अपने को एकजुट रखने, एक सञ्जयता के रूप में पेश करने और सबसे बढ़कर अपनी जनता के दिमागों को किसी खास दिशा में ले जाने के लिए पाठ्यपुस्तकों का सहारा लेता है. 

नौजवान इतिहासकार शान कश्यप की यह पुस्तक औपनिवेशिक काल (1870-1947) से लेकर मोदी युग (2014-20) तक, विभिन्न राजनीतिक समयों में इतिहास को लेकर बनी शासकीय समझ को डिकोड करने का प्रयास करती है. इस किताब के समीक्ष्य वर्ष दावा करते हैं कि उसमें 150 वर्ष शामिल हैं लेकिन लेखक ने औपनिवेशिक भारत और आजादी के आंदोलन के दौरान इतिहास-लेखन को संक्षेप में निपटा दिया है और सीधे मूल विषय पर आया गया है कि किस प्रकार आजाद भारत में सरकारों ने इतिहास-लेखन को एक सरकारी परियोजना का रूप दिया.

यह परियोजना 10+2 से लेकर डॉक्टोरेट स्तर तक चलती है. ऐसे में इतिहास-लेखन की परियोजनाएं सामाजिक-सांस्कृतिक और अंतत: चुनावी स्वर ग्रहण कर लेती हैं. निष्पक्ष दिखने वाले इतिहासकार भी इस परिघटना से बच नहीं पाते क्योंकि इतिहास के लिखने, पढ़ने, पढ़ाने और उससे एक सामाजिक विमर्श तैयार करने की जगह भी तो यही सरकारी स्कूल और विश्वविद्यालय ही हैं.

आजाद भारत में शिक्षा मंत्रालय (बीच के कुछ दशकों में मानव संसाधन विकास मंत्रालय) इस काम के लिए एक नोडल एजेंसी रहा है कि देश को किस तरह से शिक्षित किया जाए और इतिहास, विज्ञान और गणित को लेकर क्या और कितना पढ़ाया जाए. जाहिर सी बात थी कि इसमें औपनिवेशिक दु:स्वप्न भी शामिल थे लेकिन 'राष्ट्रीय एकता’, 'मध्यकलीन भारत’, 'मुस्लिम प्रश्न’ और 'सेकुलरवाद’ की समझ को लेकर कांग्रेस, जनता पार्टी और वर्तमान में केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अपनी समझ रही है.

इस आधार पर एनसीईआरटी की तरफ से समय-समय पर इतिहास का लेखन-पुनर्लेखन किया जाता रहा है. इसे लेकर संसद से लेकर सड़क पर गहन और आवेगपूर्ण चर्चाएं हुई हैं. शान कश्यप की किताब शिक्षा मंत्रालय और इतिहासकारों के बीच सहमति और असहमति के बिंदुओं को बारीकी से उभारती है. 

यह किताब देश के चुनिंदा राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी और सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी इतिहासकारों के बौद्धिक झुकावों का इतिहास भी बन जाती है. हालांकि, यह किताब बौद्धिक इतिहास होने का दावा नहीं पेश करती लेकिन इसका झुकाव उन बौद्धिक हलकों की तरफ है जहां समकालीन राजनीति, भविष्य के देश की कल्पना और इतिहासदृष्टि एक धरातल पर आ जाते हैं. इसका एक अध्याय द बर्थ ऑफ हिस्टोरियंस किताब की पूरी बहस को न केवल सुघड़ ढंग से पेश करता है बल्कि पुराने ढंग के अच्छे निबंधों की याद भी दिलाता है.

इस मुकम्मल ढंग की किताब की थोड़ी-बहुत सीमाएं भी हैं. ऐसा संभवत: एक लंबे कालखंड को लेने और लेखक के पास सीमित समय होने के कारण हुआ होगा. इसमें यदि देश के चुनिंदा इतिहासकारों से बातचीत से संबंधित एक ऐतिहासिक नृतत्वशास्त्रीय अध्याय होता तो और ज्यादा बात बन जाती लेकिन सारी बातों की अपेक्षा एक ही नौजवान इतिहासकार से करना उचित बात नहीं है. जब स्रोत खूब मौजूद हों और एक सुसंगत इतिहास लिखने की चुनौती हो तो एक इतिहासकार को न्न्या करना चाहिए, यह किताब इसे बखूबी सिखाती है. 

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