इस सवाल को ध्यान से सुनिए. आप सुखी हैं?... अगर सवाल औचक था तो तीन सेकंड और लेकर सोच लीजिए. अब बताइए, आप सुखी हैं? क्या कहा? आप थोड़ा और समय लेना चाहते हैं? लीजिए सा’ब थोड़ा और ठहर लीजिए. लेकिन यहां एक दिक्कत है. वह यह कि आपको मालूम ही नहीं. आपने आखिरी के तीन सेकंड में जोर देकर खुद को समझाया कि सुखी तो मुझे होना चाहिए था. फिर आपको अपने फैसले पर किसकी मुहर, किसका वैलिडेशन चाहिए था?
इसी सवाल के गिर्द बना है अमेरिकन वेब सीरीज बीफ़ का पार्ट 2. अप्रैल 2023 में आया इसका पार्ट 1 खासा कामयाब हुआ था. महज पार्किंग के एक छोटे से विवाद से हुई इस सीरीज ने पहले सीजन के सारे एपिसोड्स में अपने दर्शक को अद्भुत ढंग से बांधे रखा था.
अब इसी सीरीज के दूसरे हिस्से का सवाल है कि क्या आप सुखी हैं? रईस दिखने वाले कुछ लोगों की बैठकी के अड्डे, एक कंट्री क्लब के खुशहाल दिखने वाले मैनेजर जोशुआ और उसकी जीवंतता की मूर्ति लगने वाली पत्नी लिंड्से सुखी दिखते हैं. रोजाना मिलते ताकतवर और मशहूर लोग, इनकी शोहरत की रौशनी में चमकते इस जोड़े को देखकर आस-पास के जोड़े आहें भरते.
कितने खुश हैं दोनों, मेड फॉर ईच अदर, पॉजिटिव वाइब्स वगैरह...इन्हीं आहें भरने वालों में से एक जोड़ा है ऐश्ली और ऑस्टिन का. जोशुआ के क्लब में गोल्फ कोर्स में मेहमानों के लिए ड्रिंक्स लेकर खड़ी रहने वाली ऐश्ली और कसरती बदन बनाता बेरोजगार ऑस्टिन शादी करने वाले हैं. लेकिन न अपना ठिकाना है और न फिक्स आमदनी. मेडिकल इंश्योरेंस तक नहीं. ये दोनों अपना जीवन झोंक कर भी रसूखदार दिखने वाले क्लब मैनेजर जोशुआ और उसकी प्यारी पत्नी की तरह कामयाबी हासिल कर सकें तो अपना जीवन सफल मानें.
लेकिन सवाल अब भी वही है? सुखी दिखने और होने में फर्क होता है. सुख के लिहाफ में अक्सर मुंह ढंक कर सच खर्राटे ले रहा होता है. ऐश्ली और ऑस्टिन को जल्दी ही मालूम पड़ता है कि इंसान दूसरों की प्राइवेसी की कद्र इसलिए करता है क्योंकि वह अपनी प्राइवेसी में निहायत लाचार, बिखरा हुआ और अपनी असली खाल में नंगा बैठा सुस्ता रहा होता है.
जोशुआ और लिंड्से तब तक आदर्श पति-पत्नी दिखाई पड़ रहे हैं जब तक वे अपना सब कुछ राख हो जाने से सिर्फ एक चिंगारी दूर हैं. पैशन पर लात धर के चुना हुआ करियर तबाह होने को है. करियर की पीठ पर सवार शादी टूटने को है और चूहे मारने की गोली जेब में है. अब उनके जीवन में कोई भाव शुद्ध रूप में बचा है तो वह है भय.
लेकिन ऐश्ली और ऑस्टिन का पैमाना तो यही दमकीला जोड़ा है. जैसा हमारा आपका पैमाना है, सोशल मीडिया के मंच पर शमा-परवाने से दिखते लोग. जो पर्दा गिरने के बाद पीछे के कमरों में स्पिरिट से रगड़कर चेहरे का अभिनय भी उतार रहे होते हैं. कोल्ड ब्लडेड तरीके से दुखियारों का शिकार करते अभिनेता.
दूसरों के सुख का पैमाना बनते लोग, जो दुख के सबसे गहरे तल पर बस किसी तरह टिके हुए हैं. क्योंकि इस शरीर और पांच इन्द्रियों के साथ इससे अधिक दुख सर्जना संभव नहीं है. इस गहराई में निपट अकेले अभिनय करते हम आप बोझ हैं, उन पर जिन्हें हम सुखी दिखाई पड़ते हैं.
इस भाव को बीफ़ के इस दूसरे हिस्से में जिस नफासत से उकेरा गया है उसकी तारीफ बनती है. संबंधों की परतें उघाड़ते हुए बता पाना कि असल में आप किसी सीध में नहीं बल्कि चक्कर में चल रहे हो, जिसकी धुरी में एक कब्र है, इस सीरीज को हालिया आए चुनिंदा कामों में शुमार करता है. शिकारियों की तरह लौटने का सुख क्या बच्चों की तरह गुम हो सकने के वरदान पर भारी साबित हो सकता है? इनके बीच भूलिएगा नहीं, सवाल अब भी वही है. क्या आप सुखी हैं? क्या आपके पास जवाब है?
एक क्लब चलाने वाले जोड़े के तौर पर ऑस्कर आइज़ैक ने जोशुआ और कैरी मलगन ने लिंड्से के किरदार को अपने बेमिसाल अभिनय से जिस मकाम तक पहुंचा दिया है वहां से अगले सीजन की राह मुश्किल दिखाई देती है.
द क्लास 2008
स्कूली शिक्षा पर केंद्रित दो घंटे की यह फ्रांसीसी फिल्म उस साल दुनिया भर के फिल्म समारोहों में छाई हुई थी. कान फेस्टिवल में इसे पाम डि'योर अवार्ड मिला और ऑस्कर में आखिरी मोड़ तक पहुंची. पत्रकार-शिक्षक-लेखक फ्रांस्वां बेगादियू के आत्मकथात्मक उपन्यास में कुछ और जोड़ते हुए निर्देशक लारेंट कैंटेट ने इसे गढ़ा है.
यह पेरिस के एक बाहरी इलाके के स्कूल के 14-15 साल के बीसेक छात्रों की फ्रांसीसी भाषा की क्लास है. ये वे बच्चे हैं जिनके श्रमिक मां-बाप अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दूसरे भूभाग से धंधे के लिए आए हैं. फिल्म में भी शिक्षक का रोल कर रहे फ्रांस्वां की उदारवादी प्रायोगिक युक्तियों का इम्तिहान शुरू होता है. छात्र उन्हें गे तक कह देते हैं. यह फिल्म ड्रामा नहीं बल्कि गंभीर बहस रचती है.
कहां देखें: गूगल
लेटर फ्रॉम साइबेरिया 1957
यह फ्रांस के चर्चित फोटोग्राफर-फिल्म निबंधकार क्रिस मार्कर के शुरुआती कामों में से है. इसे डॉक्युमेंट्री की बजाय विजुअल यात्रा वृत्तांत कहना ठीक होगा. साइबेरिया में शून्य से 90 डिग्री नीचे के इलाकों तक पहुंचकर वे उस दौर के सोवियत संघ में जमीन और जीवन दोनों में चलते बदलाव को दर्ज करते हैं.
देखने के साथ वृत्तांत के गझिन रसीले कथ्य का उनका पाठ सुनते बनता है. टैगा इलाके को दिखाते हुए वे कहते हैं: साइबेरिया में कहावत है कि जंगल को दैत्य ने बनाया. अच्छा किया. उसका यह जंगल पूरे अमेरिका से भी बड़ा है. पर अमेरिका को भी तो शायद दैत्य ने ही रचा. तेजी से ठेठ नगरीय विकास और नदियों-झीलों के आसपास की जिंदगी सबको वे संतुलन में समेटते हैं.
कहां देखें: मूबी और गूगल
तीन बहूरानियां 1986
एस.एस. वासन दक्षिण के दबदबे वाले नेता-फिल्मकार थे. उन्होंने ही जेमिनी फिल्म्स ग्रुप स्थापित किया था. बेटे एस.एस. बालन के साथ उन्होंने यह फिल्म निर्देशित की, जो उनके ही बैनर की तमिल फिल्म बमा विजयम का रीमेक थी. इसमें एक घर के बुजुर्ग दीनानाथ (पृथ्वीराज कपूर) अपने बेटों शंकर, राम और कन्हैया की बीवियों क्रमश: पार्वती, सीता और राधा को झूठे दिखावों से बाहर लाते हैं, उनकी ''आंखें खोल देते’’ हैं.
तीनो मध्यवर्गीय बहुएं पड़ोस में एक नामी अभिनेत्री शीला देवी (शशिकला) के आ बसने पर उनसे संबंध बनाने-बढ़ाने के लिए महंगे साजोसामान खरीद पतियों को कर्जदार बना देती हैं. कहानी में लय है.
पृथ्वीराज कपूर बीच-बीच में आकर अपने संयत लेकिन प्रभावी संवादों से नैरेटिव को मुट्ठी में किए रखते हैं. इसी तरह की पारिवारिक फिल्में बनाने वाले वासन ने, बताते हैं, ताराचंद बड़जात्या को राजश्री ग्रुप की स्थापना के लिए प्रेरित किया.
कहां देखें: प्राइम वीडियो

