scorecardresearch

विहंगम बलिदान

गुप्तचरी की दुनिया के अपेक्षाकृत कम खंगाले गए किरदारों-घटनाओं को ताजा नैरेटिव में ढालती यह फिल्म 'घुसकर’ मारने वाले नए हिंदुस्तान की वकालत करती है. कल्पनाशील संगीत और अभिनय के उम्दा नमूनों ने भी डाली जान.

Film / Dhurandhar: The Revenge
धुरंधर फिल्म के क्लाइमैक्स के एक दृश्य में रणवीर सिंह
अपडेटेड 15 अप्रैल , 2026

दर्द को हौसले का ईंधन चाहिए होता है बदला लेने के लिए...और ये हरेक में नहीं होता.’’ इस तरह के डायलॉग के साथ खुलती, भारतीय सिनेमा के लिए परिघटना-सी बन चुकी धुरंधर: द रिवेंज इसी के पीछे-पीछे यह भी कहती दिखती है कि नए प्रतिमान गढ़ने के लिए दुस्साहसी होना होता है.

चारेक महीने के भीतर (दिसंबर 2025 से मार्च 2026) दो हिस्सों में रिलीज धुरंधर का बिजनेस कल्पना से परे लगभग 3,000 करोड़ रु. हो चुका है. किसी भी भारतीय फिल्म से मीलों आगे.

फौज में भर्ती होने निकला, पठानकोट का जसकीरत सिंह रांगी (रणवीर सिंह) मां-बाप और बहनों पर गुंडों-जालिमों के ढाए जुल्म के बाद बदला लेता है और जेल जाता है. भारतीय खुफिया योजना के तहत यही जसकीरत हमजा अली मजारी के नाम से पाकिस्तान पहुंच वहां भारत विरोधी अपराध-आतंक-सियासत के इन्फ्रास्ट्रक्चर में घुसता, उसे नष्ट करता है.

दूसरा भाग भी किस्सागोई में औपन्यासिक है, एपिसोड में, तफसील से, छोटे-छोटे किरदारों की भी बैकस्टोरी के साथ. 2016 की नोटबंदी, यूपी विधानसभा चुनाव, दाऊद इब्राहिम, उसकी भारत के नकली नोटों की फैक्ट्री, माफिया अतीक अहमद का धंधा और उसका कत्ल. असल टाइमलाइन की फिक्र किए बगैर ये सारी घटनाएं पर्याप्त कल्पनाओं के साथ जसकीरत के प्रतिशोध के मुख्य नैरेटिव में गुंथती जाती हैं.

ब्लीड इंडिया विद थाउजैंड कट्स का तेवर देकर खड़े किए गए खल चरित्र अपने तल्ख-लपलपाते संवादों से जैसे भारतीय दर्शकों के जज्बात को जख्मी करते हैं. क्लाइमैक्स के करीब मुरीदके में एक खासे लंबे चेज़ सीन के बाद रेलवे प्लेटफॉर्म पर जसकीरत के साथ नत्थमगुत्था आइएसआइ का मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) कुछ इस तरह सुई चुभोता है: ''काफिरों का जल्लाद मेजर इकबाल...तुम सब साले हिंदुस्तानी मर्दों को कलमा पढ़वाऊंगा...दिल्ली को इस्लामाबाद बनाएंगे.’’

फिल्म के कॉन्फिक्लट में हिंदुस्तान-पाकिस्तान के चिर वैमनस्य और हिंदू-मुसलमान के मौजूदा दौर के नैरेटिव का इस्तेमाल है लेकिन इसे वह बार-बार आतंकवाद के फर्मे में ले जाती है. दर्शक चौकन्ना तब होता है जब भारत में 'इतर’ सोच वाली देश/प्रदेश की सरकारों को पाकिस्तान के इस टेरर सिस्टम से फंडिंग के डायलॉग आते हैं. और फिर इकबाल पर भारी पड़ते जसकीरत की चोट: ''ये नया ‌हिंदुस्तान है...घुसेगा भी और मारेगा भी.’’ फिल्म की राजनीति इससे स्पष्ट हो जाती है. इस संदर्भ में डिस्क्लेमर उपयोगी है जो कहता है: ''दर्शकों को अपना विवेक इस्तेमाल करने की सक्चत हिदायत दी जाती है.’’  

पर विहंगम, ऐक्शन और हिंसाप्रधान धुरंधर की ध्वनि, दृश्य और पूरे परिवेश की योजना दिलचस्प है, खासकर बैकग्राउंड म्यूजिक, उसकी पिच भी और टोन भी. भयंकर मारधाड़ और पीछे गाना हम प्यार करने वाले; लंबा चेज़ सीन और गाना तम्मा तम्मा लोगे...फिल्म का संगीत भारी हिंसा के चलते तनी दिलोदिमाग की नसों को बराबर राहत देता चलता है.

एक पहलू और...कई दूसरे किरदार भी बड़े सलीके से निबाहे गए हैं. पॉलिटीशियन जमील जमाली के नितांत सस्पेंस भरे रोल को राकेश बेदी ने संयत अंदाज से यादगार बना दिया है तो रामपाल ने भी मेजर इकबाल के तीखे तेवरों का सुर करीने से साधा है.

गौरव गेरा (जूस विक्रेता आलम), दानिश इकबाल (दाऊद इब्राहिम) और सुविंदर विकी (इकबाल का बाप जहांगीर) के काम को भी गौर से देखिए जरा. यहां तक कि माफिया अतीक से प्रेरित अतीफ के छोटे-से किरदार को सलीम सिद्दीकी ने इलाहाबादी लबो-लहजे को जिस तरह से खेला है वह कॉमिक रिलीफ मुहैया करता है.

पॉलिटीशियन जमील जमाली के नितांत सस्पेंस भरे रोल को राकेश बेदी ने अपने संयत अंदाज से यादगार बना दिया है.

सिने-सुझाव: सुमित सिंह

आइ लॉस्ट माय बॉडी  2019 

अगर आपकी उम्मीद के तराजू में एनिमेशन फिल्मों को अब तक भारी बटखरा नसीब नहीं हुआ तो यह फ्रेंच एनिमेशन आपके इंतजार में है. एक प्रयोगशाला के रेफ्रिजरेटर से एक कटी हुई इंसानी हथेली निकल भागती है. फ्रांस के कस्बों गांवों से होकर आगे बढ़ती यह हथेली अपने शरीर से मिलने जा रही है.

किसी दारुण प्रेम कथा के मिलन जैसा. बचपन से अनाथ और कई तरीकों से जिंदा रहा नॉफेल के हाथ कीे यह हथेली कट के बिछड़ गई थी. बेहद कमाल के बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ यह सफर नॉफेल की पैदाइश से लेकर उसके अब तक के जीवन को रीविजिट करता है. धीरे-धीरे नॉफेल के सफर में आप खुद को उसका हमराह पाएंगे. और इस सवाल का जवाब भी कि आज हम जहां हैं, वहां आखिर क्यों हैं?
कहां देखें: नेटफ्लिक्स

क्रैप हैप्पेन्स  2026 

आपने अब तक जितनी इमोशन ड्रिवेन फिल्में या सीरीज देखी हों उसमें सबसे शानदार कहानी के अंत को याद कीजिए. उस अंत से यह जर्मन सीरीज शुरू होती है. ऊब और थकान की जमीन पर बसे अपने गांव से टोनी बरसों पहले कामयाब रैपर बनने की चाह लिए शहर गया था.

पिज्जा स्टोर पर काम करते हुए टोनी, रैपिंग की हर मुमकिन कोशिश जारी रखता है. एक सुबह रैप बैटल के दौरान टोनी को पता चलता है कि उसकी मां गुजर गई. अब टोनी को जर्मनी के उस ठस गांव में लौटना है जिसे वह सपने में भी नहीं देखना चाहता. अचानक मिला जीवन का सबसे बड़ा मौका, अचानक पता चलना कि टोनी का एक बेटा है, अचानक कामयाबी से बेहद करीबी...ये इतने सारे 'अचानक’ जब इस जर्मन गांव के अनोखे किरदारों से मिलते हैं तो ऐसी कॉमेडी पैदा होती है कि मन गुदगुदाता रहता है.
कहां देखें: नेटफ्लिक्स

काट्टन  2026 

तमिलनाडु के एक गांव में पुलिस स्टेशन इसलिए बंद होने वाला है क्योंकि वहां कोई केस ही नहीं है. अब तक बकरी पालने और घरेलू कामों के साथ नौकरी कर रहे सीधे सरल पुलिस वाले परेशान हैं. अब जब शहर जाने के लिए सामान समेटा जा रहा है तब इलाके में एक कटा हुआ सिर मिलता है.

बंधा सामान खुल जाता है. शरीर खोजे नहीं मिलता, मामला बस सिर का है. बहुत धीमे इस सिर की कहानी सामने आती है. मुत्थु का किरदार कर रहे विजय सेतुपति ने इस मिस्ट्री सीरीज को अपनी शाहकार अदाकारी से अलग ही आसमान दे दिया है. कसा हुआ सस्पेंस ड्रामा देखना चाहते हों तो यह सीरीज देख जाइए.
कहां देखें: जियोहॉटस्टार

Advertisement
Advertisement