भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास अक्सर बड़े नामों और निर्णायक क्षणों के इर्द-गिर्द लिखा गया है किंतु इसकी परिधि में अनेक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनकी उपस्थिति शांत, संयत और लगभग अदृश्य सी रही. राजगोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक मणिबेन पटेल के जरिए इतिहास के इसी मौन क्षेत्र में हलचल पैदा करते हैं जिसे अक्सर मुख्यधारा की कथाएं अनदेखा कर देती हैं.
मणिबेन पटेल को अक्सर सरदार वल्लभभाई पटेल की पुत्री के रूप में याद किया जाता है किंतु राजगोपाल उस सीमित पहचान को तोड़ते हुए मणिबेन को एक जुनूनी सेनानी, प्रखर जनप्रतिनिधि और विचारक के रूप में स्थापित करते हैं. यह पुस्तक उस भारतीय राजनैतिक परंपरा की खोज है जिसमें सत्ता से अधिक महत्व चरित्र, अनुशासन और सार्वजनिक नैतिकता का होता है.
मणिबेन का जीवन स्वतंत्रता आंदोलन की तपस्या में निर्मित हुआ. बारदोली सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक उनकी भूमिका एक सक्रिय सेनानी की रही. उन्होंने महिलाओं को आंदोलनों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया. कई बार गिरफ्तार हुईं. वे आंदोलन की दृश्य राजनीति से अधिक उसके अनुशासन और नैतिक ढांचे को संभालने वाली शक्ति थीं. नारों से अधिक कर्मों में मौजूद.
लौह पुरुष की पुत्री और तिस पर पांच बरस की उम्र में मां की मत्यु, जिम्मेदारियों के एकाकी आकाश में कितनी ही आकांक्षाएं राष्ट्र के एकीकृत पितृस्वप्न में घुल गई होंगी. इसीलिए अपने पिता के साथ मणिबेन का रिश्ता पुत्री के साथ-साथ एक वैचारिक सहचरी का भी था. वे उनके कार्यक्रमों का प्रबंधन करतीं, पत्राचार संभालतीं, आगंतुकों को नियंत्रित करतीं और उनके स्वास्थ्य तथा समय का ध्यान रखतीं.
इस अर्थ में वे सरदार पटेल के सार्वजनिक जीवन की एक जीवित संरचना थीं. पुस्तक में बार-बार यह भाव उभरता है कि वे उनकी छाया थीं. अवश्य थीं किंतु निष्क्रिय छाया नहीं बल्कि एक सजग, अनुशासित और निर्णयक्षम.
इस पुस्तक का एक जरूरी पक्ष मणिबेन की डायरी और पत्रों के अंश हैं. 1936 से लेकर 1950 तक मणिबेन ने जिस सावधानी से घटनाओं, संवादों और निर्णयों को दर्ज किया, वह भारतीय राजनैतिक इतिहास के लिए अत्यंत मूल्यवान दस्तावेज है. इनमें केवल घटनाएं नहीं हैं, राजनीति की मानवीय परतें भी दिखलाई पड़ती हैं.
जैसे, मणिबेन लिखती हैं, मैं टेलीफोन के निकट सोया करती थी ताकि देर रात में आने वाली कॉल्स से पिता की नींद में व्यवधान उत्पन्न न हो. मैं संदेश लिख लिया करती और अगली सबेरे पिता को दिखाया करती.
यह पुस्तक एक तरह का व्यक्ति विश्लेषण भी है. ऐसे ही कश्मीर समस्या पर नेहरू और पटेल के बीच अंतर्विरोध भी पठनीय है.
मणिबेन पहली बार खेड़ा से लोकसभा सदस्य चुनी गईं. कांग्रेस की सांसद होते हुए उन्होंने सार्वजनिक हित में अपनी ही सरकार को घेरने में कसर नहीं छोड़ी. राजगोपाल सिंह वर्मा लिखते हैं कि वे कांग्रेसियों द्वारा सुविधानुसार गांधी का नाम लेने से सहमत नहीं थीं. इसके अलावा स्कूल बैग के अत्यधिक बोझ, विश्वविद्यालयों बढ़ते दबाव से लेकर फिल्मों पर सेंसर, शराबबंदी, रेल यात्राओं में महिलाओं की सुरक्षा और प्रधानमंत्री के रहन-सहन को लेकर भी उन्होंने संसद में जमकर सवाल उठाए. बाकायदा उनके भाषणों के उद्धरण दिए गए हैं.
खादी की मोटी साड़ी, कंधे पर झोला, साधारण जीवन, यह सब मणिबेन के लिए प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक ढंग था. बरसों तक सांसद रहते उन्होंने कभी सरकारी गाड़ियों या विशेष सुविधाओं का उपयोग नहीं किया. महात्मा गांधी से प्रभावित मणिबेन के लिए राजनीति सदैव सेवा रही, विशेषाधिकार नहीं. यह सादगी और साहस तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब वे स्वयं उस राजनैतिक परंपरा से आती हों जहां सत्ता का केंद्र उनके अपने पिता रहे.
मणिबेन पटेल अन्य नेताओं की तरह मंचों की नायक नहीं थीं लेकिन निर्णयों के पीछे खड़ी एक दृढ़ चेतना अवश्य थीं. उनका जीवन एक ऐसी बेटी के तौर पर भी पढ़ा जाना चाहिए जो पिता के संसार में अपना एक अनकहा, अनसुना और अनछुआ संसार बुनती है, जिसे सरदार पटेल की बेटी होने का भारीपन कभी हल्का नहीं होने देता और एक ऐसी स्त्री के तौर पर भी पढ़ना चाहिए जो संबंधों के द्वंद्वों में थोड़ा व्यक्त होते हुए भी बहुत कुछ अव्यक्त होते जीती रही.
पुस्तक का नाम: मणिबेन पटेल
एक जुनूनी सेनानी, प्रखर जनप्रतिनिधि और विचारक की अंतर्यात्रा
लेखक: राजगोपाल सिंह वर्मा
प्रकाशन: पेंगुइन स्वदेश
कीमत: 399 रुपए.

