
ऐसे वक्त में जब भारत-अमेरिका रिश्ते पर भरोसे का संकट मंडरा रहा था, वाशिंगटन के दो प्रमुख वार्ताकार विदेश मंत्री तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्को रूबियो और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने बातचीत की. रूबियो हाल ही पांच महीने में अपने दूसरे भारत दौरे पर मुंबई में थे. इस मुलाकात में रिश्तों को गढ़ने के लिए जरूरी मुद्दों और चुनौतियों पर बेबाक बातचीत हुई.
उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में हो रही देरी, रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी रुख, रक्षा और तकनीकी सहयोग, एच1बी वीजा पर सख्ती और पाकिस्तान से अमेरिका की बढ़ती नजदीकी जैसे कई मुद्दों पर अपना नजरिया साफ किया. अपने मुखिया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नेतृत्व शैली पर भी उन्होंने राय दी. पेश हैं प्रमुख अंशः
• अगर भारत-अमेरिका रिश्तों को एक से दस के पैमाने पर आंकना हो, जिसमें दस का मतलब पक्की साझेदारी हो, तो आप कितने अंक देना चाहेंगे और क्यों?
मार्को रूबियो: मैं इसे अंक में रखना नहीं चाहूंगा, बल्कि मैं कहूंगा कि यह बेहद अहम रिश्ता है. जाहिर है, दोनों बड़े और महत्वपूर्ण देश हैं. हम बहुत लंबे समय से साथ काम करते आए हैं. हमारे कई साझा हित हैं और मिलकर काम करने का लंबा इतिहास भी है. और मेरी राय में, भारत ऐसे अनेक क्षेत्रों में तेजी से प्रगति कर रहा है, जो अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के लिए अहम हैं.
यह स्वाभाविक साझेदारी है. इसलिए मुझे एक से दस अंक का पता नहीं है. मैं यही कहूंगा कि यह रिश्ता आज उतना ही मजबूत है, जितना हमेशा से रहा है. मुझे लगता है कि पांच साल बाद हम पीछे मुड़कर देखेंगे तो इसे दुनिया के सबसे मजबूत रिश्तों में गिनेंगे.
• फिलहाल आप किन दो-तीन चीजों पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहते हैं?
रूबियो: हम चाहते हैं कि यह व्यापार समझौता पूरा हो जाए क्योंकि मेरी राय में, इससे सभी को स्थिरता और निश्चितता मिलेगी. और उसके बाद ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जिनमें हम साथ काम कर सकते हैं—ऊर्जा तथा यकीनन टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और दूरसंचार जैसे उससे जुड़े क्षेत्र वगैरह. हम बहुत कुछ बॉयोमेडिकल और दवा उद्योग में कर सकते हैं. आप जिस क्षेत्र का नाम लें, सहयोग की गुंजाइश है. मैं इस पर घंटे भर बोल सकता हूं.
सर्जियो गोर: मैं इतना और जोड़ूंगा कि आप कोई भी क्षेत्र चुन लें, आज अमेरिका और भारत उसमें पहले से ज्यादा नजदीकी से, ऊंचे स्तर पर और ज्यादा सक्रियता के साथ काम कर रहे हैं—चाहे दवा उद्योग हो या सैन्य अभ्यास. आप जानते हैं कि भारत अमेरिका के साथ किसी भी दूसरे देश के मुकाबले ज्यादा सैन्य अभ्यास कर चुका है. लिहाजा आइटी हो, बिक्री हो या हमारा द्विपक्षीय व्यापार—हर क्षेत्र में हम पहले से कहीं ऊंचे स्तर पर काम कर रहे हैं.


• व्यापार पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि भारत और अमेरिका एक ऐसे समझौते पर दस्तखत करने के करीब हैं जो दूसरे समझौतों से अलग होगा. क्या इस अंतरिम व्यापार समझौते के तहत वाशिंगटन भारत को वह प्रतिस्पर्धी टैरिफ लाभ देने को तैयार है, जिसकी वह मांग कर रहा है?
रूबियो: समझौता पूरा होने से पहले मैं उसकी बारीकियों में नहीं जाऊंगा क्योंकि कुछ मुद्दों पर बातचीत अब भी जारी है, हालांकि उनकी संख्या बहुत कम है. हम समझौते के बेहद करीब हैं और मुझे ऐसी कोई वजह नहीं दिखती जो इसे होने से रोक सके. फिर भी कुछ मुद्दों पर बातचीत चल रही है, इसलिए सब कुछ पूरी तरह तय होने तक मैं विस्तार में नहीं जाना चाहूंगा. इतना कहना काफी है कि समझौता होने पर उसे दोनों देशों के लिए फायदेमंद होना चाहिए और मुझे पूरी उम्मीद है कि वह ऐसा ही होगा.
• भारत व्यापारिक रिश्तों में अनिश्चितता के बजाए निरंतरता चाहता है. लेकिन सुपर 301 का प्रावधान अब भी हमारे सिर पर लटक रहा है. क्या हम टैरिफ में लगातार बदलाव की जगह स्थिरता की उम्मीद कर सकते हैं?
रूबियो: किसी समझौते का मकसद ही निश्चितता पैदा करना होता है ताकि लोगों को पता हो कि वे निवेश कर सकते हैं और दोनों देशों के बीच व्यापार तथा कारोबार किन नियमों के तहत चलेगा. समझौता करने का मूल उद्देश्य यही है. हम इसी दिशा में काम कर रहे हैं और मुझे पूरा भरोसा है कि हम बहुत जल्द एक बेहद अच्छी स्थिति में पहुंच जाएंगे.
• भारत में अमेरिकी निवेश की अगली बड़ी लहर आपको कहां से आती दिखती है और वह किन क्षेत्रों में होगी?
गोर: देखिए, हमारा द्विपक्षीय व्यापार अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर है. पंद्रह साल पहले यह 20 अरब डॉलर था और आज 240 अरब डॉलर है. निवेश दोनों दिशाओं में हो रहा है. भारतीय कंपनियां अमेरिका में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं. राष्ट्रपति ने हाल ही ओवल ऑफिस में एस्सार के प्रतिनिधियों की मेजबानी की थी.
कंपनी अमेरिका में अरबों डॉलर की शानदार इकाइयां खोल रही है, जिनसे स्थानीय समुदायों में अमेरिकियों के लिए नौकरियां पैदा हो रही हैं. दूसरी ओर, यह दोनों देशों के फायदे की स्थिति है. खासकर आइटी क्षेत्र से जुड़ी अमेरिकी कंपनियां भारत आई हैं. जब वे यहां आती हैं तो उससे अमेरिका में भी किसी रोजगार को सहारा मिलता है. यह एकतरफा रास्ता नहीं है. इसलिए हमारा लक्ष्य द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ाना और ऐसे अवसर तलाशना है जिनमें दोनों पक्षों का फायदा हो.
• अब ऊर्जा की बात करते हैं. विदेश मंत्री रुबियो, राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका की रूसी डीजल खरीद को राष्ट्रीय हित में बताया है. साथ ही भारत को रूसी कच्चा तेल खरीदने की छूट देने के लिए प्रतिबंध हटाए गए हैं, जबकि पहले इसी खरीद के लिए भारत पर जुर्माना लगाया गया था. इसकी वजह क्या है?
रूबियो: देखिए, इसमें कुछेक पहलू हैं. पहली यह कि इस समय हमें वैश्विक अर्थव्यवस्था को देखना होगा और विदेश नीति के सभी पहलुओं के बीच समग्र संतुलन बनाना होगा. हर चीज को केवल एक देश या एक टकराव के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर हम अब भी बेहद फिक्रमंद हैं और उसे खत्म कराने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन हम वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसके असर को भी समझते हैं. इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य और अब लाल सागर में भी हालात बिगड़ते जा रहे हैं. इसलिए मेरे ख्याल से राष्ट्रपति ने बहुत समझदारी भरा फैसला किया कि कुछ समय के लिए वैश्विक बाजार में ऊर्जा की अतिरिक्त आपूर्ति आने दी जाए.
इसका फायदा सिर्फ हमें ही नहीं मिलेगा. जाहिर है, इससे अमेरिका को मदद मिलती है, लेकिन डीजल की कीमतें पूरी दुनिया में ऊंची हैं. भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में ठोस प्रगति की है. उसने ऐसा किसी धमकी या दबाव में नहीं किया.
ऊर्जा कहां से ली जाए, उसमें विविधता लाना भारत के अपने हित में है. किसी भी देश को एक ही देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर नहीं रहना चाहिए. भारत पहले से इसी दिशा में बढ़ रहा था. बात रूसी तेल कम खरीदने की उतनी नहीं है, जितनी अमेरिकी, वेनेजुएलाई या पश्चिमी गोलार्ध के दूसरे देशों का कच्चा तेल अधिक खरीदने की है.
मेरे विचार से यह भारत के हित में है और जाहिर है, बेशक, हम इसमें मदद करना चाहते हैं. इससे भी अहम बात यह है कि भारत में रिफाइनिंग बढ़ाने की वास्तविक क्षमता है. वह न केवल ज्यादा तेल शोधन कर सकता है, बल्कि बहुत कम समय में ऐसे निवेश भी कर सकता है जिससे उसकी रिफाइनिंग क्षमता और बढ़े.


• क्या भारत-अमेरिका ऊर्जा सहयोग बढ़ाने के लिए ही आप जामनगर गए थे?
रूबियो: हमारे बीच ऊर्जा सहयोग पहले से है. उस इकाई को देखना, उसके कामकाज को समझना और यह जानना ज्यादा अहम था कि वह कैसे चलती है. वह जबरदस्त प्लांट है. साथ ही रिलायंस ने अमेरिका के ब्राउन्सविल में भी निवेश किया है, जिसके 2029 तक शुरू होने की उम्मीद है.
इसलिए उस कंपनी से बातचीत का यह अच्छा मौका था जो अमेरिका में रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश कर रही है. इसके साथ ही जामनगर का संयंत्र पश्चिमी गोलार्ध से आने वाले ज्यादा कच्चे तेल की रिफाइनिंग में भूमिका निभा सकता है. इससे दुनिया को पश्चिम एशिया पर अपनी निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी.
• भारत ने हाल ही अपने असैन्य एटमी क्षेत्र, खासकर छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों में निजी निवेश का रास्ता खोला है. क्या अब आपको अमेरिकी निवेश के लिए आखिरकार निर्णायक मौका दिखाई देता है?
गोर: इस दिशा में जबरदस्त तेजी आई है. चीजों में समय लगता है और नियम-कायदों से जुड़ी कुछ चुनौतियां भी रही हैं. कुछ भी रातोरात नहीं होता. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को श्रेय देना होगा कि शांति विधेयक पारित हुआ, जिसने एसएमआर और निजी टेक्नोलॉजी के भारत आने का रास्ता खोला. ये बेहद पेचीदा मुद्दे हैं और इनसे आने वाले कई दशकों के रिश्तों की बुनियाद तैयार होगी.
अमेरिका विदेश में अपना पहला एसएमआर लगाने के लिए जिन शुरुआती जगहों पर विचार कर रहा है, उनमें भारत शामिल है. और हम बहुत अच्छी दिशा में बढ़ रहे हैं. इस मुद्दे पर वाशिंगटन, दिल्ली और मुंबई में बैठकें हो चुकी हैं क्योंकि भारत की नियामक एजेंसी मुंबई में है. काम सही दिशा में आगे बढ़ रहा है. मेरा मानना है कि हम जल्द ही इस मुकाम तक पहुंच जाएंगे.
• हम इस वक्त ताज महल पैलेस होटल में बैठे हैं, जो 2008 में मुंबई में हुए भयावह 26/11 आतंकी हमलों का प्रमुख निशाना था. अमेरिका भारत को कैसे भरोसा दिला रहा है कि पाकिस्तान के साथ उसके मौजूदा करीबी रिश्ते आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई की कीमत पर नहीं होंगे?
रूबियो: पहली बात तो यह कि अमेरिका को दुनिया के ज्यादा से ज्यादा देशों के साथ रिश्ते रखने होंगे क्योंकि हमारी वैश्विक मौजूदगी है और दुनिया में होने वाली घटनाओं से हमारे हित जुड़े हैं. पाकिस्तान के साथ हमारा रिश्ता नया नहीं है. अब यह इस तरह आगे बढ़ा है कि उम्मीद है, हम विभिन्न मुद्दों पर उसके फैसलों को ज्यादा प्रभावित कर सकेंगे.
पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते किसी भी तरह भारत के साथ संबंधों की कीमत पर नहीं हैं. आतंकवाद को लेकर हमारी चिंताएं भारत जैसी ही हैं. भारत की तरह हम भी आतंकवाद का शिकार रहे हैं और आज भी हैं. दरअसल, आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका जितनी कार्रवाई दुनिया का कोई दूसरा देश नहीं करता. राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने ही पश्चिम एशिया में आइएसआइएस या दाएश को ध्वस्त किया.
अमेरिका ने ही अल-कायदा को कमजोर किया और बिन लादेन को खत्म किया. अब अमेरिका अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भी ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है. इसलिए मुझे नहीं लगता कि वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका से ज्यादा प्रतिबद्धता किसी दूसरे देश ने दिखाई है. इसमें वे विचारधाराएं भी शामिल हैं जिनसे भारत को खतरा है.
• विदेश मंत्री रूबियो, पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आपने अहम कूटनीतिक भूमिका निभाई थी. युद्धविराम की घोषणा से ठीक पहले 10 मई, 2025 को आपने दोनों पक्षों के नेतृत्व से सीधे बात की थी. क्या आप हमें उसका कुछ जायजा दे सकते हैं कि उन बातचीत में परदे के पीछे क्या हुआ था?
रूबियो: मैं आपको परदे के पीछे की बातें नहीं बताऊंगा क्योंकि फिर भविष्य में कोई मुझसे बात ही नहीं करेगा लेकिन जब भी हमें देशों के बीच ऐसा टकराव उभरता दिखता है जो बड़े संघर्ष या युद्ध में बदल सकता है, हम रचनात्मक भूमिका निभाने की कोशिश करते हैं.
यह कई पक्षों से बातचीत करने की हमारी क्षमता की अच्छी मिसाल था. भारत और पाकिस्तान, दोनों के साथ हमारे पुराने रिश्ते हैं, जो मेरे ख्याल से पिछले कुछ वर्षों में बेहतर हुए हैं. हमने उन्हीं रिश्तों का इस्तेमाल यह पक्का करने के लिए किया कि कोई चिंगारी बड़े टकराव में न बदल जाए और दोनों देशों के लिए हालात ज्यादा मुश्किल न हों.
देखिए, दोनों देशों के बीच तनाव की वजहें सबको अच्छी तरह मालूम हैं लेकिन मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि अमेरिका रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार है क्योंकि हम युद्ध नहीं देखना चाहते. हम कारोबार और व्यापार में साझेदारी के अवसर देखना चाहते हैं और ऐसे काम करना चाहते हैं जिनसे भारत और अमेरिका, दोनों के लोगों को समृद्धि और सुरक्षा मिले.

• अब रक्षा साझेदारी की बात करते हैं. साझा उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और उन्नत हथियार प्रणालियां विकसित करने के मामले में वाशिंगटन कहां तक जाने को तैयार है?
गोर: देखिए, यह सब भारत में पहले से हो रहा है और अब भी जारी है. लॉकहीड यहां है, बोइंग यहां है और साझा उत्पादन चल रहा है. इन उत्पादन प्रणालियों के जरिए अमेरिका और भारत में रोजगार साथ-साथ बढ़ रहे हैं. हमारा रक्षा सहयोग अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर है. केवल आंकड़े देखें तो इसकी कोई बराबरी नहीं है.
पिछले महीने ही अमेरिकी सेना के 500 जवानों ने यहां युद्ध अभ्यास में प्रशिक्षण लिया. तरंग शक्ति अभ्यास में पहली बार एफ-35 विमान भारत आए और भारतीय सेनाओं के साथ संयुक्त अभ्यास में शामिल हुए. हमारे एफ-35 किसी भी देश में नहीं जाते. वे उन्हीं देशों और साझेदारों के पास जाते हैं जिन पर हमें भरोसा है. क्वाड में भारत हमारा बेहद अहम साझेदार है.
विदेश मंत्री के स्तर पर कई बैठकें हो चुकी हैं. एक और बैठक अगले हफ्ते अटलांटा में जी20 सम्मेलन के दौरान होगी. डॉ. जयशंकर वहां होंगे, ऑस्ट्रेलियाई और जापानी प्रतिनिधि भी मौजूद रहेंगे. हम अगले महीने राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी समेत क्वाड नेताओं की बैठक कराने की दिशा में भी काम कर रहे हैं. लिहाजा, क्वाड में बहुत कुछ हो रहा है. रक्षा सहयोग अमेरिका की साझेदारी का अहम हिस्सा है और इसमें भारत मूल्यवान भागीदार है. इस मोर्चे पर काफी कुछ चल रहा है.
• विदेश मंत्री रूबियो, चीन के बढ़ते आक्रामक रवैये के जवाब में आप क्वाड को किस तरह विकसित होते देखते हैं? अहम सप्लाइ चेन सुरक्षित करने और चीन पर निर्भरता घटाने के लिए भारत और अमेरिका मिलकर और क्या कर सकते हैं?
रूबियो: विदेश मंत्री बनने के बाद मेरी पहली बैठक क्वाड की ही थी. पिछले डेढ़ साल में विदेश मंत्री स्तर पर शायद उतनी क्वाड बैठकें हुई हैं, जितनी उससे पहले के चार वर्षों में मिलाकर भी नहीं हुई थीं. अब बहुत जल्द, संभवतः दिसंबर में, नेताओं की बैठक होने वाली है. राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल के अंत तक हम ऐसी और बैठकें कराने की कोशिश करेंगे.
उनके कार्यकाल के अभी ढाई साल बाकी हैं. यह रिश्ता बेहद अहम है, मगर केवल इसलिए नहीं कि चार देश आपस में तालमेल कर रहे हैं. अब इसके ठोस नतीजे भी दिखाई देने लगे हैं. मसलन, समुद्री क्षेत्र की निगरानी—पानी के भीतर क्या हो रहा है, समुद्री केबलों को कहां खतरा है वगैरह. क्वाड इन मुद्दों पर मिलकर काम कर रहा है और जमीन पर वास्तविक प्रगति हो रही है.
सप्लाइ चेन के मामले में भी ऐसा किया जा सकता है. दुनिया भर में और खास तौर पर भारत-अमेरिका रिश्तों में एक बात समान है—हम किसी भी देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर नहीं रहना चाहते. मैं केवल चीन की बात नहीं कर रहा, बल्कि दुनिया के किसी भी देश की बात कर रहा हूं. हमारी अर्थव्यवस्थाओं के लिए अहम किसी भी चीज की 90 फीसद जरूरत के लिए हम किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहते.
कुछ चीजें खुद करने की घरेलू क्षमता हमारे पास होनी चाहिए. यह भारत के हित में है और राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में निश्चित रूप से अमेरिका के हित में भी. हम इस पर मिलकर काम कर सकते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, तकनीक, बॉयोमेडिसिन, दवा उद्योग या महत्वपूर्ण खनिजों जैसे प्रमुख क्षेत्रों में दोनों देशों के फायदे के लिए घरेलू क्षमताएं कैसे विकसित की जाएं. यह सूची बहुत लंबी है.

• भारत हाल ही पैक्स सिलिका में शामिल हुआ है. क्या अब बड़े अमेरिकी निवेश और तकनीकी साझेदारियों की उम्मीद की जा सकती है, जिनसे भारत रणनीतिक सप्लाइ चेन का प्रमुख केंद्र बन सके?
गोर: यह शानदार साझेदारी है. अमेरिका ने पैक्स सिलिका में शामिल होने के लिए जिन शुरुआती 10 देशों को आमंत्रित किया था, उनमें भारत भी था, क्योंकि हमें भारत पर भरोसा है. इस सप्लाइ चेन में वह हमारा अहम साझेदार है. यही वजह है कि विदेश मंत्री एक साल में दूसरी बार यहां आए हैं. मेरा संकल्प है कि अमेरिकी सरकार के शीर्ष अधिकारियों को यहां लाऊं ताकि वे भारत सरकार के शीर्ष स्तर के लोगों से बातचीत कर अवसरों की पहचान कर सकें.
तीन हफ्ते बाद हमारे अटॉर्नी जनरल दिल्ली के अधिकारियों के साथ काम करने यहां आ रहे हैं. राजधानी में मादक पदार्थ विरोधी सम्मेलन होगा और हम अपने डीईए प्रमुख को भी ला रहे हैं. मेरे लिए यह अहम है कि हमारी सरकार के शीर्ष स्तर के अधिकारी भारत में अपने समकक्षों के साथ सक्रियता से जुड़ें.
• विदेश मंत्री रूबियो, आप अमेरिका के दोबारा औद्योगिकीकरण की कोशिशों की बात करते रहे हैं. ऐसे में क्या अमेरिका को पहले की तरह बेहद कुशल भारतीय पेशेवरों का स्वागत नहीं करना चाहिए, बजाए इसके कि वह वर्क वीजा महंगा करे और भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका में पढ़ाई की लागत बढ़ाए?
रूबियो: हमारे आव्रजन कानूनों में बदलाव हुआ है, लेकिन यह बदलाव भारत को ध्यान में रखकर या उसे निशाना बनाकर नहीं किया गया. इसका असर उन भारतीयों पर जरूर पड़ता है जो अमेरिका आना और काम करना चाहते हैं और उन अमेरिकी कंपनियों पर भी, जो उन्हें बुलाना चाहती हैं. लेकिन यह नीति भारत केंद्रित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर लागू है.
सच तो यह है कि दुनिया में मेरी कोई बैठक ऐसी नहीं होती जिसमें वीजा का कोई मुद्दा न उठे. अमेरिका की आव्रजन व्यवस्था खराब रही है. शायद इस कार्यक्रम में नहीं, लेकिन दूसरी व्यवस्थाओं के जरिए दो करोड़ लोग गैर-कानूनी ढंग से हमारी सीमा पार कर देश में दाखिल हुए. कारोबार से जुड़े आव्रजन कार्यक्रमों में भी कई मामलों में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और दुरुपयोग हुआ. उनका इस्तेमाल ऐसे तरीकों से किया गया जिनका कोई औचित्य नहीं था. इससे हमारे समाज में तनाव है.

दुनिया के किस देश में लोग ऐसे में प्रतिक्रिया नहीं देंगे, जब उन्हें लगे कि उनकी कुछ बेहतरीन नौकरियां विदेश से आने वाले लोगों को मिल रही हैं? इन मुद्दों को सुलझाना जरूरी है और हम यही कोशिश कर रहे हैं लेकिन ये कदम भारत के खिलाफ नहीं हैं. ये दुनिया के हर देश पर लागू होते हैं. व्यापार हो या आव्रजन, यही सच है.
मैं समझता हूं कि अमेरिकी नीति में बदलाव से किसी देश पर अनुपात से ज्यादा असर पड़े तो उसे लग सकता है कि उसे निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है. हम व्यवस्था को दुरुस्त करेंगे और ऐसी प्रणाली बनाएंगे जो हमारी अर्थव्यवस्था तथा अमेरिकी जनता के हित में काम करे. अंत में मैं इतना कहूंगा कि मुझे उम्मीद है, भारत सरकार हमेशा भारतीयों और भारत के राष्ट्रीय हित को सबसे ऊपर रखेगी.
लेकिन मैं यह भी चाहता हूं कि सभी लोग समझें कि राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अपने लोगों, अपने कामगारों और अपने देश को पहले रखेगा. मित्र देश ऐसे मतभेदों के बावजूद मिलकर काम कर सकते हैं. हमारे साझा हित, पुराने रिश्ते और समान मूल्य इन मतभेदों को दूर करते हुए ऐसे नतीजों तक पहुंचने में मदद करेंगे जो दोनों देशों के लिए अच्छे हों.

गोर: विदेश मंत्री बिल्कुल सही कह रहे हैं. जब हम ‘अमेरिका फर्स्ट’ कहते हैं तो उसका मतलब ‘अमेरिका अकेला’ नहीं होता. जैसा उन्होंने कहा, जिन बदलावों का असर भारत पर पड़ा है, वे केवल भारत तक सीमित नहीं. अमेरिका को पूरी दुनिया के संदर्भ में अपनी नीतियों की समीक्षा करनी थी. बहुत लंबे समय तक हमारी सीमाएं खुली रहीं और लोग अमेरिका आकर हमारी व्यवस्था का फायदा उठाते रहे.
दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों में ऐसे नेता रहे जिन्होंने अमेरिकी जनता के हितों की परवाह नहीं की. राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में यह बदल गया है. इसका मतलब किसी खास देश को निशाना बनाना नहीं है. हमें नई शुरुआत की जरूरत थी. प्रधानमंत्री ने भी साफ कहा है—‘इंडिया फर्स्ट’. इसमें कुछ गलत नहीं है. उन्हें अपने देश के हितों का ध्यान रखना ही चाहिए. लेकिन लोगों को इस पर हैरानी भी नहीं होनी चाहिए कि हमारा नेतृत्व अपने देश के हितों की रक्षा कर रहा है.

• विदेश मंत्री रूबियो, अब भू-राजनीति की बात करते हैं. राष्ट्रपति पुतिन ने संकेत दिया है कि रूस युद्ध खत्म करने पर चर्चा के लिए अमेरिका और यूक्रेन के साथ त्रिपक्षीय बैठक को तैयार है. रूस-यूक्रेन संघर्ष खत्म करने का व्यावहारिक रास्ता आपको क्या दिखता है?
रूबियो: यह ऐसा संघर्ष है जिसे खत्म करना बेहद मुश्किल है. मैं जानता हूं कि राष्ट्रपति ने इस पर अच्छा-खासा समय लगाया है. हमारे यहां ऐसे लोग हैं जो दिनभर केवल यही कोशिश करते हैं कि इस दिशा में कोई फर्क कैसे पैदा किया जाए और दोनों पक्षों के मतभेद कैसे दूर किए जाएं. मैं बस इतना कहूंगा कि लोग भले ही इसे यूक्रेन का युद्ध कहते रहें, लेकिन यह युद्ध असल में दोनबास को लेकर है.
यह देश के एक इलाके की लड़ाई है. मूल रूप से विवाद यूक्रेन के एक हिस्से के करीब 11 फीसद क्षेत्र को लेकर है, जिसे रूस चाहता है लेकिन सैन्य ताकत से हासिल नहीं कर पा रहा. वहीं यूक्रेन उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं. अपनी संप्रभुता और लंबे समय की सुरक्षा को देखते हुए उसके पास ऐसा न करने की वजहें हैं. इसलिए सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष जंग खत्म करने के लिए कुछ रियायतें देंगे.
यह युद्ध सैन्य तरीके से हल नहीं होगा. इसका अंत केवल कूटनीति से हो सकता है. सवाल यह है कि क्या ऐसे नतीजे तक पहुंचा जा सकता है जिसमें दोनों पक्षों को कुछ लाभ मिले, दोनों कुछ रियायतें भी दें और जंग खत्म हो जाए? यह मुश्किल रहा है, लेकिन मैं यह कह सकता हूं. इतना तो तय है कि दोनों पक्ष जब तक बातचीत की मेज पर नहीं आते, इसे हल करना नामुमकिन है.
इस मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाने में हमें खुशी होगी. हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं. हम यह दावा नहीं कर रहे कि दोनों पक्षों को एक कमरे में बैठा देने भर से समस्या हल हो जाएगी, लेकिन अगर उन्हें एक कमरे में ला ही नहीं सके तो तय है कि इस जंग को सुलझाने की कोई संभावना भी कतई नहीं होगी.

• राजदूत गोर, आपने राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बहुत करीब से काम किया है. उनके साथ सफलतापूर्वक काम करने का राज आखिर क्या है?
गोर: देखिए, राष्ट्रपति असाधारण शख्सियत हैं. मैं उन्हें कई वर्षों से जानता हूं. वे बहुत साफ और सीधे ढंग से बात करते हैं और नतीजों की उम्मीद रखते हैं. आपके प्रधानमंत्री की तरह उनका भी पूरा जोर नतीजों पर रहता है. वे तेजी से आगे बढ़ना और काम पूरा करना चाहते हैं.
सच कहूं तो राष्ट्रपति की यही बात मुझे हमेशा प्रभावित करती रही है. दुनिया का हर नेता नतीजों पर केंद्रित नहीं होता. बहुत-से लोग प्रेस कॉन्फ्रेंस और एक के बाद दूसरी बैठक करना पसंद करते हैं. हमारे राष्ट्रपति नतीजे चाहते हैं और वे नतीजे फौरन और फटाफट चाहते हैं.
• प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनका तालमेल कैसा है?
गोर: दोनों गहरे और प्यारे दोस्त हैं और इसीलिए उनका तालमेल अच्छा है. चीजों को फौरन आगे बढ़ाने, फटाफट काम पूरा करने और नतीजे देने पर दोनों की सोच मिलती है. दोनों का नजरिया तकरीबन एक जैसा है. राष्ट्रपति प्रधानमंत्री का बहुत सम्मान करते हैं.
वे एक-दूसरे को कई वर्षों से जानते हैं और आगे भी लगातार संपर्क में रहेंगे. अकेले इसी महीने दोनों के बीच कई बार फोन पर बातचीत हुई है. परदे के पीछे बहुत कुछ होता रहता है जिसकी लोगों को जानकारी नहीं होती, लेकिन दोनों नेता लगातार संपर्क में रहते हैं.

• विदेश मंत्री रूबियो, अपने बॉस राष्ट्रपति ट्रंप के साथ काम करने का आपका अनुभव कैसा रहा है?
रूबियो: वे ऐतिहासिक शख्सियत हैं, इसमें कोई शक नहीं. वे पारंपरिक किस्म के राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं. असल में वे राजनैतिक शख्सियत हैं ही नहीं. वे कारोबारी हैं और जीवन में उनका नजरिया यह है कि फैसले इस आधार पर लिए जाएं कि व्यावहारिक रूप से क्या सही है.
लेकिन उनकी एक और खूबी है जिसका उन्हें पर्याप्त श्रेय नहीं मिलता—उनके पास दूरदृष्टि है. वे उन चीजों की कल्पना करते हैं जिन्हें लोग असंभव बताते हैं. लोग कहते हैं, “हम यह नहीं कर सकते, क्योंकि पहले कभी ऐसा नहीं हुआ.” फिर वे उसे हासिल कर दिखाते हैं. आप एक के बाद एक मुद्दे को देखें तो पाएंगे कि राष्ट्रपति ने ऐसी चीजों को आगे बढ़ाया और हासिल किया, जिन्हें लोग नामुमकिन मानते थे, क्योंकि कोई पारंपरिक राजनीतिक ऐसा कभी नहीं करता.
इसलिए मेरी राय में, उनके साथ और उनके लिए काम करने वाले हम लोगों को यह जानकर ऊर्जा मिलती है कि हम वे काम कर सकते हैं जो पारंपरिक राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति के नेतृत्व में संभव नहीं होते. विदेश नीति, वैश्विक मामलों और दुनिया से जुड़े मुद्दों पर काम करने का यह बेहद रोमांचक समय है.
गोर: मैं इतना और जोड़ूंगा कि आने वाले समय में लोग इन वर्षों को पीछे मुड़कर देखेंगे तो हमारे राष्ट्रपति को महानतम नेताओं और बहुत कुछ हासिल करने वाली ऐतिहासिक शख्सियतों में गिनेंगे. हम इसे अभी अपनी आंखों के सामने होते देख रहे हैं.
• विदेश मंत्री रूबियो, क्या 2028 के राष्ट्रपति चुनाव के मतपत्र पर आपका नाम दिखाई दे सकता है?
रूबियो: फिलहाल मेरा पूरा ध्यान अपने काम पर है. इस समय मेरे पास दो जिम्मेदारियां हैं और उनमें मेरा पूरा समय और ऊर्जा लगती है. मैं इन जिम्मेदारियों को निभाते हुए बहुत खुश हूं.

