
उस जगह का भी अपना संदेश था. मुंबई का ताज महल पैलेस होटल, जो 26/11 हमलों का प्रमुख निशाना था. अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर इंडिया टुडे के साथ साझा खास बातचीत के लिए यहीं बैठे. इस क्षेत्र में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वे दो सबसे अहम चेहरे हैं.
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेदारी भी संभाल रहे रूबियो विदेश नीति के सबसे वरिष्ठ पदाधिकारी हैं. इस साल उनका यह दूसरा भारत दौरा था. ट्रंप के पुराने भरोसेमंद गोर दिल्ली भेजे जाने से पहले व्हाइट हाउस में नियुक्तियों का काम देखते थे. उन्हें भारत में “हमारी सरकार के शीर्ष स्तर” को सक्रिय करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
उनका काम रिश्तों की मरम्मत करना है. फरवरी 2025 के मोदी-ट्रंप शिखर सम्मेलन में 500 अरब डॉलर (47.3 लाख करोड़ रु) के व्यापार का लक्ष्य, 10 साल का रक्षा ढांचा और तकनीक, महत्वपूर्ण खनिजों तथा एआइ से जुड़ी कई पहलकदमियों का ऐलान हुआ था. मगर ये महत्वाकांक्षाएं जल्द ही शिकायतों के ढेर में दब गईं.
उनमें 50 फीसद का दंडात्मक टैरिफ, रूसी तेल खरीदने पर जुर्माना, भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराने के ट्रंप के बार-बार के दावे, पाकिस्तानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से वाशिंगटन की बढ़ती नजदीकी और नए एच-1बी वीजा पर 1,00,000 डॉलर (95 लाख रुपए) का शुल्क शामिल था, जिसकी सबसे ज्यादा मार भारतीयों पर पड़ती है.

फरवरी 2026 के अंतरिम व्यापार समझौते से टैरिफ घटकर 18 फीसद हुआ और बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उसकी आधार दर फिर 10 फीसद तय करने को मजबूर कर दिया. फिर भी ट्रेड डील पर अब तक दस्तखत नहीं हुए हैं. ट्रंप ने अब रूस और ईरान प्रतिबंध कानून के प्रावधानों में छूट दी है, जो उन्हें रूसी और ईरानी तेल खरीदने वालों पर 100 फीसद तक टैरिफ लगाने की ताकत देते हैं. इसी पृष्ठभूमि में ट्रंप के दो प्रमुख संकटमोचन मुंबई पहुंचे.
भारत-अमेरिका रिश्तों को एक से दस के पैमाने पर आंकने के सवाल पर रूबियो ने कोई अंक देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, “पांच साल बाद हम पीछे मुड़कर देखेंगे और कहेंगे कि यह दुनिया के सबसे मजबूत रिश्तों में से एक है.” उनकी यह उम्मीद आगे की पूरी बातचीत की दिशा तय करती है. कूटनीतिक शिष्टाचार को अलग रख दें तो खास बातचीत से पता चलता है कि अमेरिकी प्रशासन ने चुपचाप अपना रुख बदला है—भारत पर दबाव डालने से व्यापार के लिए उसे साधने की ओर.
नरमी का सबसे स्पष्ट संकेत व्यापार के मोर्चे पर मिला, जिसने आपसी भरोसे को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुंचाया. जब पूछा गया कि क्या वाशिंगटन भारत को उसकी मांग के मुताबिक प्रतिस्पर्धी टैरिफ लाभ देने को तैयार है तो रूबियो ने संकेत दिया कि लंबे समय से अटका अंतरिम समझौता लगभग तैयार है.
टैरिफ में बार-बार बदलाव को लेकर भारत की चिंता पर विदेश मंत्री का जवाब और भी अहम था. रूबियो ने कहा कि समझौते का मकसद निश्चितता कायम करना है, ताकि कारोबारी द्विपक्षीय व्यापार के नियम जानकर निवेश कर सकें. यह जोर देने के नजरिए में आया बदलाव महत्वपूर्ण है. पहले अमेरिका का रवैया रियायतें लेने के लिए टैरिफ को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल करने पर टिका था. रूबियो टिकाऊ आर्थिक साझेदारी की बुनियाद के रूप में स्थिरता पर जोर दे रहे थे.
उधर, गोर ने दोनों देशों के बीच बढ़ते दोतरफा निवेश का हवाला देकर आर्थिक दलील को और मजबूत किया. उन्होंने अमेरिका में एस्सार की अरबों डॉलर की निवेश योजनाओं और भारत में अमेरिकी तकनीकी कंपनियों की मौजूदगी का जिक्र किया. संदेश साफ थाः ट्रंप प्रशासन ऐसा रिश्ता चाहता है जो दोनों देशों में रोजगार पैदा करे और औद्योगिक क्षमता बढ़ाए. अब रिश्तों की सफलता को केवल व्यापार के आंकड़ों से नहीं, बल्कि निवेश से भी आंका जा रहा है.

ऊर्जा नीति में ज्यादा अहम बदलाव होता दिख रहा है. कई महीनों से भारत की सस्ते रूसी कच्चे तेल की खरीद दोनों देशों के रिश्तों में बड़ी अड़चन बनी हुई थी. वाशिंगटन इसे यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को पर दबाव बनाने की अपनी कोशिशों के नजरिए से देखता था. नई दिल्ली की दलील थी कि 1.4 अरब से ज्यादा की आबादी वाली अर्थव्यवस्था के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा राष्ट्रीय जरूरत है.
ईरान संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य तथा लाल सागर से होने वाली शिपिंग में रुकावटों ने इस गणित को नाटकीय ढंग से बदल दिया है. वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति दबाव में आने के बाद वाशिंगटन ने रूसी तेल की ढुलाई को प्रभावित करने वाली कुछ पाबंदियां अस्थायी रूप से ढीली कर दी हैं. इसकी प्रमुख वजह यह है कि डीजल की बढ़ती कीमतें अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की संभावनाओं पर असर डाल सकती हैं.
रूबियो की सफाई बेहद व्यावहारिक थी. उनका कहना था कि अमेरिकी विदेश नीति को हर मुद्दे को किसी एक संघर्ष के नजरिए से देखने के बजाए अपने फैसलों के वैश्विक आर्थिक असर पर भी गौर करना होगा. इससे भी अहम बात यह थी कि उन्होंने भारत से अपेक्षाओं को नए ढंग से पेश किया.
अब लक्ष्य भारत से कम रूसी कच्चे तेल की खरीद कराना नहीं, बल्कि उसे अमेरिका, वेनेजुएला और पश्चिमी गोलार्ध के दूसरे देशों से ज्यादा तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना था. उन्होंने यह भी माना कि ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की भारत की कोशिश अमेरिकी धमकियों से नहीं, बल्कि उसके अपने हितों से प्रेरित है.
हालांकि, इसमें एक अहम शर्त भी जुड़ी है. रूबियो ने रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंधों से भारत को स्थायी छूट देने की पेशकश नहीं की. यह अस्थायी राहत वैश्विक ऊर्जा बाजार में पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों के दबाव का नतीजा है. रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी का उनका दौरा इसी उभरती रणनीति से सीधे जुड़ा था.
रूबियो ने संयंत्र के विशाल आकार और उसकी उन्नत क्षमता की तारीफ की. साथ ही इसे अमेरिका के टेक्सास में ब्राउन्सविल की रिफाइनिंग क्षमता में रिलायंस के निवेश से जोड़ा, जिसके 2029 तक शुरू होने की उन्हें उम्मीद है.


संतुलन साधने की कवायद
पाकिस्तान के मामले में वाशिंगटन की नरमी की सीमाएं ज्यादा साफ दिखीं. खासकर ईरान से जुड़ी क्षेत्रीय कूटनीति में भूमिका के कारण पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व वाशिंगटन में फिर अहम हो गया है. भारत लंबे समय से अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी और पाकिस्तान से उसके रिश्ते के बीच स्पष्ट फर्क चाहता रहा है. ऐसे में यह नई नजदीकी उसे असहज करती है.
रूबियो ने अमेरिकी नीति से पीछे हटे बिना नई दिल्ली को भरोसा दिलाने की कोशिश की. उन्होंने कहा, “पाकिस्तान से हमारे रिश्ते किसी भी तरह से भारत के साथ संबंधों की कीमत पर नहीं हैं.” उनका तर्क था कि इस्लामाबाद से संपर्क रखने पर पाकिस्तानी फैसलों को प्रभावित करने की वाशिंगटन की क्षमता बढ़ती है. साथ ही उन्होंने जोर दिया कि आतंकवाद को लेकर अमेरिका की चिंताएं भारत जैसी ही हैं.
प्रतिरक्षा में गोर ने सहयोग की निरंतरता पर जोर दिया. उन्होंने भारत में लॉकहीड मार्टिन और बोइंग जैसी अमेरिकी कंपनियों की मौजूदगी, जारी साझा उत्पादन, संयुक्त सैन्य अभ्यासों और भारतीय सेना के साथ अभ्यास में उन्नत अमेरिकी विमानों की भागीदारी का हवाला दिया. उनका तर्क था कि रक्षा सहयोग खरीदार-विक्रेता वाले पारंपरिक रिश्ते से काफी आगे निकल चुका है.
साझा प्रशिक्षण और औद्योगिक साझेदारियों ने ऐसी आपसी समझ और भरोसा पैदा किया है जिसकी दो दशक पहले कल्पना करना मुश्किल था. फिर भी यह गहरे तकनीक हस्तांतरण और वास्तविक साझा विकास की भारत की प्रमुख मांग से अब भी पीछे है.
अधिक ठोस रणनीतिक मुद्दे क्वाड समूह से जुड़े थे. रूबियो ने सुरक्षित सप्लाइ चेन को इसका प्रमुख लक्ष्य बताया. मगर इसे साफ तौर पर चीन के खिलाफ अभियान के रूप में पेश करने के बजाए उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका में से किसी को भी जरूरी उत्पादों तथा तकनीक के लिए किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर नहीं रहना चाहिए.
एच-1बी वीजा और कुशल पेशेवरों के आव्रजन के मुद्दे ने सबसे साफ याद दिलाया कि दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों में अब भी फर्क है. ट्रंप प्रशासन के बढ़े वीजा शुल्क और कड़ी पाबंदियों ने भारतीय कर्मचारियों, नियोक्ताओं और छात्रों में काफी चिंता पैदा की है. इससे जुड़े सवाल पर रूबियो ने किसी विशेष छूट की पेशकश नहीं की. उनका जोर था कि ये बदलाव भारत को निशाना बनाकर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए किए गए हैं.
इंडिया टुडे से बातचीत की बड़ी अहमियत इसमें है कि यह भारत-अमेरिका रिश्ते की बदलती शर्तों को सामने लाता है. रिश्ता केवल साझा रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं या दोनों देशों के नेताओं की निजी दोस्ती के सहारे नहीं चल रहा. इसे लगातार इस कसौटी पर परखा जा रहा है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को कितना ठोस फायदा पहुंचा सकते हैं.

