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नया समीकरण

गलवान घाटी झड़प के बाद रिश्तों में जमी बर्फ के बाद मोदी और शी संबंधों की शर्तें नए सिरे से तय करने की ओर बढ़े लेकिन विवादास्पद सीमा और व्यापार के टकराव डाल सकते हैं खलल

प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में, 12 सितंबर
अपडेटेड 29 सितंबर , 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 सितंबर को दिल्ली के भारत मंडपम में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का गर्मजोशी से हाथ मिलाकर स्वागत किया तो यह सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार भर नहीं था. 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेता यह परख रहे थे कि क्या भारत और चीन वह रिश्ता बना सकते हैं, जिसे दोनों तरफ के अधिकारी सावधानी से ‘नया समीकरण’ कहने लगे हैं.

करीब सात साल में शी की यह पहली भारत यात्रा थी. यह 2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चार दशकों से ज्यादा समय के सबसे भयंकर भारत-चीन सीमा टकराव के बाद भी उनका पहला दौरा था. उस घटना ने द्विपक्षीय रिश्तों को गहरा झटका दिया था.

सैनिकों के पीछे हटने और राजनैतिक संवाद दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया असल में अक्तूबर 2024 में ही शुरू हो गई थी. यह रूस के कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी और शी की मुलाकात से कुछ दिन पहले हुआ था. अगस्त 2025 में चीन के तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेता फिर मिले. उन्होंने कहा कि भारत और चीन “विकास के साझेदार हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं.” उसके बाद रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया और आगे बढ़ी.

लिहाजा दिल्ली में उनकी हालिया द्विपक्षीय बैठक को यह तय करने की अहम कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए कि रिश्तों में आई नरमी कैसे कायम रह सकती है. इसके लिए सीमा पर ज्यादा महत्वाकांक्षी व्यवस्थाएं, गहरे आर्थिक संबंध और संपर्क की बहाली जरूरी होगी.

ब्रिक्स सम्मेलन से एक पखवाड़े पहले बीजिंग में चुपचाप और सोच-समझकर तैयार की गई जमीन से दिल्ली की यह नरमी संभव हुई. इसकी अगुआई राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने की. दोनों जटिल सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि हैं. उनकी 25वें दौर की बातचीत असामान्य रूप से विस्तृत आठ सूत्री सहमति के साथ खत्म हुई.

ऊपरी तौर पर इसमें बहुत-सी बातें जानी-पहचानी कूटनीतिक भाषा में थीं, लेकिन कुछ अहम नई बातें भी शामिल थीं. विशेषज्ञ इसे एक दशक से ज्यादा समय में सीमा विवाद पर दोनों सरकारों की ओर से जारी सबसे विस्तृत सार्वजनिक रूपरेखा मानते हैं.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी, बीजिंग, 25 अगस्त 2026

जल्द और ठोस नतीजे

भारत-चीन सीमा विवाद के समाधान के लिए दोनों पक्षों ने 2005 में तय राजनैतिक मानकों और मार्गदर्शक सिद्धांतों के आधार पर सीमा पर “शांति और स्थिरता” बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई. साथ ही “निष्पक्ष, उचित और दोनों पक्षों को मंजूर” सीमा समाधान के लिए “बातचीत आगे बढ़ाने” पर जोर दिया.

दो प्रमुख समूहों को सीमा निर्धारण और सीमा प्रबंधन में “जल्द और ठोस नतीजों” पर चर्चा की जिम्मेदारी दी गई. अगस्त 2025 में दिल्ली में हुई डोभाल-वांग वार्ता के बयान में भी ‘जल्द नतीजे’ की बात कही गई थी, लेकिन इस बार जारी बयान में ‘ठोस’ शब्द जुड़ने से उम्मीदें कुछ हद तक बढ़ गई हैं.

वर्ष 2026 के समझौते ने सीमा निर्धारण पर विशेषज्ञ समूह (ईजीबीडी) बनाने को औपचारिक रूप दिया. इसके अलावा भारत-चीन सीमा मामलों पर मौजूदा परामर्श और समन्वय कार्य तंत्र (डब्ल्यूएमसीसी) के तहत पिछले साल सीमा प्रबंधन कार्य समूह बनाया गया था.

सीमा प्रबंधन सुधारने के लिए वरिष्ठतम सैन्य कमांडरों (एसएचएमसी) की बैठकों के दो और केंद्र बनाए जाएंगे. उन केंद्रों के एलएसी के पूर्वी क्षेत्र—सिक्किम से अरुणाचल प्रदेश—और हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के विवादित इलाकों वाले मध्य क्षेत्र में निर्धारित होने की संभावना है.

फिलहाल तो पश्चिमी क्षेत्र के लद्दाख में चुशुल-मोल्डो ही एसएचएमसी बैठक के लिए एकमात्र केंद्र है. दोनों पक्ष पूर्वी और मध्य क्षेत्रों में दो अतिरिक्त सैन्य हॉटलाइन बनाने पर भी सहमत हुए. फिलहाल छह हॉटलाइन हैं—दो पश्चिमी और दो पूर्वी क्षेत्र में. ये ब्रिगेड और बटालियन कमान के बीच मैदानी स्तर पर काम करती हैं. दो नई हॉटलाइन उच्च स्तर पर होंगी.

उन्हें भारतीय सेना की पूर्वी और मध्य कमान के मुख्यालयों को चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के संबंधित मुख्यालयों से सीधे जोड़ने की उम्मीद है. एसएचएमसी की दो नई बैठकें और दो उच्चस्तरीय हॉटलाइन रणनीतिक बदलाव मानी जा रही हैं. उनसे एलएसी पर कई जगह एक साथ गतिरोध होने पर वरिष्ठ क्षेत्रीय कमांडर जल्दी से बात कर सकेंगे और टकराव को बड़े संघर्ष में बदलने से रोक सकेंगे.

वर्ष 2026 के डोभाल-वांग समझौते में संस्थागत व्यवस्था बनाने के ये उपाय शायद उसकी सबसे ठोस उपलब्धि हैं. उनका सीधा मकसद गलवान घाटी जैसी झड़प की पुनरावृत्ति रोकना है. वर्ष 2025 और 2026 के समझौतों से सीमा पार रोजमर्रा की गतिविधियां भी सामान्य हुई हैं. उनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा का विस्तार और हिमाचल प्रदेश के शिपकी ला, उत्तराखंड के लिपुलेख तथा सिक्किम के नाथू ला दर्रों पर व्यापार केंद्र दोबारा खोलना शामिल है.

नए समझौते में जल संबंधी आंकड़े साझा करने के लिए सीमा-पार नदियों पर विशेषज्ञ स्तरीय तंत्र की नई बैठक भी शामिल है. नेपाल की हिमालयी आपदा के बाद निचले इलाकों वाले भारतीय राज्यों के लिए यह बेहद अहम है.

मसले तो बड़े और भी 

भारत-चीन मामलों के कई बड़े विशेषज्ञ सीमा समाधान में ‘जल्द नतीजों’ के साथ ‘ठोस’ शब्द जुड़ने को पिछले एक दशक का सबसे अहम घटनाक्रम मानते हैं. लेकिन चीन में भारत के पूर्व राजदूत अशोक कांत कहते हैं कि व्यवस्था बनाने और समाधान निकालने में बड़ा फर्क है.

वे बताते हैं कि नए विशेषज्ञ समूह की कार्यशर्तों पर भी अभी सहमति नहीं बनी है. कांत के मुताबिक, “जल्द और ठोस नतीजे” मूल रूप से भारत का गढ़ा वाक्य है. चीन ने इस शब्दावली को स्वीकार किया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ‘नतीजे’ की भारतीय व्याख्या भी उसे मंजूर है.

नाम न बताने की शर्त पर एक अन्य विशेषज्ञ कहते हैं, “रणनीतिक बदलाव का अभी कोई प्रमाण नहीं है.” उनके मुताबिक, चीन के साथ नया समीकरण इसलिए भी बन रहा है क्योंकि ट्रंप के अमेरिका से अपने रिश्तों को ज्यादा आंकने के बाद भारत रणनीतिक स्वायत्तता की अहमियत फिर समझ रहा है.

वे कहते हैं, “हम बहु-साझेदारी की भाषा बोलते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एक ही पक्ष से जुड़े रहे हैं. अब उसके नतीजे सामने आ रहे हैं.” चीन ने वाशिंगटन के साथ भारत की हालिया मुश्किलों में मौका देखा-परखा है. वह दिल्ली से गर्मजोशी दिखाकर भारत को अमेरिका की ओर उसके कथित जरूरत से ज्यादा झुकाव से पीछे खींचना चाहता है.

कुछ विशेषज्ञ भारत के मकसद को ज्यादा व्यावहारिक मानते हैं. भारत सीमा पर शांति और चीन के साथ आर्थिक अवसरों की बहाली चाहता है ताकि बेहद उथल-पुथल भरी दुनिया में उसके पास फैसले लेने की ज्यादा गुंजाइश रहे.

भारत-चीन सीमा वार्ता को अब भी दिशा देने वाली 2005 की रूपरेखा तैयार करने में शामिल रहे पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन कहते हैं, “मौजूदा भू-राजनैतिक स्थिति में दोनों पक्षों का हित इसी में है कि वे एक-दूसरे के विरोधी न दिखाई दें.” पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन कहते हैं, “भारत और चीन, दोनों की सरकारें कुछ गुंजाइश और शांति चाहती हैं.

संदेश है, ‘आपस में न टकराएं क्योंकि हमें दूसरे बड़े मसले निबटाने हैं.’ वे कहते हैं कि हाल में दोनों देशों की दिखाई “सीमित महत्वाकांक्षा एक अहम बदलाव है”, लेकिन यह अपने आप में रणनीतिक साझेदारी नहीं है.

बीजिंग के भू-राजनैतिक मामलों के टिप्पणीकार आइ़नर तैंगेन चीन की तरफ से डोभाल-वांग यी वार्ता को अलग ढंग से देखते हैं. वे कहते हैं, “अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि सीमा विवाद समाधान के करीब पहुंचा है लेकिन ये सभी कदम गलवान घाटी से टूटे भरोसे को मेहनत से दोबारा बनाने के लिए हैं.”

तैंगेन के मुताबिक, ‘जल्द नतीजों’ की असली कसौटी कोई बड़ा समाधान नहीं, बल्कि “टिकाऊ स्थिरता” पैदा करना है. वे मौजूदा स्थिति को सीधे शब्दों में रखते हैं, “अब काम विवाद को इस तरह संभालना है कि वह पूरे रिश्ते पर ही हावी न होने लगे.”

संदेह क्यों

जानकारों को इसमें कोई शक नहीं कि भारत-चीन रिश्तों में हालिया नरमी वास्तविक है, लेकिन उसे समाधान नहीं समझना चाहिए. विदेश मंत्रालय में दशकों तक चीन मामलों पर काम कर चुके कांत वास्तविकता की ओर ध्यान दिलाते हैं. वे कहते हैं, “हम चीन के साथ स्थिर और अनुमान लगाने योग्य रिश्ते चाहते हैं. आगे चलकर ये रचनात्मक हो जाएं तो अच्छी बात है, वह अतिरिक्त लाभ होगा.”

जो नहीं बदला, उस पर भी वे उतनी ही बेबाकी से कहते हैं, “तनाव घटाने की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है. पिछले दो साल में हमने उस पर बातचीत तक शुरू नहीं की.”

वर्ष 2020 में गलवान घाटी संकट के दौरान सेना प्रमुख रहे जनरल एम.एम. नरवणे भी इससे सहमत हैं. वे कहते हैं, “एलएसी पर दोनों तरफ के सैनिक टकराव वाली जगहों से पीछे हटे हैं, लेकिन उन्हें क्षेत्र से वापस नहीं बुलाया गया है.” उनके मुताबिक, एलएसी पर सैनिकों की संख्या गलवान घाटी की घटना से पहले के मुकाबले अब भी काफी ज्यादा है और गश्त के इलाकों के अधिकारों पर बुनियादी मतभेद पहले की तरह अब भी बने हुए हैं.

“जल्द और ठोस नतीजे” वाली बात ने विशेषज्ञों के बीच संदेह बढ़ाई है. सरन याद दिलाते हैं कि चीन ने दो दशक पहले सिक्किम क्षेत्र का जल्द समाधान करने का प्रस्ताव दिया था. भारत ने उसका विरोध किया क्योंकि 2005 के सिद्धांतों में टुकड़ों में नहीं, बल्कि पूरी सीमा के व्यापक समाधान की बात थी.

कांत भी इससे सहमत हैं. वे बताते हैं कि भारत ने 2019 के प्रस्ताव में अलग-अलग क्षेत्रों में लेन-देन पर आधारित पैकेज का समाधान रखा था. इसमें जल-विभाजक सिद्धांत के आधार पर सिक्किम के साथ पूरे मध्य क्षेत्र का समाधान करने की बात थी. चीन ने तब उसे खारिज कर दिया था.

सरन और कांत, दोनों को चिंता है कि आसान हिस्सों को पहले सुलझाने से भारत बातचीत की बढ़त खो दे सकता है. ऐसे में अक्साई चिन, तवांग और बाकी अरुणाचल प्रदेश के सबसे विवादित मसले अनसुलझे रह जाएंगे.

मेनन इस पूरी दुविधा को एक कठिन सवाल में समेटते हैं, “अगर आप सभी आसान हिस्से निबटा देंगे तो मुश्किल हिस्सों को कभी कैसे सुलझा पाएंगे?” अगर भारत बातचीत की यह पूंजी पहले ही खर्च कर देता है तो लद्दाख और अरुणाचल के सवाल पर उसके पास सौदेबाजी के लिए कुछ नहीं बचेगा.

लंबित मुद्दे छोटे नहीं हैं. उनमें अक्साई चिन और तवांग के विवाद, सैनिकों को क्षेत्र से वापस बुलाने का अनसुलझा सवाल और सैन्य जमावड़ा हटाने की कोई ठोस समयसीमा न होना शामिल है. डोकलाम के पास सिक्किम-भूटान-चीन तिराहे की रणनीतिक उलझन भी ज्यों की त्यों बनी हुई है. वहां चीन की स्थिति अनजाने में मजबूत करने वाली कोई भी व्यवस्था भारत और भूटान की सुरक्षा के लिए गंभीर नतीजे ला सकती है.

फिर 2026 के डोभाल-वांग समझौते में इस्तेमाल हुए ‘सीमा निर्धारण’ शब्द को लेकर संशय है. यह तकनीकी लग सकता है, लेकिन उसी का असली महत्व है क्योंकि भारत-चीन सीमा जमीन पर कभी औपचारिक रूप से तय नहीं हुई. सीमा के हिस्सों को तय करना, भले ही वे कम विवादित हों, पहली ऐतिहासिक पहल होगी.

उसके लिए अपनाए जाने वाले सिद्धांतों पर राजनैतिक सहमति जरूरी होगी. उसके बाद मानचित्रण आता है, जिसमें सीमा निर्धारण समझौते के आधार पर नक्शों पर सीमा रेखा खींची जाती है. जमीन पर सीमांकन उसका आखिरी चरण है. इसमें सीमा खंभे और बाड़ लगाने समेत जमीन पर सीमा को भौतिक रूप से चिह्नित किया जाता है.

एलएसी पर सैन्य कमान संभालने के अपने अनुभव के आधार पर नरवणे को रिश्तों में एक दिलचस्प संभावना दिखती हैः “सिर्फ एलएसी का प्रबंधन करने से आगे बढ़कर अंतिम सीमा समाधान के कुछ हिस्सों पर कोशिश करना.” लेकिन वे भी जोर देते हैं कि ‘जल्द नतीजे’ को पहली किस्त माना जाए, अंतिम समाधान नहीं.

वे कहते हैं, “हमें पूरी एलएसी को समेटने वाली पैकेज डील करनी होगी. आप सिर्फ अपने अनुकूल मुद्दे हल करके बड़े और मुश्किल मसलों को भविष्य के लिए नहीं छोड़ सकते.”

ईमानदार आकलन क्या है? सीमा प्रबंधन में वास्तविक और उपयोगी प्रगति हुई है, लेकिन सीमा विवाद सुलझाने की दिशा में अब तक बहुत कम हलचल है. दोनों सरकारें ब्योरे पर खास तौर पर चुप हैं. चीन के विदेश मंत्रालय के बयान में पिछले एक साल के दौरान सीमा निर्धारण में “अच्छी प्रगति” का जिक्र था, लेकिन भारत के बयान में यह बात साफ तौर पर गायब थी.

यह अस्पष्टता बताती है कि कोई भी पक्ष नहीं चाहता कि उसके देश के लोग मौजूदा स्थिति को गतिरोध या रियायत के रूप में देखें. इन सबसे ऊपर सरन का वह सवाल है, जिसे वे इकलौती असली कसौटी मानते हैं, “यह कहना बहुत आसान है कि ‘आप चीन के साथ सीमा विवाद क्यों नहीं सुलझा लेते?’ ज्यादा अहम सवाल हैः किन शर्तों पर?”

व्यापार की राहें डालियान पोर्ट से चीन के उत्तर-पूर्वी हिस्से से भारत के लिए पहले समुद्री व्यापार मार्ग की शुरुआत, 11 जनवरी, 2024

चीन का झटका 2.0

सतर्कता भरे प्रतीकात्मक कदमों से सीमा वार्ता धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है, जबकि आर्थिक रिश्तों में कहीं ज्यादा तेजी दिख रही है लेकिन यहां भी चेतावनी हैः ये रिश्ते अब भी बेहद असंतुलित हैं. अपने हालिया शोध के आधार पर कांत इस चुनौती को साफ तौर पर “चीन का झटका 2.0” कहते हैं. यह चीनी आर्थिक दबदबे की दूसरी और ज्यादा खतरनाक लहर है, जो पहली लहर से बुनियादी तौर पर अलग है.

वर्ष 1990 और 2000 के दशक में पहला चीन का झटका सस्ते श्रम के कारण कम मूल्य वाली मैन्युफैक्चरिंग पर चीनी दबदबे से जुड़ा था. नई लहर मूल्य शृंखला के ऊपरी हिस्से में है. यह खास तौर पर सेमीकंडक्टर, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर और पवन ऊर्जा उपकरण, रोबोटिक्स, जैव प्रौद्योगिकी तथा उन्नत सामग्री जैसे क्षेत्रों में दिख रही है. दुनिया भर में नजर रखी जा रही 74 अहम तकनीकों में से 69 में चीन पहले ही आगे है.

चीन का झटका 2.0 की प्रकृति अलग है क्योंकि इससे केवल कारखानों और नौकरियों को नहीं, बल्कि उन तकनीकी और औद्योगिक क्षमताओं को भी खतरा है, जिन पर भविष्य की आर्थिक और रणनीतिक ताकत टिकी होगी. वर्ष 2025 में चीन का व्यापार अधिशेष रिकॉर्ड 1.19 ट्रिलियन डॉलर (114 लाख करोड़ रु.) पहुंच गया.

दुनियाभर में मैन्युफैक्चरिंग के कुल मूल्य संवर्धन में उसकी हिस्सेदारी करीब एक-तिहाई है लेकिन घरेलू मांग कमजोर होने की वजह से चीनी कारखानों को तेजी से विदेशी बाजारों में सामान बेचना पड़ रहा है. पहले झटके के उलट चीन ने तकनीकी सीढ़ी चढ़ते हुए पुराने उद्योग नहीं छोड़े हैं.

कांत चेताते हैं कि इससे भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के मूल्य शृंखला के दोनों छोर पर दबने का खतरा है. “जो ताकतें आज भारत को प्रतिस्पर्धी बना रही हैं, वही कल उसकी रणनीतिक निर्भरता भी बढ़ाती हैं.”

व्यापार के बारीक आंकड़े इस तस्वीर की पुष्टि करते हैं और वे लगभग डराने वाले हैं. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, वित्त वर्ष 26 में चीन को भारत का निर्यात सिर्फ 19.5 अरब डॉलर (1.87 लाख करोड़ रु.) था.

यह कोविड से पहले दर्ज 21.2 अरब डॉलर (2.03 लाख करोड़ रु.) से भी कम है. बड़ी चिंता यह है कि इसी अवधि में आयात 65.2 अरब डॉलर (6.26 लाख करोड़ रु.) से दोगुने से ज्यादा बढ़कर 131.6 अरब डॉलर (12.62 लाख करोड़ रु.) हो गया. इसकी वजह से व्यापार घाटा पांच साल में 155 फीसद बढ़कर 44 अरब डॉलर (4.22 लाख करोड़ रु.) से 112.1 अरब डॉलर (10.75 लाख करोड़ रु.) पहुंच गया.

श्रीवास्तव के मुताबिक, घाटे का आकार केवल आधी कहानी है. उसका स्वरूप नीति निर्माताओं के लिए ज्यादा चिंताजनक होना चाहिए. भारत के कुल आयात में चीन की हिस्सेदारी अब करीब 16 फीसद और औद्योगिक आयात में 30.8 फीसद है. यह भी डरावना है कि भारत चीन से जो कुछ आयात करता है, उसमें 86.5 फीसद औद्योगिक सामान है, न कि उपभोक्ता वस्तुएं या कृषि उत्पाद.

सिर्फ चार श्रेणियां—इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कंप्यूटर और ऑर्गेनिक केमिकल—82.6 अरब डॉलर (7.92 लाख करोड़ रु.) मूल्य की हैं. यह चीन से होने वाले भारत में कुल आयात का तकरीबन दो-तिहाई है.

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में चीन की हिस्सेदारी 43 फीसद, मशीनरी और कंप्यूटर में 40 फीसद तथा ऑर्गेनिक केमिकल में 44 फीसद है. श्रीवास्तव कहते हैं, “चीन के साथ भारत का व्यापार अब सिर्फ घाटे की कहानी नहीं है.यह उत्पादन की निर्भरता की कहानी बन चुकी है.”

बेहद डरावनी चिंता यह है कि चीन भारतीय उपभोक्ताओं को केवल तैयार सामान नहीं बेच रहा, बल्कि भारतीय कारखानों को चलाने वाले सामान या कच्चे माल की आपूर्ति भी कर रहा है.

लिहाजा, उससे अचानक आर्थिक दूरी कायम कर लेना कतई व्यावहारिक नहीं है. साथ ही दवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन, इलेक्ट्रिक वाहन और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में खतरनाक रूप से निर्भरता पैदा हो रही है.

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन, 12 सितंबर

चीन की दलील

हालांकि, इस बहस में हर कोई केवल चीन को जिम्मेदार नहीं मानता. तैंगेन चीन की तरफ से जानबूझकर अलग नजरिया रखते हैं. उनके मुताबिक, इस असंतुलन के लिए अकेले बीजिंग को दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि भारतीय उपभोक्ता और निर्माता कीमत, बड़े पैमाने और गुणवत्ता के कारण चीनी उत्पाद चुनते रहते हैं.

उनकी दलील है कि चीनी से आयात पूरी तरह बंद कर देने पर भी भारत को शायद दूसरे देशों से विकल्प के तौर पर महंगी चीजें खरीदनी पड़ेंगी. तैंगेन कहते हैं, “नया आर्थिक समीकरण केवल शिकायत के आधार पर नहीं बन सकता. भारत को वहां चीनी सामान इस्तेमाल करना चाहिए, जहां उससे वास्तव में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है. साथ ही समय के साथ निर्भरता घटाने के लिए घरेलू क्षमता तैयार करनी और बढ़ानी चाहिए. यह भ्रम के बिना परस्पर लेन-देन का मामला है.”

इसी पृष्ठभूमि में चीनी पूंजी के लिए भारत का सोच-समझकर दरवाजा खोलना अहम हो जाता है. गलवान की घटना के बाद भारत ने जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों के सभी निवेशों को प्रभावी रूप से सुरक्षा घेरे में डाल दिया था.

वर्ष 2020 के प्रेस नोट 3 के तहत उसके लिए पहले सरकारी मंजूरी जरूरी थी. फिर इस साल 10 मार्च को जारी प्रेस नोट 2, 2026 से इसमें बदलाव शुरू हुआ. उसके बाद 1 मई और 12 जून को विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून (फेमा) [नॉन-डेट इंस्ट्रुमेंट्स ] संशोधन नियम जारी हुए. 

इन उपायों ने सभी निवेशों की एक जैसी जांच वाली व्यवस्था की जगह हिस्सेदारी पर आधारित जांच लागू की. इसका मतलब है कि जिन विदेशी निवेशक कंपनियों में जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों, मुख्य रूप से चीन, की बिना नियंत्रण वाली लाभकारी हिस्सेदारी 10 फीसद तक है, वे क्षेत्रीय नियमों के तहत अब सहज तरीके से बेरोकटोक निवेश कर सकती हैं.

इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों, पूंजीगत सामान और सोलर सेल जैसे कुछ मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों के प्रस्तावों पर फैसले के लिए 60 दिन की समयसीमा तय की गई है. यह कुछ हद तक ढील है, खुला दरवाजा नहीं. चीन या हांगकांग में पंजीकृत कंपनियों को आम तौर पर अब भी सरकारी मंजूरी लेनी होगी. यानी सर्तकता जारी रहेगी.

विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे रणनीतिक सोच यह है कि चीनी पूंजी पर पाबंदी से चीनी आयात की तेज बढ़ोतरी नहीं रुकी. इसलिए दिल्ली अब यह परख रही है कि चीन से सिर्फ आयात करने के बजाए उसकी कंपनियों से भारत में निवेश और उत्पादन कराना बेहतर होगा या नहीं.

इस साल अगस्त तक संशोधित व्यवस्था के तहत सूचना प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और संचार क्षेत्र में करीब 50 करोड़ डॉलर (4,895.65 करोड़ रु.) के 29 प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रस्ताव आए. कांत “सुरक्षा उपायों के साथ जुड़ाव” की वकालत करते हैं.

मतलब यह कि जिन क्षेत्रों में भारत को लाभ हो, वहां ज्यादा व्यापार और निवेश हो, पर तकनीक हस्तांतरण अपारदर्शी न रहे. ऐसा कतई न हो कि ‘मेक इन इंडिया’ केवल भारत में असेंबली बनकर न रह जाए जबकि अहम तकनीक और सप्लाइ चेन चीन के हाथ में ही रहे.

फासले अभी बाकी

नए समीकरण का सबसे साफ दिखाई देने वाला और शायद सबसे नाजुक पहलू दोनों देशों के बीच आवाजाही का धीरे-धीरे खुलना है. कोविड महामारी और सीमा पर टकराव तथा विवाद के बाद सीधी उड़ानें पांच साल तक बंद रहीं.

फिर, आखिरकार अक्तूबर 2025 में इंडिगो की कोलकाता-ग्वांगझोऊ उड़ान के साथ यह दोबारा शुरू हुई. उसके बाद चाइना ईस्टर्न ने शंघाई-दिल्ली सेवा बहाल की. हाल में मोदी-शी मुलाकात से ठीक पहले चाइना सदर्न ने 21 सितंबर से ग्वांगझोऊ-नई दिल्ली उड़ान फिर शुरू करने की घोषणा की.

वीजा प्रक्रिया में भी साथ-साथ कुछ ढील आई है. चीन ने दिसंबर 2025 से भारतीय नागरिकों के लिए ऑनलाइन वीजा आवेदन प्रक्रिया की शुरुआत की. वह उस भारतीय यात्रा बाजार का लाभ उठाना चाहता है, जिसे साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने 21.6 अरब डॉलर (2.07 लाख करोड़ रु.) का आंका है.

भारत ने भी पांच साल के अंतराल के बाद चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा प्रक्रिया बहाल कर दी है. उतने ही समय तक बंद रही कैलाश मानसरोवर यात्रा 2025 में फिर से शुरू हुई. वर्ष 2026 की गर्मियों में कैलाश मानसरोवर यात्रा लगातार दूसरे साल लिपुलेख और नाथू ला, दोनों रास्तों से चली.

तैंगेन का कहना है कि रिश्तों का यह पहलू केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि बुनियादी है क्योंकि संबंधों को “आखिरकार सिर्फ सेनाएं, राजनयिक और कारोबारी स्थिर नहीं कर सकते.” गलवान घाटी की झड़प के बाद चीन को लेकर भारत के लोगों का रुख सख्त हुआ और वह नाराजगी अब तक कम नहीं हुई है.

वहीं, तैंगेन के मुताबिक, भारत की राजनीति, संस्कृति और जटिलताओं को लेकर चीन की समझ अब भी सतही है, जैसे कि चीन के बारे में राय भी ऊपरी ही है. यह दूरी खास मायने रखती है.

दोनों सरकारें कभी राजनैतिक रूप से स्वीकार्य सीमा समझौता तलाश भी लें तो उसे लागू नहीं कर पाएंगी, अगर उनके अपने लोग किसी भी रियायत को आत्मसमर्पण मानें. इसीलिए नए समीकरण को शुरुआती कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए, पूरी हो चुकी उपलब्धि के रूप में नहीं.

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