भले ही सतलज सिनेमाघरों में नहीं लग पाई मगर यह बीते कई वर्षों में पंजाब की सबसे ज्यादा सियासी विवादों में घिरी सांस्कृतिक घटना बन गई है. 2022 में आम आदमी पार्टी (आप) के सत्ता में आने के बाद से भगवंत मान सरकार पहले ही अकाल तख्त के साथ तीखे टकराव से जूझ रही है.
राज्य के बेअदबी-विरोधी कानून को लेकर शुरू हुआ विवाद अब इस बड़े सवाल में बदल गया है कि पंजाब के सिखों की ओर से बोलने का हक किसके पास है—जनता की चुनी सरकार के पास या फिर सिख धर्म की सर्वोच्च लौकिक संस्था के पास.
अकाल तख्त ने एक अन्य विवादित वीडियो के मामले में भगवंत मान को ‘गुरुद्रोही’ घोषित किया, सिख मंत्रियों और विधायकों को इस कानून पर सरकार का पक्ष स्पष्ट करने के लिए तलब किया और राज्य सरकार से कानून पर दोबारा विचार करने को कहा है.
इसी सियासी संघर्ष के बीच सतलज आ खड़ी हुई, जबकि विधानसभा चुनाव में केवल सात महीने बाकी हैं. 14 जुलाई को अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने हरिके पत्तन में जसवंत सिंह खालड़ा और कथित फर्जी मुठभेड़ों के पीड़ितों की स्मृति में अरदास की. हरिके पत्तन में सतलज और ब्याज नदियों का संगम होता है.
आप ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है. मान न तो सिख धार्मिक समुदाय और न ही हिंदू मतदाताओं को नाराज करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने कोई स्पष्ट राय नहीं जाहिर की है. लेकिन बहस उग्रवादी हिंसा और आतंकवाद के पीड़ितों की तरफ मुड़ती है तो उदारवादी सिख और हिंदू मतदाता सरकार और पार्टी पर रुख स्पष्ट करने का दबाव बढ़ा सकते हैं.
कांग्रेस पहले से ही गुटबाजी में उलझी हुई है और उसकी असली चुनौती ऐतिहासिक है. ऑपरेशन ब्लूस्टार और उसके बाद की घटनाओं का बोझ आज भी पार्टी पर भारी है. ऐसे में सिख असंतोष से जुड़े मसले पर कोई पहल करना उसके लिए अपने सियासी प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले कहीं अधिक जोखिम भरा है. उसने लो-प्रोफाइल बने रहना ही बेहतर समझा है.
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने अलग चुनौती है. शिरोमणि अकाली दल से अलग होने के बाद से वह अपने पारंपरिक शहरी आधार से आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है, मगर उसके पास ग्रामीण पंजाब को लुभाने वाला कोई नैरेटिव अब भी नहीं.
पार्टी के नेताओं का मानना है कि फिल्म को लेकर छिड़ी बहस हिंदू मतदाताओं और उन उदारवादी सिखों को भाजपा के पक्ष में संगठित कर सकती है जो महसूस करते हैं कि उग्रवादी हिंसा के पीड़ितों की अनदेखी की गई है. वैसे कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि वे मतदाता उतनी ही आसानी से कांग्रेस की ओर भी जा सकते हैं क्योंकि उसने अरसे से खुद को विकल्प बना रखा है.
अकाली दल के लिए सतलज एक अवसर भी है, तो उसके सियासी पतन की असहज याद भी. 2015 के बेअदबी विवाद और प्रकाश सिंह बादल सरकार के दौरान पुलिस फायरिंग की घटना के बाद से पार्टी लगातार अपनी साख खोती गई. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उसका निराशाजनक प्रदर्शन रहा. फिल्म का पक्ष लेना अकाली दल को अपने पंथिक आधार को दोबारा जोड़ने में मददगार हो सकता है.
मगर अकाली और आप दोनों पार्टी के नेता निजी तौर पर चिंता जताते हैं कि युवा पंथिक मतदाता पुराने अकाली नेतृत्व की बजाय कट्टरपंथी नेताओं की ओर आकर्षित हो सकते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में इसकी झलक भी दिखी. अमृतपाल सिंह खडूर साहिब से और सरबजीत सिंह फरीदकोट से जीत गए.
फिल्म का सियासी असर बेशक है. पंजाब दो सियासी नैरेटिव के बीच फंसा है. एक सरकारी दमन के पीड़ितों के हक का है, तो दूसरा उग्रवाद के पीड़ितों का. राज्य चुनाव में अब दोनों नैरेटिव अपनी सियासी जगह तलाश रहे हैं.
‘‘पंजाब दो सियासी नैरेटिव के बीच फंसा है. एक सरकारी दमन के पीड़ितों के हक का है, तो दूसरा उग्रवाद के पीड़ितों का. विधानसभा चुनाव के पहले दोनों सियासी जगह तलाश रहे हैं.’’

