
हर भारतीय महिला पहली बार अपने परिवार में ही सीखती है कि उसकी 'ना’ मायने रखती है या नहीं. इस अध्याय में यह पड़ताल है कि कैसे घर, रिश्तेदारियां और शादी जैसी महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनी संस्थाएं ही उनकी अस्वीकृतियों पर नजर रखने, मोलतोल या नकारने की जगह बन जाती हैं. प्रश्न रोजमर्रा की पारिवारिक बातचीत से लेकर कानून के सबसे विवादित क्षेत्र विवाह के भीतर सहमति तक जाते हैं.
सिर्फ 38 फीसदी स्त्रियां ही कहती हैं कि किसी बड़े या परिवार के सदस्य को मना करने पर उनकी बात का सम्मान किया जाता है. बाकी महिलाओं के मामले में 'ना’ कहने पर उन्हें मनाने की कोशिश की जाती है या बात न मानने को बगावत के तौर पर देखा जाता है.
सिर्फ 29 फीसद महिलाएं कहती हैं कि शादियों, पार्टियों और पारिवारिक समारोहों में शामिल न होने के उनके फैसले का सम्मान किया जाता है. एक-चौथाई से ज्यादा महिलाओं ने बताया कि 'संस्कृति’ या 'परंपरा’ के नाम पर उन्हें गले मिलने या पास बैठने जैसे शारीरिक संपर्क के लिए मजबूर किया जाता है. जब मना करने को परिवार की इज्जत के खिलाफ माना जाता हो तो ऐसे में महिलाएं सिर्फ किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि एक संस्था को मना कर रही होती हैं.
शादी के मामले में यह सवाल और भी अहम हो जाता है. लगभग आधी महिलाओं का कहना है कि वे शादी या लंबी चलने वाली रिलेशनशिप में सेक्स के लिए मना कर सकती हैं और उम्मीद करती हैं कि उनके फैसले का सम्मान किया जाएगा. बाकी लोगों ने बताया कि मना करने पर उनसे सवाल किए जाते हैं, उन्हें चुनौती दी जाती है या दबाव और भावनात्मक ब्लैकमेल के जरिए उन्हें झुका दिया जाता है.

सर्वे के सबसे गंभीर आंकड़े इसी मामले में हैं—17 फीसद महिलाओं ने बताया कि पति या पार्टनर ने उन्हें शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया. डेटा से पता चलता है कि रिश्तों के अंदर जबरदस्ती का यह मामला हर वर्ग, शिक्षा और इलाके में देखने को मिलता है.
फिर भी, इसी अध्याय में सोच बदलने के सबूत भी मिलते हैं. साफ तौर पर ज्यादातर (66 फीसद) मानती हैं कि शादीशुदा जिंदगी में भी बलात्कार हो सकता है. यह इस नजरिए के विपरीत है कि शादी का मतलब हमेशा के लिए सहमति मिल जाना है. तीन-चौथाई स्त्रियां वैवाहिक बलात्कार के खिलाफ कानून का समर्थन करती हैं, हालांकि इसमें सबसे बड़ा समूह (43 फीसदी) बिना शर्त उसे अपराध मानने के बजाय इससे बचाव के उपाय चाहता है.
वैवाहिक बलात्कार को मान्यता देने से न्यायपालिका लगातार इनकार करती रही है, इस अदालती नजरिए को 44 फीसदी साफ तौर पर नाइंसाफी और महिलाओं के अपने शरीर पर अधिकार का उल्लंघन मानती हैं, जबकि 29 फीसद का कहना है कि इस मामले को संसद सुलझाए न कि अदालतें.
लिहाजा, जो तस्वीर उभरती है, वह ऐसे सिस्टम की है जो बदलाव के दौर से गुजर रहा है. महिलाएं अब शादी की संस्था में रजामंदी को अनिवार्य मानने से इनकार करती हैं. इसके बावजूद, परिवार ही वह पहली जगह है जहां उनकी आजादी की परीक्षा होती है, और सिर्फ 54 फीसद महिलाएं ही दोस्तों या परिवार के साथ ऐसे उल्लंघन के बारे में बात करने में सहज महसूस करती हैं. लगता है कि निजी जिंदगी का दायरा ही वह जगह है जहां रजामंदी को लेकर चल रही बहस जीती या हारी जाएगी.

