
धर्म ही रहता है, बाकी सब नश्वर है—अयोध्या के राजकुमार ने कहा था, जब वे अपने राज-पाट और यश-वैभव से मुंह मोड़कर संन्यासी की तरह वन में रहने जा रहे थे. हिंदू देवों में किसी भी देवता से ज्यादा राम ने कर्तव्य और वैराग्य को जीवन का नियम बनाया. उन्हें करोड़ों हिंदू आज भी ईश्वर के अवतार के रूप में पूजते हैं.
सामान्य मनुष्यों के लिए वह आदर्श आसान नहीं था. आधुनिक भारतीय इतिहास की दिशा बदलने वाला सदी भर का राजनैतिक आंदोलन उनके नाम पर चला. उसका फल जनवरी 2024 में अयोध्या में सोने-सी आभा का विशाल मंदिर था, जिसकी लागत करीब 2,000 करोड़ रुपए बैठी.

विडंबना ही है कि राम के वैराग्य को भौतिक वैभव में बदलने का विचार बहुत जल्द और कहीं ज्यादा कुत्सित रूप में सामने आ गया. जून 2026 के आखिरी हफ्ते में 70 एकड़ के राम जन्मभूमि मंदिर परिसर के आसपास अंतिम काम पूरा होने के दो महीने बाद अयोध्या किसी दैवी आभा से नहीं, बल्कि उसके उलट माहौल से खदबदा रही है. नगर पर बदनामी की छाया है और पुलिस जांच आगे बढ़ रही है. जांच जिस चीज का पीछा कर रही है, वह है लालच का फैलता दाग—आरोप है कि भक्तों की ओर से दान में दी गई करोड़ों रुपए की रकम उसके रखवालों ने ही गबन कर ली.
इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी (सपा) के नेतृत्व में राज्य के विपक्षी नेताओं ने गंभीर आरोप लगाए. उसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 13 जून को तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआइटी) की घोषणा की. उसका काम सिर्फ भ्रष्टाचार की खास घटनाओं की जांच करना नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया की पड़ताल करना भी था, जिसके जरिए दान लिया गया, गिना गया, रखा गया और जमा किया गया.
अगले कुछ दिनों में गरमाए राजनैतिक माहौल के बीच, जांचकर्ताओं ने लगभग साल भर के वित्तीय रिकॉर्ड खंगाले, छिपाए और छेड़छाड़ किए गए सीसीटीवी डेटा निकाले, बैंक लेनदेन की जांच की और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट (एसआरजेटीकेटी) के अधिकारियों, बैंक कर्मचारियों और नकदी गिनने वालों से पूछताछ की. 23 जून को एसआइटी ने प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें चोरी की 70 घटनाओं का ब्योरा था.

कुल रकम 7.9 करोड़ रुपए बताई गई. दो दिन बाद अयोध्या पुलिस ने एफआइआर दर्ज की, जिसमें दान गिनने और जमा करने से जुड़े आठ आरोपियों के नाम थे. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन घोटाले का दायरा बढ़ने के साथ ट्रस्ट के दो प्रमुख लोगों—महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्र—ने अपने इस्तीफे सौंप दिए.
'चंदा चोरी’
फटाफट विपक्ष ने केंद्र और राज्य सरकार, दोनों को घेर लिया. इसे 'चंदा चोरी’ बताकर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सवालों की बौछार कर दी: दान की नकदी गिनने की अहम सीसीटीवी फुटेज गायब क्यों हुई? क्या नकदी राजनैतिक खजाने में भेजी गई? कोई सरकार खुद की जांच कैसे कर सकती है? जैसे-जैसे घटनाएं आगे बढ़ीं, सवाल बढ़ते गए.
आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह ने एक पुरानी जांच का मुद्दा उठाया, जिसमें मंदिर ट्रस्ट पर अयोध्या में बड़े जमीन सौदों के आरोप चुपचाप दबा दिए गए थे. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे ''5,000 करोड़ रुपए का घोटाला’’ बताया और सवाल उठाया कि 1990 के दशक से मंदिर के लिए चंदे में जुटाई गई भारी रकम का क्या हुआ.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब सिर्फ सात महीने बचे हैं, ऐसे में इस मामले के असर को संभालना भाजपा के लिए बहुत बड़ा दांव बन गया है. लोगों के मन से संदेह दूर करने के लिए दोषियों को कानून के दायरे में लाना जरूरी था. भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र कहते हैं, ''मंदिर के प्रशासन के तरीके की पूरी सफाई जरूरी थी.’’
चोरी की सबसे पहले निंदा करने वालों में नृपेंद्र मिश्र भी शामिल थे, जो राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष हैं, जिसने मंदिर निर्माण की निगरानी की थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व प्रमुख सचिव मिश्र ने इंडिया टुडे टीवी से कहा कि श्रीराम के नाम पर दान की कथित लूट ''वाकई दुखद है. इससे भक्तों की आस्था को चोट पहुंची है.’’ मंदिर प्रबंधन में बदलाव की मांग करते हुए उन्होंने कहा, ''जांच के दो पहलू हैं—आपराधिक और भविष्य में सुधार. जब इन दोनों पहलुओं पर काम होगा, तभी हम भक्तों का भरोसा जीत पाएंगे.’’
दशकों तक राम जन्मभूमि आंदोलन का नेतृत्व करने वाली विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने न सिर्फ चोरी की तुरंत निंदा की बल्कि संगठन को इस घटना से अलग भी कर लिया. हालांकि चंपत राय अब भी उसके अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं लेकिन विहिप अध्यक्ष आलोक कुमार ने साफ कहा, ''देश के किसी भी हिस्से में मंदिर बनाना या उसे चलाना विहिप का काम नहीं.
ट्रस्ट ही उन्हें चलाता है और ट्रस्ट में जो कुछ होता है, उसकी जिम्मेदारी ट्रस्ट की होती है. अयोध्या में जो हुआ है, वह बहुत अपमानजनक और बहुत शर्मनाक है. हम सब, दुनिया भर के हिंदू, खासकर वे लोग जिन्होंने धन दिया, और कारसेवक तथा उनके परिवार, बहुत आहत हैं. जो भी दोषी है, ऐसे हर शख्स पर मुकदमा चलना चाहिए और उसे सजा मिलनी चाहिए.’’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इस मुद्दे पर काफी देर से दी प्रतिक्रिया में यही लाइन ली. सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि ''इससे समूचे समाज और रामभक्तों को गहरा आघात पहुंचा है.’’ दोषियों को कठोर दंड सुनिश्चित करने के अलावा उन्होंने ट्रस्ट से अपेक्षा जताई कि ''इस घोर निंदनीय घटना को असाधारण मानकर वह व्यवस्था और संचालन की कमियां दूर करेगा.’’
कैश की कड़ी
यह गबन कैसे हुआ? गिनती की प्रक्रिया से संबंधित लोग एसआइटी की पड़ताल की पुष्टि करते हैं: यह कोई एक बार की चोरी नहीं, बल्कि ढीले-ढाले नियमों का कुछ इस तरह का इंतजाम था, जिसमें रिसाव व्यवस्थित रूप से हो सके. मंदिर परिसर में कंप्यूटराइज्ड रसीद देने वाले 10 दान काउंटरों के अलावा कुल 35-40 हुंडियां यानी दान पेटियां हैं. उनमें छह गर्भगृह के पास हैं और बाकी साथ के मंदिरों और सार्वजनिक जगहों पर लगी हैं.

औसत दैनिक संग्रह 13 लाख रुपए तक जाता है, जो सप्ताहांत और धार्मिक कैलेंडर के महत्वपूर्ण दिनों पर 50 लाख रुपए तक पहुंच जाता है. वित्त वर्ष 2024-25 में ट्रस्ट ने घोषित किया कि उस साल 327 करोड़ रुपए की कुल सालाना आय में भक्तों से सीधे मिला योगदान 153 करोड़ रुपए था.
सिद्धांत रूप में सुरक्षा तंत्र चाक-चौबंद है. हर हुंडी की पूरी यात्रा को सुरक्षित रखने के लिए सख्त एसओपी है. उन्हें कम से कम चार अधिकृत व्यक्तियों की मौजूदगी में खोला जाना चाहिए और हर बार का उचित रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए. पर एसआइटी जो तस्वीर बताती है, वह ज्यादा ढील-ढाले रवैए जैसी है, प्रक्रिया पर निगरानी का खास बोझ न था. शुरुआत वहीं से होती है, जहां अनधिकृत संरक्षक चाबियां संभाल रहे थे और अनिवार्य डबल-लॉक व्यवस्था को दरकिनार किया जा रहा था.
तीर्थयात्री सुविधा केंद्र (पीएफसी) के बेसमेंट में बना गिनती कक्ष इस स्याह ड्रामे का मुख्य मंच था. जांचकर्ताओं ने उसके कैमरा कवरेज में ब्लाइंड स्पॉट पाए. यानी वह लगभग ऐसा अपारदर्शी मंच था, जिसकी कोई चौथी दीवार न थी. उसी जगह हुंडियां खोली जाती थीं, नकदी को हाथ से छांटा जाता था, गड्डियां बनाई जाती थीं और फिर मशीनों से गिना जाता था.
जांचकर्ता हाथ की सफाई के कई तरीकों की बात करते हैं—जैसे गड्डियों में चुपके से अतिरिक्त नोट डालना, ताकि बाद में उन्हें निकाल लिया जाए. कुछ समय तक परिसर की एक अस्थायी पुलिस चौकी भी गिनती कक्ष के रूप में इस्तेमाल हुई, लेकिन सुरक्षा ढीली ही थी. बाहर निकलते समय तलाशी नहीं, बिना जेब वाले कपड़े नहीं, स्वतंत्र गवाह नहीं. रक्षक आराम से भक्षक बन सकता था.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने इंडिया टुडे से निगरानी व्यवस्था की खामियां गिनाईं. उसने कहा कि परिसर में करीब 800 सीसीटीवी कैमरे हैं और सभी कैमरों की लाइव फीड केंद्रीय कंट्रोल रूम में उपलब्ध है. लेकिन गिनती क्षेत्र के चार-पांच कैमरों की फीड पासवर्ड से सुरक्षित थी और मुट्ठी भर लोगों तक ही उसकी पहुंच थी. उस अधिकारी के शब्दों में, ''जिस दिन मामला सामने आया, हम फीड को देखने गए और एक्सेस मांगी. तभी पासवर्ड हटाए गए.’’ छह साल पहले ऑडिट और रिस्क मैनेजमेंट समीक्षा ने ऐसी ही खामियों की ओर इशारा किया था.
चेतावनियों की अनदेखी
ट्रस्ट के गठन के नौ महीने बाद नवंबर 2020 में कामकाज की समीक्षा के लिए प्राइवेट ऑडिट फर्म की सेवाएं ली गईं. रोजमर्रा के कामकाज का अध्ययन करके वह इस नतीजे पर पहुंची कि ट्रस्ट के पास ऐसे ब्योरेवार नियम-कायदे ही नहीं हैं, जो साफ-साफ जिम्मेदारी तय करें और असरदार निगरानी व्यवस्थाएं बनाएं.
उसने आगाह किया कि ऐसी विधिवत मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) के बिना व्यवस्था में गड़बड़ियों की गुंजाइश बनी रहेगी. उसने खास तौर पर दान का रिकॉर्ड रखने की दयनीय व्यवस्था और वित्तीय लेनदेन और डेटा की लचर निगरानी की तरफ ध्यान दिलाया.
उसने नकद और जेवर-गहनों के दान के अलग-अलग रजिस्टर रखने और योग्य अकाउंटिंग प्रोफेशनल्स की देखरेख में बैंक खाते के ब्योरों के साथ नियमित मिलान करने की सिफारिश भी की. यही नहीं, करीब 1,500 कर्मियों को काम पर रखने के बावजूद ट्रस्ट पेशेवराना तरीके से छानबीन के बजाय निजी ढंग से बनाए तौर-तरीकों पर ही भरोसा करता रहा है.
छह साल बाद सलाह-सुझाव के वे शब्द बुरी तरह चुभते ही तो हैं. कथित दोषियों में प्रमुख राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू है, जो पहले चंपत राय का ड्राइवर था. कहा जाता है कि राय से इस नजदीकी की बदौलत उसने अच्छा-खासा दबदबा कायम कर लिया. दान पात्रों की चाबियां जाहिरा तौर पर उसी के पास रहती थीं और गिनती करने वाले प्रमुख कर्मियों पर भी उसी का नियंत्रण था.
दूसरों का दबदबा उससे कम था. गिरफ्तार किए गए लोगों के कुछ ठिकानों और मंदिर परिसर के भीतर मारे गए पुलिस के छापों में जल्द ही 79.85 लाख रुपए की नोटों की गड्डियां बरामद हो गईं, उनमें से कुछ तो मंदिर के बाथरूमों में छिपाई गई थीं. इसके अलावा कई जायदाद और संपत्तियों के दस्तावेज भी बरामद हुए जिनका कुल मूल्य करीब दो करोड़ रुपए बताया जाता है.
यह तस्वीर उससे मिलती-जुलती है जो गिनती करने वाली टीम के एक पूर्व सदस्य ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर इंडिया टुडे को बताया. उसने राय से संपर्क साधा, जिन्होंने उसे अनिल मिश्र के पास भेज दिया, और इस तरह मार्च 2025 में वह इस गणना तंत्र का हिस्सा बन गया. मिश्र सेवानिवृत्त होमियोपैथिक डॉक्टर हैं जिनकी जड़ें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी रही हैं.
उन्होंने और उनकी पत्नी ने ही 2024 की प्राण प्रतिष्ठा में प्रधान यजमान की भूमिका निभाई थी क्योंकि विवाहित जोड़ा ही यह आनुष्ठानिक भूमिका निभा सकता है. पिछले मार्च में छोटे-से इंटरव्यू के बाद मिश्र ने इस बंदे को और कई अन्य को 15,000 रुपए महीने की तनख्वाह पर रख लिया, जिसे बाद में बढ़ाकर 18,000 रुपए कर दिया गया. प्रक्रिया से जुड़ा वही बंदा आगे बताता है, ''हमारा काम सीधा-सादा था.
एक समय पर हम दो या तीन दानपात्र उस कमरे में ले जाते जहां गिनती होती थी, उन्हें खाली करते, नोट छांटते, उनके बंडल बनाकर रबर बैंड से बांध देते, और वापस दान बक्सों में रख देते. उसके बाद मशीनों से उनकी गिनती का इंतजार करते.’’ ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) के एक-एक प्रतिनिधि वहां मौजूद होते थे.
उसका आरोप है कि उसके उस काम में जुड़ने के कुछ हफ्तों बाद ही यह पटकथा रास्ते से भटक गई. वह बताता है, ''गिनती वाले कमरे में लोग कुर्ते, कार्गो पैंट और बड़ी-बड़ी जेबों वाले कपड़े पहनकर आते. कोई नियम नहीं थे. गिनती में मदद के लिए वे दूसरों को भी ला सकते थे. कभी-कभी चालीस से पचास लोग आ जाते थे.’’ वह आगे बताता है, ''हमने गौर करना शुरू किया कि कुछ कर्मचारी, जिनमें अब गिरफ्तार लोग भी शामिल हैं, नोटों की गड्डियां, चार या पांच, ज्यादातर 500 के नोटों की गड्डियां, निकाल रहे थे.
हममें से कुछ ने उसका विरोध किया, लेकिन उन्होंने हर बात से इनकार कर दिया.’’ उसने और कुछ दूसरों ने अंतत: काम छोड़ दिया. इस बीच संतोष दुबे ने जो आरोप लगाए, वे गड़बड़ियों के लंबे इतिहास की तरफ इशारा करते हैं. दुबे बाबरी विध्वंस मामले में नामजद कारसेवक और अब धर्म सेना के प्रमुख हैं. वे दावा करते हैं कि मंदिर आंदोलन के दौरान दान की गईं सोने, चांदी, हीरे-जड़ी और अष्टधातु की करीब 1,250 ईंटों का कहीं कोई हिसाब नहीं मिल रहा.
एसआइटी की जांच अवधि 15 जुलाई तक बढ़ा दी गई है. अब उसने पांच साल के बही-खातों की पूरी तरह नए सिरे से ऑडिट का फैसला किया है. हर वित्तीय लेनदेन की समीक्षा, निर्माण ठेकों की जांच और कथित तौर पर कमिशन के भुगतान के अलावा बिना हिसाब-किताब वाले जेवरात के दान की पड़ताल के उसके फैसले से अंदाजा लगता है कि जांचकर्ता छोटी-मोटी व्यन्न्तिगत चोरियों से आगे बढ़कर संभावित व्यवस्थागत वित्तीय अनियमितताओं और गड़बड़ियों के सबूत तलाश कर रहे हैं. ये घटनाएं जांच का दायरा बढ़ा सकती हैं और अंदाजा दे सकती हैं कि कथित चोरियां लूट की इकलौती वारदातें नहीं हैं.
ट्रस्ट का पुनर्निमाण
इस विवाद ने एक काम यह किया कि ट्रस्ट के ढांचे की बड़ी खामी की तरफ ध्यान दिलाया, यानी सत्ता और अधिकारों का कुछ व्यक्तियों के हाथ में केंद्रित होना. कागज पर तो यह अचूक दिखाई देता था—हिंदु साधु-संतों, विहिप-आरएसएस मूल के लोगों, चार पदेन सरकारी सदस्यों का जमावड़ा. लेकिन व्यवहार में, अब 80 बरस के हो रहे, राय अकेले सर्वेसर्वा थे. अनिल मिश्र ने भी दबदबा कायम कर लिया और इससे चहेतों को पालने की व्यवस्था फली-फूली.
एक ट्रस्टी महंत दिनेंद्र दास ने इंडिया टुडे से बातचीत में उसे 'एकछत्र राज’ बताया. उनका कहना था कि अयोध्या विवाद के मूल पक्षकारों में से एक निर्मोही अखाड़े का प्रतिनिधि होने के बावजूद उन्हें दरकिनार कर दिया गया. उनके शब्द थे, ''राम जी ने मेरा नाम कलंकित होने से बचा लिया.’’
अयोध्या के राम मंदिर में दान की कथित चोरी से एक ज्यादा बड़ा सवाल उठता है. देश के सबसे धनवान और सबसे ज्यादा श्रद्धालुओं की भीड़ से भरे मंदिरों में धर्म और आस्था की बदौलत आने वाली संपदा की हिफाजत कैसे करनी चाहिए? इसका जवाब इसलिए जरूरी है क्योंकि दूसरे बड़े मंदिरों में भी गड़बड़ियां होती रही हैं. अमूमन ये अपराध अंदरूनी लोगों के ही काम होते हैं, जैसा कि केरल के सबरीमला मंदिर में सोने की कथित लूट में हुआ, जहां रिकॉर्ड में हेराफेरी की गई और सोना-चढ़ी प्राचीन कलाकृतियां समुचित अधिकार के बिना ले जाई गईं.
देश में हिंदू मंदिरों की कोई आधिकारिक गिनती नहीं है लेकिन करीब 10 लाख मंदिर होने का अनुमान लगाया जाता है. उनमें ज्यादातर छोटे मंदिर हैं जिनका रखरखाव स्थानीय समुदाय और पुरोहित या परिवार करते हैं. चुनौती उन बड़े मंदिरों की है जिनके पास बहुत-सारी जमीनें, जेवर-गहने और दूसरी संपत्तियां हैं और जिन्हें दान में भारी नकदी, सोना-चांदी और बेशकीमती रत्न मिलते हैं. उनके प्रबंधन में बहुत भिन्नताएं हैं. कुछ मंदिर परिवार चलाते हैं, कुछ पर महंतों और अखाड़ों का कब्जा है, तो कुछ का संचालन ट्रस्ट या न्यास, वैधानिक बोर्ड या सरकारी देखरेख में चल रहे निकायों के हाथों हो रहा है.
संविधान धार्मिक संस्थाओं के धर्मनिरपेक्ष मामलों में सरकार के दखल की इजाजत देता है. अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन अनुच्छेद 25(2) सरकार को धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी ''आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य गतिविधियों’’ के नियमन की अनुमति देता है.
इसी की बदौलत सरकारें मंदिर प्रशासन से जुड़े कानून पारित कर पाईं, जिनमें तमिननाडु की हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती व्यवस्था से लेकर केरल का देवस्वोम बोर्ड, आंध्र प्रदेश के तिरुमला तिरुपति देवस्थानम और 1983 में बड़ी चोरी के बाद बने उत्तर प्रदेश के काशी विश्वनाथ मंदिर के वैधानिक बोर्ड तक शामिल हैं. मगर नियम और नियंत्रण के बीच की लकीर विवाद का विषय बनी हुई है. उत्तराखंड ने पांच साल पहले चार धाम मंदिरों को सरकार की देखरेख में चलने वाले बोर्ड के मातहत लाने की कोशिश की थी, जिसे पुजारियों और उससे जुड़े दूसरे लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा, और अंतत: उस कानून को वापस ले लिया गया.
इस बीच अयोध्या बेहतरीन ढंग से संचालित मंदिरों से सबक ले सकता है (देखें: बड़े मंदिर कैसे करते हैं अपने दान की रखवाली). तिरुपति मिसाल है. वहां सीलबंद हुंडियां समर्पित पराकमानी केंद्रों तक ले जाई जाती हैं, सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में उन्हें गिना और खोला जाता है, मशीनों से गिना जाता है, बहुमूल्य धातुओं समेत उन्हें एसबीआइ और यूनियन बैंक में जमा किया जाता है.
इससे डिजिटाइजेशन की अहमियत भी स्थापित होती है. ट्रस्ट को मिला गैर-हुंडी वाला लगभर हर योगदान ऑनलाइन होता है, जिससे लूट की गुंजाइश कम हो जाती है. वहां ताजा विवाद अलहदा मसले से पैदा हुआ. लड्डुओं में सस्ते वनस्पति तेल की कथित मिलावट, जिसे घी की जगह इस्तेमाल किया बताया गया.
आगे का साफ रास्ता
इसके अलावा शिरडी और सिद्धिविनायक मंदिर अपने संचालन में अनुशासन की मिसाल हैं. शिरडी में नकदी सीसीटीवी की निगरानी और ट्रस्ट तथा चैरिटी कमिश्नर और बैंक प्रतिनिधियों की मौजूदगी में हफ्ते में दो बार गिनी जाती है. गिनती करने वाले कर्मचारियों की तलाशी ली जाती है और उन्हें बिना जेब वाली वर्दी पहनाई जाती है.
सिद्धिविनायक में सीसीटीवी की निगरानी और न्यासियों, अधिकारियों और बैंक के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में साप्ताहिक गिनती की जाती है; सोने और चांदी के चढ़ावे हर थोड़े समय बाद नीलाम किए जाते हैं; सरकारी सूची में शामिल फर्म से खातों का लेखापरीक्षण करवाया जाता है और वार्षिक रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर रखी जाती है. पुरी का जगन्नाथ मंदिर परिसंपत्तियों में पारदर्शिता बरतने की कसम खाता है.
दान की धनराशि ऑपरेशनल, फाउंडेशन और कॉर्पस फंड में बांटी जाती है, बड़ी धनराशियां लंबी अवधि की जमाराशियों में और बची हुई बेशकीमती धातुएं एसबीआइ के लॉकर में रखी जाती हैं. सोमनाथ में न्यासियों को रोज रिपोर्ट दी जाती है, अगली सुबह नगदी बैंक में जमा की जाती है, और लिखित मानक संचालन प्रक्रिया है कि नकद दानपात्र कब खोले जाने होंगे, कौन-कौन मौजूद रहेगा और परिसर में नकदी एक से दूसरी जगह कैसे ले जाई जाएगी.
अयोध्या के लिए आगे का रास्ता स्पष्ट है: दानपात्र सीलबंद हों और उन पर नंबर लिखे हों, सीसीटीवी की निगरानी में उन्हें गिना और लाया-ले जाया जाए, ट्रस्ट, बैंक, लेखापरीक्षा और सुरक्षा अधिकारी अनिवार्य रूप से मौजूद रहें, गिनने वाले कर्मचारियों की तलाशी ली जाए और उनके लिए बिना जेब की वर्दी हो, उसी दिन या अगले दिन बैंक में जमा करें, सोने और चांदी की डिजिटल सूचियां बनाएं, स्वतंत्र मूल्य निर्धारण करवाएं, समय-समय पर तीसरे पक्ष से ऑडिट करवाएं, और वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक करें. नृपेंद्र मिश्र कहते हैं, ''मंदिर की समुचित साजसंभाल के लिए कायापलट की जरूरत है. इसमें रोजमर्रा के काम संभालने, नियमों के पालन और जवाबदेही के लिए पूर्णकालिक सीईओ की नियुक्ति भी शामिल है.’’
अयोध्या की सड़कों पर माहौल गंभीर और उदास है. चाय की दुकानों और पान के ठेलों से लेकर ई-रिक्शों पर आते-जाते लोगों तक के बीच मंदिर में हुई चोरी ही चर्चा का विषय है. भाजपा के समर्थक हों या समाजवादी पार्टी के, ताउम्र यहीं रहने वाले बाशिंदे हों या पहली बार आए लोग, सभी एक-सी मायूसी की जुबान में बोल रहे हैं. कर्नाटक के कॉमर्स पोस्टग्रेजुएट और मंदिर के नजदीक खुदरा दुकान पर काम करते हुए कोविड के दौरान परिवार के एक सदस्य को खो देने की तकलीफ से निपट रहे रवि कुमार कहते हैं, ''न्यूज में मैं ये बातें सुनता हूं और मेरा दिल बैठ जाता है.’’
वे पूछते हैं, ''मुझे नहीं पता अब किस पर भरोसा किया जाए. मैं यहां शांति की तलाश में आया. अब हमें शांति कहां मिलेगी?’’ कुछ कदम दूर बैठे, पहली बार आए मैसूरू के तीर्थयात्री आदर्श कहते हैं, ''जब ऐसी चीजें होती हैं, तो हमारी आस्था को चोट लगती है.’’ धर्म और आस्था की बदौलत दान का आना जारी रह सकता है, लेकिन अचूक व्यवस्थाएं स्थापित करके ही इसे चोरी और लूट से सुरक्षित रखा जा सकता है. और देश के सबसे पवित्र और श्रद्धेय मंदिर पर लगे इस दाग को हमेशा के लिए धोया जा सकता है.
—साथ में राज्यों की ब्यूरो रिपोर्ट.

