
एक रोजमर्रा का चमत्कार, जो इतने नियमित ढंग से आपकी मेज तक पहुंचता है कि सामान्य-सा लगने लगता है: आपकी खाने की थाली. रोटी या चावल, थोड़ी दाल, सब्जी, शायद अचार. यह थाली पूरे भारतीय कृषि क्षेत्र की छोटी तस्वीर है. फिर भी हम इसके बारे में ज्यादा नहीं सोचते, जब तक चीजें बिगड़ने न लगें और हमें कमी, बढ़ती कीमतों या दोनों का सामना न करना पड़े.
और 2026 की गर्मियों में किसानों के सिर पर सचमुच कई तरह के अनिष्ट एक साथ मंडरा रहे हैं. उन्हें एक विरोधाभास जोड़ता है: आत्मनिर्भरता और खाद्य सुरक्षा के दशकों पुराने दावों के बावजूद सबसे देसी भारतीय थाली भी काफी हद तक उन चीजों से बनी है, जो बाहर से आई हैं.
भारतीय थाली दूसरों पर कितनी निर्भर है: दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के खाने के तेल, शायद कनाडा या इथियोपिया की मसूर दाल, म्यांमार का उड़द, ऑस्ट्रेलिया का चना, मोजांबीक की अरहर और हां, पश्चिम एशिया की गैस, जिससे खेत की मिट्टी को खाद मिली. लंबे समय से डाली गई आदतों ने आयात को अब जैसे सिरदर्द बना दिया है.
हैदराबाद के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक जी.वी. रामांजनेयुलु कहते हैं, ''हमारी खाद्य नीतियां साठ के दशक में अटकी हैं और उन्हीं से हम आज और कल की भी समस्याएं हल करने की कोशिश कर रहे हैं.’’
अब युद्ध और खराब मौसम ने उसी कमजोर नस को दबा दिया है. इस दर्द की कीमत आंकड़ों में दिखती है. देश का संयुक्त कृषि आयात बिल, जिसमें खाद, कच्चा माल, खाने के तेल और दालें शामिल हैं, इस वित्त वर्ष में 52-56 अरब डॉलर ( 5-5.3 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंचने की उम्मीद है.
वित्त वर्ष 2026 में यह 49-51 अरब डॉलर (4.4-4.5 लाख करोड़ रुपए) था. सिर्फ खाद और कच्चे माल का आयात ही वित्त वर्ष 2026 के 26-27 अरब डॉलर (2.3-2.4 लाख करोड़ रुपए) से बढ़कर 28-30 अरब डॉलर (2.7-2.9 लाख करोड़ रुपए) होने का अनुमान है. कुल मिलाकर, देश के कुल आयात बिल में इन तीन चीजों की हिस्सेदारी पिछले वित्त वर्ष के 5-5.2 फीसद से बढ़कर 5.2-5.5 फीसद तक पहुंचने की उम्मीद है.
हैरानी नहीं कि सोने और विदेश यात्रा के अलावा विदेशी मुद्रा की खपत व्यक्तिगत स्तर पर घटाने की अपील करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ''अगर हर घर खाने के तेल का इस्तेमाल 10 फीसद घटा दें तो यह देशभक्ति में बड़ा योगदान है.’’
ईरान युद्ध से ठीक पहले 27 फरवरी को देश का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 728.49 अरब डॉलर (69 लाख करोड़ रुपए) पर था. जून के पहले हफ्ते तक यह घटकर 681.61 अरब डॉलर (64.8 लाख करोड़ रुपए) रह गया.
यह करीब 6.4 फीसद की गिरावट थी. सिर्फ अप्रैल अप्रैल में देश के कुल भुगतान संतुलन (देश में आने वाले पैसे और बाहर जाने वाले पैसे का अंतर) में 6.6 अरब डॉलर यानी 62,700 करोड़ रुपए का घाटा था. आयात, सब्सिडी और सहायता बिलों से जीडीपी पर 1.8-1.9 फीसद का बोझ पड़ने का अंदेशा है.
दालें, खाने का तेल और खाद, तीनों में भारतीय कृषि का यह बहुस्तरीय संकट सिर्फ कमी का मामला नहीं. असली चिंता खेती से जुड़ी जरूरी चीजों को लेकर आयात पर निर्भरता है. दालें प्रोटीन सुरक्षा और थाली की महंगाई को प्रभावित करती हैं. खाने का तेल घरेलू बजट और चालू खाते पर असर डालता है.
खाद फसल की लागत, सरकारी सब्सिडी बिल और बुआई के भरोसे को प्रभावित करती है. इन तीनों मामलों में देश उपभोक्ताओं को आयात के जरिए और किसानों को सब्सिडी तथा सरकारी खरीद से बचाने की कोशिश कर रहा है. पर अक्सर ये दोनों लक्ष्य आपस में टकरा जाते हैं.
मौजूदा संकट ने असल खतरे को बेरहमी से स्पष्ट कर दिया है: देश ने अहम कृषि वस्तुओं में कीमतों की स्थिरता को अस्थिर वैश्विक बाजारों के भरोसे छोड़ दिया है. यूक्रेन युद्ध ने सूरजमुखी तेल और उर्वरक की कीमतें बढ़ाईं. ईरान युद्ध और खाड़ी में जंग से एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस), माल ढुलाई और यूरिया की लागत तेजी से बढ़ गई.
उर्वरक की उलझन
उर्वरक का वैश्विक भू-राजनीति और भारतीय खेती की अर्थव्यवस्था के बीच सबसे सीधा रिश्ता है और यह देश को बेहद महंगा पड़ रहा है. उर्वरक देश की खाद्य सुरक्षा का छिपा इंजन भी है. हर फसल मिट्टी से पोषक तत्व लेती है, उर्वरक उन्हें वापस डालता है. लेकिन फसलों को पोषक तत्वों का संतुलित आहार चाहिए.
जैसे पत्तियों की तेज बढ़त और बायोमास के लिए यूरिया से नाइट्रोजन, जड़ों के लिए डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) से फॉस्फोरस, और फसल को जलवायु झटकों से मजबूत बनाने के लिए म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) से पोटैशियम. यह पानी की कमी सहने और दाने के विकास तथा पैदावार सुधारने में मदद करता है.
एनपीकेएस (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम और सल्फर) का मेल ज्यादा संतुलित पोषण देता है. ये एक-दूसरे के विकल्प नहीं, बल्कि पूरक हैं. लेकिन कीमतों की गड़बड़ी इस्तेमाल को बुरी तरह बिगाड़ देती है. किसान सस्ती यूरिया खेतों में ज्यादा डालना पसंद करते हैं. इसी वजह से देश में खाद के कुल इस्तेमाल में यूरिया की हिस्सेदारी 56 फीसद है. इसके बाद एनपीकेएस करीब 23 फीसद, डीएपी 17 फीसद और एमओपी करीब 4 फीसद है.
खाद बनाने और खरीदने की आर्थिक लागत बहुत बड़ी है. 2024-25 में देश को चार मुख्य उर्वरकों की 6.4 करोड़ टन की जरूरत थी, जो पिछले साल के 6.2 करोड़ टन से ज्यादा थी. घरेलू उत्पादन कुल 4.59 करोड़ टन रहा, जिससे मांग का सिर्फ 70 फीसद हिस्सा पूरा हुआ.
मजबूरन देश को करीब 1.6 करोड़ टन खाद आयात करनी पड़ी, जिसकी लागत 10.23 अरब डॉलर ( 86,500 करोड़ रुपए) रही. यह निर्भरता अब पश्चिम एशिया के युद्ध ने बेरहमी से उजागर कर दी है. भारत के यूरिया आयात का 60 फीसद से ज्यादा, अमोनिया और सल्फर (डीएपी बनाने वाले एसिड के कच्चे माल) का करीब 80 फीसद और उर्वरक कारखानों को चलाने वाली एलएनजी का करीब 86 फीसद इसी क्षेत्र से आता है.
हालांकि, भारत की कमजोरी सिर्फ खाड़ी तक सीमित नहीं. उसकी खाद सप्लाइ चेन दूसरी भू-राजनैतिक दरारों से भी गुजरती है, जिनमें रूस-यूक्रेन कॉरिडोर और चीन शामिल हैं. इससे भारत सप्लाइ के अचानक और अनिश्चित किस्म के झटकों के सामने खुला रह जाता है.
खाद की कमी टालने के लिए भारत ने ईरान युद्ध शुरू होने के बाद तेजी से और कई स्रोतों से खरीद की. करीब महीने भर लगभग किसी भी कीमत पर खरीदारी हुई. इसलिए फिलहाल बुआई का मौसम सुरक्षित है और किसानों को कोई कमी नहीं झेलनी पड़ रही. गांव की दुकान पर कीमत एक रुपया भी नहीं बदली है.
यूरिया की 45 किलो की बोरी अब भी 242 रुपए की है, जबकि उसकी असली लागत 2,420 रुपए है और इसका 90 फीसद से ज्यादा बोझ सरकार उठा रही है. यह अंतर बजट पर डाल दिया गया और वित्त वर्ष 2026 का अंत 1.86 लाख करोड़ रुपए की भारी खाद सब्सिडी के साथ हुआ. हालांकि कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट शुरुआती डेटा के मुताबिक असल में खर्च 2.11 लाख करोड़ रु. किए गए.
वित्त वर्ष 2027 के बजट में 1.71 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया था, तब किसी को नहीं पता था कि होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहेगा. खाद विभाग ने इसे दोगुना करने की मांग की है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अगर युद्ध का असर कम नहीं हुआ, तो बिल 32 अरब डॉलर (3.04 लाख करोड़ रुपए) को पार कर सकता है.
यूरिया से दूरियां
खाद नीति के मामले में मोदी सरकार की तीन अहम रणनीतियां है: देश में उत्पादन बढ़ाना, विदेशों से सप्लाइ पक्की करना और खेतों में उसकी बर्बादी रोकना. सबसे ज्यादा जोर यूरिया पर दिया गया है, जिसका देश में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है. सरकार का कहना है कि 2023-24 में देश में यूरिया का उत्पादन रिकॉर्ड 3.1 करोड़ टन तक पहुंच गया, जिसे बीते छह साल में बने छह संयंत्रों की 76 लाख टन नई क्षमता से मदद मिली.
लेकिन आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ फैक्ट्री उत्पादन के आंकड़े ही नहीं है. यूरिया की उत्पादन लागत में लगभग 90 फीसद हिस्सा प्राकृतिक गैस का होता है, और उसमें इस्तेमाल महज 26 फीसद गैस ही घरेलू होती है. इसलिए पुराने प्लांटों को आधुनिक बनाना, सस्ती गैस जुटाना और कोयले से गैस बनाकर यूरिया उत्पादन की संभावना तलाशना, आयात घटाने की योजना के अहम हिस्से बन गए हैं. इन में बंद पड़े तलचर प्लांट को शुरू करना भी शामिल है.
दूसरा तरीका सप्लाइ को सुरक्षित करना है. भारत खाड़ी देशों और चीन पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है. मार्च 2026 में, उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पहले भारत के यूरिया आयात में खाड़ी देशों की हिस्सेदारी 20-30 फीसद और डीएपी आयात में करीब 30 फीसद थी. अब रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया, मिस्र और टोगो वगैरह से लेने का प्रयास हो रहा है.
तीसरा तरीका बर्बादी में कमी करना है. देश में खाद के तौर पर यूरिया का उपयोग ज्यादा होता है क्योंकि यह सस्ती है, इसके बारे में लोग जानते हैं और यह एक तरह से हरियाली का भ्रम भी दिखाता है. लेकिन नाइट्रोजन के अधिक उपयोग और फास्फोरस, पोटाश, सल्फर और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स के कम इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत को नुकसान पहुंचता है और खाद की क्षमता कम होती है.
2023 में मोदी सरकार ने पीएम-प्रणाम योजना शुरू की. इसके तहत जो राज्य रासायनिक खादों का इस्तेमाल कम करके और ऑर्गेनिक और जैव-खाद को बढ़ावा देकर उर्वरक सब्सिडी बचाएंगे, उन्हें उस सब्सिडी का 50 फीसद हिस्सा वापस मिलेगा. लेकिन यह योजना अभी रफ्तार नहीं पकड़ पाई है.
किसानों को खाद सब्सिडी सीधे नकद देने पर दशकों से बहस चल रही है. अभी, सब्सिडी खाद की कीमत में शामिल होती है, खासकर यूरिया में, जिससे यह दिखने में सस्ता लगता है और इस कारण उसके ज्यादा इस्तेमाल तथा दूसरी जगहों में उपयोग को बढ़ावा मिलता है.
साथ ही गैर-कृषि कामों में भी इसका दुरुपयोग होता है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपए की खाद सब्सिडी सीधे किसानों के खातों में भेजने की बात को फिर से उठाया है.
लेकिन इसमें अच्छा-खासा जोखिम भी है. अगर खाद को बाजार भाव पर बेचा जाए और सरकार का पैसा बाद में मिले, तो छोटे किसानों को नकदी की कमी झेलनी पड़ सकती है. अगर पैसा मालिकाना आधार पर दिया जाता है, तो पट्टेदार और बटाईदार बाहर हो सकते हैं.
एक बड़ी बाधा भरोसा भी है: नीति आयोग के ताजा आकलन में पाया गया कि सर्वे में शामिल 95.5 फीसद किसानों के पास बैंक खाते थे, लेकिन महज 36.4 फीसद ने ही सीधे कैश ट्रांसफर को पसंद किया. आॢथक समीक्षा में सुझाया गया है कि यूरिया की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी की जाए और प्रति एकड़ जो अंतर हो, उस राशि को ट्रांसफर कर दिया जाए.
यह आर्थिक रूप से तो सही है लेकिन प्रति एकड़ की समान दर लागू करने में कई गंभीर अड़चनें हैं: जैसे फसल अलग-अलग है, मिट्टी की जरूरतें अलहदा हैं, देश में जमीन की पैमाइश में भी गड़बड़ियां हैं. कोई भी सरकार कीमतों में उछाल के दौरान किसी आवश्यक वस्तु से नियंत्रण नहीं हटाना चाहेगी. सुधार की जरूरत पहले कभी इतनी नहीं रही.
दाल पर मलाल
अगर युद्ध से कोई एक फायदा हुआ है, तो वह यह कि उसने उन सवालों को फिर से उभार दिया है जिनसे देश 40 साल से बचता आ रहा है. दुनिया में सबसे ज्यादा दालें पैदा करने वाला भारत उनका सबसे बड़ा आयातक क्यों बना हुआ है? मुख्य रूप से इसलिए कि दशकों की हरित क्रांति के दौर की नीतियों से एक आदत बन गई है जिसे छोड़ना मुश्किल हो रहा है: सिर्फ चावल और गेहूं को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बिक्री की पक्की गारंटी है.
करोड़ों किसान आमदनी के लिए उस पर निर्भर हैं. उन्हें देश की कुल खेती योग्य जमीन के 36 फीसद हिस्से में उगाया जाता है, और उनसे हमें अनाज का विशाल भंडार मिलता है—उसका पिछला आंकड़ा 27.5 करोड़ टन था.
जाहिर है, यह जरूरत से ज्यादा पैदा किया जाना है; इतना कि देश न केवल शुद्ध निर्यातक बन सकता है, बल्कि 80 करोड़ लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा का बफर स्टॉक भी रख सकता है और उसके बाद भी एथेनॉल बनाने के लिए कुछ अनाज अलग बच सकता है. हमारे खाने में कार्बोहाइड्रेट कितना ज्यादा है, उसकी तुलना दालों से मिलने वाले प्रोटीन की कमी से करते हैं.
देश 1980 के दशक में दालों के मामले में 90 फीसद से ज्यादा आत्मनिर्भर था. यह स्थिति लगातार बिगड़ती गई और 2015-16 तक आयात पर निर्भरता बढ़कर लगभग 29 फीसद तक पहुंच गई. आज अरहर, उड़द, मसूर और पीली मटर का बिना शुल्क आयात किया जाता है जो हमारी जरूरत का 15-20 फीसद पूरा करता है और जिससे खुदरा कीमतें स्थिर रखने में मदद मिलती है.
आयात 2020-21 में 25 लाख टन था जो 2024-25 में 190 फीसद बढ़कर रिकॉर्ड 73 लाख टन तक पहुंच गया है. आयात बिल भी 11,938 करोड़ रुपए से बढ़कर 46,428 करोड़ रुपए हो गया है, जो उसी अवधि में 290 फीसद की वृद्धि है. इसके उलट, घरेलू पैदावार तकरीबन स्थिर रही है. फरवरी में कृषि मंत्री चौहान ने माना कि ''दालों का आयात हमारे लिए शर्म की बात है.’’
हालात इतने खराब होने के कई कारण हैं. नई दिल्ली में द एनर्जी ऐंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) की महानिदेशक डॉ. विभा धवन कहती हैं कि जब ज्यादा उपज देने वाली गेहूं और चावल की खेती का रकबा बढ़ा, तो पंजाब समेत कई राज्यों से दलहनी फसलें लगभग गायब ही हो गईं.
नई दिल्ली में आइसीएआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स ऐंड पॉलिसी रिसर्च के वरिष्ठ वैज्ञानिक दिनेश चंद मीणा का कहना है कि एकतरफा नीतियों के कारण रिसर्च में निवेश भी घटा. लिहाजा, बकौल उनके, 1980-2021 के दौरान अनाज की पैदावार 148 फीसद बढ़ी, जबकि दलहन प्रति हेक्टेयर महज 88 फीसद.
इस अंतर का क्या कारण है? रऌामांजनेयुलु इसे 'संस्थागत नाकामी’ कहते हुए बताते हैं कि देश में दलहनी बीजों पर शोध का 99 फीसद काम सरकारी क्षेत्र में होता है. कानपुर में आइसीएआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पल्सेस रिसर्च के निदेशक डॉ. गिरीश प्रसाद दीक्षित कहते हैं कि शुरुआती दो चरणों-न्यूक्लियस सीड और उससे बनने वाले ब्रीडर सीड-के लिए वैज्ञानिक जिम्मेदार हैं. उन्हें आधार बीजों में बदलना और फिर व्यावसायिक वितरण के लिए प्रमाणित करना सरकारी एजेंसियों का काम है. यहीं चेन टूट जाती है.
दाल के हाल
जानकारों के मुताबिक आयात, कीमतों पर नियंत्रण या मौसमी खरीद की घोषणा से देश में दालों की समस्या हल नहीं हो सकती. यह तभी हो सकती है जब उसे पर्याप्त प्रोटीन सेवन के मिशन के रूप में लिया जाए. केंद्र सरकार ने अक्तूबर 2025 में 11,440 करोड़ रुपए के बजट के साथ दलहन में आत्मनिर्भरता का मिशन शुरू किया, जिसका लक्ष्य 2030 तक 3.5 करोड़ टन पैदावार हासिल करना है.
इसमें चार साल तक एमएसपी पर अरहर, उड़द और मसूर की 100 फीसद सरकारी खरीद का वादा किया गया है. उससे लगभग दो करोड़ किसानों को फायदा होने की उम्मीद है. लेकिन आगे का रास्ता मुश्किल है. 2004-14 के दौरान ऐसी तीन कोशिशें सफल नहीं सकीं क्योंकि उनमें पैदावार और खेती के रकबे पर ज्यादा जोर था.
समस्या की एक बड़ी वजह ज्यादा उपज देने वाली किस्मों का अभाव है. नीति आयोग की 2025 की रिपोर्ट यह मानती है. देश में दलहन की पैदावार करीब 925 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. उसे बेहतर बीजों, मौसम अनुकूल किस्मों, कीट नियंत्रण, विस्तार सेवाओं और टेक्नोलॉजी के जरिए 1,150 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक बढ़ाने की जरूरत है. आइसीएआर-आइआइपीआर ने 421 दलहन उपजाने वाले जिलों में से ऐसे 233 जिलों को छांटा है जहां पैदावार राष्ट्रीय औसत से कम है. अब सरकारी एजेंसियों को यह पक्का करना होगा कि अरहर, उड़द, मसूर, मूंग और चने की नई किस्में किसानों तक पहुंचें.
दूसरा बदलाव प्रोत्साहन देने का होना चाहिए. देश में धान और गेहूं की बुआई को प्रोत्साहन देकर खाद्य सुरक्षा हासिल की गई. अब दलहन की बुआई को बढ़ावा देकर पोषण सुरक्षा पक्की करनी चाहिए. दलहन की फसल पानी भी कम सोखती है और मिट्टी में नाइट्रोजन भी बढ़ाती है.
फिर भी दलहन के किसानों पर धान की खेती करने वाले किसानों की तुलना में सरकार का ध्यान कम होता है. विभा धवन का कहना है कि कुपोषण से निबटने के लिए सरकार को उन किसानों को प्रोत्साहन देना चाहिए जो पोषक तत्वों से भरपूर दलहन पैदा करते हैं. इसलिए, दलहन के लिए एमएसपी समर्थन भरोसेमंद होना जरूरी है. गेहूं और धान के साथ अरहर, उड़द और मसूर की पक्की सरकारी खरीद शामिल होनी चाहिए.
तीसरी बात, देश को समझदारी से दालों की खेती का रकबा बढ़ाना चाहिए, लेकिन गेहूं और धान की खेती को खत्म नहीं किया जा सकता, दलहन उन जगहों पर बोई जा सकती है जो खेती के लिहाज से बेकार छोड़ दिए गए हैं.
उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में गन्ने और कपास की कतारों के बीच दलहन फसल उगाने जैसे पारंपरिक तरीके फिर से शुरू किए जाएं, तो खेती के लिए 30 लाख हेक्टेयर जमीन और मिल सकती है, जिससे संभावित 24 लाख टन दलहन उपज सकती है. देश में ऐसी फसल योजना की जरूरत है—जो स्थानीय हो, लचीली हो और कृषि-जलवायु की वास्तविकताओं के अनुकूल हो, न कि कोई ऐसा राष्ट्रीय तरीका जो हर जगह एक समान लागू हो जाए.
खाने के तेल की कड़वी सचाई
खाने के तेल की बात करें तो 3.05 करोड़ हेक्टेयर रकबे में उसकी खेती होती है और सरसों, मूंगफली, सोयाबीन आदि की 4.3 करोड़ टन से थोड़ी ज्यादा उपज मिलती है. उनकी पेराई करने पर लगभग 1.3 करोड़ टन खाने का तेल निकलता है. देश की कुल मांग? बहुत ज्यादा, 2.9 करोड़ टन, और यह बढ़ ही रही है.
इस तरह आयात पर हमारी निर्भरता 56 फीसद है, जिससे खाद्य तेल देश का छठा सबसे महंगा आयात बन गया है. मांग क्यों इतनी तेजी से बढ़ रही है? प्रति व्यक्ति खपत वित्त वर्ष 23 में 19.7 किलोग्राम थी, वह लगातार बढ़ रही है, क्योंकि आय बढ़ रही है, लोग प्रोसेस्ड फूड पसंद कर रहे हैं, और रेस्तरां तथा फूड बिजनेस बढ़ते जा रहे हैं.
नीति आयोग का अनुमान है कि 2028 तक यह खपत 25.3 किलोग्राम तक पहुंच जाएगी. लोग प्रधानमंत्री मोदी की ''10 फीसद कटौती’’ की अपील मान लेते हैं, तो आज की कीमतों पर करीब 2 अरब डॉलर (19,000 करोड़ रुपए) की बचत होगी.
आयात पर ऐसी निर्भरता के बीच युद्ध छिड़ गया, और होर्मुज रूट की बंदी बढ़ती रही, आयात बिल भी बढ़ता गया. हाल ही आयात का तौर-तरीका बदला है, पाम ऑयल की 55-60 फीसद की परंपरागत हिस्सेदारी पिछले साल घटकर 47 फीसद रह गई क्योंकि कीमतें बढ़ने से रिफाइनर सॉफ्ट ऑयल की ओर मुड़ गए.
अर्जेंटीना और ब्राजील से सोयाबीन का आयात रिकॉर्ड 54.7 लाख टन तक पहुंच गया, और सूर्यमुखी तेल का आयात लगभग 30 लाख टन रहा, जो ज्यादातर रूस और यूक्रेन से आया. देश में इस साल लगभग 96 लाख टन का उत्पादन होगा और संभवत: 1.67 करोड़ टन का आयात करना पड़ेगा.
युद्ध ने सरकारी खजाने का हिसाब-किताब बिगाड़ दिया है. इस तेल वर्ष (1 नवंबर-31 अक्तूबर) की पहली छमाही के लिए आयात का खर्च 87,000 करोड़ रुपए रहा, जो पिछले साल की तुलना में 14,000 करोड़ रुपए ज्यादा है और उसमें लगभग 30,000 करोड़ रुपए की वार्षिक छलांग लग सकती है.
देश में इस बोझ को कम करने के लिए दशक के बड़े हिस्से में काफी कुछ हुआ है. सरसों, सोयाबीन, सूर्यमुखी और मूंगफली की एमएसपी कई बार बढ़ाई गई है. लेकिन धान और गेहूं के उलट यह आपात मूल्य समर्थन सीमित तरीके से मिलता है और फसल के केवल 25 फीसद हिस्से के लिए ही होता है और तभी लागू होता है जब बाजार में कीमतें तय दर से 10 फीसद नीचे गिर जाती हैं. फिर भी, इससे तिलहन उपज को 55 फीसद तक बढ़ाने में मदद की है—बुआई के रकबे में 18 फीसद की वृद्धि हुई है और 432 बेहतर किस्मों के कारण प्रति एकड़ उपज 31 फीसद बढ़ी है.
खाद्य तेल आयात पर नकेल
आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर देकर मोदी सरकार ने खाद्य तेलों पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमईओ) के तहत दोहरी रणनीति अपनाई. उसने 2021 में 11,040 करोड़ रुपए के साथ एनएमईओ-ऑयल पाम मिशन शुरू किया, जिसका मकसद पूर्वोत्तर, अंदमान और निकोबार, आंध्र प्रदेश और केरल के कुछ हिस्सों में पॉम की फसल का दायरा बढ़ाना था.
अक्तूबर 2024 में शुरू किए गए एनएमईओ-तिलहन बीज का लक्ष्य तिलहन उपज को लगभग दोगुना करके 6.97 करोड़ टन तक पहुंचाना है. पेराई से लगभग 2.1 करोड़ टन खाद्य तेल मिलेगा. इन दोनों मिशनों के जरिए 2030-31 तक 2.545 करोड़ टन उत्पादन का लक्ष्य है, जो अनुमानित मांग का करीब 72 फीसद होगा.
इसमें जटिल पहेली पॉम ऑयल की है. यह बारहमासी पेड़ है जो साल भर भारी मात्रा में फल देता है जिनमें भरपूर तेल होता है. जमीन के बेहतर इस्तेमाल के मामले में निस्संदेह यह अव्वल है: एक हेक्टेयर से 4-5 टन पॉम ऑयल मिलता है, जो दूसरे तिलहनों की तुलना में 10 गुना ज्यादा है.
लेकिन बदले में इसे पानी भी भरपूर चाहिए: सरसों को प्रति हेक्टेयर सिर्फ 31 लाख लीटर पानी चाहिए, जबकि ऑयल पाम को 1.8 करोड़ लीटर तक पानी की जरूरत होती है. इससे सिंचाई की प्राथमिकताओं को लेकर संकट पैदा होता है. यही वजह है कि एनएमईओ-पॉम ऑयल का लक्ष्य ज्यादा बारिश वाले इलाके हैं, लेकिन उनके लिए अक्सर उष्णकटिबंधीय जंगल साफ कर दिए जाते हैं. इसके विनाशकारी नतीजे इंडोनेशिया और मलेशिया में साफ दिखाई देते हैं.
इसलिए प्रगति के साथ सावधानी भी जरूरी है. नवंबर 2025 तक पॉम ऑयल का कुल रकबा 6.2 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया और एक दशक में पैदावार भी दोगुनी हो गई थी. लेकिन हम अभी भी लगभग 80 लाख टन के अपने सालाना आयात का पांच फीसद से भी कम उगा पाते हैं. नए बागान तैयार होने में 4-5 साल लग जाते हैं जिससे छोटे किसान दूर हट जाते हैं. यहां तक कि मिशन की अपनी अनुमानित सीमा के मुताबिक सबसे अच्छी स्थिति में भी, पैदावार 2030 तक बढ़कर 12 लाख टन ही हो पाएगी.
तिलहन का व्यापक परिदृश्य भी चिंताजनक है. अभी प्रति हेक्टेयर औसत उपज 1,294-1,408 किलोग्राम है, जो अमेरिका और ब्राजील में सोयाबीन की नियमित पैदावार 3,000-3,200 की आधी से भी कम है. इसमें भी वैसा ही फासला है जो दलहन के मामले में है: प्रौद्योगिकी, बीजों की गुणबत्ता, बाजार से टूटा संपर्क. सरकार को किसानों और उपभोक्ताओं की जरूरतों के बीच भी संतुलन साधना पड़ता है.
सितंबर 2024 में, किसानों को समर्थन देने के लिए तीन अहम तेलों पर सीमा शुल्क लगभग चौगुना कर दिया गया-जिससे प्रभावी दरें 27.5 फीसद बढ़ गईं, लेकिन इससे खुदरा कीमतों में इजाफा हो गया. मई 2025 आते-आते सरकार ने अपना रुख पलट दिया और कीमतों में कमी के लिए सीमा शुल्क आधा कर दिया. ऐसा लगता है कि यह रणनीतिक कदम जरूरी था, लेकिन इससे संकेत मिला कि इसमें किसानों के लिए भरोसेमंद आय नहीं है.

इस बीच, मांग और बढ़ गई: 2004-05 और 2022-23 के बीच देहात में खाद्य तेलों की खपत में 83.68 फीसद और शहरों में 48.74 फीसद की वृद्धि हो गई. देश की कड़ाहियों में तेल का जलना नहीं रुकता है तो देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर 20 अरब डॉलर (1.9 लाख करोड़ रुपए) की आंच आएगी.
देश में इसके लिए मिशन, बीज प्रोग्राम, कीमत समर्थन, टैरिफ में बदलाव और किसानों के लिए लागत भरपाई जैसे तरीके आजमाए गए हैं. लेकिन जिस अहम विरोधाभास का सीधा मुकाबला नहीं किया गया, वह है: सस्ता आयात महंगाई से बचाव का जरिया बना हुआ था, जबकि देश में तिलहन किसानों को वैसा भरोसा नहीं दिया गया जिसने गेहूं और धान में देश को आत्मनिर्भर बनाया—यानी खेत से ही तय कीमत पर खरीद.
इनसे मिला सबक सिर्फ खाने के तेलों तक सीमित नहीं है. जिन फसलों का देश बड़े पैमाने पर आयात करता है, या जिनकी देश में सही कीमत नहीं मिल पाती, वे वही फसलें हैं जिनके लिए 'खरीद सिस्टम’ कभी नहीं बनाया गया: तिलहन, दलहन और फल-सब्जियां कोल्ड चेन और प्रोसेसिंग की कमी के कारण खराब हो जाती हैं.
उनको भी उसी सरकारी निवेश की जरूरत है जो दशकों पहले अनाज को मिला था: खरीद का भरोसा, भंडारण, ग्रेडिंग, खेतों के पास शुरुआती प्रोसेसिंग और बाजार तक ऐसी पहुंच जिससे किसानों को ज्यादा पैसे मिलें और उन्हें बिचौलियों के हाथों न गंवाना पड़े.
गेहूं और धान के सिस्टम ने अनाज की सुरक्षा पक्की की क्योंकि सरकार ने जरूरी ढांचा तैयार किया था. दूसरी ज्यादातर फसलों के मामलों में सरकार की नीति बाजार पर निर्भर रही है और बाजार ने सस्ते आयात को ही पसंद किया है. लाखों घरों में कटौती करके वह हासिल नहीं किया जा सकता जो चार दशकों की नीति से नहीं हो पाया.
होर्मुज जलडमरूमध्य शायद फिर से खुल जाएगा, टैंकर चलने लगेंगे और घबराहट भी कम हो जाएगी. लेकिन जब तक भारत अपनी कृषि नीतियों को ठीक करने का सख्त फैसला नहीं लेता, तब तक वह उन खाद्य पदार्थों और खेती से जुड़ी चीजों के लिए हर साल लगभग 35 अरब डॉलर (3.3 लाख करोड़ रुपए) विदेश भेजता रहेगा, जिन्हें वह देश में ही तैयार करने में नाकाम रहा है.
गांव की दुकानों पर यूरिया की कीमत एक रुपए भी नहीं बढ़ी. वहां 45 किलो की बोरी की कीमत अब भी 242 रुपए ही है. सरकार उसकी असली कीमत 2,420 रुपए का 90 फीसद खुद वहन करती है.
खाद के लिए खाड़ी देशों और चीन पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता घटाने के लिए नई दिल्ली की कोशिश रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया, मिस्र और टोगो वगैरह से सप्लाइ लाने की है.
ज्यादा पैदावार देने वाला गेहूं और धान पूरे देश की खेती पर छाता गया, तो दलहन की फसल कई राज्यों से गायब हो गई. एकतरफा नीतियों से शोध पर निवेश भी सिकुड़ा, दालों के बीजों के लिए शोध और विकास का काम 99 फीसद सरकारी क्षेत्र में.
धान और गेहूं के उलट तिलहन का एमएसपी फसल के केवल 25 फीसद हिस्से के लिए ही थोड़े समय के लिए होता है और तभी लागू होता है जब बाजार में कीमतें तय दर से 10 फीसद नीचे गिर जाती हैं.

