वर्ष 1991 की गर्मियों में पी.वी. नरसिंह राव और उनके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने लाइसेंस राज को चलता किया था. पैंतीस साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ वैसा ही बड़ा काम करने की कोशिश कर रहे हैं. 10 जून को वे जवाहरलाल नेहरू के 4,398 दिनों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए.
मोदी अब व्यवस्थित ढंग से उस व्यवस्था को तोड़ रहे हैं, जिसे उद्योग जगत के कई लोग देश का 'रेगुलेटरी राज’ कहते हैं. हालांकि, 1991 की तरह इस बार कोई बड़ा धमाकेदार ऐलान नहीं है. उसके बजाए हजारों बदलाव चुपचाप हो रहे हैं.
उनमें आपराधिक धाराएं हटाना, जरूरी मंजूरियां खत्म करना, बेमानी हो चुके लाइसेंस नियमों और जांच-पड़ताल की उन व्यवस्थाओं को हटाना शामिल है, जो भारतीय उद्यमियों के लिए बाधा बनती थीं और उन्हें संभावित अपराधी की तरह देखती थीं.
अभी की कवायद किसी भी पैमाने पर उदारीकरण के बाद सबसे व्यापक प्रशासनिक सुधारों में से एक है. इसमें सैकड़ों मामूली खामियों को अपराध की श्रेणी से हटाना, नियमों और अनुपालन के जाल को ढीला करना, क्वालिटी-कंट्रोल से जुड़े आदेशों और राज्य स्तर की मंजूरियों की उलझन को कम करना शामिल है.
इसके दार्शनिक केंद्र में एक बड़ा विचार है—जन विश्वास. सीधे कहें तो भारतीय राज्य को लोगों पर भरोसा करना सीखना होगा. रेगुलेटरी सुधार पर सरकार के थिंक-टैंक के अहम सदस्य तथा टीमलीज सर्विसेज के सह-संस्थापक मनीष सभरवाल कहते हैं, ''1991 के सुधारों ने इंडस्ट्रियल लाइसेंसिंग को खत्म किया लेकिन फिर वह मंजूरी और अनुपालन राज में बदल गया.’’
सभरवाल सही कह रहे हैं. 1991 से 2024 के बीच भारत ने औद्योगिक लाइसेंसिंग व्यवस्था तो छोड़ दी, लेकिन उसकी जगह चुपचाप लगभग उतनी ही बोझिल व्यवस्था खड़ी हो गई—पर्यावरण मंजूरियां, फैक्ट्री लाइसेंस, क्वालिटी-कंट्रोल आदेश, नगरपालिका की मंजूरियां, लेबर इंस्पेक्टरों के दौरे और सालाना कंप्लाएंस फाइलिंग का पूरा तंत्र.
बसे छोटे उद्यम को भी हर साल 1,400 से ज्यादा नियम-कायदों के पालन की जरूरत पड़ती थी और रोजाना दर्जनों नियम संबंधी बदलावों पर नजर रखनी होती थी. अलग-अलग देखें तो हर शर्त मुनासिब लग सकती थी. लेकिन इन सारी शर्तों ने मिलकर वह चीज बना दी, जिसे सभरवाल 'रेगुलेटरी कोलेस्ट्रॉल’ कहते हैं. यह शब्द सभरवाल ने यह बताने के लिए गढ़ा कि कैसे जरूरत से ज्यादा कंप्लायंस ने आर्थिक गतिविधि की धमनियों को जाम कर दिया था.
ऐसी कई रुकावटों से वाकिफ मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मंत्रालयों से 40,000 से ज्यादा गैर-जरूरी अनुपालन खत्म करवाए और दर्जनों कानूनों में बदलाव कराए, ताकि वे आम लोगों के लिए कम डराने वाले बनें.
लेकिन वे जानते थे कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. दिसंबर 2024 में राज्यों के मुख्य सचिवों के राष्ट्रीय सम्मेलन में, जिसकी अध्यक्षता वे कर रहे थे, मोदी ने मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन से रेगुलेटरी बोझ की भारी आर्थिक लागत पर विस्तृत प्रेजेंटेशन दिलवाया.
वहां मौजूद अधिकारियों के मुताबिक, मोदी का निष्कर्ष साफ था—छोटे-छोटे सुधार अब पर्याप्त नहीं होंगे. उनका स्पष्ट मानना था कि अगर भारत 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखता है, तो वह वहां तब तक नहीं पहुंच सकता जब तक उसके उद्यमी 20वीं सदी के लिए बने रेगुलेटरी ढांचे में ही रास्ता तलाशते रहेंगे.
प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव डॉ. प्रमोद के. मिश्र ने इंडिया टुडे से कहा, ''मूल बात यह है कि देश अपने कारोबारी माहौल को लगातार बेहतर बनाकर ऊंची विकास दर को बनाए रख सकता है. दशकों में लाइसेंस, अनुमतियों, सर्टिफिकेशन और फाइलिंग की परतें चढ़ती गईं और अनुपालन का ऐसा बोझ बना, जिसका सबसे ज्यादा असर छोटे उद्यमों और कारोबारियों पर पड़ा.
इससे औपचारिक अर्थव्यवस्था में आने की प्रक्रिया, उत्पादकता और रोजगार सृजन रुकते गए. डीरेगुलेशन हमारे सामने उपलब्ध सबसे असरदार और विकास दर में इजाफे का ऐसा उत्प्रेरक है, जो महंगाई बढ़ने की दिशा में नहीं ले जाता, क्योंकि यह ईमानदारी से कारोबार करने की लागत घटाकर उत्पादन बढ़ाता है.’’
त्रिशूल अप्रोच
मुख्य सचिवों के साथ बैठक के एक महीने बाद जनवरी 2025 में मोदी ने खासकर राज्य स्तर पर अफसरशाही की लंबी-चौड़ी लालफीताशाही को काटने और बोझिल रेगुलेटरी राज को खत्म करने के लिए तीनतरफा रणनीति शुरू की.
प्रधानमंत्री ने 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में नियमों को आसान बनाने और प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए केंद्रीय कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन की अध्यक्षता में टास्क फोर्स ऑन कंप्लायंस रिडक्शन ऐंड डीरेगुलेशन (टीएफसीआरडी) बनाई. इस टास्क फोर्स ने पांच बड़े क्षेत्रों में 23 प्राथमिकता वाले क्षेत्र पहचाने.
इनमें जमीन के इस्तेमाल, भवन और निर्माण, श्रम, यूटिलिटी और अनुमतियों से जुड़े मुद्दे शामिल थे. मुख्य मकसद था बेकार, दोहराव वाले या पुराने पड़ चुके अनुपालनों की पहचान करना और उन्हें तार्किक बनाना.
रणनीति के दूसरे हिस्से के तहत मोदी ने केंद्र सरकार के नियमों, सर्टिफिकेशन, लाइसेंस और अनुमतियों के जाल पर ध्यान केंद्रित किया. पहली फरवरी, 2025 को अपने बजट भाषण में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्र सरकार से जुड़े रेगुलेटरी मुद्दों से निबटने के लिए उच्च स्तरीय कमेटी ऑन नॉन-फाइनेंशियल रेगुलेटरी रिफॉर्म्स (एचएलसी-एनएफआरआर) बनाने का ऐलान किया.
यह समिति 19 अगस्त, 2025 को बनाई गई. उसकी अध्यक्षता पूर्व कैबिनेट सचिव तथा नीति आयोग के सदस्य राजीव गाबा को सौंपी गई, ताकि वे उन सुधारों को आगे बढ़ाएं जिन्हें मोदी ने चार दिन पहले स्वतंत्रता दिवस भाषण में ''नेक्स्ट जेनरेशन रिफॉर्म्स’’ कहा था.
गाबा ने 13 वर्किग ग्रुप बनाए, जिनका दायरा डीरेगुलेशन और डिक्रिमिनलाइजेशन से लेकर पर्यावरण नियमों, कारोबारी सहूलियत, मैन्युफैक्चरिंग, एमएसएमई, टैक्सेशन, सर्टिफिकेशन संस्थानों और विवाद निबटारे तक फैला था. पहले की सुधार समितियों से अलग, यह समिति सलाह-मशविरे पर चलने वाली थी.
एक भी सिफारिश तैयार करने से पहले उसने सीआइआइ, फिक्की, एसोचैम और मैनेजमेंट कंसल्टेंट्स की बात सुनी. गाबा ने हाल ही सीआइआइ के एक कार्यक्रम में कहा, ''अब जरूरत नट्स ऐंड बोल्ट्स सुधारों की है. ये भले चमकदार न हों लेकिन बारीक और बेहद जरूरी हैं, ताकि कारोबार शुरू हो सके, चल सके और जरूरत पड़ने पर बंद भी हो सके.
अगली पीढ़ी के सुधारों को लोगों पर अविश्वास और उल्लंघन पर सजा वाली औपनिवेशिक सोच से निर्णायक दूरी बनानी होगी. भरोसे पर आधारित गवर्नेंस की तरफ बढ़ना होगा. यह सिर्फ कानूनों में बदलाव नहीं, बल्कि गवर्नेंस की भाषा में बदलाव का संकेत है. हमें अब नियमों की तुलना दुनिया की बेहतरीन प्रक्रियाओं से करनी चाहिए.’’
इस तरह जन विश्वास मोदी के मिशन डीरेगुलेशन का तीसरा हिस्सा बना. अब तक यह उनकी रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म सोच का सबसे ज्यादा दिखने वाला रूप रहा है. 2025 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा था, ''हमारे देश में ऐसे कानून हैं, सुनकर हैरानी होगी, जिनमें छोटी-छोटी बातों पर जेल भेजने का प्रावधान है, और अब तक किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया.
मैंने यह जिम्मेदारी ली है कि ऐसे गैरजरूरी कानून खत्म किए जाएं, जो भारतीय नागरिकों को जेल के पीछे पहुंचाते हैं.’’ दशकों तक प्रक्रियागत चूकों को अपराध माना गया. कई मामलों में कानून ऐसी गलतियों पर भी जेल देता था, जहां न धोखाधड़ी हुई और न नुक्सान.
डीक्रिमिनलाइजेशन की प्रक्रिया 2023 में जन विश्वास (संशोधन) कानून पास होने से शुरू हुई. 42 कानूनों में 183 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया. लेकिन प्रधानमंत्री दूसरे दौर में ज्यादा व्यापक बदलाव चाहते थे और उन्होंने जोर लगाया.
राज्यों में बदलाव
इस बीच, सोमनाथन की अगुआई वाली राज्य सुधार टास्क फोर्स ने पाया कि राज्यस्तरीय कई नियम कामगारों के कल्याण, पर्यावरण संरक्षा, सुरक्षा या शहरी नियोजन जैसे वाजिब मकसदों के लिए तैयार किए गए, लेकिन वे समय के साथ ऐसी बाधा बन गए हैं, जिनसे लागत, वक्त बढ़ता है और कारोबार अनिश्चितता का शिकार हो जाता है.
जमीन पर काम कर रहे किसी उद्यमी के लिए देश के सबसे अहम कारोबारी नियम अक्सर दिल्ली में बने ही नहीं होते. भूमि अधिग्रहण और लैंड यूज बदलना, फैक्ट्री की मंजूरियां, लेबर इंस्पेक्शन, स्थानीय निकायों की अनुमति, ये सब राज्यों और नगरपालिकाओं के दायरे में हैं, और निवेश के फैसलों को बना या बिगाड़ सकते हैं.
मसलन, मौजूदा श्रम कानून अक्सर कंपनियों को बड़ा होने से रोकते हैं. कारोबारियों को 300 मजदूरों वाली एक फैक्ट्री चलाने के बजाए 150-150 मजदूरों वाली दो फैक्ट्रियां चलाना सस्ता पड़ता है क्योंकि एक तय सीमा पार करते ही अतिरिक्त अनुपालन बोझ शुरू हो जाता है. फैक्ट्री मालिक को निर्माण शुरू करने से पहले लैंड यूज बदलने की जटिल प्रक्रिया, जोनिंग मंजूरी और कई तरह की अनुमतियों से भी गुजरना पड़ता है.
सिर्फ बाधा खड़े करने वाले नियम ही औद्योगिक जमीन का बड़ा हिस्सा निगल सकते हैं. 10,000 वर्ग मीटर के प्लॉट पर बनी फैक्ट्री को 1,164 से 3,522 वर्ग मीटर तक जमीन खाली छोड़नी पड़ सकती है. इससे 97.5 लाख रुपए तक की जमीन बेकार जा सकती है और 500 से ज्यादा संभावित नौकरियां भी हाथ से निकल सकती हैं.
इसके उलट, विशेषज्ञ बताते हैं कि जापान मिश्रित इस्तेमाल वाले शहरी विकास की अनुमति देता है. दक्षिण कोरिया काम के घंटों की सीमा को लंबे समय में औसत के आधार पर लागू करने देता है. और अमेरिका के कुछ हिस्सों में 'एज-ऑफ-राइट’ डेवलपमेंट की अनुमति है, जहां निर्माण से पहले मंजूरियों की जरूरत कहीं कम होती है.
यह बोझ कमजोर प्रशासनिक क्षमता की वजह से और बढ़ जाता है. टास्क फोर्स के सामने साफ था कि राज्य निरीक्षण, लाइसेंस और रिन्यूअल पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, लेकिन उन्हें असरदार ढंग से लागू करने के लिए अक्सर उनके पास पर्याप्त स्टाफ नहीं होता. देश की 3,20,000 से ज्यादा फैक्ट्रियों के लिए सिर्फ 644 इंस्पेक्टर उपलब्ध हैं.
यानी सिद्धांत रूप से हर इंस्पेक्टर के जिम्मे करीब 500 फैक्ट्रियां आती हैं. फायर सेफ्टी इस समस्या को अच्छी तरह दिखाती है. कई राज्यों में फायर एनओसी यानी नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट सिर्फ 1-3 साल के लिए मान्य होते हैं. इससे कारोबारियों को बार-बार वही जानकारी जमा करनी पड़ती है और लंबी मंजूरी प्रक्रिया में फिर से जाना पड़ता है.
वहीं, विभागों के पास अक्सर आवेदन समय पर निबटाने की क्षमता नहीं होती. विशेषज्ञों का तर्क था कि वैधता की अवधि बढ़ाने, जोखिम के आधार पर निरीक्षण अपनाने और मान्यता प्राप्त थर्ड पार्टी का इस्तेमाल करने से अनुपालन लागत घट सकती है, प्रशासनिक बोझ कम हो सकता है और नियमों को लागू करने के नतीजे बेहतर हो सकते हैं. ऑस्ट्रेलिया और कनाडा बिल्डिंग सेफ्टी मंजूरियों में यह तरीका अपनाते हैं.
पर्दे के पीछे काम करते हुए सोमनाथन और उनकी टास्क फोर्स ने राज्यों को कई केंद्रीय सचिवों के बीच बांटा. इन सचिवों ने संबंधित मुख्य सचिवों से सीधा संवाद किया और बदलाव लाने के लिए उनके साथ काम किया. विस्तृत डॉजियर तैयार किए गए. अधिकारी देश भर में गए, मुख्य सचिवों, उद्योग संगठनों और कई मामलों में मुख्यमंत्रियों से मिले.
जमीन, श्रम और स्थानीय मंजूरियां राज्यों के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आती हैं, इसलिए नई दिल्ली ने दबाव के बजाए समझाने-बुझाने का रास्ता अपनाया. इस साल जनवरी में आर्थिक सर्वेक्षण में टास्क फोर्स की प्रगति की समीक्षा में नागेश्वरन ने लिखा, ''इस कवायद को पहले की डीरेगुलेशन मुहिमों से अलग सिर्फ सुधारों की संख्या नहीं बनाती, बल्कि इसकी संस्थागत प्रक्रिया बनाती है—एजेंसियों के बीच तालमेल और राज्यों के साथ लगातार समस्या सुलझाने की प्रक्रिया.’’
टास्क फोर्स बनने के एक साल बाद नतीजे प्रभावशाली थे. सर्वेक्षण ने बताया कि राज्यों ने पहले ही 630 ऐक्शन योग्य सुधार लागू कर दिए थे, यानी तब तक पहचाने गए कुल सुधारों का 76 फीसद. 79 सुधार, यानी 10 फीसद लागू होने की प्रक्रिया में थे. सिर्फ 119 सुधार ऐसे बचे थे जो लागू नहीं हुए थे या लागू नहीं होते थे. हौसला बढ़ाने वाली बात यह भी थी कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने ऐसे सुधार किए जो साझा सुधार टेम्पलेट से भी आगे जाते थे.
मंजूरी राज का अंत
उधर, गाबा की अगुआई वाली उच्चस्तरीय समिति ने पुराने और रुकावटी केंद्रीय नियम-कायदों की समीक्षा शुरू कर दी. यह जन विश्वास सिद्धांत के आधार पर की जा रही थी. इसके कुछ हिस्से निश्चित रूप से बहुत बुनियादी हैं. लाइसेंस केवल राष्ट्रीय सुरक्षा की वजहों से या मानव स्वास्थ्य या पर्यावरण के प्रति गंभीर खतरा पैदा करने वाली गतिविधियों के लिए जरूरी होना चाहिए. स्वत: स्व-पंजीकरण आदर्श होना चाहिए.
जहां लाइसेंस जरूरी हो, वहां उसकी वैधता सतत या लंबी अवधि के लिए होनी चाहिए. बार-बार नवीनीकरण करवाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. आदर्श यही है कि निरीक्षण जोखिम के आधार पर और मान्यता-प्राप्त तीसरे पक्ष के हाथों किए जाएं. गाबा कहते हैं, ''यह आमूलचूल बदलाव है, ये 'मंजूरी के बिना वर्जित’ की व्यवस्था से 'वर्जित होने तक मंजूरी’ की तरफ ले जाते हैं.’’
गाबा समिति ने व्यापक और गहन सलाह-मशविरा किया. उन्होंने नियामकीय रुकावटों की पहचान करने के मकसद से उद्योगों और दूसरे संबंधित संगठनों के साथ बातचीत के लिए 250 से ज्यादा बैठकें कीं. इस उच्चस्तरीय समिति के एक सदस्य तथा इसके एक कार्यकारी समूह के अध्यक्ष बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप इंडिया के चेयरमैन जन्मेजय सिन्हा हैं. वे कहते हैं, ''काम बहुत गहन और भारी-भरकम था.
काफी प्रगति हुई है—केवल रिपोर्ट लिखने में नहीं, बल्कि जमीन पर चीजों को बदलने में.’’ तरीका सीधा-सादा रहा: यह पूछना कि लाइसेंस या मंजूरी की जरूरत ही भला क्यों है? अगर जरूरत है तो उसे पाना कितना खर्चीला और मुश्किल है, उसके प्रावधानों का पालन कितना पेचीदा है.
उसे हासिल करने में कितना वक्त लगता है, प्रक्रिया कितनी मानकीकृत है, यह कितने वक्त के लिए वैध होता है, क्या नवीनीकरण जरूरी है, कौन-सी सजाएं लागू होती हैं, क्या आपराधिक प्रावधान हैं, क्या उनका औचित्य है? सिन्हा कहते हैं, ''ये सवाल बुनियादी लगते हैं, लेकिन भारत में वे क्रांतिकारी हैं.’’
उच्चस्तरीय समिति के एक और सदस्य सभरवाल कहते हैं, ''संविधान में केवल दो साधनों को मान्यता दी गई है—कानून और नियम. हमें ऐसे और 19 साधन मिले.’’ उनके मुताबिक इनमें सर्कुलर (परिपत्र), कार्यालय स्मरणपत्र, अधिसूचना, एफएक्यू (बार-बार पूछे जाते प्रश्न), एडवाइजरी (सलाहनामे), गाइडलाइन, नीतिपत्र और शासनादेश शामिल हैं.
इनमें से कइयों का पूरी ताकत से पालन करवाया जाता है—कारोबार गंभीर नतीजों का जोखिम उठाकर ही उन्हें नजरअंदाज कर सकते हैं. मगर फिर भी कभी उन्हें संसदीय छानबीन, सार्वजनिक सलाह-मशविरे या औपचारिक अधिसूचना से नहीं गुजरना पड़ा. वे कहते हैं, ''कोई भी 'नहीं’ कह सकता है और 'हां’ कोई भी नहीं कह सकता. इस सोच को ध्वस्त करना नियामकीय सुधारों की सबसे गहरी महत्वाकांक्षा है.’’
नतीजे बेतुके हो सकते हैं. समीक्षा के दौरान एक मिसाल दी गई. पोल्ट्री फार्म पर लागू होने वाले एक दिशानिर्देश में उनके संचालकों पर 35 अलग-अलग अनुपालन आवश्यकताएं थोपी गई थीं. इस दस्तावेज को कानून के रूप में अधिसूचित तक नहीं किया गया था. फिर भी उसके प्रावधानों का पालन नहीं करने पर पर्यावरण कानून के तहत सजा दिलाई जा सकती थी. असल में कारोबारों पर उन नियमों के उल्लंघन के लिए मुकदमे चलाए जा रहे थे जिनका कोई आधिकारिक अस्तित्व ही नहीं था.
उच्चस्तरीय समिति ने अंतरराष्ट्रीय स्थितियों का भी अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि कई उन्नत देशों ने भी ऐसी ही गलतियां कीं. यूरोपीय कमीशन (ईसी) ने 2014 से 2024 के बीच 1,000 से ज्यादा नियामकीय प्रस्तावों की समीक्षा की और उनमें से करीब 660 स्वीकार करते हुए बड़े और छोटे कारोबारों पर अनुपालन की नई बाध्यताएं लागू कीं.
नतीजा यह हुआ कि करीब 176 अरब डॉलर की सालाना कागजी कार्रवाइयों और प्रशासनिक बोझ से छुटकारा मिला, जो ईसी के जीडीपी का करीब एक फीसद था. यूरोप के इस अनुभव ने उच्चस्तरीय समिति के लिए चेतावनी भरे सबक का काम किया. ऐसे ही नियामकीय बोझ से बचने के लिए समिति ने मंत्रालय-दर-मंत्रालय और सेक्टर-दर-सेक्टर हर नियम-कायदे के ऊपर भरोसे पर आधारित राजकाज का सिद्धांत लागू किया.
फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री) की महानिदेशक ज्योति विज कहती हैं, ''इस पूरी कोशिश में जो बात अलग और खास दिखाई देती है, वह यह कि मंत्रालय अपना अधिकार क्षेत्र बचा रहे नियामक की तरह कम और कारगर समाधान खोजते साझीदार की तरह ज्यादा व्यवहार कर रहे हैं. यह बहुत मददगार रहा है.’’
ये रहे फायदे
भारतीय अर्थव्यवस्था में एमएसएमई—सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यम—सेक्टर इसकी बड़ी मिसाल है कि नियम पालन का का बोझ कितना ज्यादा है. हालांकि सकल मूल्य वृद्धि में उनका लगभग 30 फीसद, मैन्युफैक्चरिंग उत्पादन में 35 फीसद और कुल निर्यात में करीब आधा योगदान है. फिर भी एमएसएमई ऐसे नियमों के दायरे में हैं जो उनसे 10-20 गुना बड़े उद्यमों के लिए बनाए गए थे.
डीरेगुलेशन का मोदी का मिशन इसी खामी को दूर करने पर केंद्रित है. छोटी कंपनियों की परिभाषा को विस्तृत कर दिया गया है; कारोबार की सीमा 40 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 100 करोड़ रुपए और पेड-अप कैपिटल की सीमा चार करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए कर दी गई है. इस बदलाव से 10,000 कंपनियां बड़े उद्यमों के लिए बने नियमों से बाहर हो गई हैं, जिससे वे कागजी कार्रवाई के बजाय वृद्धि पर ध्यान दे सकती हैं.
ज्यादा बड़े बदलाव खान-पान से जुड़े नियमों में किए गए हैं. एफएसएसएआइ (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) में रजिस्ट्रेशन के लिए सालाना टर्नओवर की सीमा 12 लाख रुपए से बढ़ाकर 1.5 करोड़ रुपए की गई है—यानी करीब 12.5 गुना बढ़ोतरी हुई है. लाइफटाइम लाइसेंस और ऑटोमैटिक रजिस्ट्रेशन के सिस्टम शुरू किए जा रहे हैं.
सरकार का अनुमान है कि इससे लगभग 50 लाख खानपान व्यापारों को फायदा होगा, जिनमें फुटपाथ पर खोमचे लगाने वाले, छोटे कैटरर और घर से खाना बनाकर सप्लाइ-बिक्री करने वालों जैसे बड़े अनौपचारिक फूड बिजनेस शामिल हैं. ये बिजनेस बिना किसी स्पष्ट नियम-कायदे के काम कर रहे थे. समिति के एक सदस्य का कहना है, ''जरूरत नियमों को लागू करने की है, न कि ज्यादा नियम बनाने की.’’
एक और बड़ी समस्या क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (क्यूसीओ) या कि गुणवत्ता नियंत्रण आदेश रहे हैं, जहां फायदे के लिए बनाए गए नियमों से नुक्सान ज्यादा हो रहा है. मानकों को बेहतर बनाने और ग्राहकों की सुरक्षा के लिए शुरू किए गए क्यूसीओ के दायरे में 2016 में 70 से भी कम प्रोडक्ट आते थे लेकिन 2025 तक बढ़कर करीब 790 हो गए.
जो क्वालिटी के आश्वासन के रूप में शुरू हुई थी, वह धीरे-धीरे नियमों के पालन का बोझ बन गई. सुधार से जुड़े अधिकारियों के अनुसार क्यूसीओ की वजह से औद्योगिक इनपुट की लागत 10-30 फीसद तक बढ़ रही थी, जिससे टेक्सटाइल जैसे उद्योग को नुक्सान हो रहा था और वियतनाम और बांग्लादेश के मुकाबले हमारी प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ रही थी.
उच्चस्तरीय कमेटी ने सीधा-सा फार्मूला अपनाया: उन उत्पादों का नियमन करें जो सीधे उपभोक्ता सुरक्षा, स्वास्थ्य या पर्यावरण को प्रभावित करते हैं, न कि आपूर्ति शृंखला के हर हिस्से को. एक अधिकारी कहते हैं, ''इलेक्ट्रिक हीटर के लिए सुरक्षा मानक समझ में आता है लेकिन अंदर के हरेक नट-बोल्ट के लिए मानक नहीं होना चाहिए.’’
लिहाजा, सरकार ने सिंथेटिक फाइबर, पॉलिमर और बेस मेटल से जुड़े 22 क्यूसीओ रद्द कर दिए हैं. समिति ने 208 क्यूसीओ से संबंधित जो सिफारिशें की हैं, उनमें से 116 को पहले ही स्थगित, निलंबित या रद्द किया जा चुका है.
पर्यावरण के नियमों में सुधार से एक और बड़ा आर्थिक लाभ होने की संभावना है. दशकों से कारोबार शिकायत करते रहे हैं कि उन्हें बार-बार मंजूरियां लेनी होती हैं, हर बार नवीनीकरण जरूरी होता है और इंस्पेक्शन का तामझाम ज्यादा है. इससे पर्यावरण पर असर में आवश्यक सुधार नहीं होता और समय और संसाधन खर्च हो जाते हैं.
समिति ने औद्योगिक परियोजनाओं के लिए हरियाली की जरूरत को 33-40 फीसद से घटाकर 10-25 फीसद कर दिया है, कम प्रदूषण वाले उद्योगों को सेल्फ सर्टिफिकेशन और तीसरे पक्ष की जांच में लिया जा रहा है, सहमति लो और चलाओ जैसी मंजूरियां स्थायी हो रही हैं, और गैर-प्रदूषणकारी विस्तार के लिए नई पर्यावरण मंजूरी जरूरी नहीं होगी.
संभावित लाभ बहुत ज्यादा हैं. अनुमान है कि सुधारों से 1,20,000 हेक्टेयर औद्योगिक भूमि के लिए रास्ता खुलेगा, 20-30 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित होगा और समय के साथ 20-40 लाख नौकरियां पैदा होंगी.
गैर-अपराधीकरण की मुहिम
यह पूछे जाने पर कि देश में नियम-कायदों को काफी हद तक जेल की सजा वाले कानूनों के जरिए क्यों लागू किया जाता है, सभरवाल दोटूक कहते हैं, ''ऐसा इसलिए है न्न्योंकि मूर्खता गैर-कानूनी नहीं है.’’ नतीजा यह है कि कई लोग मुकदमेबाजी में वर्षों खपा देते हैं, जिसकी कीमत बड़ी रकम और भारी चिंता-फिक्र से चुकानी पड़ती है.
यह इस प्रक्रिया को ही सजा बना देता है. ऊपर से देश की न्यायिक व्यवस्था हजारों छोटे-मोटे अपराधों से जुड़े मुकदमों से बुरी तरह भरी रहती है. जन विश्वास सुधारों का दूसरा चरण अभी तक सबसे व्यापक रहा है. यह 23 मंत्रालयों के हाथों लागू किए जा रहे 79 केंद्रीय कानूनों के 784 प्रावधानों की समीक्षा करता है.
मार्च 2026 में पारित जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) अधिनियम के तहत 1,000 से ज्यादा आपराधिक कृत्यों के पुराने और बेकार प्रावधानों को हटाकर विवेकसम्मत बनाया गया है. कारावास की व्यवस्था को मौद्रिक जुर्मानों या चेतावनियों से बदल दिया गया है. कई क्षेत्रों में पहली गलती के लिए अब सिर्फ चेतावनी दी जाती है, मुकदमा नहीं चलाया जाता. जुर्मानों और सजा को अपराध के स्वरूप के अनुपात में विवेकसम्मत बनाया गया है.
डॉ. मिश्र कहते हैं, ''प्रधानमंत्री का मार्गदर्शक फलसफा न्यूनतम सरकार, अधिकतम राजकाज का विचार है. सरकार की भूमिका समर्थ बनाने की है, रोड़े अटकाने की नहीं. इससे शक की व्यवस्था से हटकर भरोसे की व्यवस्था की तरफ जाने के गहरे बदलाव की झलक मिलती है.
छोटी, तकनीकी और प्रक्रियागत चूकों को दशकों से आपराधिक कृत्य माना जाता रहा है, और उद्यमियों को संदिग्ध मानकर व्यवहार किया जाता रहा है. सरकार का नजरिया यह है कि नागरिक और उद्यमी को राष्ट्र निर्माण में भागीदार मानकर उनके साथ व्यवहार किया जाए.’’
सुधार गौरतलब ढंग से कई सारे क्षेत्रों में किए गए हैं.
मसलन, कॉपीराइट कानून के तहत कुछ निश्चित प्रक्रियागत उल्लंघनों से जुड़े कारावास के प्रावधानों को हटाने का प्रस्ताव है. मोटर वाहनों की रूपरेखा के तहत ड्राइवरों को लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए विधिवत मोहलत या अनुग्रह अवधि मिलती है. रेलवे कानून के तहत सवारियों से हुए छोटे-मोटे उल्लंघन आपराधिक मुकदमे से हटाकर जुर्माने के दायरे में ले आए गए हैं.
स्वास्थ्य सेवा और व्यापार नियमनों में भी इसी तरह के बदलाव किए जा रहे हैं. उधर श्रम संहिताओं में पहले नियोक्ताओं पर लागू होने वाले लगभग 70 फीसद आपराधिक प्रावधान हटा दिए गए हैं, और उनकी जगह प्रॉजीक्यूशन-एज-डिफॉल्ट की व्यवस्था की गई है जिसमें आपराधिक सजाएं केवल गंभीर दुराचरण के लिए सुरक्षित हैं.
जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) अधिनियम 2026 के प्रावधानों को संजोने की नोडल अधिकारी और उद्योग संवर्धन तथा आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआइटीटी) की अतिरिक्त सचिव हिमानी पांडे का कहना है कि यह महज कारोबारी नियम-कायदों को आसान बनाने की कवायद नहीं, उससे ज्यादा यह नागरिक और राज्य-सत्ता के रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश थी.
वे कहती हैं, ''मूल सिद्धांत जितना लगता नहीं, उससे कहीं ज्यादा सीधा-सादा है. छोटी-मोटी प्रक्रियागत गलतियों और तकनीकी उल्लंघनों के लिए आपराधिक मुकदमे नहीं चलने चाहिए. हरेक उल्लंघन को अपराध मानने के बजाय सरकार ने चेतावनियों, सलाहों और जुर्माने की रूपरेखा बनाने की कोशिश की.
उद्देश्य डर की संस्कृतियों की जगह सहूलियत की संस्कृति लाना था.’’ उनका मानना है कि अगला चरण मौजूदा नियमों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने से आगे जाकर देश में नियम-कायदे बनाने के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलेगा.
जानकार बताते हैं कि भारत किस किस्म की प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है. वियतनाम, इंडोनेशिया और मैक्सिको भी वैश्विक आपूर्ति शृंखला के उन्हीं अवसरों के पीछे भाग रहे हैं जिन्हें भारत पाने की कोशिश कर रहा है. भारत आ सकने वाला निवेश नियामकीय बाधाओं की वजह से हर साल बाहर चला जाता है.
निवेश भारत आए, इसके लिए महज बेहतर राजमार्गों और सस्ती बिजली की ही जरूरत नहीं है, बल्कि उन दिखाई न देने वाली रुकावटों (मंजूरियां, सालाना नवीनीकरण, निरीक्षकों के दौरे, अस्पष्ट दिशानिर्देश) को भी हटाने की जरूरत है जो भारत को निवेश के लिए उससे कहीं ज्यादा मुश्किल बना देती हैं जितना उसे होना चाहिए.
सीआइआइ के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी कहते हैं, ''हम नियम-कायदों को अनुपालन के चश्मे से नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा की क्षमता के चश्मे से देख रहे हैं. हम न केवल नियम-कायदे हटा रहे हैं, बल्कि नियम-कायदों के ढांचे को समकालीन, आधुनिक और पूर्व-प्रत्याशित बना रहे हैं.
वैश्विक चुनौतियों की वजह से यह सबसे बुरा वक्त हो सकता है मगर इन नियामकीय सुधारों पर जोर देने के लिए यह सबसे अच्छा वक्त भी है ताकि भारत आठ फीसद से ऊपर की जीडीपी ग्रोथ हासिल कर सके.’’
फिर भी नियम-कायदों के मकड़जाल से मुक्ति का यह अभियान अभी शुरू हुआ है. अर्थव्यवस्था के विशाल क्षेत्र अभी भी लालफीताशाही में उलझे हुए हैं. इन सुधारों का असल असर दिखाई देने में बरसों लगेंगे. ये सुधार राजकाज के उस मॉडल को बदलने की कोशिश कर रहे हैं जिसे एक सीधी-सादी लेकिन नुक्सानदेह मान्यता के आधार पर गढ़ा गया है.
वह यह कि आर्थिक गतिविधियों के लिए लगातार मंजूरियों और देखरेख की जरूरत है, और सरकार तथा नागरिक के बीच मूल रिश्ता असल में शक का होता है. इसके बजाय नया ढांचा खुद दिए गए प्रमाणपत्र, तीसरे पक्ष के सत्यापन, डिजिटल निगरानी और जोखिम भरे प्रवर्तन पर भरोसा करता है.
सरकार की भूमिका पहरेदार से बदलकर नियामक की, निरीक्षक से बदलकर ऑडिटर की, कुछ भी शुरू होने से पहले हां कहने को अनिवार्य बनाने वाली संस्था से बदलकर केवल गड़बड़ी होने पर दखल देने वाली संस्था की हो गई है. ऐसे में मोदी सरकार की सबसे दमदार आर्थिक विरासत शायद वह न हो जिसका उसने निर्माण किया है. यह शायद वह है जिसे प्रधानमंत्री ने चुपचाप और व्यवस्थित ढंग से धराशायी करना चुना.

