सात महीने पहले, 41 साल के रितोबान सेन ने अपने घुटने पर एक छोटी-सी गांठ देखी. सेन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद से पढ़े हैं और मुंबई के एक बड़े बैंक में काम करते हैं. परिवार में कैंसर की हिस्ट्री होने की वजह से उनकी चिंता बढ़ती गई. उन्होंने हर छोटी-बड़ी जानकारी चैटजीपीटी में डाल दी.
जवाब में उन्हें लंबी-चौड़ी व्याख्या मिली, जिसमें बोन कैंसर की आशंका जताई गई थी. सेन ने मुंबई में तीन कैंसर विशेषज्ञों से सलाह ली. तीनों ने इसे साधारण सूजन बताया और बायोप्सी की जरूरत से इनकार किया. फिर भी वे संतुष्ट नहीं हुए. चौथी राय लेने के लिए वे न्यूयॉर्क सिटी चले गए. वहां भी वही नतीजा निकला. सेन हंसते हुए कहते हैं, ''अब मुझे बेवकूफी लगती है, लेकिन उस समय फिक्र बहुत ज्यादा थी.’’
पहले के हाइपोकॉन्ड्रिएक मामूली शारीरिक लक्षण को भी किसी गंभीर बीमारी का संकेत मान बैठते थे. अब उनके पास अपने सबसे बड़े डर की पुष्टि करने वाला एक औजार है: डॉ. चैटजीपीटी. दोनों ने मिलकर एक नया किरदार पैदा किया है, जिसे साइबरकॉन्ड्रिएक कहा जा सकता है. ऐसा शख्स जो ऑनलाइन लक्षण खोजने से शुरू करता है, लेकिन जल्दी ही बार-बार और जुनूनी ढंग से चेक करने के चक्र में फंस जाता है. हर नतीजा उसकी चिंता कम करने के बजाए और बढ़ा देता है.
डॉक्टर के पास जाना अब बीमारी जानने के लिए नहीं होता, बल्कि उस बीमारी की पुष्टि कराने के लिए होता है जो पहले ही दिमाग में बैठ चुकी होती है. ऐसे में डॉक्टर के सामने दो काम होते हैं: सामने मौजूद लक्षणों को समझना और ऑनलाइन सेल्फ-डायग्नोसिस से पैदा हुई सेहत संबंधी बेचैनी का इलाज करना. यह एक पुरानी समस्या का ही नया रूप है.
पहले भी मरीज दूसरी या वैकल्पिक मेडिकल सलाह लेने के बाद डॉक्टर के पास पहुंचते थे और उन्हें यकीन होता था कि उन्होंने अपने लक्षणों का जवाब खोज लिया है. एआइ ने इस आदत को पैदा नहीं किया, बस उसे तेज कर दिया है.
यह बीमारी इतनी गंभीर हो चुकी है कि इस पर रिसर्च की जरूरत महसूस हो रही है. इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री में 2024 की एक समीक्षा में चेन्नै के आइटी सेक्टर पर हुई एक अध्ययन का जिक्र था.
उसमें 55.6 फीसद कर्मचारियों में साइबरकॉन्ड्रिया के लक्षण मिले. फ्रंटियर्स इन साइकियाट्री में 2026 की एक स्कोपिंग रिव्यू ने भारतीय डेटा समेत अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों का विश्लेषण किया. उसमें साइबरकॉन्ड्रिया की दर 30.7 फीसद से 55.6 फीसद के बीच बताई गई, और भारतीय कामकाजी तबकों में यह सबसे ज्यादा में पाई गई.
आर्काइव्ज ऑफ मेंटल हेल्थ जर्नल में 2022 की वयस्क आबादी पर हुए एक अध्ययन में दर 45.3 फीसद मिली. बीएलडीई यूनिवर्सिटी जर्नल ऑफ हेल्थ साइंसेज में 2023 के एक अध्ययन के मुताबिक, छात्रों में 22.5 फीसद उससे ग्रस्त थे और 36.2 फीसद जोखिम में थे.
फटाफट डायग्नोसिस का दौर
हमारे जैसे देश में जहां मेडिकल स्पेशलिस्ट तक बहुत थोड़े लोग ही पहुंच पाते हैं, एआइ टूल उन बीमारियों की पहचान भी कर डालते हैं, जो शायद हों ही नहीं. ये टूल जिस भरोसे और तेजी से साफ-सुथरी, निजी लगने वाली व्याख्या देते हैं, उससे यकीन होने लगता है.
फैक्ट-चेकिंग कंपनी द हेल्दी इंडियन प्रोजेक्ट के संस्थापक सुदीप्त सेनगुप्ता कहते हैं कि जनरेटिव एआइ चैटबॉट और भी ज्यादा असरदार हैं. वे गलत जानकारी गढ़ने और उसे पढ़े-समझे जाने का तरीका बदल रहे हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, नतीजा यह होता है कि मरीज हल्के लक्षणों को भी गंभीर बीमारी से जोड़ने लगते हैं.
आर्टेमिस गुरुग्राम में एनआइसी तथा क्लिनिकल कार्डियोलॉजी के प्रमुख डॉ. राहुल मेहरोत्रा कहते हैं, ''एआइ सिम्प्टम चेकर और ऑनलाइन हेल्थ वीडियो तक आसान पहुंच की वजह से अब बहुत-से लोगों को लगता है कि सीने में हल्का-सा दर्द भी हार्ट अटैक का लक्षण है. इसी वजह से इमरजेंसी रूम में आने वाले घबराए और काफी डरे हुए मरीजों की तादाद बढ़ रही है.’’
इसके असर अलग-अलग रूप में दिखते हैं. कुछ लोग घबरा जाते हैं, बार-बार डॉक्टरों से सलाह लेते हैं या ऐसी स्कैनिंग या जांच करने को कहते हैं जिसकी शायद जरूरत न हो. इससे डॉक्टर और मरीज के बीच भरोसा कमजोर होता है. कुछ लोग खुद दवा लेने लगते हैं, सप्लीमेंट या ऐंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल करते हैं और सही जांच में देरी कर देते हैं.
यह चलन अब इतना स्थापित हो चुका है कि शोधकर्ताओं ने इसके लिए बाकायदा स्क्रीनिंग टूल बना लिए हैं. उनमें साइबरकॉन्ड्रिया सीवियरिटी स्केल (सीएसएस-12) एक है. इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री में 2025 की एक वैलिडेशन स्टडी में कलकत्ता यूनिवर्सिटी और सहयोगी संस्थानों के रिसर्चरों ने इस स्केल को स्थानीय आबादी पर औपचारिक रूप से परखा. इससे साफ है कि यह स्थिति अब क्लिनिकल लिहाज से कितनी अहम हो चुकी है.
घबराहट की महामारी
आम कामकाजी दिन की एक सुबह दिल्ली में साकेत के मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल के ओपीडी वेटिंग हॉल में मरीजों की भीड़ है. कई मरीज ऐसे हैं जो अपनी बीमारी को लेकर पहले से आश्वस्त हैं. एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति अपने रिश्तेदार से कह रहा है कि उसे थायरॉइड की दिक्कत है.
फोन स्क्रॉल करती एक युवती पीसीओएस (पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम) का जिक्र करती है, जिसे अब पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीएमओएस) कहा जाने लगा है. एक और मरीज पुरानी रिपोर्टें हाथ में लिए इस जिक्र में लगा है कि सीने का दर्द दिल से जुड़ा है या गैस से. उनमें कोई भी अभी डॉक्टर से मिला नहीं है.
भारत के अस्पतालों में ऐसे मरीज अब आम दिखने लगे हैं. न्यूरोलॉजी और कॉर्डियोलॉजी से लेकर गायनेकोलॉजी, आँकोलॉजी और साइकियाट्री तक, हर विभाग बता रहा है कि मरीज मामूली लक्षणों के साथ आ रहे हैं लेकिन उन्हें लगता है कि ये किसी गंभीर बीमारी के लक्षण हैं.
दिल्ली के रेनबो हॉस्पिटल में कंसल्टेंट पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. ऋषि शर्मा कहते हैं, ''सिरदर्द, झनझनाहट, चक्कर या थोड़ी देर के लिए याददाश्त चूकना, जिन्हें पहले मामूली या थोड़ी देर की समस्या माना जाता था, अब अक्सर स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर या याददाश्त जाने जैसी गंभीर बीमारियों से जोड़ दिया जाता है.
नतीजा यह है कि कई मरीज अपने दिमाग में पहले से बनी डायग्नोसिस के साथ आते हैं, और अक्सर वे बहुत ज्यादा चिंतित होते हैं.’’
आँकोलॉजी यानी कैंसर के इलाज के क्षेत्र में साइबरकॉन्ड्रिया भावनात्मक रूप से सबसे ज्यादा विस्फोटक हो जाता है. हरियाणा के फरीदाबाद में फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल में आँकोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. सिद्धार्थ शंकर सूद कहते हैं, ''युवा और बुजुर्ग, दोनों में साइबरकॉन्ड्रिया तेजी से फैल रहा है. अब ढेरों लोग इंटरनेट खंगालने के बाद थकान, दर्द, वजन घटने या गांठ को कैंसर मानने लगते हैं.’’
राष्ट्रीय स्तर की एक अस्पताल चेन में इंटरनल मेडिसिन विभाग की प्रमुख डॉ. मीरा सिंह (नाम अनुरोध पर बदला गया) अपने ओपीडी में एक मरीज को याद करती हैं. मरीज को पूरा यकीन था कि उसे तुरंत टीबी की दवा चाहिए, क्योंकि उसके रिश्तेदार को टीबी थी.
डॉक्टर बार-बार इलाज से पहले जांच कराने की सलाह दे रही थीं लेकिन मरीज ने उसे जान-बूझकर इलाज से इनकार करना समझा. उसे मनाने में डॉक्टर को करीब एक घंटा लग गया. टीबी टेस्ट नेगेटिव आया, लेकिन मरीज इतना डरा हुआ था कि उसने वही टेस्ट दो बार और कराया. बाद में उसने माना कि एक एआइ टूल ने उसे टीबी बताया था.
ऑर्थोपेडिक स्पेशलिस्ट भी ऐसे ही मामलों से जूझ रहे हैं. दिल्ली के सी.के. बिरला हॉस्पिटल में ऑर्थोपेडिक्स के डायरेक्टर डॉ. रामकिंकर झा कहते हैं, ''पीठ दर्द, घुटने के दर्द और बैठने-लेटने से जुड़ी परेशानियोंं के मरीजों में इंटरनेट की सलाह पर चलने का चलन बढ़ रहा है. वे अपने दर्द की असली वजह समझे बिना जेनरिक एक्सरसाइज या हर मर्ज की एक दवा जैसा कुछ करने लगते हैं.’’
नतीजा: जांच में देरी, सूजन का बढ़ना, लंबे समय तक दर्द रहना या बेअसर सेल्फ-ट्रीटमेंट में महीनों गंवा देना. गुरुग्राम के 38 साल के प्रोडक्ट मैनेजर नवनील चटर्जी ने यह बात बड़ी मुश्किल से समझी. एक हाथ में झनझनाहट और सुन्नपन नीचे तक फैलने लगा तो वे घबरा गए. उन्होंने ऑनलाइन खोजा और वीडियो-थ्रेड देखने के बाद मान बैठे कि डेस्क पर लंबे समय तक बैठने से उन्हें पोश्चर की समस्या हो गई है.
उन्होंने तकिए बदले, स्ट्रेचिंग रूटीन अपनाए, नेक ब्रेस खरीदा और कई हफ्तों तक स्पेशलिस्ट के पास जाने में देरी की. आखिरकार जब उन्होंने डॉक्टर से सलाह ली, तो पता चला कि उन्हें नर्व कम्प्रेशन है, जिसके लिए खास इलाज की जरूरत थी. ऑर्थोपेडिक क्लिनिकों में चटर्जी जैसे मरीज नियमित रूप से आते हैं, जिन्होंने इंटरनेट के आम नुस्खों से खुद अपना इलाज करने की कोशिश की होती है.
डॉ. झा कहते हैं, ''गलत एक्सरसाइज करने से समस्या बढ़ सकती है. कई बार इससे सूजन बढ़ती है, मांसपेशियों में ऐंठन आती है या नर्व कम्प्रेशन बढ़ जाता है.’’ घुटने के दर्द के लिए स्ट्रेच दिखाने वाली कोई रील एक दर्शक की मदद कर सकती है, लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति का दर्द बढ़ा सकती है, जिसे लिगामेंट डैमेज या आर्थराइटिस हो.
महिलाओं की सेहत से जुड़े स्पेशलिस्ट ऐसे मरीजों से मिल रहे हैं जिन्हें यकीन होता है कि उनके शरीर में हॉर्मोनल गड़बड़ी है. लक्षण कोई भी हो, उसके लिए सोशल मीडिया रील, सिम्प्टम चेकलिस्ट या चैटबॉट की कोई न कोई व्याख्या मौजूद है.
सी.के. बिरला हॉस्पिटल में ऑब्स्टेट्रिक्स ऐंड गायनेकोलॉजी की डायरेक्टर डॉ. तृप्ति रहेजा कहती हैं, ''अब मरीजों का सेल्फ-डायग्नोसिस के साथ आना बहुत आम हो गया है, खासकर पीएमओएस, थायरॉइड डिसऑर्डर या पेरिमेनोपॉज जैसे मर्जों को लेकर. कई महिलाएं अनियमित पीरियड, वजन बढ़ना, मुंहासे या मूड में बदलाव जैसे लक्षणों को ऑनलाइन पढ़ी बातों से मिलाने लगती हैं.’’
कई बार ऐसा सेल्फ-डायग्नोसिस मेडिकल इमरजेंसी भी बन जाता है. दक्षिण दिल्ली की 29 साल की एक प्रोफेशनल के साथ ऐसा ही हुआ. मासिक धर्म देर से आने और ऑनलाइन लक्षण खोजने के बाद उसे लगा कि वह गर्भवती है. उसने डॉक्टर से सलाह लिए बिना और बिना अल्ट्रासाउंड कराए गर्भ गिराने की गोली ले ली. कुछ घंटों बाद तेज ऐंठन और भारी रन्न्तस्राव के बाद वह अस्पताल पहुंची.
नई दिल्ली के फोर्टिस ला फेम में ऑब्स्टेट्रिक्स और गायनेकोलॉजी की सीनियर डायरेक्टर डॉ. अनीता गुप्ता कहती हैं कि ऐसे मामले बेहद चिंताजनक हैं. हो सकता है महिला गर्भवती ही न हो, एक्टोपिक प्रेग्नेंसी हो या गर्भ का ऐसा चरण हो जहां गोलियां असुरक्षित या बेअसर हों. ऐसे में महिलाएं अधूरे गर्भपात, गर्भ में बचे टिश्यू या भारी ब्लीडिंग के साथ अस्पताल पहुंचती हैं. ऐसे में सक्शन इवैक्यूएशन या इमरजेंसी सर्जरी की जरूरत भी पड़ सकती है.
ओजेम्पिक और वेगोवी जैसी जीएलपी-1 दवाओं के भारी चलन से वजन और मेटाबॉलिक स्थितियां भी ऐसा क्षेत्र बन गई हैं जहां लोग खुद ही तय कर रहे हैं. गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में एंडोक्राइनोलॉजी के चेयरमैन डॉ. जसजीत वसीर कहते हैं, ''लोगों को वजन घटाने या डायबिटीज के लिए डॉक्टर से सलाह लिए बिना दवा नहीं लेनी चाहिए.
वजन या ब्लड शुगर को लेकर अगर फिक्र है तो ऑनलाइन रूटीन अपनाने और बार-बार वजन घटाने-बढ़ाने से फायदा कम, नुक्सान ज्यादा हो सकता है. डॉक्टर की सलाह से बना स्ट्रक्चर्ड प्लान बेहतर है. इससे सेहत भी सुधरेगी और मन को सुकून भी मिलेगा.’’
मनोचिकित्सा में यही समस्या अलग रूप में दिखती है. 20 साल की एक कॉलेज छात्रा ने कई हफ्ते एडल्ट एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) पर शॉर्ट वीडियो देखा. उसने सामान्य टालमटोल, बोरियत, बेचैनी और डेडलाइन मिस करने जैसी बातों को नए सिरे से समझना शुरू किया.
वह दोस्तों से कहने लगी कि अब उसे पता चल गया है कि उसके साथ 'गलत क्या है’. जब तक वह मदद लेने पहुंची, वह उस पर न सिर्फ भरोसा कर रही थी, बल्कि उसे अपने व्यवहार में निभाने भी लगी थी. उसे यह नहीं पता था कि साइकियाट्रिक असेसमेंट सिर्फ चेकलिस्ट पर निर्भर नहीं करता.
डॉक्टर बचपन की हिस्ट्री, अलग-अलग हालात में लक्षणों की लगातार मौजूदगी, एंग्जाइटी, डिप्रेशन, नींद की क्वालिटी और यह देखते हैं कि लक्षण जीवन को लगातार प्रभावित कर रहे हैं या सिर्फ मुश्किल दौर में दिख रहे हैं. उसके मामले में डॉक्टरों को एडीएचडी नहीं, बल्कि गहरी बेचैनी, खराब नींद और परीक्षा का तनाव मिला.
एआइ जब मरीजों को यह यकीन दिला देता है कि उनके लक्षण गंभीर बीमारी से मेल खाते हैं, तो समस्या सिर्फ उस तक सीमित नहीं रहती. उसका असर पूरे स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था पर पडऩे लगता है. बेचैनी हल्के लक्षणों वाले मरीजों को इमरजेंसी रूम तक पहुंचा देती है.
इससे ट्रायेज डेस्क और वेटिंग एरिया पर भीड़ बढ़ती है, अस्पताल स्टाफ का कीमती समय लगता है और सचमुच गंभीर मरीजों की देखभाल में देरी होती है. बेकार की जांचें भी इसका एक नतीजा हैं. डॉ. शर्मा कहते हैं, ''मरीज अक्सर एमआरआइ स्कैन जैसी एडवांस जांचों की मांग करते हैं, भले ही क्लिनिकल जांच में जरूरत न दिखती हो. इससे व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है और गैरजरूरी टेस्ट हो सकते हैं.’’
दुष्चक्र को कैसे तोड़ें
झटपट संतुष्टि के इस दौर में एआइ चिंता कम करने का आसान औजार बन गया है. वह कुछ सेकंड में भरोसेमंद लगने वाला जवाब दे सकता है, साथ में इलाज के सुझाव भी. कुछ क्लिक में ही आपको 'सीने के दर्द के लिए सबसे अच्छे टेस्ट’, ओवर-द-काउंटर दवाओं का डोज शेड्यूल और सिरदर्द के लिए एमआरआइ स्कैन जैसी सिफारिशें मिल सकती हैं.
चैटबॉट जवाबों को निजी और कस्टमाइज्ड जैसा बना देते हैं. दिक्कत यह है कि उनकी सलाह फीड की गई जानकारी के हिसाब की ही होगी. वे घुटने की सूजन की जांच नहीं कर सकते या चेहरे की पीलापन नहीं देख सकते. वे यह भी नहीं समझ सकते कि मरीज ने कौन-सी बात छोड़ दी.
पढ़े-लिखे और पैसे वाले लोग भी साइबरकॉन्ड्रिया से अछूते नहीं हैं. वजह यह है कि ऐसा अज्ञानता से कम और चिंता से ज्यादा होता है. फोर्टिस हॉस्पिटल मानेसर और अदायु माइंडफुलनेस, गुरुग्राम में एमडी साइकियाट्री डॉ. नेहा अग्रवाल कहती हैं कि सेहत को लेकर जागरूकता अच्छी बात है: आप लक्षण देखते हैं, आम वजहों पर सोचते हैं और जरूरत हो तो डॉक्टर से सलाह लेते हैं.
इसके उलट, वे बताती हैं, साइबरकॉन्ड्रिया ''एक दुश्चक्र और बेचैनी का नतीजा है. घंटों खंगालते रहना, फटाफट सबसे बुरी स्थिति मान लेना, ऐसा भरोसा तलाशना जो कभी टिकता नहीं, और फिर वही डर लौट आता है. हद तब होती है जब जानकारी साफ समझ या इलाज तक नहीं ले जाती, बल्कि बढ़ती चिंता और बार-बार चेक करने की आदत में बदल जाता है, जिससे मानसिक सेहत पर असर पड़ने लगता है.’’
सबसे ज्यादा जोखिम उन लोगों को होता है जिन्हें पहले से सेहत को लेकर फिक्र ज्यादा हो, चिंता करने की आदत हो, परफेक्शनिस्ट स्वभाव हो या अनिश्चितता सहने की क्षमता कम हो. ऐसे लोगों के लिए, वे कहती हैं, ''शायद कुछ नहीं है’’ काफी नहीं होता.
डॉ. अग्रवाल एक आसान सवाल खुद से पूछने की सलाह देती हैं, ''क्या आपकी खोज किसी प्लान पर खत्म होती है, या फिर चिंता को दोबारा खोल देती है?’’ अगर यह पैटर्न मजबूरी जैसा लगे और रोकना मुश्किल हो, तो वे कहती हैं कि प्रोफेशनल मदद की जरूरत पड़ सकती है.
कई मरीजों के लिए समाधान एक और टेस्ट नहीं, बल्कि उनकी चिंता दूर करना है. जानकारों के मुताबिक, इलाज में अक्सर लोगों को बार-बार लक्षण चेक करने और लगातार आश्वासन की जरूरत से पीछे हटना सिखाया जाता है.
दिल्ली के माइंडस्केप सेंटर फॉर काउंसलिंग की हेड साइकोलॉजिस्ट डॉ. उपासना चड्ढा कहती हैं, ''मकसद हर शक को खत्म करना नहीं, बल्कि अनिश्चितता को सहने की क्षमता बनाना है.’’ थेरेपी इसका मुख्य आधार है. योग, माइंडफुलनेस और तनाव संभालने की प्रैक्टिस भी चिंता को कम करने में मदद करती है. गंभीर एंग्जाइटी के मामलों में साइकियाट्रिस्ट नींद या बेचैनी दूर करने की दवा की सलाह दे सकते हैं.
साइबरकॉन्ड्रिया से फायदा कैसे उठाएं
कई डॉक्टरों कहना है कि साइबरकॉन्ड्रिया पूरी तरह बेमानी भी नहीं है. उसका मजाक उड़ाने या खारिज करने के बजाए उसे सही दिशा देने की जरूरत है. सेहत की फिक्र को प्रिवेंटिव केयर, काउंसलिंग और समय पर डायग्नोसिस के मौके में बदला जा सकता है.
डॉ. सिद्धार्थ शंकर सूद कहते हैं, ''ये स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं अहम मौका देती हैं. कोई चिंतित व्यक्ति क्लिनिक में आता है, तो मुझे गंभीर बीमारी की आशंका दूर करने और उसके रिस्क प्रोफाइल के आधार पर उम्र के हिसाब से कैंसर स्क्रीनिंग शुरू करने का मौका मिलता है. अगर कुछ गंभीर नहीं मिलता, तो भरोसा दिलाना अपने-आप में इलाज जैसा होता है.’’
ऑनलाइन सलाह के साथ भी यही बात लागू होती है. वह अपने आप नुक्सानदेह नहीं होती. डॉ. झा कहते हैं, ''बैठने-लेटने के तरीके सुधारने और चलने-फिरने के लिए सही जानकारी फायदेमंद हो सकती है.’’ असली समस्या निजी जरूरत के हिसाब से सलाह न होना और क्लिनिकल जांच की कमी है. ज्यादा सतर्कता कई बार जान भी बचा सकती है. डॉ. शर्मा के मुताबिक, इसका मतलब है कि कुछ मरीज असली इमरजेंसी, जैसे स्ट्रोक, में जल्दी मदद लेने पहुंचते हैं, जहां हर मिनट अहम होता है.
मेडिकल बिरादरी या दवा उद्योग के सभी लोग टेक्नोलॉजी को दोष नहीं देते. वीनस रेमेडीज के सीईओ सारांश चौधरी कहते हैं कि चुनौती टेक्नोलॉजी नहीं है, क्योंकि जिम्मेदारी से इस्तेमाल हो तो यह जागरूकता और क्लिनिकल फैसलों को बेहतर बना सकती है. वे कहते हैं, ''असली सवाल यह है कि क्या इसका इस्तेमाल पारदर्शी, सुगम और नियमों से बंधे ढांचे के तहत हो रहा है या नहीं.
स्वास्थ्य सेवा में एआइ की पैठ बढ़ने के साथ खतरा भी बढ़ रहा है कि लोग अधूरी या अपुष्ट जानकारी पर भरोसा करने लगें. इसके स्वास्थ्य पर असर हो सकते हैं, खासकर ऐसे दौर में जब ऐंटीबायोटिक के गलत और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से ऐंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस बढ़ रहा है.’’
रेडक्लिफ लैब्स के संस्थापक तथा सीईओ आदित्य कंडोई भी एआइ टूल की तारीफ करते हैं, जो प्रिवेंटिव जांच को बढ़ावा देते हैं या सही टेस्ट की ओर ले जाते हैं. लेकिन उनकी सलाह के साथ भी एक सावधानी जुड़ी है: ''सेहत से जुड़े फैसलों के लिए संदर्भ, समझ और मेडिकल जजमेंट जरूरी है.’’ उनके मुताबिक, एआइ को फैसलों में मदद करनी चाहिए, डायग्नोसिस नहीं.
किसी भी हालत में ऐसी डायग्नोसिस खुद दवा लेने तक नहीं पहुंचनी चाहिए.
फार्मा डिस्ट्रिब्यूशन फर्म शांतिलाल ब्रदर्स के डायरेक्टर रोहन संघवी के मुताबिक, ''टॉपिकल स्टेरॉयड, ऐंटीफंगल, पेनकिलर और ऐंटीबायोटिक कॉम्बिनेशन का धड़ल्ले से गलत इस्तेमाल हो रहा है. पेनकिलर तक आसान पहुंच असली बीमारी को छिपा सकती है, जबकि आम दवाओं का बार-बार इस्तेमाल अपने अलग स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है.’’
वे ओवर-द-काउंटर बिक्री पर ज्यादा सख्त निगरानी की वकालत करते हैं, खासकर ऐंटीबायोटिक, स्टेरॉयड और कुछ ऐंटी-इन्फ्लेमेटरी दवाओं पर. उनका मानना है कि मोहल्ले की फार्मेसी अहम भूमिका निभा सकती है.
संघवी कहते हैं, ''फार्मासिस्ट अक्सर मरीजों को डॉक्टरों से पहले देखते हैं, इसलिए सही ट्रेनिंग और प्रोटोकॉल के साथ वे बार-बार लौटते लक्षण, अस्पष्ट डायग्नोसिस या हाइ-रिस्क दवाओं की मांग जैसी चेतावनी पहचान सकते हैं और जरूरत पड़ने पर मरीजों को डॉक्टरों के पास भेज सकते हैं. उनकी भूमिका मरीजों को जानकारी देने तक जा सकती है.’’
साइबरकॉन्ड्रिया इसलिए फलता-फूलता है क्योंकि डॉक्टर से मिलना मुश्किल है और अच्छी हेल्थकेयर तक सबकी पहुंच नहीं है. ऐसे में मरीजों के पास इंटरनेट की ओर मुड़ने के अलावा ज्यादा रास्ते नहीं बचते. उन्हें तेज और आसान जवाब तो मिलते हैं, लेकिन उनसे डर और बढ़ता है. साइबरकॉन्ड्रिया का इलाज करना है, तो भरोसेमंद मेडिकल सलाह को सबकी आसान पहुंच में बनाना होगा.

