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नानी राजभवन में, नातिन रुपहले पर्दे पर : आखिर क्यों चर्चा में हैं संस्कृति पटेल?

‘कृष्णावतारम’ की टैक्स फ्री घोषणा के बाद संस्कृति पटेल अचानक सुर्खियों में हैं. राजनीतिक विरासत, सोशल मीडिया लोकप्रियता और फिल्मी डेब्यू ने उनकी पहचान को नई ऊंचाई दी है

Sanskriti Patel with Yogi Adityanath
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अपनी नानी आनंदी बेन पटेल के साथ संस्कृति
अपडेटेड 11 मई , 2026

उत्तर प्रदेश की राजनीति और सिनेमा, दोनों के गलियारों में इन दिनों एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है - संस्कृति पटेल. वजह सिर्फ यह नहीं कि उन्होंने भगवान कृष्ण पर बनी बहुचर्चित फिल्म ‘कृष्णावतारम’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की है बल्कि इसलिए भी कि वे उत्तर प्रदेश की राज्यपाल और गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की नातिन हैं.

9 मई को अपनी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद लखनऊ के लोकभवन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरी कैबिनेट के साथ ‘कृष्णावतारम’ की विशेष स्क्रीनिंग देखी और फिर इसे उत्तर प्रदेश में टैक्स फ्री करने का ऐलान कर दिया. लोक भवन के खचाखच भरे ऑडिटोरियम में 'कृष्ण-कृष्ण' और 'राधे-राधे' के जयकारों के बीच हुई इस स्क्रीनिंग ने फिल्म को सीधे राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया.

लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा सुर्खियां संस्कृति पटेल ने बटोरीं जिन्होंने फिल्म में सत्यभामा का किरदार निभाया है.

पहली ही फिल्म से राष्ट्रीय चर्चा में

आमतौर पर स्टार किड्स की लॉन्चिंग ग्लैमरस रोमांटिक फिल्मों या बड़े बैनरों के जरिए होती है लेकिन संस्कृति ने अपने करियर की शुरुआत भगवान कृष्ण पर आधारित फिल्म से की. वे खुद कहती हैं कि यह फैसला सिर्फ अभिनय नहीं बल्कि ‘जिम्मेदारी’ से जुड़ा था. संस्कृति का मानना है कि उन्हें अपने परिवार से देश, समाज और संस्कृति को प्राथमिकता देने की सीख मिली है. यही वजह है कि उन्होंने अपने पहले प्रोजेक्ट के लिए ऐसी कहानी चुनी जो भारतीय परंपरा और सनातन संस्कृति को केंद्र में रखती है. दिलचस्प बात यह है कि संस्कृति अपना नाम ‘संस्कृति जयना’ लिखना पसंद करती हैं. इसमें ‘जय’ उनके पिता जयेश और ‘अना’ उनकी मां अनार के नाम से लिया गया है. यह नाम उनके पारिवारिक जुड़ाव और पहचान, दोनों को सामने लाता है.

संस्कृति सिर्फ किसी राजनीतिक परिवार की सदस्य नहीं हैं, बल्कि ऐसे परिवार से आती हैं जिसकी पहचान राजनीति के साथ सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी रही है. उनके पिता जयेश पटेल ‘साबरमती हरिजन आश्रम ट्रस्ट’ से जुड़े हैं और पद्मश्री सम्मानित समाजसेवी ईश्वरभाई पटेल के बेटे हैं. ईश्वरभाई पटेल देश में स्वच्छता आंदोलन और सामाजिक जागरूकता अभियानों के लिए जाने जाते थे. उनकी मां और आनंदीबेन पटेल की बेटी अनार पटेल ‘ग्रामश्री’ संस्था चलाती हैं जो गुजरात के कारीगरों और ग्रामीण हस्तशिल्प को बढ़ावा देने का काम करती है.

हाल ही में अनार पटेल को ‘श्री खोडलधाम ट्रस्ट’ का अध्यक्ष बनाया गया और वह इस पद तक पहुंचने वाली पहली महिला बनीं. संस्कृति अक्सर अपनी मां और नानी को अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा बताती हैं. उनके मुताबिक, दोनों महिलाओं ने सार्वजनिक जीवन में बिना किसी दिखावे के लगातार काम किया है. संस्कृति यह भी बताती हैं कि उनका बचपन ‘खेतों और झुग्गी-झोपड़ियों’ के बीच बीता जहां उन्होंने सेवा और सामाजिक सरोकारों को करीब से देखा. यही पारिवारिक पृष्ठभूमि अब उनकी सार्वजनिक छवि का अहम हिस्सा बन चुकी है.

आखिर कौन हैं सत्यभामा?

‘कृष्णावतारम’ में संस्कृति ने भगवान कृष्ण की पत्नी सत्यभामा की भूमिका निभाई है. भारतीय पौराणिक कथाओं में रुक्मिणी और राधा के मुकाबले सत्यभामा पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है. फिल्म इसी कम चर्चित लेकिन प्रभावशाली किरदार को नए तरीके से सामने लाती है. फिल्म की कहानी गुजराती लेखक राम मोरी के उपन्यास ‘सत्यभामा’ पर आधारित है.

लेखक के मुताबिक, सत्यभामा एक ऐसी रानी थीं जो मानती थीं कि 'कृष्ण उन्हें पाकर भाग्यशाली हैं.' यानी वे पारंपरिक स्त्री पात्रों से अलग, आत्मविश्वासी और अधिकार जताने वाली व्यक्तित्व के रूप में दिखाई गई हैं. संस्कृति भी मानती हैं कि इस किरदार को निभाना आसान नहीं था. उनके अनुसार, बहुत कम लोग सत्यभामा की विरासत को जानते हैं इसलिए उन्हें इस बात की जिम्मेदारी महसूस हुई कि दर्शकों के सामने यह किरदार सही रूप में पहुंचे.

‘कृष्णावतारम’ की चर्चा सिर्फ सिनेमा तक सीमित नहीं रही. इसकी रिलीज़ के साथ ही यह फिल्म सांस्कृतिक राजनीति का हिस्सा भी बन गई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फिल्म देखने के बाद सूचना विभाग को निर्देश दिया कि प्रदेश के हर जिले में इसकी विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की जाए ताकि बच्चे और युवा भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा को समझ सकें. राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह सिर्फ एक फिल्म स्क्रीनिंग नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उस नैरेटिव का हिस्सा थी जिसे बीजेपी समय से आगे बढ़ाती रही है. ऐसे माहौल में संस्कृति पटेल अचानक एक अभिनेत्री से कहीं ज्यादा बड़ी सार्वजनिक पहचान बनकर उभरी हैं.

ग्लैमर और संस्कृति का नया मिश्रण

संस्कृति की छवि पारंपरिक ‘स्टार किड’ जैसी नहीं दिखती. उन्होंने अहमदाबाद में स्कूली पढ़ाई की, फिर लंदन में फैशन की पढ़ाई की और न्यूयॉर्क फिल्म स्कूल से सिनेमा का प्रशिक्षण लिया. वे एक फैशन ब्रांड भी चलाती हैं और लंबे समय से क्रिएटिव इंडस्ट्री से जुड़ी रही हैं. लेकिन दिलचस्प यह है कि उनकी पहली सार्वजनिक पहचान फैशन या ग्लैमर से नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक सिनेमा से बनी. यह बदलाव भी मौजूदा दौर के भारतीय सिनेमा की नई दिशा को दिखाता है जहां पौराणिक कथाओं और सांस्कृतिक विषयों पर आधारित फिल्मों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है.

‘कृष्णावतारम’ इसी ट्रेंड का हिस्सा मानी जा रही है. फिल्म की रिलीज़ के बाद सोशल मीडिया पर यह चर्चा भी तेज हो गई कि क्या संस्कृति आगे चलकर राजनीति में कदम रखेंगी. इसकी वजह सिर्फ उनका पारिवारिक बैकग्राउंड नहीं, बल्कि उनकी सार्वजनिक भाषा और विषयों का चयन भी है. वे अपने इंटरव्यू में लगातार ‘देश’, ‘संस्कृति’, ‘सेवा’ और ‘जिम्मेदारी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं. यही वजह है कि कुछ लोग उन्हें भविष्य की संभावित सार्वजनिक नेता के तौर पर भी देखने लगे हैं. हालांकि फिलहाल संस्कृति खुद को पूरी तरह अभिनय और रचनात्मक कामों तक सीमित बताती हैं. लेकिन जिस तरह से उनकी पहली फिल्म को राजनीतिक समर्थन और सांस्कृतिक मंच मिला है, उससे उनकी सार्वजनिक पहचान सिर्फ फिल्म अभिनेत्री तक सीमित नहीं रह गई है.

यूपी से गुजरात तक चर्चा

दिलचस्प बात यह है कि संस्कृति की चर्चा सिर्फ उत्तर प्रदेश या गुजरात तक सीमित नहीं है. फिल्म हिंदी, तमिल और तेलुगू में रिलीज़ हुई है, जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है. फिल्म के निर्देशक हार्दिक गज्जर हैं, जबकि इसमें सिद्धार्थ गुप्ता भगवान कृष्ण की भूमिका में नजर आए हैं. इसके अलावा जैकी श्रॉफ और आशुतोष राणा जैसे अभिनेता भी फिल्म का हिस्सा हैं. लेकिन तमाम बड़े नामों के बावजूद चर्चा का केंद्र संस्कृति ही बनी हुई हैं. इस की वजह उनका किरदार, पारिवारिक पृष्ठभूमि और फिल्म को मिला राजनीतिक-सांस्कृतिक समर्थन, तीनों हैं.

भारतीय सिनेमा में अक्सर किसी अभिनेता की पहली फिल्म को सिर्फ ‘लॉन्च’ माना जाता है लेकिन संस्कृति पटेल का मामला थोड़ा अलग है. उनका डेब्यू ऐसे समय में हुआ है जब पौराणिक कथाओं, सनातन संस्कृति और भारतीय विरासत पर आधारित कंटेंट को सरकारों और दर्शकों दोनों का समर्थन मिल रहा है. ऐसे में संस्कृति पटेल सिर्फ एक नई अभिनेत्री नहीं, बल्कि उस नए सांस्कृतिक दौर की प्रतीक बनकर उभरी हैं, जहां सिनेमा, राजनीति और परंपरा एक-दूसरे के साथ मिलते दिखाई दे रहे हैं.

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