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घमंड दरकने की खूबसूरती जाननी है तो देखिए 173 साल पुरानी कहानी पर बनी यह छोटी-सी फिल्म

Netflix पर आई महज 18 मिनट लंबी फिल्म The Singers आपको बिल्कुल नया इंसान बना देने की संभावना से लबालब भरी हुई है

The Singers रूसी लेखक इवान तुर्गनेव (दाएं) की कहानी पर बनी है
अपडेटेड 19 फ़रवरी , 2026

रूसी साहित्यकार इवान सरगेमेविच तुर्गनेव, जिन्हें आम तौर पर इवान तुर्गनेव के नाम से जाना जाता रहा है, की कहानियां करीब डेढ़ सदी से तीसरी दुनिया की खिड़की साबित हुई हैं. जो अपने भीतर खुलती हैं. इन खिड़कियों से इंसान को खुद की झलक मिलती है.

नेटफ्लिक्स पर हाल ही में एक ऐसी फिल्म स्ट्रीम होने को आई है जो तुर्गनेव की कहानी पर बनी है. समय की खाई देखिए, तुर्गनेव ने ये कहानी क़रीब एक सौ तिहत्तर साल पहले लिखी थी. मूलरूप से यह तुर्गनेव के राइटिंग स्केचेस में से एक स्केच है. फिल्म का नाम है The Singers. दिग्गज अभिनेता माइकल यंग और क्रिस स्माइदर समेत कई बेहतरीन कलाकारों को लेकर यह फिल्म बनाई है सैम डेविस ने.

तुर्गनेव के बाद भी रूस समेत दुनिया भर के ऐसे तमाम लेखक रहे हैं जो सिनेमा को प्रिय रहे हैं. जिनकी कहानियां आसानी से सिनेमाई तर्जुमे के साथ स्क्रीन पर पेश की जाती रही हैं, अब भी की जा सकती हैं. लेकिन, सैम डेविस ने पौने दो सौ साल पुरानी इसी कहानी को ही क्यों चुना? वजह है इस कहानी का ग्लोबल कनेक्ट. जो इतना मज़बूत है कि एक बार इस कहानी से गुज़रने के बाद कोई भी सीरियस सिनेमा मेकर इसकी हूक से खुद को बचा नहीं सकता.

सड़क किनारे बर्फ़ीले मौसम में खड़ा एक बार. और पर्याप्त नशा कर चुकने के बाद इस बार के आधा दर्जन बाशिंदे. एक शर्त. बस इतनी-सी कहानी है इस फिल्म की.

असल में यह कहानी एक ज़ोरदार ‘दंभ ब्रेकर’ है. जिसके सामने आपका दंभ भरभराकर मटियामेट हो जाता है. इस कहानी से इतर, क्या आपको अक्सर अपने आस-पास शेखी बघारने वाले लोग नहीं मिलते? ऐसे लोग जो सब कुछ जानने और क़रीब ईश्वर होने के दंभ से भरे हुए हैं. ये लोग बात करते हुए अधिकतर ‘अंतिम बात’ की शैली में बात करते हैं. जिसके बाद तर्क, विश्वास, भ्रम और संभावनाएं बिल्कुल ख़ारिज हो जाती हैं. 

इन बातों के कुछ उदाहरण देखें, ये कुछ ऐसी सुनाई देती हैं-

‘दुनिया का सबसे अच्छा गुलाबजामुन इलाहाबाद में देहाती नाम का हलवाई बनाता है...’
‘अगर दुनिया में किसी को असली लस्सी बनाने आती है तो वो बनारस का पहलवान लस्सी वाला है...’
‘मेरे जिले गाजीपुर में दुनिया का सबसे बेहतरीन आम का अचार मिलता है...’
‘बंगाल में बांकुड़ा के सोंदेश के आगे दुनिया भर की मिठाइयां पानी भरती हैं...’
‘इस आदमी से ढीठ पूरी दुनिया में आपको कोई नहीं मिलेगा...’

वगैरह...वगैरह...वगैरह 

इन ज्यादातर बातों को ध्यान से सुनें, तो हम पाएंगे कि ये उन लोगों की तरफ से कही जाती हैं जिनकी अब तक की जिंदगी महज दो-चार शहरों तक ही सिमटी रही, बाकी पूरा भारत घूमना तो बहुत दूर की बात है. इन शेखीबघारों ने अपने बहुत सीमित अनुभव में जो देखा, सुना, भुगता...उसे ये दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बताने से नहीं चूकते. सर्वश्रेष्ठ से नीचे कोई तमगा नहीं. जबकि आपके ‘सर्व’ की परिभाषा ही राई रत्ती बराबर है अभी.

भ्रम से पैदा हुई इसी शेखी और अहंकार को धूल बनाती है फिल्म The Singers.

बार में एक आदमी दावा करता है कि वह ‘सर्वश्रेष्ठ’ सिंगर है. उसकी आवाज़ के आगे कोई टिक नहीं सकता. जबकि बार का मालिक ठीक इस दावे के बीच एक ऐसे आदमी की तरफ देख रहा होता है, जो कई दशकों तक इसी बार में गा चुका है और हर शाम अनगिनत लोग उसके दीवाने हुआ करते थे. अब बुढ़ापे और समय की मार ने उसे चुप करवा दिया है, लेकिन कहावत है न ‘मरा हाथी भी सवा लाख का’. बार का मालिक शेखी बघारने वाले को बहुत समझाता है कि इस आदमी के होते हुए ऐसे दावे करना मूर्खता है, लेकिन दंभ के कान नहीं होते.

आखिरकार, बार का मालिक टेबल ठोंककर एक मुनादी करता है. कि, जो भी आज सबसे बढ़िया गाएगा उसे सौ डॉलर और फ्री बियर मिलेगी. 
फिल्म यहीं से शुरू होती है और उसके बाद एक आलातरीन म्यूजिकल में बदल जाती है. महज 18 मिनट. और इतने में बार के भीतर बैठे हर आदमी की भ्रांतियां टूटती हैं. अपने और दूसरों के बारे में बुने गए भ्रम हवा होते हैं. ये पता चलता है कि ‘दुनिया बहुत बड़ी है’. आपसे हमेशा कोई न कोई बेहतर होता ही है. 

और सबसे बड़ी बात. हर बात से पहले ‘मेरे ख़याल से’ या ‘शायद’ कहना क्यों ज़रूरी है. ये शब्द इंसानी सभ्यता के मूल में हैं, जिनकी वजह से हम यहां तक आ पाए. चालाक होना, अक्सर महंगा सौदा साबित होता है. औसत प्रतिभा और मस्तिष्क के साथ डायनासोर इस धरती पर दस करोड़ साल से अधिक रहकर विलुप्त हुए. लेकिन, इतने भारी दिमाग और धारदार इच्छाओं ने हम मानवों को अब तक सिर्फ दो लाख साल जिंदा रखा है, और जानकार कहते हैं कि बतौर प्रजाति हम शायद ही दस लाख साल तक बचे रह पाएं. क्यों? क्योंकि हम बहुत बहुत बुद्धिजीवी हो गए. दावों और वादों के बीच झूलते हम, ‘शायद’ शब्द का इस्तेमाल भूल गए. जिसने हमारे पुरखों को खोजी और कल्पनाशील बनाया. जिसकी वजह से हम इंसान यहां तक पहुंच सके.
तुर्गनेव की ये कहानी मानवता के अंत तक उतनी ही प्रासंगिक बनी रहेगी, जितनी पौने दो सौ साल पहले थी. ये ‘दंभ ब्रेकर’ फिल्म हमें पहले से बेहतर इंसान बनाती है, वो भी महज 18 मिनट में. ये बुरा सौदा नहीं है.

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