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रविंद्र किशोर सिन्हा: पत्रकार से अरबपति कारोबारी बने लेकिन कभी अपनी जड़ें नहीं भूले

पटना के एक गैराज से देश की सबसे बड़ी सुरक्षा एजेंसियों में से एक खड़ी करने वाले उद्यमी, बीजेपी के वफादार नेता और समाजसेवी रविंद्र किशोर सिन्हा को भविष्य की असाधारण समझ थी

सिक्योरिटी एजेंसी SIS के संस्थापक रविंद्र किशोर सिन्हा का 30 अक्टूबर को निधन हो गया (फोटो : हार्दिक छाबड़ा)
अपडेटेड 3 नवंबर , 2026

कुछ लोगों की जिंदगी किसी रोमांचक कहानी की तरह होती है. रवींद्र किशोर सिन्हा की जिंदगी भी ऐसी ही थी. इसमें एक पत्रकार के काम जैसी अनिश्चितता थी, एक उद्यमी के जोखिम उठाने का साहस था और सबसे बढ़कर उस व्यक्ति का धैर्य था जिसने कभी हालात को अपनी महत्वाकांक्षाओं की हद तय नहीं करने दी.

सिन्हा ने उन परिस्थितियों से कहीं आगे बढ़कर अपनी पहचान बनाई जिनमें उनका जन्म हुआ था. लेकिन कामयाबी ने उन्हें कभी उस मिट्टी, उन लोगों और उन मूल्यों से दूर नहीं किया, जिन्होंने उन्हें गढ़ा था. 30 अक्टूबर को 75 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. वे अपने पीछे कारोबार की एक बड़ी विरासत छोड़ गए.

लेकिन सिन्हा की जिंदगी की कहानी को सिर्फ कंपनी के वित्तीय आंकड़ों, अधिग्रहण, राजनीतिक पदों या उनकी बेशुमार दौलत के जरिए नहीं समझा जा सकता. उन्हें जानने के लिए पटना के एक किराए के गैराज, काम की तलाश कर रहे कुछ पूर्व सैनिकों और अचानक बेरोजगार हो गए एक युवा पत्रकार के दिनों में लौटना होगा.

1971 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था तब सिन्हा पटना के एक अखबार में काम करते थे. उनकी मासिक तनख्वाह थी 230 रुपए. इसी दौरान उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसकी हिम्मत बहुत कम युवा पत्रकार कर पाते. वे युद्ध की रिपोर्टिंग करने के लिए चोरी-छिपे बांग्लादेश पहुंच गए. उनके पास न तो ऐसी जिम्मेदारी के मुताबिक आर्थिक सुरक्षा थी और न ही बीमा की सुविधा. लेकिन पत्रकारिता उनके लिए सिर्फ पेशा नहीं बल्कि एक जुनून थी. वे इसके लिए लगभग हर जोखिम उठाने को तैयार थे.

तीन साल बाद उनका यह सफर अचानक थम गया. बताया जाता है कि लेखन को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान से मतभेद के कारण अखबार ने उनका अनुबंध आगे नहीं बढ़ाया. उस समय यह एक पेशेवर झटका लग रहा था लेकिन आगे चलकर यही उनकी जिंदगी का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ.

इस बीच उनके दिमाग में एक बड़ा विचार आकार ले रहा था. पत्रकारिता के दिनों में सिन्हा का संपर्क कई पूर्व सैनिकों से हुआ था. 1971 के युद्ध से लौटे इनमें से कई सैनिकों को रोजगार नहीं मिल रहा था. वे अपनी जिंदगी फिर से पटरी पर लाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. इसी दौरान जयप्रकाश नारायण से उनकी मुलाकात हुई. जयप्रकाश नारायण ने उन्हें पूर्व सैनिकों के लिए काम करने की सलाह दी. इससे उनके मन में पहले से पल रहे विचार को एक दिशा मिली.

SIS के शुरुआती दिनों में रविंद्र किशोर सिन्हा (फोटो : sisindia.com)
SIS के शुरुआती दिनों में रविंद्र किशोर सिन्हा (फोटो : sisindia.com)

1974 में सिन्हा ने पटना के एक किराए के गैराज में सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (SIS) की स्थापना की. उन्हें पहला ठेका बहुत छोटा मिला. झारखंड के रामगढ़ स्थित एक फैक्ट्री में सुरक्षा के लिए 11 गार्ड देने थे. 

उस समय रामगढ़ बिहार का हिस्सा था. सिन्हा के पास अपने भर्ती किए गए लोगों के लिए वर्दी खरीदने तक के पैसे नहीं थे. उन्होंने फैक्ट्री से अग्रिम भुगतान मांगा. उस पैसे से वर्दियां खरीदीं, उन पर SIS के शुरुआती अक्षर सिलवाए और अपने पहले 11 गार्ड काम पर भेज दिए.

यह एक छोटी शुरुआत थी लेकिन इसके पीछे भविष्य को भांपने की उनकी असाधारण क्षमता थी. उस दौर में भारत में सुरक्षा का मतलब आमतौर पर मोहल्ले के चौकीदार तक सीमित था. लेकिन सिन्हा ने समझ लिया था कि तेजी से औद्योगीकरण की राह पर बढ़ रहे देश में सुरक्षा की संगठित व्यवस्था की जरूरत बढ़ेगी. फैक्ट्रियों, खदानों, बैंकों, हवाई अड्डों, कारोबारी प्रतिष्ठानों और फैलते शहरों में प्रशिक्षित और पेशेवर तरीके से काम करने वाले सुरक्षा कर्मियों की मांग होगी.

सिन्हा सिर्फ गार्ड भर्ती नहीं कर रहे थे. वे एक नए बाजार को आकार दे रहे थे, लंबे समय से उपेक्षित इस पेशे को व्यवस्थित और पेशेवर बना रहे थे. साथ ही, उन लोगों को जिंदगी की दूसरी पारी शुरू करने का मौका दे रहे थे जो कभी सशस्त्र बलों की वर्दी पहन चुके थे.

शुरुआत में कारोबार धीरे-धीरे बढ़ा लेकिन फिर उसने तेजी पकड़ ली. SIS ने बिहार से बाहर विस्तार किया, दिल्ली में अपना कॉरपोरेट कार्यालय बनाया और धीरे-धीरे देशभर में अपनी मौजूदगी कायम की. 2008 में कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा कंपनी चब सिक्योरिटी पर्सनेल का अधिग्रहण किया. यह एक बड़ा सौदा था जिसने भारतीय कंपनी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचा दिया.

रविंद्र किशोर सिन्हा लोगों की मदद करने में कभी पीछे नहीं हटे (फोटो : sisindia.com)
रविंद्र किशोर सिन्हा लोगों की मदद करने में कभी पीछे नहीं हटे (फोटो : sisindia.com)

एक और उपलब्धि थी जिसने सिन्हा को खास संतोष दिया. उनका हमेशा से सपना था कि उनकी कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो. 2017 में SIS भारतीय शेयर बाजारों में सूचीबद्ध हुई. इस तरह वे अपने क्षेत्र की देश की पहली सूचीबद्ध कंपनी बन गई.

हालांकि सिन्हा की जिंदगी को सिर्फ एक कारोबारी सफलता की कहानी मानना उनके व्यक्तित्व के सबसे आत्मीय पहलू को नजरअंदाज करना होगा. वे समाजसेवा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखने वाले व्यक्ति थे. मदद मांगने उनके पास आने वालों के लिए उनका हाथ हमेशा खुला रहता था.

बिहार के बहुत से लोगों के लिए सिन्हा की पहचान सिर्फ एक सफल कारोबारी या बीजेपी नेता की नहीं थी. वे ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचाने जाते थे जिसके पास मुसीबत के समय मदद के लिए पहुंचा जा सकता था. 

जरूरतमंद व्यक्ति, अपने बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए संघर्ष कर रहा परिवार, आर्थिक संकट से जूझ रहा कोई शख्स या नौकरी की तलाश में भटक रहा व्यक्ति उनके दरवाजे पर दस्तक दे सकता था. उन्हें जानने वाले बताते हैं कि अगर कोई व्यक्ति वास्तविक जरूरत लेकर उनके पास पहुंचता था तो वे उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे.

उनकी समाजसेवा में एक निजी अपनापन था. किसी परिवार की जिंदगी में अपनी मदद से आए बदलाव को देखकर उन्हें संतोष मिलता था. किसी गरीब और मेधावी बच्चे की पढ़ाई का इंतजाम करना या संघर्ष कर रहे परिवार के किसी सदस्य को नौकरी दिलाकर उसकी आर्थिक स्थिति सुधारना उन्हें ऐसी खुशी देता था जो शायद किसी कारोबारी उपलब्धि से भी नहीं मिलती.

सिन्हा की समाजसेवा सिर्फ व्यक्तिगत मदद तक सीमित नहीं थी. SIS समूह और विभिन्न धर्मार्थ संस्थाओं के जरिए उन्होंने 2 लाख से अधिक युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दिलाने और वंचित वर्गों के 1 लाख से ज्यादा लोगों को स्थायी रोजगार दिलाने में मदद की. 

उनकी पहल में बिना दहेज सामूहिक विवाह, सार्वजनिक पुस्तकालय, मुफ्त एंबुलेंस सेवा, मंदिर निर्माण और बाढ़ व आपदा राहत के काम शामिल थे. 1999 में उनके बनाए देहरादून के इंडियन पब्लिक स्कूल में एक चौथाई छात्रों को मुफ्त शिक्षा दी जाती थी.

कई मायनों में सिन्हा का समाजसेवा का नजरिया बहुत सरल था. किसी व्यक्ति को एक मौका दीजिए, आप पूरे परिवार की किस्मत बदल सकते हैं. वे पहले 11 गार्डों के साथ कारोबार शुरू करने के दिनों से ही इस सोच पर अमल करते आए थे.

रविंद्र किशोर सिन्हा के बेटे ऋतुराज (फोटो : sisindia.com)
रविंद्र किशोर सिन्हा के बेटे ऋतुराज (फोटो : sisindia.com)

उनका राजनीतिक सफर भी कम उल्लेखनीय नहीं था. बीजेपी के प्रति उनकी गहरी निष्ठा थी. छात्र जीवन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े थे. वे उस पीढ़ी का हिस्सा थे जिसने बीजेपी के शुरुआती दौर से ही पार्टी को खड़ा करने में योगदान दिया. 

विचारधारा के प्रति उनकी यह प्रतिबद्धता लंबे समय तक बनी रही और उनके सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करती रही. उनकी राजनीतिक सक्रियता का एक पड़ाव 2014 में आया जब बीजेपी ने उन्हें बिहार से राज्यसभा के लिए नामित किया.

लेकिन एक और संवैधानिक जिम्मेदारी भी उन्हें मिल सकती थी. घटनाक्रम से परिचित लोगों के मुताबिक बीजेपी ने राज्यपाल पद के लिए उनके नाम पर गंभीरता से विचार किया था. सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने इस पद के लिए उनके नाम पर सक्रिय रूप से चर्चा की थी. लेकिन स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के कारण वे इस जिम्मेदारी को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थे. इसलिए उन्होंने खुद को इस संभावना से अलग कर लिया.

इतनी बड़ी कामयाबी हासिल करने के बावजूद सिन्हा का जुड़ाव अपनी जड़ों से बना रहा. वे अपनी पुरानी जिंदगी की जानी-पहचानी चीजों से जुड़े रहे. उन्हें अपनी गैराज में खड़ी महंगी कारों के बजाय इनोवा पसंद थी. वे पारंपरिक कुर्ता-पायजामा पहनते रहे और दौलत आने के बाद दिखावे पर खर्च करने में उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. उनके यहां मेहमानों के स्वागत में लिट्टी-चोखा का खास स्थान बना रहा. छुट्टियां बिताने के लिए भी उनकी पसंद विदेश के चर्चित पर्यटन स्थलों के बजाय देहरादून थी.

सिन्हा में एक पत्रकार की तरह अतीत को सहेजने की प्रवृत्ति भी थी. उनकी किताब 'जन आंदोलन' में 1970 से 1975 के बीच जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले छात्र आंदोलन का दस्तावेजीकरण किया गया है. यह किताब उस दौर से उनके जुड़ाव को दिखाती है जिसने उनकी राजनीतिक और व्यक्तिगत सोच को आकार दिया था. इसके बाद उन्होंने कई और किताबें लिखीं. इनमें 'मी एंड माई गुरु', 'महामानव मृत्युंजय', 'बेलाग-लपेट' और 'समय का सच' शामिल हैं. पत्रकारिता छोड़ने के बाद भी उनके भीतर का रिपोर्टर कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ.

अगर सिन्हा वे दूरदर्शी व्यक्ति थे जिन्होंने इस कारोबार की कल्पना की और उसे खड़ा किया, तो उनके बेटे ऋतुराज सिन्हा ने रणनीतिकार के रूप में इसे एक अलग मुकाम तक पहुंचाने में मदद की. ऋतुराज को विरासत में सिर्फ एक कारोबारी साम्राज्य नहीं मिला था, बल्कि उन्होंने खुद इसके कामकाज में गहरी दिलचस्पी ली और इसे बदलने में अहम भूमिका निभाई. 

ऋतुराज ने दून स्कूल और लीड्स यूनिवर्सिटी बिजनेस स्कूल से पढ़ाई की. इसके बाद ब्रिटेन में बैंकिंग क्षेत्र में अपना करियर शुरू किया और 2002 में SIS से जुड़ गए. उन्होंने कारोबार के विस्तार, कॉरपोरेट फाइनेंस और संचालन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया. 2017 में वे समूह के प्रबंध निदेशक बने.

ऋतुराज अपने आप में एक बड़े कारोबारी हैं. उन्होंने SIS को वित्तीय समझ, रणनीतिक सोच और विस्तार की नई दिशा दी. उनके नेतृत्व में समूह ने निजी इक्विटी कंपनियों के साथ साझेदारी की, अंतरराष्ट्रीय कंपनियों का अधिग्रहण किया और अपने कारोबार का विस्तार किया. 

कंपनी ने सुविधा प्रबंधन, नकदी के परिवेन और प्रौद्योगिकी आधारित सुरक्षा सेवाओं में भी कदम रखा. 2007 में कंपनी के पहले निजी इक्विटी सौदे में ऋतुराज की अहम भूमिका थी. इसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ कई अधिग्रहण और संयुक्त उपक्रमों का नेतृत्व किया.

2002 में ऋतुराज के कंपनी से जुड़ने के समय समूह का कारोबार करीब 25 करोड़ रुपए का था. उनके नेतृत्व में वित्त वर्ष 2026 तक यह बढ़कर लगभग 15,982 करोड़ रुपए हो गया. यह विस्तार सिर्फ सुरक्षा गार्डों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं था. इसके साथ ही एक ऐसा कारोबार खड़ा हुआ, जिसका प्रबंधन पेशेवर तरीके से होता था, जिसका संचालन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल चुका था और जिसकी सेवाओं का दायरा भी काफी बढ़ गया था.

ऋतुराज ने अपने पिता के SIS को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने के सपने को भी आगे बढ़ाया. किसी संस्थापक के नेतृत्व में चलने वाली कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध और पेशेवर प्रबंधन वाले संगठन में बदलने के लिए अलग तरह के नेतृत्व की जरूरत थी. इस बदलाव में ऋतुराज की अहम भूमिका रही. सिन्हा को अपने बेटे पर गर्व करने की पूरी वजह थी. उसने न सिर्फ उनकी विरासत को आगे बढ़ाया बल्कि उसमें एक नया आयाम भी जोड़ा.

लेकिन शायद सिन्हा की सबसे बड़ी उपलब्धि SIS का आकार, उसका कारोबार या देश के सबसे अमीर सांसदों में शामिल होना नहीं था. उनकी असली उपलब्धि वे जिंदगियां रहीं जिन्हें उन्होंने अपने सफर में छुआ. वे पूर्व सैनिक, जिसे दूसरा करियर मिला. वे ग्रामीण युवा, जिसे रोजगार का सहारा मिला. वह बच्चा, जिसकी पढ़ाई का इंतजाम हुआ. वे परिवार, जिसे निराशा के दौर में मदद मिली. और वह आम आदमी, जिसे पता था कि पटना में एक ऐसा व्यक्ति है जो उसकी बात सुन सकता है और मदद कर सकता है.

उनके निधन से हजारों लोगों की जिंदगी में ऐसा खालीपन आ गया है जिसे कारोबारी आंकड़ों या राजनीतिक पदों से नहीं मापा जा सकता. उनकी मदद पर निर्भर रहने वाले लोग, उनकी पहल से करियर शुरू करने वाले युवा, जिन परिवारों के बच्चों को उनके दखल से शिक्षा मिली और मुश्किल वक्त में जिन लोगों को उनसे सहारा मिला, उनके लिए यह नुकसान बेहद निजी है. 

इन लोगों ने सिर्फ एक मददगार व्यक्ति को नहीं खोया बल्कि ऐसे शख्स को खोया है, जिसके पास वे अपनी परेशानी लेकर जा सकते थे. जो उनकी बात सुनता था और ज्यादातर मामलों में मदद की कोशिश भी करता था.

सिन्हा अपने पीछे एक कंपनी, राजनीतिक विरासत और ऐसा परिवार छोड़ गए हैं जो उनके काम को आगे बढ़ाएगा. लेकिन उनकी सबसे आत्मीय विरासत कहीं और है. उनके कारोबार से पैदा हुए हजारों रोजगारों में, उन बच्चों के भविष्य में, जिन्हें उनकी मदद से नई दिशा मिली और उन अनगिनत लोगों की यादों में, जो उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में याद रखेंगे जिसने जरूरत के वक्त कभी किसी को अपने दरवाजे से नहीं लौटाया.

शायद रविंद्र किशोर सिन्हा को याद करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता. वे ऐसे व्यक्ति थे जो बड़े पैमाने पर सोच सकते थे, अपनी परिस्थितियों की सीमाओं से आगे सपने देख सकते थे और एक कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर सकते थे. इसके बावजूद वे अपने दरवाजे पर दस्तक देने वाले आम आदमी के लिए हमेशा सुलभ रहे. 

कुछ लोग अपने पीछे दौलत छोड़ जाते हैं. कुछ संस्थान खड़े करते हैं. लेकिन कुछ विरले लोग ऐसे होते हैं जिनके गुजरने के बाद कई लोगों की जिंदगी पहले से बेहतर होती है. सिन्हा ऐसे ही लोगों में से एक थे.

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