
आज और कल होली है. फागुन अपने अंतिम उच्छ्वास में है और चैत (चैत्र) देहरी पर आ खड़ा हुआ है. उत्तर भारत की धरती इन दिनों किसी गुप्त साधना के पूर्ण होने जैसी दीप्ति से भरी रहती है. गेहूं की बालियां हवा में झूमती हैं, सरसों का पीला रंग धीरे-धीरे स्मृति में बदल रहा है, आम की गाछी से गंध की महीन रेखाएं निकलती हैं और कोयल की पहली कूक समय की घोषणा करती है.
ऋतुएं केवल मौसम नहीं होतीं. वे भारतीय जीवन में अर्थ की तहों को खोलती हैं. फागुन और चैत का संधिकाल तो विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. यह वह क्षण है जब शीत की संकोचिता विदा लेती है और ग्रीष्म का तेज अभी दूर क्षितिज पर है. इस बीच जो ठहराव है, वही बसंत है. वही रंग का पहला संकेत है.
उत्तर भारत के गांवों में इस समय सुबह की हवा में एक प्रकार की नमी और मादकता रहती है. खेतों के बीच से गुजरते हुए लगता है कि धरती स्वयं कोई पुराना पद गुनगुना रही है. नदी के किनारे खड़े पीपल और आम के वृक्षों पर नई पत्तियां ऐसे फूटती हैं जैसे शास्त्र की किसी पंक्ति में अचानक अर्थ का आलोक उतर आया हो.
सीमांत मिथिला की फगुआ
मैं मिथिला क्षेत्र का हूं, भारत-नेपाल सीमांत का. वहां बसंत का आगमन किसी सरकारी कैलेंडर से नहीं होता. वह खेतों की हरियाली, आंगन की चहल-पहल और दालानों की बैठकों से प्रकट होता है. हमारे यहां होली की शुरुआत बसंत पंचमी से ही हो जाती है. उस दिन से फगुआ के गीतों की एक लंबी परंपरा शुरू हो जाती है. ढोलक की थाप धीरे-धीरे गांव के हर कोने में पहुंचती है.
मुझे याद है, बचपन में जब पहली बार ढोलक मेरे हाथ में आई थी, तो मैं ताल से अधिक उत्साह में था. हम खेतों की मेड़ पर बैठकर गीत गाते थे. कभी शब्द भूल जाते, कभी सुर बिगड़ जाता, पर उस असंगति में भी एक स्वाभाविकता थी. वह जीवन का अपना संगीत था.
सीमांत क्षेत्र का अपना सौंदर्य है. वहां भाषाएं भी मिलती हैं और हवाएं भी. नेपाल की ओर से आती ठंडी हवा में हिमालय की स्मृति होती है, तो इधर की धरती में गंगा के मैदानों की उर्वरता. फागुन के दिनों में यह मिलन और स्पष्ट हो उठता है. रंग का अर्थ केवल अबीर-गुलाल नहीं रह जाता, वह जन-संस्कृतियों के आदान-प्रदान का प्रतीक बन जाता है.
उत्तर भारत का बसंत और प्रकृति का व्याकरण
यदि कोई मुझसे पूछे कि उत्तर भारत का बसंत कैसा होता है, तो मैं कहूंगा कि वह धीरे-धीरे खुलने वाली पांडुलिपि है. सरसों के खेत उसका प्रथम अध्याय हैं. पीले रंग की वह अनंत पंक्ति दूर तक फैली रहती है. उसके बीच से गुजरती पगडंडी पर चलते हुए लगता है जैसे किसी चित्रकार ने धरती पर रंग उड़ेल दिया हो.

आम के पेड़ों पर मंजर (बौर) आते ही हवा में गंध की एक नई परिभाषा जन्म लेती है. मधुमक्खियां मंडराती हैं और बच्चे कच्चे आम की कल्पना में मुस्कुराते हैं. यह वही समय है जब तालाबों का जल भी किसी आंतरिक प्रसन्नता से चमकता प्रतीत होता है.
चैत के आगमन के साथ ही आकाश की नीलिमा में एक विशेष पारदर्शिता आ जाती है. बादल विरल हो जाते हैं. सूर्य की किरणें तीखी नहीं, पर स्पष्ट होती हैं. पेड़ों की छाया लंबी होकर धरती पर गिरती है. यह वह समय है जब सुबह की धूप में बैठकर कोई भी व्यक्ति सहज ही कविता की ओर प्रवृत्त हो सकता है.
होली का सांस्कृतिक अर्थ
होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है. वह सामाजिक संरचनाओं के बीच एक अस्थायी अवकाश भी है. गांवों में उस दिन जो लोग सामान्यतः संकोची रहते हैं, वे भी खुलकर हंसते हैं. रिश्तों की औपचारिकता कुछ समय के लिए ढीली पड़ जाती है. यह ढीलापन अराजकता नहीं है, वास्तव में यह समाज के आंतरिक लचीलेपन का संकेत है.
मेरे गांव में होली की पूर्व संध्या पर होलिका दहन के समय बुजुर्ग कथा सुनाते थे- प्रह्लाद की कथा, भक्ति और अहंकार की कथा. उस अग्नि के चारों ओर घूमते हुए हम बच्चे केवल उत्सव देखते थे, पर धीरे-धीरे समझ में आया कि वह अग्नि प्रतीक के साथ-साथ सामाजिक स्मृति की लौ भी है.

फागुन के गीतों में जो खुलापन है, वह केवल हास्य नहीं है. उसमें जीवन की विडंबनाओं पर एक सहज टिप्पणी भी होती है. किसान अपने श्रम के बीच, स्त्रियां अपने घरेलू दायित्वों के बीच और युवक अपने सपनों के बीच, सब एक दिन के लिए रंग में एकाकार हो जाते हैं.
सीमांत की स्मृतियां और वर्तमान का बोध
अब मैं अपने सीमांत मिथिला से दूर रहता हूं. पहले ऐसा होता था कि वर्षों बाद ही सही, होली के अवसर पर गांव लौटना संभव हो जाता था. वहां बहुत कुछ बदला हुआ दिखता था; पक्के घर बढ़ गए थे और मोबाइल की धुनें ढोलक के साथ घुल गई थीं. पर खेतों की हरियाली, आम के बौर और चैत की सुबह का आलोक अब भी वैसा ही रहता था.
पर अब मैं गांव नहीं जा पाता. यह वाक्य लिखते हुए भीतर कहीं एक सूक्ष्म रिक्ति बनती है. जीवन की गति ने जैसे एक स्थायी दूरी रच दी है. होली का दिन आता है, पर टिकट नहीं कटती. घर की देहरी आंखों के सामने नहीं आती. मेरी होली अब लौटने की घटना नहीं, बल्कि याद करने की साधना बन गई है.
मेरी होली की सारी स्मृतियां मेरे गांव 'उड़ेन' की हैं. वही मिट्टी, वही पोखर और वही आंगन जहां होलिका दहन की अग्नि उठती थी. उस अग्नि की लपटों में हम अपने बालपन की इच्छाएं फेंक देते थे. अगली सुबह जब रंग लेकर निकलते थे तो लगता था कि पूरा संसार हमारा है. वह निश्चिंतता अब स्मृति में है, पर इतनी जीवित है कि आंखें बंद करते ही सब दृश्य स्पष्ट हो उठते हैं.
अब मैं दक्षिण भारत के शहर बेंगलुरु में रहता हूं. यहां फागुन का आकाश अलग है, पेड़ों की प्रजातियां अलग हैं और उत्सव की रीति भी अलग है. अपार्टमेंट की सीमित परिधि में रंग खेला जाता है. पर होलिका की रात मैं छत पर खड़ा होकर उत्तर की ओर देखता हूं. मुझे लगता है कि हवा की किसी अदृश्य धारा में मेरे गांव के धुएं की गंध चली आती है. स्मृतियों का एक द्वार खुलता है, जिसके उस पार ढोलक की थाप है, गेहूं की बालियों की सोंधी महक है, मां की आवाज है और मित्रों की हंसी है.
भारत-नेपाल सीमांत का होना मेरे लिए केवल भौगोलिक तथ्य नहीं, बल्कि एक मानसिक स्थिति है. मैं दो दिशाओं को साथ लेकर चलता हूं. अब एक तीसरी दिशा भी है- दक्षिण की. पर इन सबके बीच मेरा गांव 'उड़ेन' मेरे भीतर ही बसा हुआ है. मैं भले ही वहां नहीं जा पाता, पर वह हर वर्ष फागुन में मेरे पास आ जाता है-स्मृति के रंग में भीगकर और मन की देहरी पर चुपचाप खड़ा होकर.
चैत की देहरी पर
चैत का आगमन किसी नए वर्ष की भूमिका जैसा है. उत्तर भारत के अनेक अंचलों में इसे 'नव संवत्सर' का प्रारंभ माना जाता है. खेतों में खड़ी फसल पकने को तैयार होती है. किसान की आंखों में श्रम का संतोष झलकता है और घरों में नई योजनाएं बनती हैं.

मुझे लगता है कि चैत हमें संयम सिखाता है. फागुन की उच्छृंखलता के बाद वह एक शांत लय लाता है. जैसे किसी वाद्य का ऊंचा स्वर धीरे-धीरे मध्यम में उतर आए. यह परिवर्तन प्रकृति के माध्यम से मनुष्य को भी भीतर से बदलता है.
इन दिनों जब मैं सुबह की धूप में खड़ा होकर आकाश को देखता हूं, तो मुझे अपने गांव की वही पुरानी सुबह याद आती है. मिट्टी की गंध, दूर कहीं से आती ढोलक की ध्वनि और मां की आवाज जो हमें भीतर बुलाती थी. समय की दूरी के बावजूद वह दृश्य मेरे भीतर जस का तस है.
रंग का स्थाई अर्थ
होली का रंग दो दिन में धुल जाता है, पर उसका जो भाव है, वह यदि मन में ठहर जाए तो वर्ष भर बना रहता है. बसंत का जो आलोक है, वह केवल पेड़ों पर नहीं, हमारी दृष्टि पर भी उतरना चाहिए. चैत की जो स्पष्टता है, वह केवल आकाश में नहीं, हमारे विचारों में भी होनी चाहिए.
उत्तर भारत की प्राकृतिक सुंदरता इन दिनों अपने चरम पर होती है. पर उससे भी अधिक सुंदर है वह सांस्कृतिक परंपरा जो ऋतुओं के साथ मनुष्य को जोड़ती है. खेत, नदी, वृक्ष, गीत और स्मृति-सब मिलकर जीवन का एक ऐसा व्याकरण रचते हैं जिसमें रंग और संयम दोनों का स्थान है.
मैं सीमांत मिथिला का एक साधारण पुत्र हूं. मेरी स्मृतियों में फगुआ की हंसी है, ढोलक की थाप है और सरसों के खेतों की पीतिमा है. आज जब होली और बसंत एक साथ मेरे सामने हैं, तो लगता है कि जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा प्रकृति ही देती है. वह सिखाती है कि परिवर्तन अनिवार्य है, पर रंग का अर्थ नष्ट नहीं होता. वह हर वर्ष लौटता है-नई आशा और नई दीप्ति के साथ.

